बैतुल्लाह के बहाने
पत्रकारिता की अपनी सीमाएँ हैं.किसकी नहीं हैं?
तालेबान कमांडर बैतुल्लाह महसूद ने पहले पाकिस्तानी सेना की सीमाओं का एहसास कराया और अब अनजाने में पत्रकारिता का भी.
हमने पहले पाकिस्तानी मंत्रियों के हवाले से बताया कि महसूद 'लगता है कि' मारे गए हैं, अब तालेबान के एक कमांडर कह रहे हैं कि वे ज़िंदा हैं.
दोनों में से एक ही बात सच हो सकती है, हम दोनों कह रहे हैं फिर हम सच कैसे कह रहे हैं?
दुनिया की लगभग हर समाचार संस्था सिर्फ़ सच रिपोर्ट करने का दावा करती है, हम भी करते हैं.
बैतुल्लाह ही नहीं, डूबी हुई नावें, टकराई हुई रेलगाड़ियाँ या फटे हुए बम... अक्सर पत्रकारों के लिए इम्तहान बनकर आते हैं.
पहले पुलिस कमिश्नर कह जाते हैं कि '50 लोग मारे गए', फिर गृह मंत्री बताते हैं कि '45 लोग मारे गए'... तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि पाँच लोग मरकर जी उठे?
इन पेंचों को पत्रकारिता के उस्ताद ख़ूब समझते हैं. ख़बरों के कारोबार टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख. यही वजह है कि हर विश्वसनीय समाचार माध्यम बताता है कि ख़बर किस ज़रिए से आ रही है, यह उसकी अपनी खोज नहीं है.
जब हम महसूद के मारे जाने की ख़बर तैयार कर रहे थे तो हमारे एडिटर ने याद दिलाया- 'ये ज़रूर कहना कि तालेबान ने इसकी तस्दीक नहीं की है, और ऐसे कई दावे पहले ग़लत साबित हो चुके हैं.'
हमने एक तरह से मान लिया था कि महसूद मारे गए हैं, हमने ये चर्चा भी कि उनकी जगह कौन लेगा, लेकिन साथ ही हमने लोगों को कई बार याद दिलाया कि पाकिस्तानी मंत्री ऐसा कह रहे हैं तालेबान या महसूद के परिजन नहीं.
सच को ढूँढ निकालने का जोश अच्छा पत्रकार होने की शर्त है, मगर संयम और सतर्कता हमेशा अच्छा पत्रकार बने रहने का पहला नियम.
सीमाओं को याद रखना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, ख़ास तौर पर पत्रकारों को.
कुछ लोग कहते हैं कि रेस में ध्यान सिर्फ़ तेज़ दौड़ने पर होता है, लेकिन मुझे लगता है कि अपनी लेन में ही दौड़ना चाहिए उसके बाहर नहीं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
राजेश जी आपने फिर सही लिखा है, लेकिन गलतियाँ बीबीसी भी करता है और मैं इसका उदाहरण भी दे सकता हूँ. आपका ये कहना सही है कि आजकल सच्ची ख़बर को बताना या सुनाना बहुत मुश्किल है. इसका एक कारण ये भी है कि अधिकतर संवाददाता मौके पर जाकर ख़बर नहीं लिखते. वो सिर्फ़ पुलिस या संबंधित अधिकारियों से बात कर ख़बर सुना देते हैं. यही बात बेतुल्लाह मेहसूद के बारे में भी है. पत्रकार रहीमुल्लाह ने सही कहा है कि बेतुल्लाह मारे गए हैं, इसका सबूत पाकिस्तान के पास नहीं है. न ही तालेबान ऐसा सबूत पेश कर पा रहा है कि बेतुल्लाह ज़िंदा है. ये सियासत है और बहुत पहले से हो रही है. पुराने ज़माने में भी युद्ध के दौरान झूठ बोलकर दुश्मन की ताक़त को कम किया जाता था. कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि आज की मीडिया या प्रिंट मीडिया पर सौ फ़ीसदी यक़ीन पर पाना बेवकूफ़ी होगी.
बहुत खूब राजेश जी. आपने पिछली बार की तरह ही तर्कसंगत बातें कही हैं. जो भी हो मैं तो इसे भी बाज़ारवाद की ही संज्ञा दूँगा. ख़बर को इतना तोड़ो-मरोड़ो कि वो भी एक ख़बर बन जाए. आपने कम ही शब्दों में सारी बातें कह डालीं. मेरे लिए तो कुछ अब बचा ही नहीं....शायद इसलिए बीबीसी की साख अभी तक कायम है.
दुर्गम स्थलों में जाकर ऐसे मामलों की जाँच पड़ताल एक पत्रकार के लिए मुश्किल कार्य है. काफ़ी हद तक सरकारी व विश्वस्त सूत्रों के भरोसे रिपोर्टिंग करनी पड़ती है. चाहे वो दाउद इब्राहिम हो, बैतुल्ला महसूद हो या ओसामा बिन लादेन का मामला हो. बीबीसी ने हमेशा तथ्यात्मक सबूतों के भरोसे पत्रकारिता कर आम जनता का विश्वास हासिल किया है. इस मुकाम पर पहुँचने के लिए बीबीसी को कई होनहार पत्रकारों की जान खोने का गम भी है. मैं राजेश के विचारों से सहमत हूँ.
बिल्कुल सही कहा, ख़बर पेश करते वक़्त बहुत सारे शब्दों के प्रयोग में सावधानी रखनी पड़ती है और रखनी भी चाहिए.
फटाफट और सबसे पहले ख़बरें देने के मुक़ाबले का ही नतीजा है कि इस तरह की विरोधाभासी ख़बरें होती हैं. मुझे लगता है कि ज़्यादातर पत्रकार अपने संबंधों को भुनाकर टेबल रिपोर्टिंग कर रहे हैं.
आपकी सोच समयोचित है, ख़ासकर ऐसे समय पर जब मीडिया एथिक्स के नाम पर सिर्फ़ बहस ही हो रही है, या शायद वह भी नहीं. सच कहूँ तो ख़बरों के अवतरण में भारतीय माध्यमों को बहुत आगे जाने की ज़रूरत है, ख़ासकर ख़बरों की संवेदनशीलता पहचानने में. लेकिन जिस माहौल में ख़बरें सिर्फ़ बेची जाने वाली चीज़ें समझी जाती हैं, उसमें यह उम्मीद रखना भी बेकार है.
राजेश जी, आपने बिल्कुल सही कहा और इसकी ठीक तरह से व्याख्या की. पत्रकार को जितना हो सके उपलब्ध तथ्यों के आधार पर सही जानकारी परोसनी चाहिए. बीबीसी की विश्वसनीयता इस मायने में कई गुना बढ़ जाती है कि वो अपने सूत्रों से तालेबान के पक्ष को भी सही तरीके से सामने रखे.
बहुत सही कहा आपने, असल में पत्रकारों को अपनी सीमाएँ समझने की बहुत ज़रूरत है. टीवी चैनल वाले तो ऐसे बात करते हैं जैसे उन्हें सब कुछ पता हो. अपनी गलती तो कोई मानने को तैयर ही नहीं होता है. आपने बहुत ईमानदारी से सवाल उठाए, इसलिए अच्छा लगा. वर्ना पत्रकारों के पास अपनी डींगें हांकने के अलावा फुरसत ही कहां होती है.
आपने याद दिलाया तो मुझे भी याद आया. कुछ पत्रकारों को छोड़कर ज़्यादातर पत्रकार अपने माध्यमों से ही ख़बरें बताते हैं. ख़बरों को सनसनी या रोचक बनाने के लिए कई तरह के हथकंडे भी अपनाते हैं जिससे लोग चाव से पढ़ें. यह सही है कि उनको संयम बरतना चाहिए, लेकिन कम और गिने चुने लोग ही ऐसे हैं जो इन बातों का ध्यान देते हैं. बाक़ी तो ख़बरें बनाने या सुर्ख़ियों में बने रहने का ध्यान देते हैं.
सही बात है, एक अच्छे पत्रकार के लिए सही समाचार खोज निकालना और सही ढंग प्रस्तुत करना बहुत कठिन है. मैं कुछ ज्यादा नहीं कहूँगा अगर आपको बीबीसी हिंदी की पत्रकारिता के बारे में जानना और समझाना है तो इसी वेबसाइट पर 'बीबीसी पत्रकारिता पाठशाला' [लिंक - https://www.bbc.co.uk/hindi/specials/1228_cojo_hindi/index.shtml%5D लेख पढें. यह अचला शर्मा जी और शिवकांत जी का बहुत ही अच्छा लेख है.
बीबीसी हिंदी आज भी दुनिया के सबसे निष्पक्ष समाचार माध्यम में से एक है.
राजेश जी ये आपने बहुत अच्छा लिखा है पर कितने पत्रकार और टीवी जर्नलिस्ट सही खबर देते हैं. किसी बात से उनका मतलब निकलता है तो वे चुप हो जाते हैं. बीबीसी ने भी कई बार सच कहने का साहस नहीं किया है. आप लोग भी मौका देखकर चुप हो जाते हैं, लेकिन दूसरे चैनलों के मुकाबले बीबीसी पर अधिक विश्वास किया जा सकता है. मुझे उम्मीद है कि आप लोग मेरे विश्वास पर खरे उतरेंगे.
शायद बाज़ारवाद और प्रतिस्पर्धा के कारण पत्रकारिता का स्तर पहले जैसा नही रहा, पास मे पैसे हों तो न्यूज़ चैनल खोलना समोसे कि दुकान खोलने जैसा असान हो गया है, और जब समोसे बेचने का कॉम्पिटीशन होता है तो समोसे सस्ते और स्वादिष्ट बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, ग्राहक की सेहत की चिंता सिर्फ़ कुछ बड़ी और नामचीन दुकानों को ही होती है.
कल ही मैं एक हिंदी वेबसाइट पर ये ख़बर पढ़ रहा था उस साइट के शब्द कुछ यूं थे, ' बेटे की चाहत मे मारा गया बैतुल्लाह मेह्सूद, मेहसूद की चार बेटियां हैं और उसे एक बेटे की ख्वाहिश थी जिसके लिए वो अपनी दूसरी पत्नी से मिलने गया था, जहां ड्रोन हमले में उसकी मौत हो गई'
एक तरफ़ बड़े दिग्गज बैतुल्लाह की मौत कनफ़र्म नही कर पा रहे और दूसरी तरफ़ ऐसी व्याख्या जैसे एक पत्रकार उस (मानवरहित) ड्रोन के ऊपर बैठा था और दूसरा अमरीकन कमांड सेंटर में और तीसरा पता नहीं कितना करीब रहा होगा कि उसे बैतुल्लाह की ख्वाहिशात की भी पूरी जानकारी थी.
मै सोच रहा था यार ये लोग यहां क्या कर रहे हैं इन लोगों को तो सीआईए या एफबीआई का टॉप एजेंट होना था.
राजेश जी समाचार माध्यम भी अपने दर्शकों श्रोताओं और पाठकों के स्तर को देख कर समाचार पेश करते हैं, कई बार मैने बी.बी.सी इंग्लिश वेबसाइट पर कुछ ऐसे महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समाचार देखे हैं जिनका हिंदी साइट पर कुछ अता पता नही होता, क्या आप लोगों को ये लगता है कि वो समाचार सिर्फ़ यूरोप और अमरीकन लोगों के काम के होते हैं, या आप ये सोचते हैं कि हिंदी पढ़ने और बोलने वालों को इतनी समझ नही है कि उन तक वो समाचार पहुंचाया जाए?
राजेशजी,
मुझे तो आपके लेख में एक बात खटकी। एक आतंकवादी सरगना का आदरसूचक शब्दों से श्रृंगार करना। मेरा कहने का ये अर्थ बिल्कुल नहीं है कि बीबीसी भारतीय भावना को कलम से उकेरने लगे। लेकिन नर संहारी तो सब के लिए नरसंहारी है, चाहे वो भारत में हो या पाकिस्तान में। शब्दों से सम्मान देकर उसको क्यों महान बनाते हैं? किसको खुश करने की कोशिश है? मुर्दा या बचकर नरसंहार करने वाले महसूद को
एक बात मैं अभी तक समझ नहीं पाया कि बैतुल्लाह के लिए बीबीसी हमेशा सम्मान सूचक शब्दों का इस्तेमाल क्यों करता है जैसे 'मारे गए' या ' मर चुके हैं'. जबकि आप ही लोग दूसरे अपराधियों या आतंकियों के लिए 'मारा गया' या 'मर चुका है' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. बैतुल्लाह महसूद को भी आतंकी या अपराधी श्रेणी में खुद उसका देश पाकिस्तान रखता है. अंतर्राष्ट्रीय रूप से भी उसे अपराधी ही माना गया है, फिर ये "सॉफ्ट कोर्नर" क्यों??
मुझे पता नहीं कि इस लेख का मुद्दा बैतुल्लाह महसूद है या पत्रकारिता का चरित्र लेकिन मज़े की बात ये है कि दोनों अपने-अपने तरीक़े से सुर्ख़ियाँ बनने और बनाने के काम में लगे हुए हैं. मेरे व्यंग से बीबीसी जैसी संस्था को अलग रखना अनुचित नहीं होगा क्योंकि बीबीसी आज भी वास्तव में सिर्फ़ ख़बरों की तह तक जाने की कोशिश करके उन्हें लोगों तक पहुंचा रही है लेकिन ज़्यादातर मीडिया आज इस हक़ीक़त से कहीं बहुत दूर चली गई है. कहीं टीआरपी और कहीं सर्कूलेशन के नाम पर ख़बर की गहराई को पीछे छोड़ कर मीडिया ट्रायल सीमा तक सीमित है, शायद इसीलिए आज ब्रेकिंग न्यूज़ का महत्व कहीं खो गया है.
रही बात पाकिस्तान की, वहाँ की समस्याओं की, वहाँ की पत्रकारिता की, तो इन सारे सवालों का जावाब तो ख़ुद वहाँ की सर्वोच्च संस्था यानी सरकार के पास नहीं है तो मेरे आपके या बीबीसी के पास कहाँ से होगा. मुझे तो आज तक यही पता नहीं चला कि वहाँ अच्छा कौन है और बुरा कौन. दुनिया की किसी भी भाषा की फ़िल्म हो या उपन्यास उसमें एक अच्छा चरित्र होता है, लेकिन पाकिस्तान की समस्या ये है कि उसकी कहानी में सब हीरो हैं, तो बाक़ी पढ़ने वाले ख़ुद समझदार हैं. पाकिस्तान एक प्रतिभा संपन्न देश है लेकिन साथ ही एक उदाहरण भी है कि बिना दिशा के प्रतिभा का कोई महत्व नहीं होता. मुझे हैरानी होती है कि क्या आज के ज़माने में किसी देश के लोग इतने बहरे और गूंगे हो सकते हैं जैसे वहाँ हैं, लेकिन याद रहे कि जनता को दिशा देने वाले न रोज़-रोज़ पैदा होते हैं और न ही रोज़-रोज़ क्रांतियाँ हुआ करती हैं. किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है.
ये जब्र भी देखा है तारीख़ की आँखों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
राजेश,
बिलकुल सच कहा तुमने.....बीमारी तो दरअसल यही है कि कोई भी अपनी लेन में रहता ही नहीं....और एक सच और भी है कि पत्रकार नाम का यह जीव खुद को सही या बड़ी पहुँच वाला साबित करने के लिए बहुत बड़ा बड़ा "नटवरलाल"हो जाता है.....और इस रस्ते से पत्रकारिता भी इक प्रकार की "ठगी" ही बन जाती है,और यह ठगी अब शायद सब कर रहें हैं.....कैसे...सो बाद में विस्तार से.....!!