डंके की चोट पर...
मुझे मुंबई में रहते हुए लगभग छह साल हो गए हैं और जो बात मैं पिछले कुछ वर्षों से कहना चाहता था और कभी कह नहीं पाया वो मैं अब डंके की चोट पर कह सकता हूँ.
वो ये कि मैं ने दिल ही दिल में इस बात का कभी यक़ीन नहीं किया कि बिहार अपराध में सब राज्यों से आगे है और यह कि वहां 'जंगल राज्य' है.
मुझे हमेशा ये लगता था कि इस मिथ्या को या इस फ़र्ज़ी सच को पूरा सच करके पत्रकारों ने हमेशा बिना रिसर्च किए पेश किया है.
कहते हैं एक झूठ को सौ बार कहो तो वह सच लगने लगता है. बिहार 'अपराध में अव्वल' वाली बात भी कुछ ऐसी ही कहानी है.
मैं आज खुल कर इसलिए आया हूँ क्योंकि मेरे पास सबूत हैं. ज़रा इन सुर्खियों पर नज़र डालिए:
एक महिला अपने घर एक ऑटो रिक्शा में लौट रही है, अचानक एक नौजवान लड़का उनके हाथ से उनका पर्स छीन कर फ़रार हो जाता है. यह हादसा उसी जगह पर होता है जहाँ उनके साथ बिलकुल इस तरह के दो हादसे पहले भी हो चुके हैं.
एक 15 बरस की लड़की का उन्हीं के दोस्तों के हाथों बलात्कार होने की ख़बर हर अख़बार में छपी है.
एक 13 साल की लड़की को एक नौजवान फुसला कर एक होटल में तीन घंटे के लिए चेक-इन करता है. उसकी नियत ख़राब होती है. लेकिन लड़की एक बॉलीवुड के अभिनेता की बेटी होती है इसलिए उसकी इज़्ज़त बच जाती है. ये ख़बर सुर्खियों में है.
आप सोच रहे होंगे मैं बिहार की बात कर रहा हूँ. और अगर मैं कहूँ हाँ तो आपको शायद कोई हैरानी नहीं होगी लेकिन अगर मैं कहूँ कि ये खबरें मुंबई की हैं तो आप को आश्चर्य हो सकता है.
मुंबई अंडरवर्ल्ड माफ़िया के ज़रिए तस्करी, हत्याओं और दादागिरी जैसे अपराध के लिए जाना जाता है. बलात्कार, चोरी, डकैती, हत्या और इसी तरह के बड़े अपराधों के लिए उतना बदनाम नहीं है. महाराष्ट्र के अन्य शहरों का हाल भी इतना ही बुरा है.
आप सोच रहे होंगे कि अख़बारों की सुर्खियों से यह थोड़े ही साबित होता है कि मुंबई अपराध में बिहार से आगे है.
तो लीजिए सरकारी सबूत हाज़िर है: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हाल के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में, जिन में मुंबई सबसे आगे है, पिछले साल बलात्कार की संख्या थी 1558. यानी राज्य में पिछले साल1558 महिलाओं का बलात्कार हुआ लेकिन बिहार में इस अपराध की संख्या थी 1041.
अन्य अपराधों में भी बिहार से महराष्ट्र कहीं आगे है.
अगर अब कोई मुझसे कहे कि बिहार में 'जंगल राज' है तो कम से कम मैं उस व्यक्ति की ग़लत फ़हमी दूर कर सकता हूँ.

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मैं बिहार का रहने वाला हूँ. पढ़कर और सुनकर दुःख होता था कि बिहार की इतनी बदनामी होती है... ऐसा नहीं है कि मुंबई की बात सुनकर खुश हो रहा हूँ... ये भी हमारा ही राज्य है... फिर ऐसी घिनौनी घटनाएँ कहीं भी हो... लानत है इसपर.... लेकिन लोग बात-बात में बिहार को बदनाम करने की बात छेड़ देतें हैं... मैं पिछले 3 साल से दिल्ली में रह रहा हूँ. और डंके की चोट पर कह सकता हूँ कि यहाँ अपराध बिहार से ज़्य़ादा होता है... पर क्या है ना कि "चलनी सूप को चिढ़ाती है, जिसमें खुद 72 छेद हैं."
ज़ुबैर जी नमस्ते. एक आप मीडिया के लोग हैं जो यह कहने का साहस कर सकते हैं. कुछ दूसरे मीडिया के लोग होते हैं जो झूठ को सौ बार झूठ कहने में ही यक़ीन करते हैं. डंके की चोट पर कह सकता हूँ आप ने सत्य कहा.
देश की हालत वाक़ई बहुत बुरी है. दफ़्तरों, अदालतों और पुलिस की यही हालत रही तो सारा देश बिहार कहलाने लगेगा. सरकार कहाँ है, ढूंढ़ना पड़ेगा. देश का बड़ा हिस्सा नक्सलवादियों के क़ब्ज़े में है. जेलों में अपराधियों का बोलबाला है, संसद में साफ़ सुथरे लोग का मिलना मुश्किल है. अब तो ऐसी स्थिति देश राम भरोसे चल रहा है.
हमें बिहार में अपराध को समझने के लिए तुलना करते समय ये ख्याल रखना चाहिए कि बिहार की आबादी महाराष्ट्र से अधिक है. अपराध को बताने के लिए प्रति हज़ार आँकड़ देना चाहिए.
मुझे ये समझे में नहीं आता के ये अहमद साहिब क्या साबित करना चाहते है , आपराध कही हो वो बुरा ही है. अगर बिहार बहुत अच्छा है तो ये ढोल बजाने से बिहार को कोई पुरस्कार नहीं मिलने वाला है, वेसे भी बिहार की वयवस्था ,वहां के राजनेता को पूरा देश जनता है! चंद उदाहरणों से कोई बड़ा जज्में करना पूरी तरह से मुर्खता है!
ज़ुबैर साहिब आपकी हिम्मत की दाद देनी होगी. कम से कम इतना कठोर सच लिखा आपने. लेकिन आज भारत के किसी भी राज्य का नाम बताएं जिसमें यह सब नहीं होता है. देखिए कुछ वर्ष पहले अमिताभ बच्चन ने उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया था और कहा कि वहाँ अपराध कम है. मेरे ख़्याल से बेइमान नेता को इस तरह से बढ़ावा नहीं देना चाहिए.
ज़ुबैर साहिब आँखें खोलने वाला अपराध के सिलसिले में आँकड़े पेश करने के लिए आपका धन्यवाद. लेकिन याद रहे कि अपराध का सीधा संबंध ग़रीबी, बेरोज़गारी, आमदनी में ग़ैर बराबरी और साथ ही प्रसाशन का अहम रोल होता है. हमें मालूम होना चाहिए कि बिहार, उत्तर प्रदेश. झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कितने बड़े मामलों की रिपोर्ट तक नहीं हो पाती है. इन राज्यों में ग़रीब अपने ऊपर हुए ज़ुल्म की रिपोर्ट पैसे की कमी, अपराधी की ताक़त और दबाव के बीच थाना में दर्ज नहीं करा पाते. ऐसे में मुझे लगता है कि इसका एक ही इलाज है कि प्रसाशन को इसके लिए जवाबदेह बनाया जाए और मीडिया इसकी निगरानी करे.
मैं बिहार का रहने वाला हूँ और स्वीकार करता हूँ कि हमें अपने में शिक्षा, समाजिक न्याय और अनुशासन के मामलों में सुधारने की आवश्यकता है, बिहार का अतीत गौरवशाली रहा है, लेकिन इस समय हम इसका दावा नहीं कर सकते.
इस डंके की चोट को तथाकथित मुंबईकर भी सुन रहे होंगे, अब मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि चलिए बिहारी को बीमारी कहते हैं, लेकिन मुंबई के सज्जन तो इन बीमारियों से भी आगे निकल गए.
जुबैर भाई,
हम भी बिहार से ही हैं और मेरी पढाई लिखाई भी सब वहीँ हुई. आजकल शिकागो में हूँ. अक्सर इस बात पर किसी न किसी से बहस हो जाती है मेरी की बिहार की ये छवि मीडिया की बनाई हुई है. आपने एक दम सटीक बात की है. ये मीडिया ही है जिसने बिहार की अच्छाइयों के ऊपर उसकी बुराइयों को तरजीह दी. वैसे और जानकारी भी दे सकते थे, जिनमे बिहार अव्वल है, जैसे की रिटायर्ड आर्मी वालो को पुलिस में लेना, फास्ट ट्रैक कोर्ट से खतरनाक मुजरिमों को जल्दी सजा दिलवाना, सूचना के अधिकार के नियम का सबसे पहले प्रयोग में लाना इत्यादि. बीबीसी जैसे मंच पर आपने ये शुरुआत की इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद.
नमस्कार पाठक बंधु,
मै जुबैर भाई की बात से पूर्णतया सहमत हूँ, बिहार के सन्दर्भ में प्रकाशित अधिकांश बातें पूर्वाग्रह ग्रस्त होती हैं. बिहार और बिहार के लोगों की छवि बाहरी लोगों के मन में मीडिया द्वारा ही बनाई गई हैं, अतः एक हद तक मैं अपने मीडिया जगत से खिन्न हूँ.
कहा जाता है कि झूट तीन तरह के होते हैं. वैसे भी केवल आँकड़े पेश करके हम ये दिखा दें कि बिहार में मुंबई से कम अपराध है. इसका मतलब यह नहीं है कि यह सच्चाई है. पहली बात मुंबई में बिहार से अधिक अपराध के मामले दर्ज हुए इसका ये भी मतलब नहीं हुआ कि मुंबई में अधिक अपराध हुए. दूसरी बात दोनों जगहों की ज़मीनी हक़ीक़त अलग है. बिहार में लोग डर के साय में रहते हैं जबकि मुंबई इससे पवित्र है. मुंबई एक कॉस्मोपोलिटन और विकसित शहर है जबकि बिहार अविकसित राज्यों में से एक है और शायद सबसे निचले पायदान पर है. ये गुड़ और चीनी की तुलना जैसा लगता है.
ज़ुबैर साहिब, मुझे उस समय ख़ुश होंगी जब आप भारत को एक राष्ट्र के रुप में देखना शुरू करेंगे. आप देश को टुकड़ों में तोड़कर देखने की कोशिश कर रहे हैं. आपने स्थान का ज़िक्र किए बिना क्यों नहीं लिखा के कहाँ क्या बुरा हो रहा है.
मेरे भाई अपराध पूरे देश में फैला हुआ है उसमें किसी राज्य को विशेष जगह नहीं है. अलग-अलग तरह से उदाहरण देने से साबित नहीं होता मुंबई में अपराध अधिक है. बिहार के प्रति मीडिया का पूर्वाग्रह ग़लत है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि बिहार में परेशानी नहीं है. कोई न कोई वजह तो ज़रूर है कि बिहार पिछड़ता जा रहा है.
ज़ुबैर भाई, मैं बिहार के प्रति आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूँ. मैं भी उसी राज्य से हूँ. चीज़े बदल रही हैं. लेकिन हमने कई बार सरकार द्वारा प्रायोजित गुंडागर्दी देखी है. हमने अपने मुख्यमंत्रियों और उनके संबंधियों के कुशासन और निरंकुशता को देखा है. यहाँ जातिवाद इतना प्रबल है कि लोग अपनी जाति के अपराधियों को प्राथमिकता देते हैं. मुझे लगा आपकी राय कुछ हद तक पूर्वाग्रह से ग्रस्त है. इसीलिए आप अपहरण के आँकड़े देना भूल गए. कृपया इस मामले को 'मेरी क़मीज़ तेरी क़मीज़ से सफ़ेद है' मत बनाइए.
आपराधिक मानसिकता को किसी देश या राज्य की सीमा से जोड़ कर देखना ठीक नही होगा. अपराधी अपराध करके यदि बच निकलता है तो समाज में दहशतगर्दी को बल मिलता है. एक तरफ जहाँ बिहार सामाजिक ध्रुवीकरण और लचर क़ानून व्यवस्था से पीड़ित रहा है वही महाराष्ट्र का अपराधीकरण वर्चस्व और विलासिता में डूबा है.
बिलकुल सही कहा. गुड़ और चीनी की कोई तुलना नहीं हो सकती. अगर यह आँकड़े गुड़ के हैं तो तुलना करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है.
हम भी बिहार से ही हैं और मेरी पढाई लिखाई भी सब वहीं हुई. आजकल दिल्ली में हूँ. सुनकर दुःख होता है कि बिहार की इतनी बदनामी होती है. अपराध पूरे देश में फैला हुआ है उसमें किसी राज्य को विशेष जगह नहीं है. बिहार के सन्दर्भ में प्रकाशित अधिकांश बातें पूर्वाग्रह ग्रस्त होती हैं.
जिन्होंने समाचारों व फिल्मों से एक राय बना ली है, वे बिहार को निश्चित रूप से घटिया से घटिया ही बताएँगे। मैं बिहार के अपराधों की किसी राज्य से तुलना नहीं कर रहा हूँ, पर मैंने बिहार भी देखा, दिल्ली भी देखी, महाराष्ट्र, और आँध्र-प्रदेश भी देखा है। बिहार में कानून-व्यवस्था बुरी थी... यह भूतकाल था। कई गुणात्मक परिवर्तन, कई नए प्रयोग हुए जिनका कई राज्य अनुकरण भी कर रहे हैं। पहले की अपेक्षाकृत शून्य हो चुका है हमने एक इतनी बड़ी खाई पाट दी है बिहार में, जो असम्भव सा प्रतीत होता था। हम आगे सोच रहे हैं आगे बढ़ रहे हैं, और आगे बढ़ने की यही प्रवृति हमें और भी आगे ले जाएगी। कठिनाईयाँ तो आती ही रहतीं हैं। चुनौतियों के बीच भी हम लगातार आगे बढ़ रहे हैं। सभी राज्य एकीकृत हों और हमारा देश भी सारी चुनौतियों को रौंदते हुए निरंतर आगे बढ़े। क्या आपका दिल कभी नहीं दुखता जब आप विदेशों में हों और आपको सुनने को मिले कि भारतीय असभ्य होते हैं? किन्हीं की टिप्पणी में कुछ ऐसा लिखा गया है कि "तो सारा देश बिहार कहलाने लगेगा"। हुज़ूर आपका लिखने का नज़रिया ग़लत है। समय तो लगेगा, पर बिहार इतना अच्छा हो जाए कि सारा देश बिहार कहलाने में गौरव महसूस करे।
ज़ुबैर जी, सादर नमस्कार. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने बरसों से बिहारियों के नाम पर लगे धब्बे को धोने का प्रयास किया.
मेरी समझ से इन बातों का कोई मतलब नही है कि भारत का कौन सा राज्य अपराध में अव्वल है और कौन दूसरे नंबर पर। केरल में घटी किसी शर्मिंदगी को जम्मू में भी उतनी हीं महसूस की जानी चाहिए।
(जहाँ तक बिहार के बदनाम छवि की बात है तो बिहार के उपर लगभग साठ वर्ष पूर्व किया गया यह एक बहुत हीं शातिर,प्रायोजित एवं बौद्धिक प्रहार है जो आज समाज के जाहिल जुबान से सर चढ़कर बोल रहा है और बिहार को मुँह चिढ़ा रहा है। बिहार मेरी मातृभूमि है,मुझे दुख के साथ-साथ आक्रोश भी होता है मगर... रहने दिजीए।
मेरा देश महान!भले ही बिहार परेशान!)
एक कहावत है बद अच्छा, बदनाम बुरा. यही क़िस्सा यहाँ भी है. बिहार को मीडिया वालों ने बदनाम करना शुरू किया जो आज उनकी फ़ितरत बन गई है. यह नहीं सोचते कि आधुनिक भारत की नींव जिन पर आधारित है, मतलब अशोक, शेरशाह सूरी की दी हुई व्यवस्था और रुपया शब्द, चाणक्य, ज़ीरो से दुनिया को परिचित कराने वाले आर्यभट्ट, जयप्रकाश नारायण, ये तमाम लोग बिहार के ही तो हैं. मीडिया वालों को यह सब दिखाई नहीं देता.
मैं बिहारी हूँ. बिहारी अच्छाइयों अव्वल है. उसको मीडिया आगे लाए. महाराट्र में चुनाव होने वाला है लोगों को जानना चाहिए कि मराठी मानुस के नाम पे नेता वोट माँगते है जो की भावनाओ से खिलवाड़ है. मराठी सेना, लोग और अलकायदा एक सामान है.
बिहार में अगर बिजली व्यवस्था ठीक हो जाए तो यह भारत के बेहतर राज्यों में से एक हो जाएगा. लोग दूसरे राज्यों में जाना बंद कर देंगे. आज बिहारी रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाकर झुग्गियों में रहते हैं अगर यहाँ छोटे-छोटे उद्योग धंधें लग जाएँ तो उनका बाहर जाना रुक जाएगा. बिजली और उद्योग में वह ताक़त है जो किसी भी राज्य का नक्शा बदल सकते हैं. सुना है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार परमाणु बिजली घर लगवाने की पहल कर रहे हैं. अगर ऐसा हो जाए तो बिहार का नक्शा बदल जाएगा. इतनी प्रतिभा होने के बाद भी आज बिहार और बिहारी दोनों ही बरबाद हो रहे हैं लेकिन बिहारी इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं. अगर सरकार थोड़ा सहयोग दे दे तो हम बिहार को भारत का गौरव बना सकते हैं. इससे हम बिहार को बुरा कहने वालों को सही ज़वाब दे पाएँगे.
एक हिंदुस्तानी होने के नाते मेरे लिए दोनों बातें दुख की हैं कि बिहार में 'जंगल राज ' की बात की जाए या फिर यह की अपराध के मामले में कौन सा राज्य किससे आगे हैं. लेकिन यह एक सच्चाई है और चिंता का विषय है कि आज हमारे देश में विकसित शहर जैसे मुंबई और दिल्ली में आम आदमी के लिए अपराध की स्थिति अच्छी नहीं है. अगर बिहार में अपराध उद्योग की शक्ल ले चुका है तो इसके लिए वहाँ का आम आदमी नहीं बल्कि प्रदेश की अगल-अलग समय की व्यवस्थाएँ रही हैं. लेकिन बड़े शहरों में अपराध के लिए आम आदमी ज्यादा ज़िम्मेदार है क्योंकि समाज एक अनदेखे साए के पीछे भाग रहा है और अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वह कुछ भी कर गुजरने को तैयार है. इसका शिकार आमतौर पर युवा वर्ग होता है. क्योंकि अपराध के ज़रिए उसे अपनी मंजिल तक पहुँचने का शार्टकट नज़र आता है. शहरी अपराध के बहुत से कारणों में से एक मुख्य कारण है हमारी संस्कृती की डूबती नैया जो परंपरागत पूर्व से काफ़ी दूर जा चुकी है और जगमगाते पश्चिम के आस-पास न है और न कभी होगी. अभी तो यह शहरी अपराध तंत्र की शुरुआत है. आधी कच्ची और आधी पक्की संस्कृती और तरक्क़ी के नाम पर हमारी लुटिया तो ऐसी डूबेगी कि न खुदा मिलेगा और न बिसाले सनम. भला हो 24 घंटे चलने वाले हमारे टीवी चैनलों का और उससे ज्यादा भला हो समाज के उस वर्ग का जो पढ़-लिख कर भी ज़ाहिल है.
यह कहना ग़लत भी नहीं है कि भारत गाँवों में बसता है. पर आज़ादी के बाद भी वहाँ जंगल का क़ानून चलता है. इसमें कोई बड़ी बात नहीं क्योंकि जिस जाति में वोट अधिक होगा उसी का सिक्का चलेगा. यही कारण है कि उन्हीं लोगों के नेता चुने जाते हैं, वे ही विधानसभा और लोकसभा में पहुँचते हैं. ऐसे लोग बाहुबली और दाग़दार भी होते हैं. इन्हीं के कारण आज गाँवों में जंगल राज है तो बाकी के नेताओं के कारण शहरों में भी जंगल राज है. ऐसी हालत देश के सभी ज़िलों की है.
मुझे यह जानकर बहुत प्रसन्नता हुई कि कोई है जो इस तरह सच कहने का साहस रखता है. मैं बिहार से हूँ और माइक्रोसाफ़्ट में काम करता हूँ और पुणे में पिछले चार साल से रह रहा हूँ. इस तरह की ख़बर के लिए आपको सलाम.
जुबैर भाई, आपने बिहार और मुंबई के अपराधों की बात की कि कौन किससे आगे हैं. मेरा मानना है कि आज हिंदुस्तान का कोई भी राज्य अपराध से अछूता नहीं है. उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली सभी राज्यों में अपराध का बोलबाला है. इसका मुख्य कारण पुलिस और अपराधियों का गठजोड़ है.
मैं इस बात पर बहस नहीं करने जा रहा हूँ कि किस राज्य में शासन बढ़िया है और कहाँ ख़राब. मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहूँगा कि टीवी के रिपोर्टर किसी ख़बर के लिए शोध करने की ज़हमत नहीं उठाते हैं.
जुबैर जी नमस्ते, आपने जो कुछ लिखा है वह कुछ ग़लत है और कुछ सही.मुझे ऐसा लगता है कि बिहार हो या महाराष्ट्र या भारत का कोई और राज्य सब एक जैसे ही हैं. सभी जगह समस्याएँ हैं, अपराध हैं, भ्रष्टाचार है या अन्य तरह की समस्याएँ. आप यह नहीं कह सकते हैं कि कहाँ ज्यादा हैं और कहाँ कम. सभी जगह जगह लोग एक हैं और सामाजिक ताना-बाना एक है. मानसिकता एक है. अगर अंतर है तो सिर्फ़ आर्थिक हालात का. बिहार की बदनामी का मूल कारण भी यही है. इसके पीछे कई कारण है. एक मुख्य कारण यह है कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और सरकार की कृषि और किसान विरोधी नितियों के कारण लोगों को पलायन कर दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है. जो अपेक्षाकृत बिहार से बेहतर स्थिति में हैं. वहाँ के लोग बिहार और बिहारियों को अपराधी और बेईमान समझते हैं. इसी बात को मीडिया प्रचारित करता है. क्योंकि आज का मीडिया लोगों को सच नहीं बताता है. बिहारियों का डंका तो कई जगह बज रहा है. लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि यह वही बिहार है जो कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का केंद्र बिंदु था.