बैतुल्लाह: ज़ख़्मी या मर चुके
प्यारे मीडिया वालो
ऐसे हालात में जब आप किसी की मौत के ख़्वाहिशमंद हों और उसकी मौत की अपुष्ट और पुष्ट दावों के बीच झूल रहे हों तो इस स्थिति में निम्न लिखित सुर्ख़ियाँ और हेडलाइन्स आपके काम आ सकती हैं जब तक हक़ीक़त खुल न जाए.
... बैतुल्लाह महसूद मर चुके हैं. फ़िलहाल सरकार पुष्टि नहीं कर सकती (रहमान मलिक)
... बैतुल्लाह महसूद सैद्धांतिक रूप से मारे गए
... बैतुल्लाह महसूद ज़ख़्मी और मारे गए
... बैतुल्लाह महसूद 70 फ़ीसदी ज़ख़्मी
... बैतुल्लाह महसूद गंभीर रूप से ज़ख़्मी, मरने का मन बना लिया
... बैतुल्लाह महसूद के सिरहाने क़ुरान की आयतें देखी गईं
... बैतुल्लाह महसूद का दिल मुर्दा हो चुका है
... बैतुल्लाह महसूद धीरे-धीरे मर रहा है
... बैतुल्लाह महसूद नैतिक रूप से मर चुका है
... बैतुल्लाह महसूद अगर नहीं भी मरे तो एक दिन ज़रूर मर जाएंगे
... बैतुल्लाह महसूद: डेड मैन वॉकिंग!
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प्रिय भाई,
मैं स्वयं मीडिया से सम्बंधित हूँ, और बीबीसी की ख़बरों या ब्लोग्स को विश्वसनीयता के नजरिये से देखता हूँ. आपका ठोस और भरोसेमंद सही खबर का देना अच्छा लगता है. साथ ही बिना पुष्टि के ख़बरों को प्रकाशित नहीं करने की नीति सचमुच काबिले-तारीफ़ है. लेकिन पहले भी राजेश जी के ब्लॉग पर पूछा था कि बैतुल्लाह जैसे इन्टरनेशनल खूंखार दहशतगर्द के लिए आपका सम्मान सूचक अल्फाजों का उपयोग समझ से परे है. खासतौर से तब और भी ज़्यादा जबकि आप ही की साईट पर दुसरे दहशतगर्दों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं हो. यानी आप दूसरे दहशतगर्दों के लिए वही अल्फाज़ इस्तेमाल करते हैं, जो करना चाहिए, फिर बैतुल्लाह से ये मोहब्बत क्यों? आप चाहें तो इसे प्रकाशित ना करें लेकिन मुझ जैसे और भी कई वरिष्ठ लोग हैं जो ऐसा सोचते हैं. अच्छा हो कि इसे आप स्पष्ट करें ताकि विश्वसनीयता के साथ-साथ हम आपके बड़प्पन के भी कायल रह सकें. शुक्रिया...
आप ख़तरनाक अपराधियों के लिए भी सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं.अगर आप इनके लिए इतनी सहानुभूति दिखाएँगे तो उन निर्दोष लोगों के लिए क्या कहेंगे जो इनके हाथों मारे गए. यहाँ तक की अनाधिकारिक रूप से कहा जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भूट्टो की हत्या में भी इनका हाथ है. मुझे लगता है कि आप लोगों को बाँट रहे हैं और विवाद पैदा कर रहे हैं.