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पुरानी-देसी सभ्यता के डूबते हुए टापू

राजेश जोशीराजेश जोशी|सोमवार, 06 जून 2011, 13:00 IST

दिल्ली के कनॉट प्लेस में आप नई उम्र के बच्चों को अक्सर ये कहते हुए सुन सकते हैं कि अंकल डेढ़ कितना होता है, लेकिन जमना पार करके नोएडा होते हुए भट्टा-पारसौल और आगे निकलें तो पाएँगे कि देहातों की अपनी बोली-बानी अभी ज़िंदा हैं.

ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच 165 किलोमीटर लंबे यमुना एक्सप्रेस हाईवे के किनारे किनारे सफ़र करके अभी तीन-एक दिन पहले ही लौटा हूँ. वहाँ अब भी कोस-कोस पर पानी बदला हुआ होता है और चार कोस पर बानी भी बदल जाती है.

जून की तपती और सुनसान दुपहरी में घरबरा गाँव के नुक्कड़ पर बैठकर बाघ-बकरी खेलता हुआ बेरोज़गार नौजवान शिकायत करता है -- 'नौकरी तो है ना और जमीन ले ली जेपी ने... क्या करेंगे? सोलह गोटी खेलैंगे. और क्या करेंगे?'


farmers protest in western uttar pradesh

यमुना एक्सप्रेस हाईवे उसके गाँव के पास से गुज़रता है, जिसके दूसरी ओर जेपी एसोसिएट्स कंपनी रेस-ट्रैक बना रही है जहाँ फ़ॉर्मूला-वन की कारें दौड़ेंगी. गाँव के तमाम किसानों की ज़मीनें इस विकास को समर्पित हो गई हैं. विकराल राज्य मशीनरी से किसानों की टक्कर जारी है. पिछले साल टप्पल में गोली चली और इस साल सात मई को भट्टा-पारसौल में लोग मारे गए.

किसानों के दुख और ग़ुस्से का एक ही रंग है स्याह -- पर बोलियाँ अलग अलग.

आगे के गाँवों में रहने वाले किसानों की भी शिकायत वही है - धोखाधड़ी, ज़ोर-ज़बरदस्ती करके ज़मीन छीन ली सरकार ने. लेकिन बातचीत में मेरे-तेरे की जगह ब्रजभाषा की मीठी मोए-तोए घुल जाती है. 'मोए का पतो कि जमीन क्यों ले रइयै मायावती. हमतै तो कोई पूछतो भी नईं. जबरदस्ती धारा लगाय दई. हमें पतो भी नाय चलो. हमतै कौन पूछ रओ है.'

ये किसान समाज एक युगांतर पर खड़ा है. उसके एक ओर उसका गाँव है, गोशाला है, मंदिर है, सामाजिक संबंध हैं तो दूसरी ओर आलीशान हाई-वे है, ग्राँ-प्री कार रेस ट्रैक है, शॉपिंग मॉल्स, स्टेडियम, चमकदार आइ-टी हब्स, मल्टीप्लैक्सेज़, गॉल्फ़ कोर्स और लक्ज़री हाउसिंग है.

समुद्र में उठते ज्वार की तरह नए ज़माने की ये सुविधाएँ गाँवों को चारों ओर से घेरती जा रही है. गाँव अब पुरानी-देसी सभ्यता के टापू जैसे रह गए हैं. धीरे-धीरे डूबते हुए टापू.

एक तरह की कॉलोनियाँ बन रही हैं, उनमें एक लहजे में बोलने वाले आएँगे.. जो एक तरह का संगीत सुनेंगे और प्रेम संबंधों के बारे में एक तरह की राय रखेंगे.

ऐसे में देहाती संस्कृति का कोई एक आध टापू बचा भी रह सकता है. अगर बीस साल बाद वहाँ का बच्चा पूछे कि अंकल डेढ़ कितना होता है तो अचरज मत करना.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:54 IST, 06 जून 2011 BINOD KUMAR SINGH:

    राजेश जी आपने बहुत अच्छा लिखा है.

  • 2. 15:05 IST, 06 जून 2011 naval joshi:

    राजेश जी ने विकास के नाम पर देश की अस्मिता, पहचान और आत्मा को कुचल डालने वाले मार्मिक प्रसंग को उठाया है. लेकिन इसे पुरानी-देशी सभ्यता के डूबते टापू कहना, ये बात उचित मालूम नहीं पड़ती क्योंकि इससे यह प्रतिध्वनित होता है कि हमारी सम्यता पुरानी और देशी होने के कारण ही टापूनुमा होती जा रही है. इस बात से आप भी सहमत होंगे ही यह संकट सुनियोजित तरीके से कुटिल लोगों द्वारा हम पर थोपा जा रहा है. इसके लिए कोई बाहरी देश ज़िम्मेदार नहीं है बल्कि वे लोग ज़िम्मेदार हैं जिनको हमने संसद और विधानसभाओं में भेजा है. उन्होंने हमें विकास का नारा दिया और विकास का मतलब उनके लिए यही था कि दूसरे देशों की चौथी और पांचवीं पीढ़ी की तकनीक हमारे यहां खपा कर दलाली के रूप में कुछ डॉलर कमा लिए जाएं. हमारी सभ्यता को देशी व पुरानी बताकर उसके प्रति हीनता का भाव पैदा किया जाए जिससे कि हमारा समाज अपनी जड़ों से उखड़ जाए ये मुझे ठीक नहीं लगता. यह सत्य है कि अगर हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें तो हमारी सभ्यता हमें इस योग्य जरूर बना देती है कि हम अपने देश व समाज के कुछ काम आ सकें. वैसे सभ्यता के ध्वजवाहकों की इस देश में कोई कमी नहीं है, लेकिन ये वे ही लोग हैं जो सभ्यता-संस्कृति का नारा देकर संसद और विधानसभाओं तक जा पहुंचे है और इनके ही कारनामों से देश रसातल में जा रहा है. ऐसे लोग जो देश के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं, उन्हें भूमिपुत्रों की ताक़त का अंदाज़ा नहीं है. अभी लड़ाई शुरू ही हुई है. टप्पल और भट्टा-परसौल में गोलीबारी करके इस देश की आत्मा को कुचला नहीं जा सकता है.

  • 3. 15:09 IST, 06 जून 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी बार-बार पढ़ कर भी आपके लेख को समझ नहीं पाया कि आप इस लेख के ज़रिए बीबीसी स्रोताओं को क्या संदेश देना चाहते हैं या समझाना चाहते हैं.

  • 4. 15:16 IST, 06 जून 2011 Hashmat Ali:

    भारत में अधिकांश आबादी ग़रीब है और पिछड़े इलाकों में रहती है. इंडिया वाले आर्थिक उदारीकरण के नाम पर भारत की सभ्यता को मिटाने के अलावा घर से भी बेघर करना चाहते हैं.

  • 5. 15:47 IST, 06 जून 2011 Anwar Ali:

    राजेश जोशी ने सही लिखा है. इन टापुओं को बचाना ज़रूरी है. इस्लाम जब अंधे आर्थिक दौड़ और नंगेपन का विरोध करता है तो उसे मध्ययुगीन कह कर आलोचना की जाती है. अगर हम नहीं चेते तो ये टापू भी नहीं बचेंगे.

  • 6. 17:26 IST, 06 जून 2011 prab:

    शायद सभ्य समाज ये बिल्कुल भूल गया है कि किसान अगर अपना काम छोड़ दे तो फिर सभी दाने-दाने के मोहताज हो जाएंगे.

  • 7. 12:19 IST, 07 जून 2011 Prem Kumar:

    राजेश जी, आपकी बातें दिल को छू गई. चाचा, चाची, काका, काकी, ये सारे शब्द हमारे जन-जीवन से दूर होता जा रहा है. ये हालत देख कर बड़ा दुख होता है.

  • 8. 12:58 IST, 07 जून 2011 ZIA JAFRI:

    राजेश जी, आपने टप्पल, जट्टारी, हमीदपुर, भट्टा परसौल के जिन गांवों को देखा है, वो देश की राजधानी से मात्र 100 किलोमीटर से कम दूरी पर हैं, लेकिन विकास के नाम पर कई सदियां पीछे हैं. आज भी वहां के लोग इलाज के करवाने पलवल जाते हैं, जो कि 50 किलोमीटर दूर पड़ता है. कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. अगर ये सड़क उनके गांवों में विकास लाती है तो इसमें बुराई ही क्या है? जिन को आप सभ्यता के टापू कह रहे हैं, वो पिछड़ापन है. क्या आप या आपके जैसे लोग इस सभ्यता के टापू में रहना पसंद करेंगें?

  • 9. 16:39 IST, 07 जून 2011 Amit bhatt:

    राजेश जोशी के ब्लॉग पर जाफरी साहब ने कुछ सवाल उठाये हैं,तर्क के नजरिए से आपकी बात बिल्कुल सही है लेकिन हम जिस जगह पर हैं वहॉ से यह बात ठीक नहीं है।तर्क के सहारे नतीजों तक पहुॅचने कर कोशिश गलत भी साबित हो सकती है।आपने कहा है कि सडक गॉवों में विकास लाती है। यह बात सही होने के बावजूद तब गलत हो जाती है जबकि सुदूर वन क्षेत्रों से प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करने के लिए सडकें बनायी जाती है। और ऐतराज जताने पर इन्हीं मार्गों से गॉवों की घेराबन्दी कर लोगों का दमन किया जाता है।सडक,शापिंग मॉल,स्टेडियम,गोल्फ कोर्स,मल्टीप्लैक्सेज या फार्महाउस कुछ भी बुरा नहीं है। लेकिन यह सब किसके लिए किया जाता है,यह सोचने की बात है।अग्रेजों ने मानचेस्टर का तैयार कपडा इस देश में सस्ती दरों पर बेचा और हमारे कारीगरों को तबाह कर दिया, कुछ लोग कह सकते हैं कि हम कारीगरों का बोझ नहीं उठा सकते हैं। इन्हें बरबाद हो जाने दो ,तो बात साफ है कि इन लोगों ने देश को अपनी जागीर समझ लिया है यह देश मेरा नहीं, हमारा है। यह मुगालता हो सकता है कि यह चमक देश का विकास है,लेकिन हर चमकदार वस्तु सोना नहीं होती है।सडकें गॉवों से शहरों तक आयें तो इसे विकास कहा जा सकता है लेकिन सडकें शहरों से गॉवों तक आ रही हैं तो कहा जा सकता है कि ये गलत नीयत से आ रही हैं ।विकास स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन विकास का नारा लगाकर चुनाव जीतने वाले लोग हमें बताते हैं कि सडक,कार,मोबाइल या फिर ऐसी ही दूसरी चीजें विकास है तो यह क्यों छुपाते हैं कि इनमें से कौन सी चीज हमने विकसित की है। हम सिवाय दूसरे देशों के माल को अपने यहॉ खपा कर बदले में अपनी प्राकृतिक सम्पदा और धन अकूत मात्रा में बाहर के मुल्कों के लिए दोनों हाथों से उलीच रहे हैं ।साथ ही इस आत्मग्लानी में भी दबे जा रहे हैं कि हम पिछडे और गये गुजरे लोग हैं।

  • 10. 22:55 IST, 07 जून 2011 umesh yadava:

    राजेश जी ! विकास के बहाव में जीवन नीरस होता जा रहा है. हर गाँव में विकास जरूरी है लेकिन अंधा विकास नहीं. गाँव में पहले स्कूल, अस्पताल और यातायात के उचित साधन चाहिए नाकि रेसकोर्स, मल्टीप्लेक्स और स्विमिंगपूल. यह विकास तो अमीरों की सुविधा के लिए गाँव को उजाड़ने के बराबर है. किसी ने कहा ".. जिसको आप सभ्यता का टापू कह रहे हैं वह पिछड़ापन है ..." अरे नहीं भाई ! तो फिर सभ्यता क्या है ? मल्टीप्लेक्स और स्वीमिंगपूल ? ऐसा विकास अच्छा नहीं जो एक का विकास और दूसरे का विनाश हो.

  • 11. 23:30 IST, 07 जून 2011 Amit Rai:

    राजेश जी, आप मीडिया में ऐसे एक टापू की तरह हैं जो कि इन चीज़ों से ताल्लुक़ात रखता हो. नहीं तो आज के पत्रकारों को कहाँ दिखा देती हैं यह सब चीज़ें.

  • 12. 18:08 IST, 08 जून 2011 DEEPAK CHANDOK:

    आरका ब्लॉग मुझे पसंद आया. लेकिन ये नहीं समझ सका कि पिछड़ेपन की बात क्यों की जा रही है. हमारी संस्कृति तो अब भी गांवों में जीवित है, हमें उसे सहेजने के बारे में, ऐसे सोचना चाहिए.

  • 13. 09:26 IST, 09 जून 2011 Jay Krishna:

    शहरों की अनियंत्रित भौतिक ख्वाहिशें गांवों की खांटी देसी पहचान को निर्ममता से लील रही हैं पर अफ़सोस तो इतना है कि ये सब वह सरकार कर रही है जो हमारी चुनी हुई कही जाती है.

  • 14. 12:30 IST, 09 जून 2011 Mukesh Purohit:

    राजस्थान की एक प्राचीन कहावत है (गरीब गुरबा पिटींजन जोग, पतला रेसा कटीजन जोग) जिसका हिंदी रूपांतरण कुछ इस प्रकार है - हाथ पर हाथ धरे बैठे, हर कमज़ोर लूटीजन जोग.
    इस से ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है. आपकी सूचना मार्मिक एवं दिल को छू लेने वाली है.

  • 15. 16:27 IST, 13 जून 2011 Jyotsna Kumari:

    राजेश जी आपका ब्लॉग बहुत समकालीन विषय पर आधारित है . बहुत से बच्चे है आज कि संस्कृति में जिन्होंने कभी गाँव नहीं देखा . उनके लिए डेढ़ क्या होता है ये पूछना कोई आश्चर्य कि बात नहीं है . और विकास और निवेश के चक्कर में कम्पनियां ये भूल जाती है कि ज़मीन का बचा रहना हर विकास से ज्यादा जरुरी है क्यूंकि आखिरकार तो ज़मीन से ही खाना उपजने वाला है . वो किसी फैक्ट्री में नहीं बनने वाला इसलिए उसके लिए ये बहुत जरुरी है कि हम थोडा बैलेंस बना के चले . ज़मीन का जाना केवल ज़मीन का जाना ही नहीं होता , उसके साथ रोजी का जरिया , और बहुत सारे लोगों के रूट ख़त्म हो जाते है , वो हमेशा के लिए प्रवासी बन के रह जाते है . शहरी गरीब के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यही है . ग्रामीण गरीब कि हालत तो फिर भी अच्छी होती है , शहरी गरीब तो नरक कि जिंदगी जीता है . उसके लिए जिम्मेदार वही लोग होते है जो उनके हिस्से कि ज़मीन खा जाते हैं

  • 16. 18:44 IST, 17 जून 2011 Rehmat, Badwani (MP):

    इसी प्रकार के टापू नर्मदा घाटी में भी जगह-जगह बनाए जा रहे हैं।

    मध्यप्रदेश में नर्मदा नदी पर एक पनबिजली परियोजना का निर्माण कपड़े की मार्केटिंग करने वाली निजी कंपनी एस कुमार्स कर रही है। इससे नर्मदा किनारे के 61 गाँवों के लोग, बेहतरीन खेती की जमीन, पुरातत्वीय अवशेष और पूरी संस्कृति डूबने वाली है।

    इस अन्यायकारी परियोजना का स्था‍नीय किसान, मजदूर और मछुआरे 1990 से ही कड़ा विरोध कर रहे हैं। विरोध को दबाने के लिए स्थानीय सरकार ने नागरिकों पर जो जुल्म ढाए वे भले ही जलियॉंवाला बाग हत्याकाण्ड के समान न हो पर अंग्रेजों की याद ताजा करने के लिए पर्याप्त हैं। सरकार ने इस काम के लिए भोपालसिंह नाम के जिस बंदे को कलेक्टर नियुक्तय किया था उसका प्रमुख कार्य ही निजी कंपनी की दलाली करना था।

    गरीब समुदायों पर जुल्म ढाते हुए उनकी जमीनें, घर-द्वार और रोजी-रोटी छीनने वाली सरकार के मुखिया उन दिनों वहीं महान दिग्विजयसिंह थे जो भट्टा-पारसौल में किसानों के हितेषी होने का ढोंग कर रहे थे।

    पहले महेश्वर परियोजना का निर्माण मध्यप्रदेश बिजली बोर्ड कर रहा था। फिर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण इसकी मालिक बनी और अंत में, सार्वजनिक संपत्तियों की नीलामी के दौर में, इस परियोजना को एस कुमार्स को सौंप दिया गया। परियोजना निर्माण हेतु कंपनी को बगैर किसी जमानत के मध्यप्रदेश स्टेट इण्डस्ट्रीतयल कॉर्पोरेशन से भारी लोन दिलवा दिया गया। लेकिन एस कुमार्स ने अभी तक फूटी कौड़ी भी वापस नहीं लौटाई है। सरकार हर छह महीने में केबिनेट मीटिंग में कंपनी को भुगतान से छूट देते हुए सार्वजनिक संसाधन लूटने वाले औद्योगिक घरानों को प्रोत्साहित कर रही है। वर्ष 2004 से मध्यप्रदेश में सत्ता बदल चुकी है। सत्ता में आई भाजपा ने भी कंपनी को बगैर किसी भेदभाव के पूर्ववत मदद जारी रखी है।

    लोगों के पुनर्वास के अभाव में और पर्यावरणीय शर्ते पूरी न कर पाने के कारण पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने पिछले वर्ष महेश्वर परियोजना के आगामी निर्माण पर रोक लगा दी थी। पिछले माह मंत्रालय ने परियोजना के निर्माण से रोक हटा दी है। परियोजना पर रोक के खिलाफ बेईमान कंपनी का पक्ष लेते हुए अब के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह और तब के मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह दोनों ने प्रधानमंत्री कार्यालय के कई चक्कर लगाए। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने परियोजना से रोक हटाने के अपने फैसले में लिखा है कि दिग्विजयसिंह और शिवराजसिंह द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय में बनाए गए दबाव के बाद उनके लिए परियोजना को स्वीकृति देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

    यह भट्टा पारसौल से ठीक उल्टा दृश्य है। वहॉं कांग्रेस और भाजपा के बड़े नेता किसानों की जमीन बचाने का नाटक कर रहे थे। लेकिन नर्मदा घाटी में ये दोनों ही राजनैतिक दल लोगों को उनके घर, जमीन और आजीविका से उजाड़ने हेतु संगठित हुए हैं।

    जब तक देश के इन बड़े राजनैतिक दलों को समाज के सबसे कमजोर तबकों के प्रति अन्याय और उनके दमन के लिए राजनैतिक गठजोड़ बनाने में शर्म महसूस नहीं होगी तब तक देश में ऐसे टापू बनते रहेंगें। इन्ही अवसरवादी राजनैतिक दलों के कारण "देसी" लोगों की यह नियति बन चुकी है।

  • 17. 21:23 IST, 17 जून 2011 Manish Pachauri:

    राजेश जी आपका लेख बेहद पसंद आया.

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