सीनियर सिटीज़ेन यानी असुरक्षित नागरिक
सुबह जब अख़बार उठाती हूँ तो पता रहता है कि उसके पांचवें-छठे पन्ने पर बुज़ुर्गों यानी सीनियर सिटीज़ेन्स की हत्याओं की दो-चार ख़बरें ज़रूर पढ़ने में आएँगी.
यह प्रवृत्ति पिछले कुछ दिन में बढ़ी है.
आम तौर पर ऐसे बुज़ुर्गों को निशाना बनाया जा रहा है जो अकेले रहते हैं. या फिर घर में बस पति-पत्नी ही हैं.
ऐसी बहुत सी हत्याएँ ऐसी कॉलोनियों में हुई हैं जहाँ गेट पर पहरा रहता है. किसी भी आने-जाने वाले की शिनाख़्त होती है.
इससे अंदाज़ा लगता है कि यह हत्याएँ जान-पहचान वालों ने की हैं. यानी जिनके आने पर घर के लोग बिना किसी शक शुब्हे के दरवाज़ा खोल देते हैं.
क्या यह हाल भारत में ही है? या विदेशों में भी बुज़ुर्ग इतने ही असुरक्षित हैं? मेरे विचार में क्योंकि विदेशों में यह प्रथा हमेशा से ही इतनी आम है, बुज़ुर्गों को अपनी सुरक्षा की चिंता करनी ही पड़ती है.
भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में अब भी अपेक्षा की जाती है कि संतान अपने बूढ़े माता-पिता का ध्यान रखेगी और उन्हें अकेला रहने पर मजबूर नहीं होना पड़ेगा.
कभी-कभी यह स्थिति अपरिहार्य भी हो जाती है. संतान अगर विदेश में है या दूसरे शहर में नौकरी पर है तो यह स्थिति लाज़मी ही है.
लेकिन तब मन बड़ा दुखता है कि उसी शहर में मौजूद बच्चों ने माता-पिता को फ़ोन किया और फ़ोन नहीं उठाया गया तो यह सोच कर निश्चिंत हो गए कि माता जी मंदिर या पिता जी बाज़ार गए होंगे.
दरवाज़ा तब तोड़ा गया जब घर के अंदर से बदबू आने लगी और पड़ोसियों का माथा ठनका.






