इस विषय के अंतर्गत रखें अगस्त 2009

सीनियर सिटीज़ेन यानी असुरक्षित नागरिक

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|सोमवार, 31 अगस्त 2009, 12:00

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सुबह जब अख़बार उठाती हूँ तो पता रहता है कि उसके पांचवें-छठे पन्ने पर बुज़ुर्गों यानी सीनियर सिटीज़ेन्स की हत्याओं की दो-चार ख़बरें ज़रूर पढ़ने में आएँगी.

यह प्रवृत्ति पिछले कुछ दिन में बढ़ी है.

आम तौर पर ऐसे बुज़ुर्गों को निशाना बनाया जा रहा है जो अकेले रहते हैं. या फिर घर में बस पति-पत्नी ही हैं.

ऐसी बहुत सी हत्याएँ ऐसी कॉलोनियों में हुई हैं जहाँ गेट पर पहरा रहता है. किसी भी आने-जाने वाले की शिनाख़्त होती है.

इससे अंदाज़ा लगता है कि यह हत्याएँ जान-पहचान वालों ने की हैं. यानी जिनके आने पर घर के लोग बिना किसी शक शुब्हे के दरवाज़ा खोल देते हैं.

क्या यह हाल भारत में ही है? या विदेशों में भी बुज़ुर्ग इतने ही असुरक्षित हैं? मेरे विचार में क्योंकि विदेशों में यह प्रथा हमेशा से ही इतनी आम है, बुज़ुर्गों को अपनी सुरक्षा की चिंता करनी ही पड़ती है.

भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में अब भी अपेक्षा की जाती है कि संतान अपने बूढ़े माता-पिता का ध्यान रखेगी और उन्हें अकेला रहने पर मजबूर नहीं होना पड़ेगा.

कभी-कभी यह स्थिति अपरिहार्य भी हो जाती है. संतान अगर विदेश में है या दूसरे शहर में नौकरी पर है तो यह स्थिति लाज़मी ही है.

लेकिन तब मन बड़ा दुखता है कि उसी शहर में मौजूद बच्चों ने माता-पिता को फ़ोन किया और फ़ोन नहीं उठाया गया तो यह सोच कर निश्चिंत हो गए कि माता जी मंदिर या पिता जी बाज़ार गए होंगे.

दरवाज़ा तब तोड़ा गया जब घर के अंदर से बदबू आने लगी और पड़ोसियों का माथा ठनका.

जिन्ना, जसवंत और पाकिस्तान...

मोहम्मद हनीफ़मोहम्मद हनीफ़|सोमवार, 24 अगस्त 2009, 15:59

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किताब जसवंत सिंह ने लिखी, उन्हें पार्टी से बीजेपी ने निकाला, किताब पर पाबंदी गुजरात सरकार ने लगाई, लेकिन ख़ुश पाकिस्तानी हैं.

हिंदू संकीर्णता का फ़लसफ़ा जो हमें बचपन से पढ़ाया जाता है हमें उसका जीता-जागता एक और सुबूत मिल गया. मोहम्मद अली जिन्ना की महानता को हमारे दुश्मनों ने भी स्वीकृति दे दी. हिंदू-मुस्लिम ऐतिहासिक दंगल में हमारा पहलवान जीत गया. काफ़िरों ने भी हमारे क़ायद को क़ायदे आज़म मान लिया.

पाकिस्तान हाल के दिनों में इतने आरोपों को झेल चुका है कि हम ख़ुशी का कोई छोटे से छोटा मौक़ा हाथ से नहीं गंवाना चाहते. वर्ल्ड ट्वेंटी 20 का फ़ायनल हो या जश्ने आज़ादी, हम लोग बंदूक़ें निकाल कर हवाई फ़ायरिंग शुरू कर देते हैं. क्या करें मौक़ा भी तो कभी-कभी मिलता है.

लेकिन हवाई फ़ायरिंग के इस सिलसिले को एक लम्हे के लिए रोक कर ज़रा यह भी सोचिए कि क्या हमारे प्रबुद्ध राजनीतिज्ञ भी कभी ऐसा करेंगे जो जसवंत सिंह ने किया है. क्या मौलाना फ़ज़लुर्रहमान कभी कोई किताब लिख कर गांधी के अहिंसा के फ़लसफ़े का प्रचार करते हुए पाए जाएँगे. क्या कोई मंज़ूर विटू से अपेक्षा करता है कि वह हिंदुस्तान के इंक़िलाब के बारे में एक किताब लिख डालें. क्या शहबाज़ शरीफ़ कभी भूल कर भी कहेंगे कि 'गुड गवर्नेन्स' उन्होंने नेहरू से सीखी.

कहने वाले कहते हैं कि अच्छे दिन में मुल्ला उमर (अफ़ग़ानिस्तान वाले असली मुल्ला उमर, पाकिस्तान की हिरासत में मौजूद तालेबानी प्रवक्ता नहीं) मुसलमानों के लीडर बनने से पहले इस्लामाबाद तशरीफ़ लाए. जिस कमरे में उनकी पाकिस्तान के रहनुमाओं के साथ मीटिंग थी वहाँ दीवार पर एक तस्वीर लगी थी जो हर सरकारी दफ़्तर में होती है. मुल्ला उमर ने फ़रमाया कि तस्वीर उतारी जाए वरना वह उस कमरे में नहीं रहेंगे. अहलकारों ने उन्हें बताया, लेकिन यह तो क़ायदे आज़म की तस्वीर है. मुल्ला उमर ने बड़ी मासूमियत से कहा, वह कौन है?

कभी लगता है कि हर सरकारी दफ़्तर में, हर थाने-कचहरी में, टेलीविज़न पर हर फ़ौजी तानाशाह
के पीछे से झांकता हुआ क़ायदे आज़म का सरकारी पोर्ट्रेट हम से सिर्फ़ यही सवाल पूछता हैः मैं कौन हूँ? मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?

क्योंकि इस प्यारे देश में मोहम्मद अली जिन्ना ग़रीब की वह जोरू बन कर रह गए हैं कि जिसका जो चाहे नाम रखे और जैसे चाहे इस्तेमाल करे.

मौलाना हज़रात उनके नाम के साथ रहमतुल्लाह की उपाधि लगा कर उन्हें पाँचवां ख़लीफ़ा साबित करने की कोशिश करते हैं. क़ौमी एकता का शग़ल करने वाले उनकी शेरवानी और टोपी दिखा-दिखा कर एक क़ौम बनने और उर्दू बोलने की नसीहत देते हैं. और आज़ाद ख़्याल वर्ग उनके सूटों वाली तस्वीरें, अंग्रेज़ों वाली अंग्रेज़ी और मद्यपान का शौक़ याद दिला कर एक सेक्युलर जन्नत के ख़्वाब दिखाते हैं.

लेकिन जिस समाज में इंक़िलाब अता करने का शौक़ इतना बेताब हो कि अंग्रेज़ी ज़बान में बंगालियों को हुक्म दिया जाए कि उर्दू बोलो, जहाँ बंधुआ मज़दूर को मजबूर किया जाए कि वह पेट पर पत्थर बांध कर न सिर्फ़ अमीरों के महल का निर्माण करे बल्कि उनकी हिफ़ाज़त भी करे और फिर अपनी ख़ुशक़िस्मती पर ख़ुदा का शुक्र भी अदा करे ऐसे समाज में यक़ीनन मोहम्मद अली जिन्ना एक ही वक़्त में रहमतुल्लाह भी हो सकते हैं और काफ़िरे आज़म भी.

विवाद होगा तो बिक्री भी होगी

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|गुरुवार, 20 अगस्त 2009, 23:37

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अकबर इलाहाबादी कह गए हैं- 'बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीदार नहीं हूँ'... सदी गुज़र गई किसी ने नहीं लिखा--'बाज़ार में बैठा हूँ, दुकानदार नहीं हूँ'.

तरह-तरह के दुकानदार होते हैं. कुछ मोलभाव करते हैं, कुछ 'फ़िक्स्ड प्राइज़' का बोर्ड लगाते हैं, कुछ कहते हैं, 'नहीं ख़रीदा तो पछताओगे, मेरे क्या है, मैं तो लुटा रहा हूँ.' कुछ ऐसे भी होते हैं जो कहते हैं कि मैं तो दुकानदार ही नहीं हूँ, जनकल्याण कर रहा हूँ. संत-समाजसेवी टाइप.

कई हैं जो बेचते कुछ हैं, बताते कुछ और हैं. सैकड़ों मिसालों में सुविधा के लिए दो नाम-- अटल बिहारी वाजपेयी और विश्वनाथ प्रताप सिंह...

कवि थे लेकिन ग़लती से राजनीति में आ गए, दूसरे चित्रकार थे राजनीति के रंग में दुर्घटनावश से रंग गए. कवियों की संगत में नेता, नेताओं की संगत में चित्रकार, माया मिली और राम भी.

पता नहीं कौन-कौन, कहाँ-कहाँ, क्या-क्या बेच रहा है, लेकिन आजकल दो नाम चर्चा में हैं जिन पर बेचने का आरोप लगाया जा रहा है मानो बेचना कोई बुरी बात हो. वैसे भी बुरी चीज़ नहीं बेच रहे हैं, एक को फ़िल्म बेचनी है, दूसरे को किताब.

दुनिया के बाज़ार में सब दुकानदार हैं, मुक़ाबला सख़्त है, जो अक्ल लगाए, बेच ले जाए. सैकड़ों फिल्में बनती हैं, कितनी हिट होती हैं? सैकड़ों किताबें छपती हैं, कितनी बिकती हैं?

करोड़ों खर्च करके इतनी पब्लिसिटी नहीं मिलती, जितनी इस तरह मिली है.

'प्रधानमंत्री के दफ़्तर के भेदिए' की पीठ पर लादकर किताब बेचने की, अमरीका की रंगीनियाँ दिखाकर फ़िल्में बेचने की कोशिशें हो चुकी हैं. इस बार 'विलेन' को 'हीरो' बनाकर किताब बेचने की, अमरीका को 'नस्लवादी' बताकर फ़िल्म बेचने की बारी है.

नीतियों, सिद्धांतों, विचारों, उसूलों की बात करने वाले बातें करते रहेंगे. ख़रीदार तय करेंगे, क्या बिकेगा, क्या नहीं.

बाज़ार की नीति, सिद्धांत, उसूल एक ही है-- सिक्का वही खरा है जो चल जाए. चाहे मुझे-आपको बुरा लगे या भला.

एक तीर कई निशाने!!!

पोस्ट के विषय:

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|बुधवार, 19 अगस्त 2009, 17:47

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अगर यह सब कुछ सच में नहीं हो रहा होता, अगर इसके मुख्य पात्र भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी और पिछले तीन दशकों से उस पार्टी की प्रथम पंक्ति में खड़े एक नेता नहीं होते तो भाजपा-जिन्ना-जसवंत की इस तिकड़ी का किस्सा एक अलग किस्म की ग्रीक त्रासदी होती जिसके अंत में शायद रोना कम और हँसी ज़्यादा आती.

पूरे प्रकरण को दो तरह से देखा जा सकता है. मैं दोनों विश्लेषण लिख देता हूँ, आप जिसे चाहें सही मानें और उसी विश्लेषण का चश्मा पहन भाजपा का भविष्य देखें.

पहला विश्लेषण

यह एक दिशाहीन नेतृत्व द्वारा लोगों का ध्यान, भाजपा को चुनौती दे रही अगली समस्याओं से हटाने की कोशिश है. पार्टी के समक्ष चुनौती है- आडवाणी के बाद कौन? सत्ताधारी नेतृत्व का कांग्रेस का नेतृत्व किस युवा दिशा में जा रहा है सबको दिख रहा है. भाजपा में आडवाणी फ़िलहाल पद छोड़ने के मूड में नहीं हैं और सुषमा, जेटली, नरेंद्र मोदी, अनंत कुमार जैसे उनके समर्थकों की टोली को अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा.

2004 और 2009 के दो आम चुनाव हारने के बाद भाजपा के समक्ष संगठन को वापिस खड़ा करने और कांग्रेस के सामने मज़बूत विपक्ष की भूमिका अदा करने की चुनौती है. राजनाथ सिंह का कार्यकाल भी अगले साल की शुरुआत में समाप्त होने जा रहा है. पार्टी को यह सोचना चाहिए कि उनके बाद पार्टी की बागडोर किसके हाथ में होगी ना कि आडवाणी बनाम राजनाथ सिंह के छद्म युद्ध में फँसना चाहिए.

पार्टी को राजस्थान में चल रही बग़ावत पर ध्यान देना चाहिए. साथ ही 2014 में लगातार तीसरा चुनाव वो ना हारे इस बारे में चिंतन करना चाहिए.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा में टकराव नहीं सामंजस्य कैसे बढ़े इस पर सोचना चाहिए. भाजपा का भविष्य पिछले पाँच-छह सालों के मुकाबले और उज्ज्वल करने का एक मात्र रास्ता स्वस्थ और ईमानदार आत्मचिंतन ही होगा.

पर चिंतन बैठक में क्या होता है? जिन्ना पर पुस्तक और उसकी प्रशंसा जसवंत सिंह की पार्टी से विदाई का कारण बनती है. और एक नॉन इश्यू को इतना तूल दे दिया जाता है कि वो चिंतन बैठक में आगे होने वाली सभी कार्यवाही पर हावी हो जाता है.

कुल मिला कर पार्टी अनुशासन और सिद्धांतों के नाम पर काफ़ी वाहवाही बटोरने की कोशिश करती है पर अंत में असली मुद्दों का सामना करने का साहस नहीं जुटा पाती.

अब विश्लेषण के दूसरे पहलू पर भी नज़र डालें जिसे भाजपा नेता मीडिया को बेचने का प्रयास कर रहे हैं.

इस वर्ग का कहना है कि पार्टी में अब अनुशासनहीनता बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी चाहे नेता कितना ही बड़ा क्यों ना हो अगर वह पार्टी के सिद्धांतों, सोच और दर्शन के ख़िलाफ़ जाएगा तो उसके साथ वही होगा जो जसवंत सिंह के साथ हुआ है.

जसवंत सिंह को उदाहरण बनाना पार्टी के लिए आसान भी है. कहने को तो वो बड़े कद्दावर नेता हैं, रक्षा, विदेश और वित्त मंत्रालय सँभाल चुके हैं. पर ज़मीनी राजनीति पर उनके पार्टी में रहने या नहीं रहने से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता. जसवंत सिंह कभी भी जननेता नहीं रहे हैं. तो पार्टी उन पर निशाना साध कर वसुंधरा राजे जैसे नेताओं को भी चेता रही है जिन्होंने बाग़ी तेवर अपनाए हुए हैं.

भाजपा नेतत्व जसवंत के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर आरएसएस को भी मनाने का प्रयास कर रहा है जो मौजूदा वक़्त की ज़रूरत है. जसवंत कभी भी आरएसएस की पसंदीदा सूची में शामिल नहीं थे और मामला इस बार सिर्फ़ जिन्ना का ही नहीं था.

जसवंत सिंह ने अपने बयानों में आरएसएस के दिल के सबसे क़रीबी कांग्रेसी नेता वल्लभ भाई पटेल पर भी प्रहार कर पार्टी से अपनी बर्ख़ास्तगी का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त किया है. कुल मिला कर इस वर्ग का यह मानना है कि समय सख़्त कार्रवाई और राजनीतिक संदेश देने का था और पार्टी ने वही किया है. एक तीर से कई निशाने साधे गए हैं.

दोनों में से कौन सी सोच सच्चाई के ज्यादा क़रीब है यह फ़ैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ. हाँ एक बात तय है कि अगर जसवंत सिंह के ख़िलाफ़ मुद्दा सिर्फ़ और सिर्फ़ ज़िन्ना पर उनकी पुस्तक है तो मैं जसवंत सिंह के उस बयान से सहमत हूँ कि विचारों पर प्रतिबंध और कार्रवाई की राजनीति कोई बहुत स्वस्थ परंपरा नहीं है.

सुरक्षा ज़रूरी, लेकिन किसकी?

रेणु अगालरेणु अगाल|सोमवार, 17 अगस्त 2009, 13:17

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डर किसे कहते हैं कल पहली बार महसूस हुआ जब मैं काबुल के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र में एक मुलाक़ात के लिए पँहुची.

जनाब यहाँ आ कर पता चला कि अगर आज के राजे महाराजे किले बनाते तो वो कैसे होते. और आज आप काबुल में अमरीकी और पश्चिमी देशो के लोगो को यहाँ के राजे महाराजे समझ सकते है.

इनका कहना है कि ये यहाँ अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए आए हैं. सच, पर ये तो खुद बिल में छुपे चूहों की तरह रहते है.

मोटी बुलेट प्रूफ़ जैकेटो और हेलमेटों में से काले चश्मे पहने गोरे चेहरे नज़र आते है - हाथों में ऑटोमेटिक राइफ़िलें लिए सड़क किनारे चौराहों पर या अपनी इमारतों के सामने, उनकी सुरक्षा करते.

जब इन राजाओं के बख्तरबंध रथ निकलते है तो लोगो को दूर रहने की सलाह दी जाती है. ये कहते है पास आओगे तो गोली चल जाएगी.. तो भला आप ही बताइए कि जो लोग यूँ अपने हाथों स्वयं बंदी बने हुए हैं क्या वो लोगो के दिलो में विश्वास पैदा कर सकते है कि उनका भविष्य इनके हाथों में सुरक्षित है.

मुझे तो पहली बार इस तामझाम को देख डर लगने लगा, सोचा कि ऐसा इंतिज़ाम तो न कश्मीर में देखा न लिट्टे से लड़ रहे श्रीलंका की सेना को यूँ बंद पाया.

और इस सबके बीच इसी क्षेत्र में शनिवार को आत्मघाती हमला हुआ और सात लोग मारे गए वो धमाका जो मैने अपने होटल के कमरे से साफ सुना था.

इस धमाके का नतीजा भी वही हु्आ जो अकसर होता है... अब नैटो और अमरीकी दूतावास जिस सड़क पर हैं वहाँ आप पैदल नहीं जा सकते, अपनी किराए की टैक्सी भी नहीं लेजा सकते. यानी सख्ती आई पर बहुत देर के बाद.

ये सब यहाँ के शहरियों को पच नहीं रहा क्योकि इनकी सुरक्षा के लिए जो आए है वो बस अपनी सुरक्षा की सोच रहे हैं.

हर धमाके में सबसे ज्यादा घायल और मरने वालो की तादाद आम अफ़ग़ानों की है. तो फिर क्या इन राजाओं की वाकई ज़रूरत है?

ये सवाल मेरा नहीं इन लोगों का है..क्या है आपके पास कोई जवाब?

भाजपा बनाम आरएसएस

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|शुक्रवार, 14 अगस्त 2009, 19:29

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भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई में जो वसुंधरा हटाओ और वसुंधरा बचाओ लॉबी के बीच उखाड़-पछाड़ चल रही है वह पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर देखी जा रही आंतरिक कलह, दिशाहीनता और केंद्रीय नेतृत्व के दिवालिएपन का सबसे ताज़ा उदाहरण है.

यूँ तो वर्ष 2004 के लोकसभा के चुनाव के बाद ही भाजपा पूरी तरह से कभी भी उबर नहीं पाई. फिर जिन्ना प्रकरण पर आडवाणी की जिस तरह हेठी हुई थी उसके बाद प्रधानमंत्री पद के पार्टी के उम्मीदवार घोषित होने के बाद में वह पार्टी में अपना पहले जैसा क़द और सम्मान दोबारा स्थापित नहीं कर सके.

वाजपेयी जी की बीमारी और सक्रिय राजनीति से सन्यास और प्रमोद महाजन की असामयिक मौत ने पार्टी को और झटका दिया और रही सही कसर पूरी कर दी राजनाथ सिंह जी ने जो दरअसल राष्ट्रीय स्तर के नेता बनने लायक़ कभी थे ही नहीं, पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन बैठे.

वर्ष 2009 लोकसभा के चुनाव की हार से पार्टी नेतृत्व और आएएसएस सीखने के बजाए एक बार फिर अंतर्कलह को बढ़ावा दिया.

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशें जारी रखीं और आडवाणी जी तो कहीं गए ही नहीं, अपितु 'आडवाणी के बाद कौन' की लड़ाई में पार्टी का समूचा द्वितीय पंक्ति का नेतृत्व एक दूसरे के सम्मुख तलवार खोल कर खड़ा हो गया.

आरएसएस की दख़लअंदाज़ी कम होने के बजाए और बढ़ रही है और पार्टी में कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि आख़िरकार आरएसएस किस बात और कौन सी ताक़त के दम यह इतनी अपनी चलाना चाहता है.

ज़मीन पर सच्चाई यह है कि देशभर में आरएसएस के शाखाओं में उपस्थिति कम हो रही है और संघ की विचारधारा और कार्यक्रमों में ऐसा कुछ नहीं है जिससे देश का युवा उत्साहित या चमत्कृत हो.

भाजपा की ताक़त और उसे बल देने वाली संस्था समझे जाने वाली आरएसएस दरअसल पार्टी को कमज़ोर बना रही है और उसे पीछे खींच रही है.

पर मुश्किल यह है कि ये बात कहे कौन. बिल्ली के गले में घंटी कौन सा चूहा बांधे.

आरएसएस एक समाजिक संस्था की तरह उपयोगी है और नेहरू जी तक ने बाढ़, भूकंप इत्यादि विभीषिका के दौरान संघ के काम की प्रशंसा की थी. अगर नेहरू जी का सर्टीफ़िकेट नहीं मिलता तो भी आरएसएस के समाजिक कार्य को उनसे कोई छीन नहीं सकता और उस भूमिका में उनका काम हमेशा प्रशंसनीय रहा है.

पर उनकी राजनीतिक विचारधारा है 21वीं सदी के भारत के साथ मेल नहीं खाती और भाजपा को नुक़सान पहुँचाती है.

समय आ गया है कि भाजपा का नेतृत्व आरएसएस के साथ अपना राजनीतिक रिश्ता तोड़े. अन्यथा भाजपा और आरएसएस दोनों का ही भविष्य मौजूदा हालात में बहुत उज्जवल नहीं दिखता. अलग होने में ही दोनों पक्षों की भलाई है.

वाजपेयी जी शायद यह बीड़ा उठा पाते. पर क्या भाजपा के मौजूदा नेतृत्व में आपको एक भी ऐसा नेता दिखता है जो इस तरह की बात करने का साहस रखता हो?

मुझे तो नहीं दिखता.

जो दिखता है वह सच नहीं होता

रेणु अगालरेणु अगाल|शुक्रवार, 14 अगस्त 2009, 14:02

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मैडम आइए बहुत अच्छा माल है..नई वेरायटी आई है, इंडिया से अभी अभी.. मैं मुस्कुराई और मैने कहा, नहीं कुछ और दिखाइए ..

मन ही मन सोच रही थी..लाहौर आ कर इंडिया का सामान भला मैं क्यों खरीदूं ..

तभी फिर और आत्मीय होते हुए दुकानदार बोला, आप तो क्लिफ्टन आती होंगी हमारी दुकान पर... अब यहाँ भी खोल ली है...फिर मुझे कहना ही पड़ा कि मैं कराची नहीं दिल्ली से आई हूं...

यानी जब भी मैं पाकिस्तान गई. न कभी मुझे लगा और न शायद पाकिस्तान में किसी को, कि मैं पाकिस्तान की रहने वाली नहीं हूं.

छोटी सी बात..बस ये कि न शक्ल सूरत अलग न बातचीत का तरीका...वैसे भी अगर सीमा रेखा अंग्रेज़ खींच न गए होते तो भारत और पाकिस्तान के लोग वाकई लाहौर और दिल्ली शॉपिंग करने के लिए आते जाते. नूरजहां और लता साझी विरासत होती.

समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है और बहुत कुछ नहीं भी.

पाकिस्तान घूमने फिरने भारत से आज भी शायद वो ही जाता है जिसका परिवार या व्यापार का कोई लेना देना हो.

आज भी कई ऐसी भ्रांतियां है जो मन में बसी है. आज भी एक अजीब सा डर होता है अपनी सुरक्षा को लेकर. क्योंकि सरकारी सोच हमारी सोच पर असर तो डालती ही है.

पाकिस्तान से लौट कर ज़रुर सोच बदलती है. कहते है न,खिड़कियां खुलती है दिमाग की.

लेकिन शायद आज भी सरकारें ये नहीं चाहती क्योंकि इसी से उनकी रोज़ी रोटी भी चलती है.

दोनो देशों की समानता की सोचें तो--बड़ी-बड़ी बातें, दावे, दावतें, बड़े परिवारों की पसंद दोनों देशों में एक जैसी हैं.

थोड़ा अंतर भी है कुछ साफ़ तो कुछ छुपा-छुपा सा...मसलन पाकिस्तान में सड़क पर भीख मांगते लोग भारत से कम दिखते हैं.

मैंने मन ही मन सोचा, पाकिस्तान ने अच्छी प्रगति की है. हम तो लगता है दौड़ में पीछे रह गए..

पर तभी रावलपिंडी के एक जूता बनाने वाले की बात याद आई कि कैसे उसके लिए 50 रुपये रोज़ की कमाई में सात बच्चों का परिवार पालना मुश्किल होता है.

यानि जो दिखता है वही हमेशा सच नहीं होता.

विरासत की बात करे तो बॉलीवुड फिल्मों के लिए दीवानगी दोनों तरफ़ है लेकिन भारतीय फ़िल्मों में पाकिस्तान को जैसे दिखाया जाता है उसपर पाकिस्तान में नाराज़गी भी और लॉलीवुड की हसरत कि एक अदद अमिताभ उनके पास भी हो.

आप भारत-पाकिस्तान की बात करें और कश्मीर की नहीं तो बात अधूरी रहती है.

पहले कुछ बातें साफ कर दू --चूंकि मै पंजाब की नहीं और न ही मेरे परिवार को विभाजन झेलना पड़ा इसलिए मेरे मन में कश्मीर को लेकर कोई खास टीस भी नहीं...

तो जब मै बैठी इस मुद्दे पर कुछ लाहौरियों की नब्ज़ टटोलने तो बात शुरु हुई दोनों देशों के बीच बातचीत के महत्व से, थोड़ी गरमाई इस बात को लेकर कि ग़लती किसकी थी, हक़ किसका और एक घंटे के बाद खत्म हुई इस बात से कि हमें कश्मीर वापिस दे दो और मैं ये न कह सकी कि कश्मीर ले लो....

शायद यहीं आकर हमारा इतिहास और यथार्थ एक सा हो जाता है.

बासठ वर्षीय सारस और लोमड़ी

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|गुरुवार, 13 अगस्त 2009, 14:41

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कराची से दिल्ली हफ़्ते में एक बार फ़्लाइट जाती है और बहुत ही भरी हुई फ़्लाइट होती है. लेकिन उस रूट पर चलने वाली पीआईए के बोइंग 737 में घुसते ही दोनों देशों के आपसी संबंधों का अंदाज़ा हो जाता है.

दोनों देश चूँकि हर कुछ समय के बाद एक दूसरे से किसी भी बात को लेकर हत्थे से उखड़ जाते हैं शायद इसलिए सीट पर बैठते ही एक हत्था हिला और मेरे हाथ में आ गया.

उस फ़्लाइट में किसी दुबली पतली नाज़ुक सी एयर होस्टेस या स्मार्ट स्टुवर्ड के बजाए मोटा ताज़ा और पहलवान दिखने को मिलता है. शायद इसलिए कि भारतीय यह नहीं समझ लें कि हम देखने में उन से कमज़ोर या उन्नीस हैं.

एक मुसाफ़िर ने जब 50 वर्षीय एयर होस्टेस से पानी माँगा तो उसने दिल को लुभा लेने वाली मुस्कुराहट के साथ बहुत जल्द काग़ज़ का गिलास, पेपर नैपकिन के साथ आगे कर दिया. मैंने पानी माँगा तो अभी लाती हूँ कह कर आगे बढ़ गई.

दस मिनट बाद फिर पानी माँगा तो उसने काग़ज़ का गिलास बिना पेपर नैपकिन मेरी तरफ़ ऐसी मुस्कान के साथ बढ़ाया जैसे दोनों देश एक दूसरे को देख यूं मुस्कुराते हैं जैसे कर्ज़ ब्याज के साथ लौटा रहे हों.

मैंने सोचना शुरू किया कि इस एयर होस्टेस ने एक मुसाफ़िर को क्यों मुस्कुरा कर पेपर नैपकिन के साथ पानी दिया और मुझे क्यों एक बनावटी मुस्कान के साथ गिलास थमाया.

यूरेका!!! वजह समझ में आ गई !!! उस मुसाफ़िर ने सफ़ेद शलवार कमीज़ पहनी हुई थी और मैंने बदक़िस्मती से जींस पर फ़ैब इंडिया का गेरूआ शर्ट कुर्ता पहना हुआ था!!!

ये फ़्लाइट जिसमें आधे से अधिक वो दक्षिण भारतीय कामगार और उत्तर भारतीय प्रवासी थे जो खाड़ी के अरब देशों से कराची के रास्ते दिल्ली जा रहे थे. उन्होंने शुद्ध उर्दू में ये एलान सुना.

ख़्वातीन-ओ-हज़रात अस्सलाम अलैकुम. हम आपके शुक्रगुज़ार हैं कि आपने अपनी परवाज़ के लिए पीआईए का इंतख़ाब किया.बराहेकरम अपनी निशस्त की पुश्त सीधा कर लीजिए. बालाइख़ाना बंद कर लीजिए. आपके मुलाहिज़े के लिए हिफ़ाज़ती तादाबीर का किताबचा आपके सामने की सीट की जेब में है. हंगामी हालात में इस्तेमाल के लिए हिफ़ाज़ती जैकेट ज़ेरे निशस्त है. उम्मीद है आपका सफ़र पुरकैफ़-ओ-ख़ुशगवार गुज़रेगा.

मैंने साथ बैठे सरदार जी से पूछा गुरू जी एलान पल्ले पड़ा? कहने लगे वाहे गुरु जाने. मेरे पल्ले ते कुछ नहीं पया.

मुझे कुछ साल पहले की एक और फ़्लाइट की घोषणा याद आ गई. कृपया करके ये घोषणा ध्यान से सुनिए. ;हम मुंबई से कराची की उडा़न पर आपका हार्दिक स्वागत करते हैं. हमारी यह उडा़न एक घंटा एवं पाँच मिनट की होगी. कृपया सुरक्षा बेल्ट बाँधे रखिए. इलेक्ट्रानिक उपकरण बंद रखिए क्योंकि उड़ान के दौरान विमान के संचार तंत्र में गड़बड़ी हो सकती है. आशा है कि इंडियन एयरलाइंस से आपकी यात्रा सुरक्षित, सुखद एवं मंगलमय रहेगी.'

मुझे याद है कि मैंने एयर होस्टेस से पूछा था कि अभी जो घोषणा हुई उसमें क्या कहा गया. कहने लगी सर आप बैठिए मैं अभी सर से पूछ कर बताती हूँ कि इसका आसान हिंदीकरण क्या है.

लेकिन इसमें इन बेचारों का क्या क़सूर! दोनों देश जब भी दिल्ली और इस्लामाबाद या न्यू यॉर्क या शर्म-अल-शेख़ या सार्क की साइडलाइंस पर वार्तालाप का मंडप सजाते हैं तो दोनों तरफ़ के नेताओं और नौकरशाहों की कोशिश होती है कि ऐसी ज़बान बोलें जिस से देखने वाले को यह शक हो कि कुछ बात हो रही है. पर इस बात का कोइ मतलब न निकलने पाए.

एक था सारस और एक थी लोमड़ी. दोनों में हर समय ख़ट-पट रहती थी. एक दिन शेर की कोशिशों से दोनों में तालमेल हो गया. लोमड़ी ने कहा सारस भाई हमारे गिले-शिकवे दूर हो गए. आप मेरे घर खाने पर आइए. सारस जब बन ठन कर लोमड़ी के यहाँ पहुँचा तो लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए एक प्लेट में पतला शोरबा उसके सामने रखा दिया. सारस ने लंबी चोंच में शोरबा भरने की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ कामयाबी न हुई. और लोमड़ी अरे आप तो बहुत तकल्लुफ़ कर रहे हैं कहती हुई लप-लप सारा शोरबा पी गई.

सारस ने लोमड़ी से कहा कि कल शाम आप मेरे यहाँ खाने पर आइए मुझे बहुत ख़ुशी होगी. लोमड़ी जब पहुंची तो सारस ने एक सुराही में बोटियाँ डालकर लोमड़ी के सामने रख दिया. लोमड़ी ने अपनी थूथनी सुराही में डालने की कई बार कोशिश की लेकिन वो एक भी बोटी न निकाल सकी. सारस ने कहा अरे आप तो मुझ से भी ज़्यादा तकल्लुफ़ कर रही हैं. सारस ने अपनी लंबी चोंच सुराही में डाली और सब बोटियाँ चट कर गया.

बासठ वर्ष बाद कॉंफ़िडेंस बिल्डिंग और कंपोज़िट डायलॉग के साए में सारस और लोमड़ी की कहानी जारी है.

बैतुल्लाह: ज़ख़्मी या मर चुके

وسعت اللہ خان|गुरुवार, 13 अगस्त 2009, 10:19

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प्यारे मीडिया वालो
ऐसे हालात में जब आप किसी की मौत के ख़्वाहिशमंद हों और उसकी मौत की अपुष्ट और पुष्ट दावों के बीच झूल रहे हों तो इस स्थिति में निम्न लिखित सुर्ख़ियाँ और हेडलाइन्स आपके काम आ सकती हैं जब तक हक़ीक़त खुल न जाए.

... बैतुल्लाह महसूद मर चुके हैं. फ़िलहाल सरकार पुष्टि नहीं कर सकती (रहमान मलिक)
... बैतुल्लाह महसूद सैद्धांतिक रूप से मारे गए
... बैतुल्लाह महसूद ज़ख़्मी और मारे गए
... बैतुल्लाह महसूद 70 फ़ीसदी ज़ख़्मी
... बैतुल्लाह महसूद गंभीर रूप से ज़ख़्मी, मरने का मन बना लिया
... बैतुल्लाह महसूद के सिरहाने क़ुरान की आयतें देखी गईं
... बैतुल्लाह महसूद का दिल मुर्दा हो चुका है
... बैतुल्लाह महसूद धीरे-धीरे मर रहा है
... बैतुल्लाह महसूद नैतिक रूप से मर चुका है
... बैतुल्लाह महसूद अगर नहीं भी मरे तो एक दिन ज़रूर मर जाएंगे
... बैतुल्लाह महसूद: डेड मैन वॉकिंग!

डंके की चोट पर...

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|मंगलवार, 11 अगस्त 2009, 17:56

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मुझे मुंबई में रहते हुए लगभग छह साल हो गए हैं और जो बात मैं पिछले कुछ वर्षों से कहना चाहता था और कभी कह नहीं पाया वो मैं अब डंके की चोट पर कह सकता हूँ.

वो ये कि मैं ने दिल ही दिल में इस बात का कभी यक़ीन नहीं किया कि बिहार अपराध में सब राज्यों से आगे है और यह कि वहां 'जंगल राज्य' है.

मुझे हमेशा ये लगता था कि इस मिथ्या को या इस फ़र्ज़ी सच को पूरा सच करके पत्रकारों ने हमेशा बिना रिसर्च किए पेश किया है.

कहते हैं एक झूठ को सौ बार कहो तो वह सच लगने लगता है. बिहार 'अपराध में अव्वल' वाली बात भी कुछ ऐसी ही कहानी है.

मैं आज खुल कर इसलिए आया हूँ क्योंकि मेरे पास सबूत हैं. ज़रा इन सुर्खियों पर नज़र डालिए:

एक महिला अपने घर एक ऑटो रिक्शा में लौट रही है, अचानक एक नौजवान लड़का उनके हाथ से उनका पर्स छीन कर फ़रार हो जाता है. यह हादसा उसी जगह पर होता है जहाँ उनके साथ बिलकुल इस तरह के दो हादसे पहले भी हो चुके हैं.

एक 15 बरस की लड़की का उन्हीं के दोस्तों के हाथों बलात्कार होने की ख़बर हर अख़बार में छपी है.

एक 13 साल की लड़की को एक नौजवान फुसला कर एक होटल में तीन घंटे के लिए चेक-इन करता है. उसकी नियत ख़राब होती है. लेकिन लड़की एक बॉलीवुड के अभिनेता की बेटी होती है इसलिए उसकी इज़्ज़त बच जाती है. ये ख़बर सुर्खियों में है.

आप सोच रहे होंगे मैं बिहार की बात कर रहा हूँ. और अगर मैं कहूँ हाँ तो आपको शायद कोई हैरानी नहीं होगी लेकिन अगर मैं कहूँ कि ये खबरें मुंबई की हैं तो आप को आश्चर्य हो सकता है.

मुंबई अंडरवर्ल्ड माफ़िया के ज़रिए तस्करी, हत्याओं और दादागिरी जैसे अपराध के लिए जाना जाता है. बलात्कार, चोरी, डकैती, हत्या और इसी तरह के बड़े अपराधों के लिए उतना बदनाम नहीं है. महाराष्ट्र के अन्य शहरों का हाल भी इतना ही बुरा है.

आप सोच रहे होंगे कि अख़बारों की सुर्खियों से यह थोड़े ही साबित होता है कि मुंबई अपराध में बिहार से आगे है.

तो लीजिए सरकारी सबूत हाज़िर है: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हाल के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में, जिन में मुंबई सबसे आगे है, पिछले साल बलात्कार की संख्या थी 1558. यानी राज्य में पिछले साल1558 महिलाओं का बलात्कार हुआ लेकिन बिहार में इस अपराध की संख्या थी 1041.

अन्य अपराधों में भी बिहार से महराष्ट्र कहीं आगे है.

अगर अब कोई मुझसे कहे कि बिहार में 'जंगल राज' है तो कम से कम मैं उस व्यक्ति की ग़लत फ़हमी दूर कर सकता हूँ.

बैतुल्लाह के बहाने

पत्रकारिता की अपनी सीमाएँ हैं.किसकी नहीं हैं?

तालेबान कमांडर बैतुल्लाह महसूद ने पहले पाकिस्तानी सेना की सीमाओं का एहसास कराया और अब अनजाने में पत्रकारिता का भी.

हमने पहले पाकिस्तानी मंत्रियों के हवाले से बताया कि महसूद 'लगता है कि' मारे गए हैं, अब तालेबान के एक कमांडर कह रहे हैं कि वे ज़िंदा हैं.

दोनों में से एक ही बात सच हो सकती है, हम दोनों कह रहे हैं फिर हम सच कैसे कह रहे हैं?

दुनिया की लगभग हर समाचार संस्था सिर्फ़ सच रिपोर्ट करने का दावा करती है, हम भी करते हैं.

बैतुल्लाह ही नहीं, डूबी हुई नावें, टकराई हुई रेलगाड़ियाँ या फटे हुए बम... अक्सर पत्रकारों के लिए इम्तहान बनकर आते हैं.

पहले पुलिस कमिश्नर कह जाते हैं कि '50 लोग मारे गए', फिर गृह मंत्री बताते हैं कि '45 लोग मारे गए'... तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि पाँच लोग मरकर जी उठे?

इन पेंचों को पत्रकारिता के उस्ताद ख़ूब समझते हैं. ख़बरों के कारोबार टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख. यही वजह है कि हर विश्वसनीय समाचार माध्यम बताता है कि ख़बर किस ज़रिए से आ रही है, यह उसकी अपनी खोज नहीं है.

जब हम महसूद के मारे जाने की ख़बर तैयार कर रहे थे तो हमारे एडिटर ने याद दिलाया- 'ये ज़रूर कहना कि तालेबान ने इसकी तस्दीक नहीं की है, और ऐसे कई दावे पहले ग़लत साबित हो चुके हैं.'

हमने एक तरह से मान लिया था कि महसूद मारे गए हैं, हमने ये चर्चा भी कि उनकी जगह कौन लेगा, लेकिन साथ ही हमने लोगों को कई बार याद दिलाया कि पाकिस्तानी मंत्री ऐसा कह रहे हैं तालेबान या महसूद के परिजन नहीं.

सच को ढूँढ निकालने का जोश अच्छा पत्रकार होने की शर्त है, मगर संयम और सतर्कता हमेशा अच्छा पत्रकार बने रहने का पहला नियम.

सीमाओं को याद रखना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, ख़ास तौर पर पत्रकारों को.

कुछ लोग कहते हैं कि रेस में ध्यान सिर्फ़ तेज़ दौड़ने पर होता है, लेकिन मुझे लगता है कि अपनी लेन में ही दौड़ना चाहिए उसके बाहर नहीं.

यौन संबंधः बच्चों को जानकारी कौन दे?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|गुरुवार, 06 अगस्त 2009, 18:43

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यदि एक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि भारत में हर चौथी अविवाहित युवती यौन संबंध बना चुकी है तो यह चौंकाने वाली बात है.

भारतीय समाज कितना भी आधुनिक हो, किसी ग़ैर शादीशुदा लड़की का अपने बारे में इस तरह खुल कर बोलना आज भी उतना आम नहीं है जितना पश्चिमी समाज में.

फिर यह भी है कि इस सर्वेक्षण में मात्र 3500 लड़कियों को शामिल किया गया. इतनी कम संख्या के आधार पर संपूर्ण भारतीय समाज के बारे में किसी नतीजे पर पहुँचना कुछ अटपटा लगता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इनमें से 41 प्रतिशत को गर्भनिरोधकों की जानकारी मीडिया से मिली.

बार-बार कहा जाता है कि किशोरावस्था के लड़के-लड़कियों को यौन शिक्षा दी जाए. कुछ स्कूलों में ऐसी शुरुआत भी हुई है.

यह भी कहा जाता है कि यह माता-पिता की ज़िम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को इस बारे में जानकारी दें.

मुझे नहीं लगता भारत में ऐसे बहुत से परिवार होंगे जो अपने बड़े होते बच्चों से कहें कि यौन संबंध बनाओ लेकिन एहतियात बरतो.

तो सवाल यह है कि इस बारे में जानकारी कहाँ से मिले. किताबों से? टीचरों से? माँ-बाप से?या फिर टीवी और फ़िल्मों से?

मुझे नहीं लगता इस बारे में आप सब क्या राय रखते होंगे लेकिन मेरा मानना है कि अधकचरी जानकारी से बेहतर है कि माता-पिता ही यह उत्तरदायित्व निभाएँ.

माँ बेटी और पिता बेटे से इस बारे में बातचीत करे. उसे असुरक्षित यौन संबंधों के ख़तरों से आगाह करे.

जानकारी देने का सबका अपना-अपना तरीक़ा हो सकता है. इसका उद्देश्य ज़रूरी नहीं यह हो कि वे अपने बच्चों को इस तरह के संबंध बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं या इसे उचित ठहरा रहे हैं.

जो सेलिब्रिटी नहीं हैं उनका क्या...

चर्चा और चिंता घर न मिलने की नहीं है, इंदिरा आवासीय योजना के तहत अनगिनत लोगों को घर नहीं मिला, तब कौन-सी चिंता हुई.

एक मुसलमान दोस्त के लिए दिल्ली में फ्लैट ढूँढने के कटु अनुभव से गुज़र चुका हूँ, मकान मालिकों ने सारी बात तय होने के बाद किराएदार का नाम सुनते ही अपना इरादा बदल दिया, किसी ने कहा 'मैं तो मॉर्डन आदमी हूँ लेकिन मम्मीजी नाराज़ हो जाएँगी,' किसी ने कहा, 'सॉरी, पड़ोसी एतराज़ करेंगे...'

इमरान हाशमी और शबाना आज़मी स्टार हैं, उनकी बात लोग ग़ौर से सुनते हैं मगर बात आगे नहीं बढ़ पाती. इन सितारों से कई गुना ज्यादा मुश्किल लाखों आम लोगों को होती है.

कोई बिहारियों को घर नहीं देना चाहता तो कोई अकेले लड़के या लड़की को, कोई माँसाहारियों को घर नहीं देता तो कोई दलितों को, देश के कई हिस्सों में जाति पूछे बिना मकान देने का रिवाज नहीं है.

असली समस्या एक ही है--ख़ाली मकान के मालिक का दिमाग़ पूर्वाग्रहों से भरा होना.

मकान मालिक की कुछ जायज़ चिंताएँ होती हैं कि वक़्त पर किराया मिल जाए, मकान में तोड़फोड़ न हो, किराएदार आतंकवादी या अपराधी न हो वग़ैरह-वग़ैरह लेकिन मकान मालिक अक्सर अपने मकान की ही नहीं, किराएदार के चरित्र की हिफ़ाज़त करना भी अपना कर्तव्य समझते हैं.

मकान बेचने के मामले में तो ख़ैर सिर्फ़ दाम से मतलब होता है लेकिन पड़ोसियों का दबाव होता है कि 'यार हमारे बग़ल में किसे बसाने जा रहे हो, जाति-धर्म, खान-पान, चाल-चलन सब हमारे अनुरूप होना चाहिए'.

डेमोक्रेटिक, प्रोग्रेसिव, मॉर्डन, अर्बन, कॉस्मोपॉलिटन, सेकुलर जैसे मुलम्मों को ज़रा सा खरोंचते ही अंदर से एक शक्की, तंगनज़र आदमी झाँकने लगता है जो सिर्फ़ अपनी जाति-धर्म के लोगों के बीच ही ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है.

इमरान जिसकी बात कर रहे हैं वह तंगनज़री का बचा हुआ हिस्सा है, जिस बॉलीवुड पर शाहरुख़-सलमान और आमिर का राज चलता है वहाँ उनका नाम इमरान है. वक़्त बदला है तभी दिलीप कुमार, अजीत और जगदीप की तरह हिंदू नाम रखने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

उम्मीद है कि उन्हें जल्दी ही घर मिल जाएगा, जो सेलिब्रिटी नहीं हैं उनके बारे में ऐसी उम्मीद करना ज़रा मुश्किल है.

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