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यौन संबंधः बच्चों को जानकारी कौन दे?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|गुरुवार, 06 अगस्त 2009, 18:43 IST

यदि एक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि भारत में हर चौथी अविवाहित युवती यौन संबंध बना चुकी है तो यह चौंकाने वाली बात है.

भारतीय समाज कितना भी आधुनिक हो, किसी ग़ैर शादीशुदा लड़की का अपने बारे में इस तरह खुल कर बोलना आज भी उतना आम नहीं है जितना पश्चिमी समाज में.

फिर यह भी है कि इस सर्वेक्षण में मात्र 3500 लड़कियों को शामिल किया गया. इतनी कम संख्या के आधार पर संपूर्ण भारतीय समाज के बारे में किसी नतीजे पर पहुँचना कुछ अटपटा लगता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इनमें से 41 प्रतिशत को गर्भनिरोधकों की जानकारी मीडिया से मिली.

बार-बार कहा जाता है कि किशोरावस्था के लड़के-लड़कियों को यौन शिक्षा दी जाए. कुछ स्कूलों में ऐसी शुरुआत भी हुई है.

यह भी कहा जाता है कि यह माता-पिता की ज़िम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को इस बारे में जानकारी दें.

मुझे नहीं लगता भारत में ऐसे बहुत से परिवार होंगे जो अपने बड़े होते बच्चों से कहें कि यौन संबंध बनाओ लेकिन एहतियात बरतो.

तो सवाल यह है कि इस बारे में जानकारी कहाँ से मिले. किताबों से? टीचरों से? माँ-बाप से?या फिर टीवी और फ़िल्मों से?

मुझे नहीं लगता इस बारे में आप सब क्या राय रखते होंगे लेकिन मेरा मानना है कि अधकचरी जानकारी से बेहतर है कि माता-पिता ही यह उत्तरदायित्व निभाएँ.

माँ बेटी और पिता बेटे से इस बारे में बातचीत करे. उसे असुरक्षित यौन संबंधों के ख़तरों से आगाह करे.

जानकारी देने का सबका अपना-अपना तरीक़ा हो सकता है. इसका उद्देश्य ज़रूरी नहीं यह हो कि वे अपने बच्चों को इस तरह के संबंध बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं या इसे उचित ठहरा रहे हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:09 IST, 06 अगस्त 2009 Saagar:

    सत्य वचन सलमा जी... शुरुआत परिवार को ही करनी होगी लेकिन देर लगेगी इसमें...

  • 2. 20:50 IST, 06 अगस्त 2009 SHABBIR KHANNA:

    सलमाजी आपने सच कहा है. लेकिन मेरे ख्याल में आज भारत में हर बेटी और बेटा यौन संबंधों को खूब जानता है और समझता है. मुझे याद है कि मेरा बचपन और उससे पहले के लोगों का बचपन जब लोगों के पास हाफ पैंट और पूरे बदन पर कपड़े तक नहीं होते थे, लेकिन वो जमाना आज नहीं है. आज छोटे से बच्चे को मालूम है कि यौन संबंध क्या होते हैं और वे छात्र जीवन से ही ग़लत तरीके से यौन संबंध बनाने की चाह रखते हैं. वैसे जैसे माँ और बाप होंगे, वैसे गुण औलाद में आते हैं. मेरे ख्याल से युवाओं पर आजकल की फ़िल्मों, टीवी और हाईफ़ाई जिंदगी का असर है और इस पर नियंत्रण कभी नहीं लग सकेगा.

  • 3. 21:01 IST, 06 अगस्त 2009 Dinesh Kumar Kumhar:

    सलमाजी आपने हमारे समाज की दुखती रग पर हाथ रख दिया है. वैसे आज भी लोग कहते हैं कि परदे की बात परदे में रहे तो अच्छा है. लेकिन परदे के पीछे क्या अच्छा होता है और क्या बुरा, इसका पता तब चलता है जब कोई अविवाहित लड़की माँ बन जाती है, बलात्कार होता है और लड़कियों को छेड़ा जाता है. ये सब सेक्स की शिक्षा न देने कारण होता है. आज भी हमारे समाज में इस विषय के बारे में खुलकर बातचीत नहीं होती. अगर कोई पहले करता भी है तो उसे बेशर्म, बेहया समझा जाता है. आधी अधूरी सेक्स शिक्षा से सबसे ज्यादा नुक़सान लड़कियों को उठाना पड़ता है. हमें पुरानी दकियानूसी धारणा से ऊपर उठकर युवाओं को सेक्स की शिक्षा देनी चाहिए. इससे उनकी ग़लत धारणा को बदलेगी ही, समाज में भी कुछ सुधार होगा और एड्स जैसी बीमारी से भी बच सकेंगे. लेकिन समस्या ये है कि आवाज़ उठाए कौन? शर्म के मारे लोग इसके बारे में खुलकर चर्चा नहीं कर पाते हैं, लेकिन सोचिए कि एक बाप अपनी बेटी को सेक्स की शिक्षा दे, एक माँ अपनी बेटी को सेक्स की शिक्षा दे, ये विचार सोचने में कुछ अजीब लगता है, परंतु ये आज की ज़रूरत बनता जा रहा है. सलमाजी मैं आपकी बात से सहमत हूँ कि शुरुआत घर से करनी होगी.

  • 4. 21:27 IST, 06 अगस्त 2009 nitin tyagi:

    सलमा जी मुझे नहीं लगता पश्चिमी समाज में ऐसे बहुत से परिवार होंगे जो अपने बड़े होते बच्चों से कहें कि यौन संबंध बनाओ लेकिन एहतियात बरतो. फिर भारत के लिए ये तर्क क्यों?

  • 5. 22:43 IST, 06 अगस्त 2009 GA:

    सलमाजी, मेरा कहना है कि अब भी भारतीय दुविधा में फंसे हुए हैं. कभी हम अति आधुनिक बन जाते हैं और कभी इतने दकियानूसी की पूरी दुनिया में उसकी मिसाल न मिले. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण सूर्यग्रहण था. सबसे पहले इस खाई को पाटते हुए ऐसा रास्ता निकालना चाहिए कि नैतिकता और समाजिक मूल्यों को बिना ठेस पहुँचाए मकसद को पूरा कर सके. और फिलहाल ऐसी इच्छाशाक्ति न तो सरकार में नज़र आती है और न इस समाज में और न ही खुद हम में.

  • 6. 23:26 IST, 06 अगस्त 2009 अश्‍वनी कुमार निगम, पत्रकार (हिन्दुस्�:

    यौन शिक्षा भारत में आज भी एक विवादित मुद्दा बना हुआ है. कुछ लोग इसके पक्ष में हैं तो स्वाभाविक है कि कुछ लोग इसके विरोध में भी होंगे. सबका अपना-अपना तर्क है. कोई विज्ञान का हवाला देता है तो कोई धर्म और संस्कृति का. सवाल यहां स्वास्थ्य का होना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य से सेक्स का नाम सुनते ही लोग हिचकने लगते हैं, जबकि यह जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है जिसकी अनदेखी से बहुत सारी बीमारियों के साथ ही मानसिक अवसाद भी उत्पन्न हो जाता है. जहां तक सेक्स शिक्षा का सवाल है तो इसे कैसे और किन तरीकों से दिया जाए, मुद्दा यह होना चाहिए. लेकिन लोग मुख्य विषय से हटकर अनावश्यक रूप से इस विषय को विवादित बना रहे हैं.

  • 7. 00:15 IST, 07 अगस्त 2009 Yogendra Rai:

    भले ही यह तथ्य कुछ 3500 लड़कियों पर किए गए सर्वे के निष्कर्ष के रूप में सामने आया हो, इसे हमें स्वीकार करना चाहिए. यौन शिक्षा चाहे वो माता पिता या फिर स्कूल के द्वारा हो, हम इसके महत्व को दरकिनार नहीं कर सकते. हमें अब संकोच छोड़ कर इस बारे में अपने बच्चों से बात करनी ही पड़ेगी.

  • 8. 03:20 IST, 07 अगस्त 2009 NAVJOT:

    मैं इस लेख से बेहद निराश हुआ हूँ क्योंकि आपने ये सर्वे केवल महिलाओं पर किया है. पुरुषों का क्या? मैं मानता हूँ कि कुछ माता पिताओं को अपने बच्चों से सेक्स के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए. आज की पीढ़ी को ये बताने की ज़रूरत है कि क्या सही है और क्या ग़लत है. उन्हें न केवल सेक्स की शिक्षा देनी चाहिए बल्कि बताना चाहिए कि वो इससे जुड़ी किन बीमारियों का शिकार हो सकते हैं. अगर वो सावधानी नहीं बरतते हैं तो तो उनकी जान ख़तरे में पड़ सकती है.

  • 9. 08:06 IST, 07 अगस्त 2009 Ram Lakhan Ram, BHU, Varanasi:

    यह सत्य है कि हम तय नहीं कर पा रहे हैं कि क्या करें, क्या न करें. यौन शिक्षा को लेकर अभिभावकों में एक डर सा बना हुआ है कि वे किस तरह अपने बच्चों से सेक्स की बात कर सकते हैं. और फिर बच्चे उनके बारे में क्या सोचेंगे. आज माता-पिता दुविधा में हैं और बच्चे परेशान. आज किशोर बहुत उत्सुक है कि वह सेक्स की जानकारी रखे और समय के साथ उसका सही तरीक़े से उपयोग भी करे. लेकिन सही जानकारी का अभाव है जिसकी वजह से बहुत सारी परेशानियाँ और बीमारियाँ बरबस ही लग जाती हैं. आज के किशोर को परिपक्व और अभिभावक को ज़िम्मेदार होना होगा. यही समय की मांग है.

  • 10. 08:45 IST, 07 अगस्त 2009 satyendra pathak :

    सलमा जी इस परिप्रेक्ष्य में दो बातें हैं जो काबिल-ए-गौर है-
    पहली-आपने कहा कि हर चार में से एक अविवाहित लड़की सम्बन्ध बना चुकी है.ये बात मुझे पचती नहीं लेकिन अगर इस बात पर हम विश्वास कर भी लें तो क्या आपको नहीं लगता कि उन चार में से कम-से-कम दो के पास असुरक्षित यौन संबंधों के नफे/नुकसान की पूरी नहीं तो कमसे कम प्राथमिक जानकारी तो अवश्य होगी.तो इस बात पर हम कितना सहमत हो सकते हैं कि यौन संबंधो की जानकारी रहने पर अविवाहित लड़के/लडकियां सम्बन्ध नहीं बनायेंगे.??
    दूसरी-आप नगरीय क्षेत्रों का ही उदाहरण लें जहां पर देहाती क्षेत्रों की तुलना में युवाओं में यौन संबंधों के बारे में ज्यादा खुलापन है.उन्हें इस संबंधों की प्राथमिक जानकारी तो अवश्य ही होती है.लेकिन आप खुद ही देख ले कि कहाँ अविवाहित कम सम्बन्ध बनाते हैं?
    हाँ इस बात से मैं सहमत हूँ कि जानकारी होने पर इससे होने वाली बिमारियों पर शायद रोक लगे.लोग एहतियात बरतेंगे.लेकिन यौन शिक्षा यौन सम्बन्ध बनाने की दर पर रोक लगायेगी ये संदेहास्पद लगता है.
    सलमा जी इस बात से मैं सहमत हूँ की माता-पिता के अलावे इस बारे में बच्चो/किशोरों को कोई बेहतर जागरूक नहीं बना सकता.
    लेकिन लोग विवाहोपरांत यौन सम्बन्ध बनायें इस बारे में आपने कुछ नहीं कहा...की कौन इसकी जागरूकता लायेगा.?हाँ माता-पिता इसके विकल्प हो सकते हैं लेकिन स्कूलों/कॉलेजों अथवा सार्वजनिक स्थानों पर इस बारे में पहल का आभाव पाया जाता है..
    लेकिन सचमे आपका प्रयास सराहनीय है.उम्मीद है आप हमारे विचारों को पहले की तरह रद्दी की टोकरी में नहीं डालेंगी...
    आपका नियमित श्रोता..
    सत्येन्द्र

  • 11. 13:14 IST, 07 अगस्त 2009 Shriram Pandey:

    सलमा जी ! केवल कुछ समंको पर इस तरह की बातो को स्वीकार नहीं किया जा सकता. रही बात सेक्स एजूकेशन को तो इसके लिए मीडिया एक तुलनात्मक भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसके लिए ये जरूरी है की बच्चो और किशोरों को इसके हर पहलुवों की जानकारी दी जाये जैसे इसके लिए सही उम्र क्या होनी चाहिए, क्या क्या बीमारिया और प्रभाव उनपर पड़ सकता है आदि .
    नैतिक शिक्षा भी बच्चो में अच्छे विचारो को जन्म देती है , बस जरूरी है बच्चो मे ऐसे गुण विकसित करने की जिससे वे अछे बुरे समझ सके. इसके लिए मीडिया, माता पिता और शिक्षा मंदिरों को आगे आना होगा .

  • 12. 14:19 IST, 07 अगस्त 2009 Idrees A. Khan, Riyadh. Saudi Arabia:

    सलमा जी, भारत इतनी विविधताओं भरा देश है कि अगर कोई तीन हज़ार की जगह तीन लाख लोगों का सर्वे करे तो भी उसके रिज़ल्ट्स को पूरे भारतीयों के सर पर नही थोपा जा सकता, श्रीनगर, अमृतसर, बनारस और लखनऊ की सोच गोवा और मुंबई के जैसी हो इस पर मुझे श है. फ़िर भी बहस की खातिर मान लेते हैं कि इस सर्वे के परिणाम सही हैं. और सारे भारत की लड़कियों पर लागू होते हैं.
    देखिये, आपके इस बलॉग़ के बिलकुल नीचे अभी मुझे एक फोरम भी नज़र आ रहा है, जिसका विषय है “सम्मान के लिये हत्याओं पर राय”
    ऐसा लग रहा है एक जगह अफ़ग़ानिस्तान की बात हो रही है और एक जगह किसी पश्चिमी देश की, ज़रा सोचिये जिस देश मे आज भी अपनी तथाकथित मान मर्यादा को बचाने के लिये लोग क़ानूनी तौर पर जायज़ शादी को नाजायज़ बता कर हत्या करने से नही चूकते वहां कोई मां बाप अपने बच्चों से ये कहे कि यौनसंबंध बनाओ पर एहतियात बरतो, एसा मुझे तो फ़िलहाल मुमकिन नही लगता.
    शादी तक सब्र (सबर) कर लो, खुद को अपने लाइफ़ पार्टनर के लिये बचा कर रखो, इन सारे उपदेशों का असर नई पीढ़ी पर हो ये उम्मीद भी कम ही है.
    ये कंट्रोल करें भी तो कैसे, जो आज इन्हे मयस्सर है इनके मां बाप उसकी कल्पना भी नही कर सकते थे, मोबाइल, एस.एम.एस, सोशल नेटवर्किंग, डेटिंग साइट्स ये तो हुए लोगों को मिलाने के हाईटेक साधन रही सही कसर इंटरनेट पर मौजूद सेक्स सामग्री पूरी कर देती है, जो चीज़ें कुछ वर्षों पेहले एक उम्रदराज़ आदमी को ढूंडने पर नही मिलतीं वो भयावह चीज़ें एक 10 साल के बच्चे को सिर्फ़ एक क्लिक पर मिल जाती हैं. इंटरनेट पाठशाला पर ही इनकी पहली यौन शिक्षा की क्लास लगती है. फ़िर उस क्लास मे सीखे हुए सबक़ को जल्द से जल्द प्रेक्टिकल मे बदलने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं.
    बहरहाल अगर हालात इतने नाज़ुक हैं तो किसी और स्कूल मे ये शिक्षा दिलवाने से बेहतर है कि मां बाप खुद अपने बच्चों के लिये स्कूल की भूमिका निभाएं. जब सबजेक्ट सेक्स जैसा सेंसिटिव हो तो टीचर के नाम पर किसी एसे व्यक्ति पर विश्वास कैसे किया जा सकता है जिसके भूत का पता न वर्तमान का न ही चरित्र का. आखरी वाक्य काफ़ी नैरो माइंडेड लगा होगा, पर सच है.

  • 13. 16:41 IST, 07 अगस्त 2009 Shailesh Sharma:

    बच्चों को यौन शिक्षा दिलाने के लिए सब पीछे पड़े हैं. अरे भाई, उनको प्राथमिक शिक्षा तो दिलाओ पहले. या यौन शिक्षा उससे पहले आती है जिसके लिए हंगमा मचाया जा रहा है.

  • 14. 19:26 IST, 07 अगस्त 2009 ashutoshjha :

    बहुत अच्छा लेकिन मुझे यह सही नहीं लग रहा है. ऐसा भारत में संभव नहीं.

  • 15. 20:36 IST, 07 अगस्त 2009 Kamal:

    सलमा जी, मैं आपकी कोशिशों की सराहना करता हूँ कि आपने इस विषय को उठाया. मेरे विचार से आज के युग में गणित और अंग्रेज़ी की तरह यौन शिक्षा भी महत्वपूर्ण है. लेकिन अब सवाल ये है कि ये काम कौन करेगा. हम नर्स या डॉक्टर के साथ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग चर्चा का आयोजन कर सकते हैं. उन्हें खुल कर सवाल पूछने दीजिए और डॉक्टरों को इसका जवाब देने दीजिए. एक बार इस विषय पर वे खुल गए तो आगे का काम उनके माता-पिता पर छोड़ देना चाहिए, जो उन्हें अच्छाई और बुराई के बारे में बता सकते हैं.

  • 16. 21:45 IST, 07 अगस्त 2009 himmat singh bhati:

    इस सवाल को पूरे भारत को लेकर नहीं थोपा जा सकता है. हर जगह की परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं. कौन दे उनको यौन शिक्षा. आप यह भी बताएँ कि आदि काल से लेकर अभी तक कौन शिक्षा दे रहा था. जबकि अबके हालत बहुत बदले हुए हैं. नेट, टीवी और मीडिया से जुड़े लोग और अपना माल बेचने के चक्कर में कई कंपनियाँ, ऐसे काम से अवगत करा रही हैं. जानवरों, पक्षियों को कौन शिक्षा देता है. वे तो खुलेआम ये सब करते हैं.

  • 17. 21:59 IST, 07 अगस्त 2009 maneesh kumar sinha:

    मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि सेक्स क्यों पहली चिंता होनी चाहिए. हमारे पास सुलझाने के लिए कई और अहम मुद्दे हैं. सेक्स एक प्राकृतिक और पाश्विक व्यवहार है. कोई भी जानवर प्रजनन के लिए शिक्षा नहीं लेता. असली मुद्दा बदलती जीवन शैली है. लोग 30 या उसके बाद शादी इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें अपना प्रोफ़ेशन जमाने की ज़रूरत होती है. शादी की संस्था अपनी सांस्कृतिक महत्ता खो रही है.

  • 18. 08:05 IST, 08 अगस्त 2009 उमेश यादव- न्यूयार्क अमेरिका:

    अच्छी बात है, बच्चों को जानकारी दी जानी चाहिए लेकिन जब वे इस तरह की जानकारी के लायक़ बन जाएँ.

  • 19. 13:53 IST, 08 अगस्त 2009 anwaral haque:

    सलमा जी, जब बात हो ही रही है तो माता-पिता को आगे आना ही होगा क्योंकि बच्चों की ग़लतियों का ख़ामियाजा सबसे पहले माता-पिता को ही भुगतना पड़ता है. इसी प्रकार हम एक स्वस्थ समाज की स्थापना कर पाएँगे. ये मुद्दा बड़ा नहीं है, माद्दा होना चाहिए.

  • 20. 23:51 IST, 08 अगस्त 2009 Shankar Tiwary:

    मेरी राय में बच्चों के साथ बातचीत करने का ये आसान विषय नहीं है. फिर भी हमारी कोशिश होनी चाहिए की हम उन्हें इस बारे में कुछ जानकारी दे सकें, शिक्षित कर सकें.

  • 21. 00:09 IST, 09 अगस्त 2009 संवे्दना, नई दिल्ली:

    सलमा जी ने एक सही सवाल उठाया है. इस सवाल पर तो यहाँ कई लोग लिख चुके हैं. मैं इससे जुड़ा हुआ ही एक दूसरा सवाल उठाना चाहती हूँ. वो है स्वयं यौन संबंधों को लेकर. हम लोग यौन संबंधों को इतनी घृणित दृष्टि से क्यों देखते हैं? यौन संबंधों के बारे में हमारा नज़रिया कब बदलेगा?
    हम सभी अपने अनुभवों से जानते हैं कि किसी व्यक्ति को अगर कोई काम करने से रोका जाता है तो संबंधित व्यक्ति वह कार्य जरूर करता है. किशोरों में यह प्रवृत्ति अधिक होती है. शायद इसीलिए माँ-बाप और समाज के लाख नैतिकता का पाठ पढ़ाने के बावजूद आधे किशोर विवाहपूर्व यौन संबंध का अनुभव प्राप्त कर चुके होते हैं. लेकिन इसके साथ ही समाज की कड़वी सच्चाई यह है कि जैसे ही इस तरह के संबंधों के बारे में माँ-बाप या समाज के किसी ठेकेदार को पता चलता है, तबाही आ जाती है. और अगर यह यौन संबंध बनाने वाली कोई लड़की है, भले ही वह बालिग हो चुकी हो और शिक्षित-समझदार हो, तो उसके इस कृत्य को भारतीय समाज में इतने घृणात्मक नजरिये से देखा जाता है कि उस लड़की के लिए बची हुई जिंदगी नर्क बनाने की पूरी तैयारी कर दी जाती है. आगे हम सब जानते हैं कि उसके साथ क्या-क्या हो सकता है, होता है. मैं इस बारे में कोई मूल्य निर्णय नहीं देना चाहती कि उसने सही किया या गलत, लेकिन इस बारे में मैं पूरे साहस के साथ कहना चाहती हूँ कि किसी के साथ सहमति से यौन संबंध (जो कि प्रेम की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं) बनाकर उसने ऐसा कोई गुनाह नहीं किया जिसके लिए उसकी बची हुई जिंदगी तबाह कर दी जाए. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि कितने पुरुष विवाह से पूर्व और विवाह के पश्चात विवाहेतर यौन संबंधों में लिप्त रहते हैं. यह हमारे पुरुषवादी वर्चस्व की ही देन है कि इससे ऐसे पुरुषों की आनंदमयी जिंदगी बिल्कुल प्रभावित नहीं होती. इसका कारण पुरुषवाद के साथ-साथ वह सड़ी हुई सोच भी है जो यौन संबंधों को इतना नकारात्मक दृष्टि से देखती है. मैं 57 साल की हो गई हूं, लेकिन लाख सोचने के बाद भी आज तक मेरी समझ में ये नहीं आया कि एक लड़की ने अगर प्रेम की प्रक्रिया में किसी लड़के से यौन संबंध बना लिए तो ऐसा क्या हो गया जिससे समाज को उसकी पूरी जिंदगी बर्बाद करने का हक़ मिल गया. समाज के ठेकेदारों से मेरा यही सवाल है कि ईमानदारी सें बतावें कि अगर उनकी जिंदगी में ऐसा लम्हा आया होता तो क्या वे उस लड़की की राह पर नहीं चलते?
    सौ बातों की एक बात, मेरा यही कहना है कि परम पूज्यनीय माँ-बापों और इस सड़े हुए समाज के ‘सम्मानीय’ ठेकेदारों को यौन संबंधों के प्रति अपनी धारणा में बदलाव की सख्त जरूरत है, जिससे कि असंख्य बच्चियों की जिंदगी बर्बाद होने से बच जाए.

  • 22. 14:23 IST, 09 अगस्त 2009 राजन उपाध्याय :

    भारत में बढ़ता हुआ बाज़ार मनुष्य की इच्छाओं का अनावश्यक विस्तार करते हुए, भोग वादी, लिप्साओं एवं अपसंस्कृति को बढ़ावा दे रहा है जिसके परिणामस्वरुप भारत में पश्चिमी संस्कृति जैसे-स्वानंद और चरमआनंद वाली मानसिकताएं लोगों पर हावी होती जा रही हैं. भारत की अपनी मूल संस्कृति में ऐसे रीति-रिवाज़ शामिल हैं जो मनुष्य और मनुष्यता के सारे मानदंडों को पूरा करता है. अब अगर हम अपनी मूल संस्कृति को भूल कर, किसी और की संस्कृति को आयात करके उसे अपनाएंगे तो हमारा वजूद प्रदूषित होकर ऐसे ही हमारे सामाजिक एवं पारिवारिक मूल्यों का क्षरण करता रहेगा.

  • 23. 17:35 IST, 09 अगस्त 2009 sanjay kumar:

    बच्चों को यौन शिक्षा देने की बात ही नहीं है, उन्हें केवल अच्छे संस्कार देने की ज़रूरत है. आज के बच्चे अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो जाते हैं. इसलिए ये कहना कि उन्हें यौन शिक्षा की ज़रूरत है, बिल्कुल गलत है. सूचना क्रांति के इस युग में सभी बच्चे सैक्स के बारे में जानते हैं. मान लिया कि आप उन्हें यौन शिक्षा देते भी हैं तो क्या बताएँगे कि समय से पहले यौन संबंध बनाने से ये सब परेशानी पैदा हो सकती है. इसके बाद उनके मन में कुतुहल और पैदा होगा, तब उन्हें कौन रोकेगा. अभी स्कूलों में यौन शिक्षा देने का माहौल नहीं है. छात्राओं से बलात्कार और उन्हें झूठे प्यार में फंसाकर यौन संबंध बनाने के मामले आय दिन आते रहते हैं, ऐसे में यौन शिक्षा के लिए पहले सही माहौल तैयार करना चाहिए.

  • 24. 23:25 IST, 09 अगस्त 2009 Rao Gumansingh:

    यौन शिक्षा भारत में प्राचीन काल से चली आ रही है. पश्चिमी विचारधारा के वाहकों के द्वारा भारत में यौन शिक्षा पढ़ाने का पाठ गैरवाजिब है. सुहागरात के बारे में सबसे प्रथम पाठ माता ही सिखाती है. भारतीय समाज में उक्त शिक्षा की जरूरत उस समय ही होती है. सैक्स का प्री-नॉलेज सामाजिक परंपरा व संस्कार के विरूद्ध है. सलमा जी, बीबीसी की हिंदी सेवा में कृपया ऐसे विचार व लेख का प्रकाशन बीबीसी की साख को खराब करना है. प्राचीन काल से ही कामसूत्र व कोकशास्त्र भारत में प्रचलित है. यौन शिक्षा का प्रचार प्रसार स्कूली जीवन में घातक है. ऐसी शिक्षा देने से तरूण बालक भी सैक्स पर प्रयोगधर्मी हो जाएगा. जोकि भारतीय समाज के लिए विनाशकारी होगा.

  • 25. 13:36 IST, 18 अगस्त 2009 saroj ku. verma:

    शुरुआत तो माता-पिता से ही करनी होगी क्योकि बच्चे के सबसे ज्यादा करीब वही होते है।

  • 26. 06:54 IST, 18 सितम्बर 2009 karunakar:

    यह सर्वेक्षण शायद किसी बड़े शहर का है.

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