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बासठ वर्षीय सारस और लोमड़ी

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|गुरुवार, 13 अगस्त 2009, 14:41 IST

कराची से दिल्ली हफ़्ते में एक बार फ़्लाइट जाती है और बहुत ही भरी हुई फ़्लाइट होती है. लेकिन उस रूट पर चलने वाली पीआईए के बोइंग 737 में घुसते ही दोनों देशों के आपसी संबंधों का अंदाज़ा हो जाता है.

दोनों देश चूँकि हर कुछ समय के बाद एक दूसरे से किसी भी बात को लेकर हत्थे से उखड़ जाते हैं शायद इसलिए सीट पर बैठते ही एक हत्था हिला और मेरे हाथ में आ गया.

उस फ़्लाइट में किसी दुबली पतली नाज़ुक सी एयर होस्टेस या स्मार्ट स्टुवर्ड के बजाए मोटा ताज़ा और पहलवान दिखने को मिलता है. शायद इसलिए कि भारतीय यह नहीं समझ लें कि हम देखने में उन से कमज़ोर या उन्नीस हैं.

एक मुसाफ़िर ने जब 50 वर्षीय एयर होस्टेस से पानी माँगा तो उसने दिल को लुभा लेने वाली मुस्कुराहट के साथ बहुत जल्द काग़ज़ का गिलास, पेपर नैपकिन के साथ आगे कर दिया. मैंने पानी माँगा तो अभी लाती हूँ कह कर आगे बढ़ गई.

दस मिनट बाद फिर पानी माँगा तो उसने काग़ज़ का गिलास बिना पेपर नैपकिन मेरी तरफ़ ऐसी मुस्कान के साथ बढ़ाया जैसे दोनों देश एक दूसरे को देख यूं मुस्कुराते हैं जैसे कर्ज़ ब्याज के साथ लौटा रहे हों.

मैंने सोचना शुरू किया कि इस एयर होस्टेस ने एक मुसाफ़िर को क्यों मुस्कुरा कर पेपर नैपकिन के साथ पानी दिया और मुझे क्यों एक बनावटी मुस्कान के साथ गिलास थमाया.

यूरेका!!! वजह समझ में आ गई !!! उस मुसाफ़िर ने सफ़ेद शलवार कमीज़ पहनी हुई थी और मैंने बदक़िस्मती से जींस पर फ़ैब इंडिया का गेरूआ शर्ट कुर्ता पहना हुआ था!!!

ये फ़्लाइट जिसमें आधे से अधिक वो दक्षिण भारतीय कामगार और उत्तर भारतीय प्रवासी थे जो खाड़ी के अरब देशों से कराची के रास्ते दिल्ली जा रहे थे. उन्होंने शुद्ध उर्दू में ये एलान सुना.

ख़्वातीन-ओ-हज़रात अस्सलाम अलैकुम. हम आपके शुक्रगुज़ार हैं कि आपने अपनी परवाज़ के लिए पीआईए का इंतख़ाब किया.बराहेकरम अपनी निशस्त की पुश्त सीधा कर लीजिए. बालाइख़ाना बंद कर लीजिए. आपके मुलाहिज़े के लिए हिफ़ाज़ती तादाबीर का किताबचा आपके सामने की सीट की जेब में है. हंगामी हालात में इस्तेमाल के लिए हिफ़ाज़ती जैकेट ज़ेरे निशस्त है. उम्मीद है आपका सफ़र पुरकैफ़-ओ-ख़ुशगवार गुज़रेगा.

मैंने साथ बैठे सरदार जी से पूछा गुरू जी एलान पल्ले पड़ा? कहने लगे वाहे गुरु जाने. मेरे पल्ले ते कुछ नहीं पया.

मुझे कुछ साल पहले की एक और फ़्लाइट की घोषणा याद आ गई. कृपया करके ये घोषणा ध्यान से सुनिए. ;हम मुंबई से कराची की उडा़न पर आपका हार्दिक स्वागत करते हैं. हमारी यह उडा़न एक घंटा एवं पाँच मिनट की होगी. कृपया सुरक्षा बेल्ट बाँधे रखिए. इलेक्ट्रानिक उपकरण बंद रखिए क्योंकि उड़ान के दौरान विमान के संचार तंत्र में गड़बड़ी हो सकती है. आशा है कि इंडियन एयरलाइंस से आपकी यात्रा सुरक्षित, सुखद एवं मंगलमय रहेगी.'

मुझे याद है कि मैंने एयर होस्टेस से पूछा था कि अभी जो घोषणा हुई उसमें क्या कहा गया. कहने लगी सर आप बैठिए मैं अभी सर से पूछ कर बताती हूँ कि इसका आसान हिंदीकरण क्या है.

लेकिन इसमें इन बेचारों का क्या क़सूर! दोनों देश जब भी दिल्ली और इस्लामाबाद या न्यू यॉर्क या शर्म-अल-शेख़ या सार्क की साइडलाइंस पर वार्तालाप का मंडप सजाते हैं तो दोनों तरफ़ के नेताओं और नौकरशाहों की कोशिश होती है कि ऐसी ज़बान बोलें जिस से देखने वाले को यह शक हो कि कुछ बात हो रही है. पर इस बात का कोइ मतलब न निकलने पाए.

एक था सारस और एक थी लोमड़ी. दोनों में हर समय ख़ट-पट रहती थी. एक दिन शेर की कोशिशों से दोनों में तालमेल हो गया. लोमड़ी ने कहा सारस भाई हमारे गिले-शिकवे दूर हो गए. आप मेरे घर खाने पर आइए. सारस जब बन ठन कर लोमड़ी के यहाँ पहुँचा तो लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए एक प्लेट में पतला शोरबा उसके सामने रखा दिया. सारस ने लंबी चोंच में शोरबा भरने की बहुत कोशिश की लेकिन कुछ कामयाबी न हुई. और लोमड़ी अरे आप तो बहुत तकल्लुफ़ कर रहे हैं कहती हुई लप-लप सारा शोरबा पी गई.

सारस ने लोमड़ी से कहा कि कल शाम आप मेरे यहाँ खाने पर आइए मुझे बहुत ख़ुशी होगी. लोमड़ी जब पहुंची तो सारस ने एक सुराही में बोटियाँ डालकर लोमड़ी के सामने रख दिया. लोमड़ी ने अपनी थूथनी सुराही में डालने की कई बार कोशिश की लेकिन वो एक भी बोटी न निकाल सकी. सारस ने कहा अरे आप तो मुझ से भी ज़्यादा तकल्लुफ़ कर रही हैं. सारस ने अपनी लंबी चोंच सुराही में डाली और सब बोटियाँ चट कर गया.

बासठ वर्ष बाद कॉंफ़िडेंस बिल्डिंग और कंपोज़िट डायलॉग के साए में सारस और लोमड़ी की कहानी जारी है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:22 IST, 13 अगस्त 2009 ashish:

    अच्छी विश्लेषण है. इसके लिए धन्यवाद.

  • 2. 15:39 IST, 13 अगस्त 2009 pankaj parashar:

    वुसत भाई, लाजवाब. अपने तजुर्बे की रोशनी में आपने ज़बर्दस्त मिसालें देकर असली मुद्दे का विश्लेषण किया है. बधाई हो.

  • 3. 17:05 IST, 13 अगस्त 2009 Arvind Yadav:

    ख़ान साहब, बस आपको ही याद कर रहे थे, आपकी अनुपस्थिति में भी बहुत से ब्लाग लिखे गए जो मुझे बहुत पसंद नहीं आए. मैने अपनी नापसंदगी भी दर्ज कराई थी, जो प्रकाशित नहीं की गई. हो सकता है कि कुछ और लोगों ने भी ऐसा किया हो. शायद यही कारण है कि आपकी वापसी हो गई. आपके लिखे का मैं सिरे से कायल हो गया हूँ. आपके कहने का अंदाज़ बेमिसाल है. बात कितनी भी गंभीर क्यों न हो आप इस तरह लिखते हैं कि भारतीय भी ख़ुश और पाकिस्तानी भी ख़ुश. ऐसा कम ही देखने को मिलता है. आप दोनों पक्षों को कड़वी सच्चाई से अवगत भी करा देते हैं. मेरा अनुरोध है कि आप ऐसे ही लिखते रहिए और मुद्दों को उठाते रहिए. इससे हो यह सकता है कि जो काम सरकार नहीं कर पाई वह कलम कर दिखाए. वैसे भी आजकल जब सारा मीडिया स्तरहीन सामग्री से भरा पड़ा है तो आपका ब्लाग ताज़गी का एहसास कराता है. यह भी कि सस्ता भले ही कुछ दिन चमक बिखेरे लेकिन अच्छाई ही लंबी रेस का घोड़ा होता है.

  • 4. 19:06 IST, 13 अगस्त 2009 N.K.Tiwari:

    एक ही लोटे से दोनों को नहलाते रहिए और वाहवाही भी लूटिए.

  • 5. 20:21 IST, 13 अगस्त 2009 ANIL MISHRA:

    वुसतुल्लाह जी, सुनने और मजे करने के लिए यह कहानी बहुत अच्छी है लेकिन सच बात यह है कि यह कहानी एक-एक आदमी और पूरी दुनिया को पता है.

  • 6. 20:43 IST, 13 अगस्त 2009 arun asthana:

    वुसतुल्लाह ख़ान साबह यह तो बिल्कुल खरी-खरी है.

  • 7. 20:54 IST, 13 अगस्त 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH ,SAUDIA ARABIA:

    वाह ख़ान साहब क्या दिमाग़ है आपका. दाद देनी होगी आपके दिमाग़ की. भारत-पाकिस्तान के 62 साल के सफ़र को बीबीसी के श्रोताओं का समझाने का बहुत शानदार प्रयास किया है आपने. आपने जो लिखा है वह सौ फ़िसदी सही है. चाहे वह फ़्लाइट के बारे में हो या लोमड़ी-सारस की कहानी हो. इतना लिखने के बाद भी एक कमी रह गई. आप यह भी बता देते कि भारत और पाकिस्तान में कौन लोमड़ी है और कौन सारस. आज ज़रूरत इस बात की है कि दोनों देशों की जनता इस कहानी को समझें.

  • 8. 21:20 IST, 13 अगस्त 2009 Ajay Pal Singh:

    मेरे विचार से ये आपका पहला ब्लॉग है जो सही है. हम लोग एक दूसरे को नीचा दिखाना चाहते हैं. चीन जैसे अवसरवादी देश इसका लाभ उठाते हैं. सही में चीन किसी का सच्चा मित्र नहीं है लेकिन अपने हाथ में रिमोट कंट्रोल रखना चाहता है. आपने जिस तरह मामला उठाया है मैं चाहुंगा कि आप लोगों को उससे बाहर आने का रासता भी बताएँ.

  • 9. 22:04 IST, 13 अगस्त 2009 Vinay Kumar:

    बहुत ख़ूब, माशा-अल्लाह.

  • 10. 22:28 IST, 13 अगस्त 2009 mukesh:

    मै वुसतुल्लाह साहब की बचकानी तुलना से सहमत नहीं हूँ. हर देश की विमानसेवा को अधिकार है कि वो अपनी राष्ट्रीय भाषा में घोषणा करे. मुझे पूरा विश्वास है कि उन्होंने अंग्रज़ी में भी घोषणा की होगी. दुनिया की हर विमान सेवा में अपनी भाषा में घोषणा होती है और भारत व पाकिस्तान इसके अपवाद नहीं हैं. सम्पूर्ण शांति की कल्पना मूर्खता होगी, मानव जाति स्वभाव से झगड़ालू प्रवृत्ति की है.

  • 11. 22:38 IST, 13 अगस्त 2009 aseem singh:

    वाह, ख़ूब ख़ान साहब, आपने बहुत गंभीर बात की है, आपने तजुर्बे और कहानी से. काश दोनों देश के राजनीतिक ठेकेदार समझ पाते. ऐसे ही लिखते रहिए और कम से कम हम पाठकों को कुछ सोचने पर मजबूर करते रहिए... शायद इसी से कुछ परिवर्तन आए.

  • 12. 00:49 IST, 14 अगस्त 2009 Rajnandan:

    पता नहीं ये आपने किस ख़ुश करने के लिए ऐसी बातें लिखी है? भारत पाकिस्तान के बीच आम लोगों के रिश्ते मेरी समझ से इतने ख़राब तो नही हैं. हिन्दी और उर्दू में आपके फ़्लाइट की घोषणा वाली बात भी समझ में नही आई क्या कहना चाहते हैं आप?

  • 13. 03:04 IST, 14 अगस्त 2009 Shaheer A. Mirza, Sana'a - Yemen:

    वुसत भाई, मैं हमेशा से आपके अंदाज़-ए-तक्कलुम से प्रभावित रहा हूँ. उसकी वजह यह है कि चाहे वह आपकी ‘बात से बात’ हो या लिखने का अंदाज, उसमें एक बात समान है कि आप सच तो लिखते ही हैं. यह सच काफ़ी कड़वा होता है. शायद यहीं सही आलोचना है.
    रही बात भारत-पकिस्तान के रिश्तों की तो वुसत मियाँ, ‘एक रिश्ता भी अगर मोहब्बत का टूट गया. देखते-देखते सिराज बिखर जाता है’. ऐसा ही कुछ हो रहा है दोनों देशों के बीच. एक हिंदुस्तानी होने के नाते अगर मैं पाकिस्तान की नीतियों की ओलोचना करुंगा तो शायद इसे पूर्वाग्रह से ग्रसित समझ लिया जाएगा. दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा अंतर यह है कि हिंदुस्तान में जनता यह तय करती है कि सरकार किसकी होगी और उसकी नीतियाँ क्या होंगी. वहीं पाकिस्तान में सरकार यह तय करती है कि जनता कौन होती है नीतियाँ तय करने वाली. इसलिए ‘कंपोजिट डायलॉग’ डीकंपोज हो जाता है और ‘कांफ़िडेंस बिल्डिंग मेजर’ में कहीं भी कांफ़िडेंस नज़र नहीं आता है.

    ताली दोनों हाथों से बजती है. भारत को ज़रूरत है कि अगर ख़ुद को सेक्युलर कहता है तो इस पर अमल करे. प्रगति के नाम पर संस्कृति से दूर न जाएँ जबकि पाकिस्तान को ज़रूरत है कि वह पहले यह तय करे कि वह है क्या. क्या वह इस्लामिक राष्ट्र है या वह राष्ट्र जिसकी कल्पना जिन्ना साहब ने की थी. लोकतंत्र है या फौजियों के हाथ का खिलौना. आतंकवाद का विरोधी है या उसे पनाह देने वाला. वह उस कश्मीर के पीछे भागने वाला साया है जो उसका है ही नहीं या फिर उस बलूचिस्तान से पीछा छुड़ाने वाला है जो एक अवैध औलाद की तरह उसके नाम से जुड़ा हुआ है. पाकिस्तान जब अपनी ही परेशानियों से उभरने में सक्षम नहीं है तो कैसे उम्मीद की जाए कि वह एक ज़िम्मेदार पड़ोसी का हक़ अदा कर पाएगा. आज इक्कीसवीं सदी में भी मध्ययुगीन मानसिकता है.
    जनता तो कोरा काग़ज़ होती है. जो मर्जी आए, जैसा चाहो लिख दो. हम तो यहीं उम्मीद कर सकते हैं कि कोई कोरे काग़ज़ पर अच्छी ताबीर लिख दे. अच्छे संबंध होना कोई असंभव बात नहीं है. मैं नहीं मानता कि किसी भी देश की जनता यह चाहती है कि उसकी अपने पड़ोसी से दुश्मनी हो. आज की दुनिया में क्या वैसे ही कम मुसीबत है कि इसको और हवा दी जाए. हम भी सठिया गए हैं और तुम भी. अब गले लग जाओं कहीं ऐसा न हो कि कल गले ही न हों.

  • 14. 04:06 IST, 14 अगस्त 2009 lalit ranjan:

    बहुत बढ़िया, इस कहानी का अर्थ हालात के साथ बिल्कुल ठीक बैठता है. अगले अर्थपूर्ण ब्लॉग के लिए आपको शुभकामनाएँ.

  • 15. 09:33 IST, 14 अगस्त 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    मुझे लगता है कि कई पाठक वुसत के ब्लॉग मे 'बिट्वीन द लाइन' वाली बात समझ नहीं पाए. मैं वुसत को बीबीसी उर्दू डॉट कॉम पर भी 'बात से बात' के नाम से पढ़ता हूँ. अगर मैं एक हफ्ते तक उनकी आवाज नहीं सुन पाता हूँ या उनका लिखा पढ़ नहीं पाता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरा कुछ खो गया है.

  • 16. 09:45 IST, 14 अगस्त 2009 satyendra pathak :

    वुसत भाई नमस्कार! आपकी सारी रचनाएँ मैंने पूरे ध्यान से पढ़ी है. हाँ प्रतिक्रिया पहली बार भेज रहा हूँ. कृपया कर आप इसे बीबीसी के प्रति मेरी निष्ठा की कमी के नज़रिए से न देखें.
    चाहे झंडे की बात हो, रैना कुमारी की कहानी हो या सुरमा की महत्ता बयाँ करती आपकी जुबानी हो. सब एक से बढ़कर एक थीं. हाँ कुछ अतिराष्ट्रवादियों ने आप पर बेवजह आरोप भी लगाए. मुझे तो डर था कि कहीं आप बीबीसी हिंदी पर लिखना न बंद कर दें लेकिन आपने मेरी शंका का समाधान कर दिया कि न तो राष्ट्र की अंधभक्ति ज़रूरी है और न ही ख़ुद को समर्पित देशवासी दिखाने की ज़रूरत. अगर ज़रूरत है तो सच्चाई को स्वीकार करने की और ग़लतफ़हमी दूर करने की. वसुत भाई प्रतिक्रिया मैं अगली बार से भेजूँगा इस बार आपसे बस इतनी इल्तज़ा है कि भले ही आप पर बेवज़ह टिपण्णी हो या आप पर आरोप लगे. आप लिखना न बंद करें क्योंकि वे आवाजें महज़ चंद उत्तेजक और चरमपंथ विचारधारा रखने वालों की है. सभी हिन्दुस्तानियों की बिल्कुल नहीं. शायद आप इसे मुझसे बेहतर समझतें हैं.
    इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकतें हैं कि जितनी समानता दिल्ली और लाहौर में हैं उतनी शायद दिल्ली और चेन्नई में नहीं है.

  • 17. 11:10 IST, 14 अगस्त 2009 santosh sharma:

    वुसत साहब सलाम,आपने संतुलित टिप्पणी की है, पढ़कर अच्छा लगा. आप दोनों तरफ़ के लोगों को ख़ुश करना अच्छी तरह से जानते हैं. मैने देखा है कि आपकी हमेशा यह कोशिश रहती है कि भारतीय पत्रकार यह न समझें कि आप पाकिस्तानी पत्रकार है इसलिए पाकिस्तान का पक्ष रखते हैं और पाकिस्तान के लोग यह न समझें कि आप हिंदी सर्विस के लिए लिखते हैं इसलिए आप भारत को ज़्यादा तरज़ीह देते हैं. यह बीच का रास्ता है. ऐसा ही कोई बीच का रास्ता दोनों तरफ़ के लोगों को खोजना चाहिए.

  • 18. 12:52 IST, 14 अगस्त 2009 Ankur :

    सही कहा है किसी ने "एक ही लोटे से दोनों को नहलाइये और वाहवाही भी लूटिए." पर आपके ब्लॉग में कहीं न कहीं पक्षपात भी छिपा होता है, जो सामने आ ही जाता है. ये भी बता दीजिए की सारस कौन है और लोमडी कौन? उम्मीद है आप ईमानदारी बरतेंगे.

  • 19. 12:56 IST, 14 अगस्त 2009 gurpreet singh, vizag:

    शहीर मिर्ज़ा की टिप्पणी बिल्कुल सही है. मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ.

  • 20. 13:36 IST, 14 अगस्त 2009 piyush:

    शहीर ए. मिर्ज़ा जी. सुभान अल्लाह , क्या कलम पाई है.
    ख़ान साहब, समस्या का अच्छा विश्लेषण है. पर समाधान क्या है? हम यदि अपनी सरकारों के भरोसे बैठें तो यह समस्या कभी ख़त्म नहीं होगी. कुछ समाधान आप भी सुझाइए. हम पीछे चलने को तैयार हैं.

  • 21. 17:53 IST, 14 अगस्त 2009 Shaheer A. Mirza, Sana'a - Yemen:

    पीयूष जी, इज़्ज़त अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया. मेरे लिखने की शैली पर वुसतुल्लाह ख़ान साहब का काफ़ी असर है क्योंकि ज़माने से उन्हें पढ़ता-सुनता आ रहा हूँ. लखनवी तहज़ीब में पला-बढ़ा और दुनिया के काफ़ी हिस्से देख चुका हूँ और अब यमन में हूँ. मेरे लिए इंटरनेट एक संजीवनी और बीबीसी हर निवाले के बाद पानी की घूंट का काम करता है.
    बेहद अफ़सोस होता है कि पिछले 62 साल में ज़हर बोने वाले इतने कामयाब हो गए कि आज दो पड़ोसी मुल्कों में रहने वाला एक आम इंसान इतनी दूर हो गया है कि उसके मिलन पर भी उम्मीद की नज़रें आसमान की तरफ़ देखती हैं. बदनसीब हैं इन दोनों मुल्कों के लोग जो संस्कृति और इतिहास की इतनी नायाब जागीर को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

  • 22. 20:34 IST, 14 अगस्त 2009 Maharaj Baniya:

    भाई, बात हिंदुस्तान और पाकिस्तान की जब छिड़ती है तो मुझे याद आ जाता है कि शायद दोनों देशों का स्वतंत्रता दिवस आ गया है. फिर पूरे साल हम सो कर निकाल देते हैं और अगले साल फिर कुछ टिप्पणियाँ इसकी याद दिला देती हैं. अब बीबीसी वाले भी इससे अछूते नहीं हैं, वो भी आख़िर कार इंसान हैं और उन्हें भी इस तरह की बातें 14 और 15 अगस्त को ही याद आती हैं. मैंने एक चीज़ जो न्यूयॉर्क में देखी सबको बताना चाहता हूँ, कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों देशों की सीमा एक हैं और न्यूयॉर्क में उनके दूतावास भी एक साथ हैं. अब जब सात समुंद्र पार भी इन दोनों देशों के दूतावास आगे पीछे हैं तो इस प्रकार के लेख हर साल आना जायज़ है. अगले साल फिर मुझे वुसत साहब के लेख का इंतेज़ार रहेगा. लिखते रहिए, शायद इन दोनों देशों की आम जनता भी किसी दिन अपने दिल की सीमा शेयर करने लगे.

  • 23. 23:38 IST, 14 अगस्त 2009 नीरज वशिष्‍ठ:

    अपने पूरी बेबाकी के साथ विश्‍लेषण नहीं किया है। भारत पाक के बीच सारस लोमडी का खेल नहीं हो रहा है। पाक की हरकतों से सब वाकिफ है और मुंबई हमलों के बाद उसकी नियत जगजाहिर हो गई है। दरअसल पाक की नियत खराब है और रही बात भारत की तो दुनिया को मालूम है कि वह सदा से बडा भाई का फर्ज अदा करने को तैयार रहा है। भारत बार बार पाक की गलतियों का माफ कर देता है, नजरअंदाज कर देता है, वह इसलिए की उसमें कोई सुधार हो सके। लेकिन सुधार की गुंजाइस कही से भी नजर नहीं आ रही है। हां पाक ने हर समय लोमडी की भूमिका का सफलता से निर्वाह जरूर किया है।
    मेरी आपसे प्रार्थना होगी कि जब भी आप दोनों देशों के संबंधों को लेकर विश्‍लेष्‍ाण करे तो निष्‍पक्षता का व्‍यवहार अख्‍ितयार करे। विलावजह हर मामले में दोनों को दोष देने की आदतों पर हमें पाबंदी लगानी होगी। नहीं तो किसी भी समस्‍या का समाधान नहीं होगा।
    धन्‍यवाद

  • 24. 01:54 IST, 15 अगस्त 2009 Rohit Malik:

    बहुत खूब खेल खेला है खेलने वालों ने.
    वरना क्या हिन्दुस्तान और क्या पकिस्तान. ले दे कर सब एक ही है , वही लोग, वही खाना पीना, भाषा, सोच, सब एक है लेकिन अपना अपना मुल्क लेकर बैठ गयें हैं. कोई राष्ट्रीयता की भावना ना 1947 से पहले थी और ना ही अब है... पहले का अंजाम तो पकिस्तान है... आगे का देखें क्या होता है ...

  • 25. 08:16 IST, 15 अगस्त 2009 Balwant Singh:

    खान साहब ,हम तो पिछले ६२ साल से घोड़े को तालाब पर ले जा रहे हैं | अब वह पानी न पिए तो किसका कसूर | कोई बीच का रास्ता हो अगली बार जरूर लिखें | वैसे आपकी कलम को बधाई |

  • 26. 10:37 IST, 15 अगस्त 2009 naresh:

    मैं आप से सहमत हूँ.

  • 27. 11:35 IST, 15 अगस्त 2009 उमेश यादव - न्यूयार्क अमेरिका:

    वुसतुल्लाह ख़ान साबह सलाम! आप का कोई जवाब नहीं, हर लेख एक से बढ़ कर एक होता है. कमाल है आप की क़लम का जादू.

  • 28. 13:10 IST, 15 अगस्त 2009 vivek kumar pandey,hyderabad,india:

    सारस और लोमड़ी में कभी भी शेर के कहने से दोस्ती नहीं हो सकती. उनको ख़ुद पहल करनी होगी, दोनों देश में क़रीब आधे लोग ग़रीब, भूखे और अशिक्षित हैं. आतंकवाद भी ऐसे ही हालात में फलता-फूलता है. बंदूक़ क़लम से ज़्यादा प्यारी हो जाती है. अब दोनों को साझा पर्यास करने की ज़रूरत है. उनको अपने असली दुश्मन से लड़ना है. इन 62 वर्षों में हमने बहुत समय बरबाद किए हैं, अब ज़रूरत है सबक़ सीखने की. हमने इन बीते सालों में दुश्मनी बहुत अच्छी तरह निभाई है. अब ज़रा सच्चे दिल से दोस्ती निभा के तो देखें. दोनों देश की सरकारें तो ऐसा करने में सफल नहीं हैं या होना भी नहीं चाहतीं. शायद ऐसा वह असली समस्या से ध्यान हटाने के लिए किया करती हैं. लेकिन अब तो जाग जाओ मियाँ, आख़िर कब तक सोते रहोगे. वुसत साहब की लगातार कोशिश के लिए हमें कृतज्ञ होना चाहिए. धन्यवाद, जय हिंद जय पाक.

  • 29. 14:49 IST, 16 अगस्त 2009 Khushdeep Sehgal, Noida:

    वुसत भाई, जहां तक सियासतदानों की बात हैं तो इनकी कोशिश तो बस यही है कि दोनों जगह अवाम की आंखों पर पट्टी बंधी रहे और इनकी हांडी बार-बार पकती रहे। गुरबत, फिरकापरस्ती, भुखमरी, बेरोज़गारी, बे-तालीमी, करप्शन से जंग लड़ने की जगह एक-दूसरे मुल्क को ही दुश्मन नंबर एक बताते हुए लड़ने-मरने की बातें की जाती रहे। बाकी जो इंसान है वो चाहे सरहद के इस पार है या उस पार, वो यही सोचते हैं- पंछी, नदियां, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इनको रोके। फिर सोचो तो क्या मिला हमको इंसान होके।

  • 30. 14:18 IST, 22 अगस्त 2009 Chander Tolani:

    कोई शक नहीं कि आपकी लेखनी कमाल की है. सारस और लोमड़ी की कहानी हमने भी सुनी है पर बिना शेर के ज़िक्र वाली. कहीं कहानी में आपने भी शेर को ज़बरदस्ती तो नहीं फ़िट किया है कुछ वैसे ही जैसे उस मोटे पहलवान स्टुअर्ड की तरह जो समझता है कि भारतीय उन्हें कमज़ोर न समझें. सच कहूँ तो आपके इस ब्लॉग ने मनोरंजन तो किया पर आपका भी अंदाज़ अब एक सा ही बन कर रह गया है. पर आपको क्या, इसी तरह लिखते रहिए आपकी दुकानदारी चलती रहेगी. शुभकामनाएँ.

  • 31. 10:43 IST, 23 अगस्त 2009 dharmendra kumar:

    भारत और पाकिस्तान के संबंध अच्छे करने के लिए पत्रकारों की पहल ही काम आएगी. कृपया मानवाधिकार जैसे मुद्दे पर बहस होनी चाहिए.

  • 32. 05:36 IST, 25 अगस्त 2009 Ritesh:

    विमानों में शुद्ध हिंदी और उर्दू में दिए जाने वाले निर्देशों को सारस और लोमड़ी की कहानी से जोड़ने वाली बात बहुत रचनात्मक है | बहुत बढ़िया |

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