जो सेलिब्रिटी नहीं हैं उनका क्या...
चर्चा और चिंता घर न मिलने की नहीं है, इंदिरा आवासीय योजना के तहत अनगिनत लोगों को घर नहीं मिला, तब कौन-सी चिंता हुई.
एक मुसलमान दोस्त के लिए दिल्ली में फ्लैट ढूँढने के कटु अनुभव से गुज़र चुका हूँ, मकान मालिकों ने सारी बात तय होने के बाद किराएदार का नाम सुनते ही अपना इरादा बदल दिया, किसी ने कहा 'मैं तो मॉर्डन आदमी हूँ लेकिन मम्मीजी नाराज़ हो जाएँगी,' किसी ने कहा, 'सॉरी, पड़ोसी एतराज़ करेंगे...'
इमरान हाशमी और शबाना आज़मी स्टार हैं, उनकी बात लोग ग़ौर से सुनते हैं मगर बात आगे नहीं बढ़ पाती. इन सितारों से कई गुना ज्यादा मुश्किल लाखों आम लोगों को होती है.
कोई बिहारियों को घर नहीं देना चाहता तो कोई अकेले लड़के या लड़की को, कोई माँसाहारियों को घर नहीं देता तो कोई दलितों को, देश के कई हिस्सों में जाति पूछे बिना मकान देने का रिवाज नहीं है.
असली समस्या एक ही है--ख़ाली मकान के मालिक का दिमाग़ पूर्वाग्रहों से भरा होना.
मकान मालिक की कुछ जायज़ चिंताएँ होती हैं कि वक़्त पर किराया मिल जाए, मकान में तोड़फोड़ न हो, किराएदार आतंकवादी या अपराधी न हो वग़ैरह-वग़ैरह लेकिन मकान मालिक अक्सर अपने मकान की ही नहीं, किराएदार के चरित्र की हिफ़ाज़त करना भी अपना कर्तव्य समझते हैं.
मकान बेचने के मामले में तो ख़ैर सिर्फ़ दाम से मतलब होता है लेकिन पड़ोसियों का दबाव होता है कि 'यार हमारे बग़ल में किसे बसाने जा रहे हो, जाति-धर्म, खान-पान, चाल-चलन सब हमारे अनुरूप होना चाहिए'.
डेमोक्रेटिक, प्रोग्रेसिव, मॉर्डन, अर्बन, कॉस्मोपॉलिटन, सेकुलर जैसे मुलम्मों को ज़रा सा खरोंचते ही अंदर से एक शक्की, तंगनज़र आदमी झाँकने लगता है जो सिर्फ़ अपनी जाति-धर्म के लोगों के बीच ही ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है.
इमरान जिसकी बात कर रहे हैं वह तंगनज़री का बचा हुआ हिस्सा है, जिस बॉलीवुड पर शाहरुख़-सलमान और आमिर का राज चलता है वहाँ उनका नाम इमरान है. वक़्त बदला है तभी दिलीप कुमार, अजीत और जगदीप की तरह हिंदू नाम रखने की ज़रूरत नहीं पड़ी.
उम्मीद है कि उन्हें जल्दी ही घर मिल जाएगा, जो सेलिब्रिटी नहीं हैं उनके बारे में ऐसी उम्मीद करना ज़रा मुश्किल है.

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एक व्यक्ति जब घर देता है तो उसके मन मे सौ विचार होते हैं। राजेश जी ने अपने ब्लॉग में लगभग उन सभी दुविधाओं को लिखा है। और ये हर समाज का हिस्सा है, सिर्फ भारत में ही नहीं है। ब्रिटिश समाज भी अभी तक इससे ग्रसित है, पर उसका स्वरूप भिन्न है। हम माने या ना माने ये सब जीवन का हिस्सा हैं। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कह कर सम्लैगिक्ता तो वैधता मिल गई तो फिर इससे गुरेज़ क्यूँ। ये भी किसी ने अपने आप्को अभिव्यक्त ही तो किया है।
इमरान साहब ने इस मसले को धर्म से जोङ कर अपनी ओछी समझ को ही उजागर किया है। कोई स्वयं को कितना बङा ही विद्वान क्यूँ ना समझे, पर हर किसी न किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित होता है। और चूँकि मीडिया को अपने कार्यक्रम २४ घंटे दिखाने है तो हर बात का बवाल होना स्वाभाविक है।
आपने सही कहा. इमरान तो सेलेब्रेटी है इसलिए उनका मामला या शिकायत सुर्खियों में आ गई. लाखों लोग हैं जो रोजाना इसके शिकार होते हैं. ये हमारे समाज की ऐसी बुराई है जो दिखाती है कि हम साथ रहकर भी कितने दूर हैं. घृणा का ही गुणगान होता है. आधुनिक होने का दावा करने वाला इंसान खुद के लिए नफरत भरी दुनिया बसाता जा रहा है. कहीं गोरा-काला, कहीं देसी-परेदेसी, कहीं ऊँचा-नीचा तो कहीं हिंदू-मुस्लिम की दीवार खड़ी कर दी गई है. अगर इस घृणा को खत्म नहीं किया गया तो हम कभी भी सुरक्षित सभ्य समाज की स्थापना नहीं कर सकते. नफ़रत की भावना से हम एक खाई खोद रहे हैं जिसमें एक दिन हम ही गिर जाएँगे.
राजेश जी, आप हमेशा ही कुछ ज्वलंत मुद्दों को उठाते आए हैं. भारत में ये बहुत शर्म की बात है कि इमरान को मकान इसलिए नहीं मिला क्योंकि वो मुसलमान हैं. मैं मानता हूँ कि आतंकवाद की वजह से या कुछ कारणों से ऐसा हो सकता है. लेकिन एक कलाकार का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है. कब तक हम लोग जातिवाद का शिकार होते रहेंगे. भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश के लिए ये बहुत अच्छी बात नहीं है. ये कलाकार हमारा मनोरंजन करते हैं और बदले में हम इन्हें क्या देते हैं- उपेक्षा. रही बात फ़्लैट की तो मैं आपको बता हूँ कि फ़्लैट तो बहुत दूर की बात है यहाँ एक कमरा किराए पर मिलना मुश्किल है. मकान मालिक तरह-तरह के सवाल करता है. हो सकता है कि उसकी अपनी मजबूरी हो लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. हमें धर्म और जातिवाद से ऊपर उठना होगा. आपने जो मुद्दा उठाया है वो तारीफ़ के काबिल है. राजेश जी आपका धन्यवाद.
राजेश सर, घर तो बहुत बड़ी बात हुई हम ग़रीब मुसलमानों को तो लोन, मोबाइल, क्रेडिट कार्ड, बैंक खाता, पासपोर्ट और पैन कार्ड भी आसानी से नहीं मिलता. अमीरों की बात अलग है. उनका क्या वो तो पैसा फेंक कर तमाशा देखते हैं.
आपकी बातों से मुझे अपना अनुभव याद आ गया. जब मैं अपने दोस्त के लिए दिल्ली में एक मकान ढूँढ़ रहा था. मकानमालिक ने पहला सवाल ही उसकी जाति के बारे में पूछा. ये हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि हम इतने आधुनिक होते हुए भी मानसिक रूप से इतने पिछडे हुए हैं.
मैं बिलकुल इस बात से सहमत हूँ कि घर या फ्लैट लेने-देने का निर्णय किसी की जाती या धर्म से नहीं होना चाहिए. जहाँ तक आप इन बड़े लोगों की बात कर रहे हैं ये लोग केवल अपने फायदे के लिए धर्म को इस्तेमाल करते हैं, इनका कोई धर्म नहीं है.
मुझे याद है, एक मुस्लिम कलाकार ने शराब पीकर रोड पर सोते कई लोगों को कुचल कर मार डाला और घायल कर दिया; और बाद में जब पुलिस उसे जेल ले जा रही थी तो उसने मुसलमानी टोपी पहन ली, बस दिखाने के लिए, आप समझ गए होंगे.
दिल्ली के बाटला हाउस में मरे गए लोगों को भी किसी दोस्त ने ही घर दिलाया होगा, मुझे पता नहीं वे लोग कैसे थे; आतंकवादी थे की नहीं थे; लेकिन अब आप यह बताएं कि आप उन पड़ोसियों के पूर्वाग्रह के बारे में क्या सोच रहे हैं?. मैंने पहले भी कहा घर या फ्लैट का लेन-देन किसी की जाति या धर्म के आधार पर नहीं होना चाहिए लेकिन मेरा सवाल यह है कि "क्या किसी घर देने वाले का पूर्वाग्रह बिलकुल आधारहीन है?"
राजेश जी आप का लेख बिलकुल संतुलित नहीं, आप घर देने वाले की इस "सन्दर्भ" में चिंता और मूल परेशानी को भूल गए.
जो "सेलिब्रिटी नहीं हैं" उनके बारे में मैं यही कहूँगा हमारे समाज की यह बहुत बड़ी विडम्बना है. मेरे पिता जी अक्सर कहा करते है, सच्चाई यही है कि "छुच्छा को कौन पूच्छा". यह एक सामाजिक रोग है.
सेलिब्रिटी लोग भी कम नहीं है, एक सेलिब्रिटी का "AK-47" वाला किस्सा तो आप ने सुना ही होगा.
इमरान हाश्मी की इतनी फिल्मों को लोगों ने सर माथे पर लिया तब उन्हें ध्यान नहीं आया वे मुस्लिम हैं? क्या उनकी फिल्में दर्शकों ने इसलिए देखीं या नहीं देखीं की वो मुस्लिम हैं? उन्हें अपनी फिल्मों में लेने वाले विक्रम भट्ट क्या मुस्लिम हैं? क्या उन्हें चूमने वालीं हेरोइनों ने उनका मज़हब पूछ कर उनके होठों को चूमा था? ये मुसलमानों का भी दुर्भाग्य है और इमरान हाश्मी का भी की एक बराबरी के समाज में वे गैर बराबरी की बात हमेशा छोटे मुद्दे के लिए उठाया करते हैं. एक आतंकवादी भी ऐसे ही तर्क दे कर बन्दूक उठाया करता है एक इमरान हाश्मी भी ऐसे ही तर्क देकर दो फाड़ करने की कोशिश करता है. देश को इमरान हाश्मी जैसे मुसलमान भी नहीं चाहियें और ऐसे नागरिक भी नहीं!
माफ़ कीजिएगा. लेकिन अगर कोई हिंदू मुस्लिम बस्ती में घर लेने जाएगा तो क्या मुस्लिम लोग उसे शक की निगाह से नहीं देखेंगे. क्या उसको प्राब्लम नहीं होगी.
इस तरह किसी के कथन पर विश्वास करके पूरे समाज को स्टीरियोटाइप करना कहाँ की समझदारी है.ऐसा भी तो हो सकता है की इमरान हाशमी को किसी कारण से मकान नहीं मिल रहा और वह जबरदस्ती मकान लेने के चक्कर में अपना 'मुस्लिम' कार्ड खेल रहे हों ज्ञात रहे की कुछ समय पहले अजहरुद्दीन ने भी यही किया था जब वे क्रिकेट सट्टेबाजी के केस में पकडे गए थे तब उन्होंने भी कहा था कि मुस्लिम होने के कारण उनको टीम से बाहर किया गया है लेकिन उनको तब यह ध्यान नहीं आया कि जिस बोर्ड ने उनको कप्तान बनाते समय यह नहीं सोचा कि वे किस धर्म के हैं तो वह सजा देते समय क्यों भेदभाव करेगा .मुझे लगता है कि जानबूझ के राजेश प्रियदर्शी उन मुद्दों पर लिखते है ताकि उनकी पत्रकारिता की दुकान चल सके .
गलती सिर्फ मकान मालिकों की नहीं है. फ्लैट्स में रहनेवाले लोग अपने ही धर्म-जाति के लोगों के साथ रहना पसंद करते हैं. मलेशिया का एक हाउसिंग प्रोजेक्ट याद आता है जिसमें सभी वर्ग के लोगों को सम्मिश्रित कर घर दिए गए थे. लेकिन कुछ ही महीनों में सबलेटिंग करके या फ़्लैट बेचकर लोग अपने ही बिरादरी के लोगों के साथ रहने लगे. बदलाव कानून में नहीं, देश की मानसिकता में आना चाहिए, जो कि थोड़ा मुश्किल है.
मैं एक पत्रकार हूँ लेकिन इसे क्या कहा जाए कि मैं भी इसका शिकार बन चुका हूँ. मुझे भी घर खोजने में परेशानी हुई है. मेरा नाम सुनते ही मकान मालिक ऐसे बिदक जाते थे जैसै किसी करेंट का तार उन्हें छू गया हो. थक हार कर एक ऐसे मुहल्ले मे ही रहना पड़ा जहां से आफिस काफी दूर था.. मरता क्या न करता..आतंकवाद के नाम पर विश्वस्तर पर एक समुदाय विशेष को तो अछूत बनाया ही जा रहा है..मुझे वे पंक्तियाँ याद आ रही है जब गुजरात दंगों के समय अरुधति राय ने कहा था..आज के समय मे मुसलमान बन कर रहना एक भयानक तजुरबे से गुजरना है.
राजेश साहब,, लोगों को लगता है कि 11 सितंबर के बाद लोगों का नज़रिया मुस्लिमों के प्रति बदला है लेकिन लोगों की मानसिकता पहले से ही ऐसी रही है.मैं आपको मई 1999 की बात बता रहा हूं जब दिल्ली के शकरपुर में मुझे झूठ बोलकर एक कमरा मिला था. मैंने खुद को कश्मीरी पंडित बताया था. ऐसा मैंने इसलिए कहा क्योंकि मेरे ऑफिस में मेरा एक दोस्त कश्मीरी था और उसी के कहने पर मुझे घर मिला था. बाद मे जब उन्हें पता चला कि मैं मुसलमान हूं तो मुझे घर छोड़ना पड़ा.
मैं भी कटु अनुभव से गुजर चुका हूँ.मानसिक संकीर्णता हैदराबाद मे भी पैर फैला चुकी है. मैं एक टीवी पत्रकार हूँ.. मुझे यहाँ किराये का मकान ढूंढने मे इतनी परेशानी हुई जितनी नौकरी ढूंढने मे भी नहीं हुई थी.असल समस्या ये है कि कट्टरपंथी संगठनों ने धर्म के नाम पर नफरत का एक ऐसा बीज बो दिया है जो अब एक अच्छा खासा पेड़ बन चुका है.हर आतंकी घटना सीधे मुसलमानों से जोड़ दी जाती है.. मेरा मानना है कि जब से अमेरिका ने आतंकवाद विरोधी युद्ध के नाम पर मुस्लिम देशों पर जो चढाई की है और इसके प्रतिक्रिया स्वरूप छिड़े उग्र आंदोलन ने दुनिया को बारूद के ढेर पर बिठा दिया है.. अभी तो मुसलमान इसकी कीमत चुका रहे हैं.. पता नहीं नफरत की ये आंधी क्या रूप धारण करेगी.. समाज मे इस तरह का बंटवारा एक भयाबह भविष्य की ओर इशारा करता है..
इमरान ने मकान के बहाने बहुत हल्की बात की है और लोगों को एक बहस का मुद्दा दे दिया है. पूछा जाना चाहिए कि उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में पहले कभी धर्म के कारण परेशानी हुई थी. यदि नहीं तो आज आपके साथ हीं ऐसा क्यों हो रहा है. देश में मुस्लिम आबादी 15 करोड़ से अधिक है. अधिकांश को इस्लाम मतावलम्बी होने के चलते दिक्कत नहीं हो रही है. होनी भी नहीं चाहिए. लेकिन दुनिया में आज जो हो रहा है उससे मुंह फेर कर बैठा नहीं जा सकता. क्यों दुनिया में होने वाली बड़ी आतंकी वारदातों में एक समुदाय विशेष का हीं हाथ सामने आता है.मौलाना वहिदुद्दीन के शब्दों में भारत के मुसलमानों को आतंकवाद के खिलाफ मुखर होना होगा और अपने को साबित करना होगा. बाटला हाउस मुठभेड़ को एक सिरे से खारिज कर नहीं किया जा सकता. देश के मुसलमानों को ये बात समझनी होगी कि भारत में उन्हें जो हक औऱ सम्मान मिला है वो अन्यत्र संभव नहीं है.
राजेश जी बहुत खूब.....
इसका एक बहुत बड़ा कारण बदले की भावना है.और प्रतिस्पर्धा अपना ओछापन दिखाने में...शाकाहारी मकान मालिक मांसाहारी को ये दिखाने की फिराक में हैं कि वो ज्यादा सांस्कृतिक और सभ्य हैं...वहीँ दिल्ली वाले बिहारियों को ये दिखाने में लगे हैं की उनकी जिंदगी ज़यादा सलीके से भरी है.मकानमालिकों का पुर्वाग्रह से भरा होना एक पहलू हो सकता है लेकिन सर जी यहाँ पर खुद को दूसरों से विशिष्टतर दिखाने की होड़ है....बहरहाल यहाँ इमरान की बात तो सब सुनते हैं लेकिन हम बिहारियों की बात कौन सुनता है??मैं खुद भी इसका भुक्तभोगी हूँ...यहाँ इमरान की कहानी दुहराते कई सत्येन्द्र मिल जायेंगे..
आपका प्रयास सराहनीय है....साधुवाद
सत्येन्द्र
राजेश जी ऐसा लगता है कि आपको मेरे भेजे हुए विचार पसंद नहीं आए क्योंकि वे आपके विचार से मेल नहीं खाते हैं. मेरे मुस्लिम भाई कैसे कैसे विचार यहाँ लिखकर आग में घी डालने का काम कर रहे हैं. कई श्रोताओं का विचार बिल्कुल सच है कि इमरान हाशमी और अज़हरूद्दीन धर्म का सहारा लेकर सबको मुसीबत में डाल रहे हैं. उमेश यादव का कहना 100 प्रतिशत सही है कि सलमान खान ने शराब के नशे में सोए हुए लोगों को कुचला तब हमारा मुस्लिम समाज क्यों चुप रहा, इस्लाम में शराब और बहुत कुछ हराम है. इमरान हाशमी जैसे लोग जो खुलेआम मुसलमानों का नाम बदनाम कर रहे हैं हमने क्यों उनका विरोध नहीं किया. कुरैशी नदीम लिखते हैं कि मुसलमान भाइयो को लोन, क्रेडिट कार्ड वगैरह आसानी से नहीं मिलता, मुसलमान हो या हिंदू, इन चीज़ों की ज़रूरत गरीबों को कहाँ हैं. अगर बीबीसी सच को लिखना पसंद नहीं करती तो यह कॉलम बंद कर देना बेहतर रहेगा. बीबीसी ऐसे लोगों के विचार छापकर और मेरे विचारों को नज़रअंदाज़ करके साबित करना चाहती है कि सब मुसलमान इमरान हाशमी और अज़हरूद्दीन जैसे लोगों के साथ हैं, जो सच नहीं है.
इमरान हाशमी ने भले ही व्यक्तिगत समस्या को राष्ट्रीय समस्या बनाने की सोची हो लेकिन एक बात इमरान हाशमी और शबाना आज़मी वगैरह को सोचनी चाहिए की बिल्डर सिर्फ मुसलमानों को मकान देने मैं क्यों परहेज करते हैं. हो सकता है एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर रही हो और मुसलमानों के केस मैं कुछ मछलियाँ तालाब को गन्दा कर रही हों तो वो अपने तालाब में देखे और गिरेबान में झांकें उन मछलियों को तालाब से निकाल फेंके ये सही है की हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है लेकिन ये भी कटु सत्य है कि हर आतंकवादी मुसलमान है. मैं मुसलमान विरोधी नहीं हूँ लेकिन रिस्क लेने कि क्षमता नहीं है. बस इस मुहावरे को गलत सिद्ध कर दे भारत का एक एक आदमी उन्हें सर आखों बार बैठाने के लिए बेताब है. और मेरा विश्वास करे अगर हर आतंकवादी मुसलमान होना बंद हो गया तो मुसलमानों को कॉलोनी तो छोड़िए दिल में जगह देने के लिए होड़ लग जायेगी. आमीन....
उसी का शहर, वही मुद्दई, वोही मुंसिफ
हमें यकीं था हमारा क़सूर निकलेगा.
मुंबई में फिल्म अभिनेता इमरान हाशमी को मकान नहीं मिलना कोई नई बात नहीं है. बात मुसलमान अभिनेता होने की नहीं है. कई मुस्लिम हिंदू परिवारों में जहां पेईंग गेस्ट के रूप में रह रहे हैं, वहीं एक अदद शख्स अपनी शख्सियत यदि बताता है तो निश्चित ही किसी दुर्भाव को दर्शाता होगा. यदि इमरान हाशमी एक सच्चे मुसलमान होते तो फिल्मों में दिखाए जा रहे अपने चरित्रों का अनुसार अपने निजी जीवन में नहीं करते, या वे अपनी
फिल्म के अंत को ताजा करना चाहते हैं जिसमें जो उनकी प्रेयसी रही अभिनेत्री ने ही उन्हें दिल से तो दूर कर ही दिया था, अपितु दुनिया से दूर करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
आसिफ भाई हमारा इरादा आपका दिल दुखाने का बिलकुल नहीं है, हकीक़त तो ये है की मेरे बहुतेरे मित्र और पारिवारिक मित्र मुसलमान हैं हम सभी त्यौहार मिलजुलकर मनाते है. लेकिन देश की हकीक़त कुछ और बयां करती है. आप व्यक्तिगत तौर पर निश्चित रूप से बढ़िया इन्सान होंगे लेकिन यहाँ हम आप अकेले की बात नहीं कर रहे. आप जैसे लोग इस देश मैं हैं जिस के कारण अभी तक भाई चारा कायम है. नहीं तो धर्म के इन ठेकेदारों ने तो हमें बाटने मैं कोई कसार नहीं छोड़ी. और जो लोग इन ठेकेदारों के बहकावे मैं आ रहे हैं उन से ही पूरी कोम का नाम ख़राब हो रहा है. पोस्ट 13 पर की गयी इकबाल दुर्रानी की टिप्पणी को भी पढ़ें, उन्होंने बहुत कम शब्दों मैं सारा कुछ समझा दिया है.
राजेश जी वाह वाह, बस कल और आज मेरे सभी विचार आपने रद्दी की टोकरी में डाल दिया क्योंकि मैने मुसलमानों की सच्ची बात लिख दी थी. जो शायद आपके विचारों से मेल नहीं खाती है.
इंटरनेट की दुनिया के नागरिकों, यह तो जीवन का हिस्सा इसे बड़ा मामला मत बनाइए. यह पूरी दुनिया में होता है. धर्म के आधार पर बसी बस्तियाँ हर जगह हैं. सुधीश कुमार जी मलेशिया का अनुभव तो बताया ही है. लोग अपनी भाषा में बात करना चाहते हैं, अपनी पसंद का खाना खाना चाहते हैं. अपने लोगो के साथ त्यौहार मनाना चाहते हैं, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है.
इमरान हाशमी बिल्कुल गलत बात कर रहे हैं. सस्ती लोकप्रियता के लिए इमरा हाशमी ऐसा कर रहे हैं. आज वे जिस मुकाम पर हैं क्या मुसलमान होने के कारण हैं, आम लोगों ने इन कलाकारों को ये जानते हुए इज्जत दी है कि वे मुसलमान हैं, एक जगह मकान नहीं मिला तो दूसरी पचास जगह मिल सकता है. नफ़रत मत फैलाओ वर्ना अल्लाह सज़ा देगा.
राजेश जी, ये कोई नई बात नहीं है, इमरान सेलिब्रिटी हैं इसलिए मामला प्रकाश में आया है. मुल्क में इस तरह के किस्से आम हैं, बात मुसलमान की ही नहीं, अगर कोई हिंदू मुस्लिम इलाके में मकान लेने जाए तो उसको भी मकान नहीं मिलता. दरअसल हमारा पूरा मुल्क जात पात और धर्म के आधार पर बँट गया है. हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा तभी इस तरह के वाक़यों पर रोक लगेगी.
आसिफ भाई, आपके इस शेर ने दिल दुखी कर दिया. सबसे पहले तो आज से ही आप ये मानना शुरू कर दीजिये की हिंदुस्तान हमारा है किसी एक समुदाय या व्यक्ति का नहीं. आपके मन में जब तक ये भावना रहेगी तब तक देश आपको अपना नहीं लगेगा और तब तक कुंठाएं मन में रहेंगी. हमारे मुसलमान समुदाय के बारे मैं समीर गोस्वामी ने कटु सत्य ही लिखा है जिसको स्वीकार करने में मुझे नहीं लगता कोई समस्या होनी चाहिए. और ये समस्याएं हर समुदाय का हिस्सा हैं इसे हम ही ठीक करेंगे कोई बाहर से नहीं आएगा.
मैं कितने उदहारण आपको दे सकता हूँ जिन लोगों ने अपने देश के लिए समाज के लिए कुछ किया उनका कोई मजहब नहीं होता नाम लिखना शुरू करूंगा तो केवल मुसलमान समुदाय के लोगों की लिस्टों से पूरा ब्लॉग भर जायेगा. अब्दुल कलाम आजाद, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, मुहम्मद रफी, नौशाद, मिर्जा ग़ालिब ............... खैर छोडिये हिंदुस्तान का दिल इतना बड़ा है कि ब्रह्माण्ड समा जायेगा. जिंदगी मैं जिसको अपना मानोगे वो दगा नहीं दे सकता. आज से ही शुरुआत करते हैं. समय लगेगा लेकिन परिणति सुखद होगी.
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है.
जो सेलिब्रिटी नही हैं उनका क्या? अव्वल तो उन्हे इस सबकी आदत हो चुकी होती है, और अगर ये उनका पहला तजुर्बा हो तो भी वो बेमतब की पॉलिटिक्स मे वक़्त बर्बाद करने की बजाए वो दूसरी जगह घर तलाश करने मे व्यस्त हो जाएंगे. ये घटनाएं गांधी जी को ट्रेन से बाहर फ़ेंक देने जितनी गंभीर नही हैं कि उन पर बाक़ायदा आंदोलन छेड़ा जाए.
मेरे ख़्याल से आम आदमी भले ही वो किसी भी धर्म से संबंध रखता हो ऐसे इलाक़े मे रहने से क़तराता है जहाँ उसके जैसे और लोग न रहते हों. आप इसे तंगनज़री कह लें पर ये इंसानी फ़ितरत का एक हिस्सा है, शायद इसलिये ही दुनिया के बड़े शहरों मे आपको चाईना टाउंस देखने को मिल जाएंगे, इसी तरह शायद लंदन के टैक्सी वालों को भी पता होगा कि भारतीय सबसे ज़्यादा किस एरिया मे बसे हैं.
ये बातें विदेशों मे रहने वाले विदेशियों पर तो फ़िट होती है पर जब एक देश के नागरिक ऐसा करते हैं तो थोड़ा अजीब लगता है, वो एक गुलदस्ते में तरह तरह के फूल, एक रंग के गधे और कई रंगतों के घोड़े और ऐसी ही कई अनेकता मे एकता वाली मिसालें बेमतलब सी लगने लगती हैं.
कोई हैरत नही है कि हज़ारों सालों से इस विशाल भारत मे सैकड़ों छोटे छोटे राजा नवाब अपनी अपनी सिटी साइज़ रियासतों पर राज किया करते थे, उस वक़्त भी सबको अपने जैसा पड़ोसी ही अच्छा लगता था, जहां पड़ोसी अपने से थोड़ा भी अलग नज़र आया वहीं एक बॉर्डर खीच दी. आज भारत एक अखंड देश है पर इन रियासतों और राजाओं की तादाद लाखों मे पहुच गई है, शहर मुहल्ले घर और यहां तक लोग अपने चारों और बॉर्डर खींच खींच कर चलती फ़िरती रियासत बनने पर तुले हुए हैं.
ईमानदारी से कहूं तो अगर कोई मकान मालिक मेरी और उसकी धार्मिक मान्यतओ के कारण मुझे मकान देने से इंकार कर दे तो मुझे इतना बुरा नही लगेगा. भई किसी ब्रह्मण को पूरा हक़ है कि मांसाहारी होने के कारंण मुझे मकान न दे, इसी तरह क्या कोई मुसलमान किसी ऐसे बंदे को अपने घर के सेकंड फ्लोर पर रहने देगा जो हर शाम डिनर मे उस जानवर का गोश्त पकाए जो इस्लाम मे हराम है? नहीं न. यानी मकान मालिक किरायादार और पड़ोसी भले ही किसी भी मज़हब के हों सबके अपने अपने इश्यूज़ हैं, फ़िर भी भुक्तभोगी होने मे और ब्लाग पर मेरी और आपकी तरह लेक्चर देने मे बड़ा फ़र्क़ है, जिस पर बीतती है न उसको पता होता है.
हम बहुसंख्यक कहाँ जाएँ, इमरान हाश्मी तो मीडिया में गए हम बहुसंख्यक कहाँ जाएँ ??
हमारे अपने देश में ,कश्मीर में जहाँ मुस्लिम ज्यादा हैं ,वहाँ हिन्दू कोई ज़मीन नहीं खरीद सकते और जिन हिंदुओं की वहाँ ज़मीनें थीं, ,उन पर मुसलमानों ने कब्जा करके हिंदुओं को वहां से भगा दिया. अमरनाथ के यात्रा करने वालों को आराम के लिए जमीन न देने की नौटंकी मुसलमानों ने अभी कुछ दिन पहले की, तब मीडिया को नींद आ रही थी क्या? जो इमरान की चिंता मै मीडिया पागल हो गया है. इमरान हाशमी के लिए तो एक बिल्डिंग में मकान न ले पाने की बात है 'हम हिन्दू तो पूरे कश्मीर की बात करते हैं तब ये सेकुलर मीडिया कहाँ सो जाता है.
यह बात सही है कि आम आदमी का दिमाग पूर्वाग्रहों से भरा हुआ है. मेरा विचार इस्लाम या मुसलमानों को बुरा नहीं कहना है, लेकिन आतंकवादियों की वजह से यह समस्या आ रही है. शबाना और इमरान ज़िम्मेदारी और परिपक्वता नहीं दिखा रहे हैं. उन्हें शाहरुख़ और सलमान ख़ान की तरह समाज में एकता को बढ़ावा देने के लिए काम करना चाहिए. इमरान ये सब सस्ती लोकप्रियता के लिए कर रहे हैं. शायद वे राजनीति में आने की तैयारी कर रहे हैं.
हद कर दी आपने इमरान मियाँ. पता नहीं क्यूँ आपकी सोच इतनी गिरी हुई कैसे है? मैं मानता हूँ कि जहाँ आपको घर नहीं मिला वहां के लोग किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकते हैं. लेकिन आप बताइए कि कलाम साहब कौन थे? मैं एक हिन्दू हूँ लेकिन उस से पहले एक भारतीय. मेरी नजर मैं आप जैसे छोटी सोच वाले लोगों से ही भारत इतना पिछड़ा हुआ है. और अगर आप भारतीय हैं तो 'वेडन्सडे' मूवी जरूर देखिये. धन्यबाद
राजेश जी आपका ब्लाग पढ़कर दिल भर आया. हर साल एग्रीमेंट खत्म होने से पहले डर लगा रहता है कि कहाँ कहाँ मुसलमान होने का ताना सुनना पड़ता है. अब क्या कहें, अपने ही कौम के कुछ लोगों की वजह से हमारे साथ ऐसा सुलूक हो रहा है. अब लोगों को कुछ ऊँचा सोचने की ज़रूरत है, इसी भारत में ऐसे ढेर सारे लोग हैं जो धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं लेकिन कई लोग अब भी संकुचित सोच से नहीं उबर पाए हैं.
ये तो पूरे देश के नागरिकों को सोचना चाहिए, हिंदू मुस्लिम बस्ती में मुस्लिम हिंदू बस्ती में अपने आप को सुरक्षित क्यों नहीं समझते. क्यों न सारे धर्मों को मिटाकर एक राष्ट्र धर्म बना दिया जाए. इससे पंडितों और मौलवियों को नुकसान ज़रूर होगा लेकिन देश में अमन चैन रहेगा. फिर मकान वाला झगड़ा भी नहीं रहेगा.
इसके लिए मुसलमान खुद जिम्मेदार हैं.
इदरीस भाई सलाम,
बहुत ही संतुलित,सटीक और व्यावहारिक लिखा आप ने. मुझे यह कहने में जरा सा भी संकोच नहीं है कि आपने समस्या को "राजेश प्रियदर्शी" जी से भी अधिक व्यावहारिक ढंग से प्रस्तुत किया है.
यह बेकार की पत्रकारिता का कमाल है, यह किसी का व्यक्तिगत निर्णय है कि वह किसी भी कारण से किसी ख़ास व्यक्ति को मकान किराये पर नहीं देना चाहता या नहीं बेचना चाहता. भारत में सारे काम जाति और धर्म के आधार पर होते हैं, हमारी पूरी चुनाव प्रणाली पर जाति और धर्म हावी है, हर किसी को अल्पसंख्यकों का ख्याल रखना चाहिए, आख़िर क्यों? हर किसी की यह अपनी जिम्मेदारी है कि वह खुद को भरोसेमंद बनाए, इसमें दूसरे क्या कर सकते हैं.
भारत में हज़ारों नक्सलवादी हैं, दुनिया भर में सैकड़ों विद्रोही हैं, दुनिया के सारे आतंकवादी मुसलमान नहीं हैं. जब मैं भारत में था तो लोगों से लंबी लंबी बहसें होती थीं, सरकार, समाज और देश से जुड़े हर मुद्दे पर लेकिन मेरा नाम सुनते ही लोगों के चेहरे का रंग, उनकी दलीलें उनकी बातें सब बदल जाती थीं. जिन लोगों को मुसलमानों की इस पीड़ा पर शक है उन्हें खुद आज़माना चाहिए. कहीं अपना नाम बदलकर फिरोज़ या इमरान बनकर देखिए आपको इसका एहसास हो जाएगा.
आपको इनकी बहुत ज्यादा चिंता है तो आप इनको अपने घर में जगह क्यों नहीं देते. पैसेवाले लोगों के लिए होटल जो है, उन लोगों की फिक्र करें जिनके पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि किराए पर घर ले सकें. नामचीन लोगों के बारे में तो हर कोई बात करता है, गरीब लोगों की समस्याओं के बारे में भी सोचना चाहिए जिनके वोटों से सरकार बनती है.
जो मुसलमान नहीं है उनका क्या?
राजेश जी, आप बिल्कुल सही फरमा रहे है. खाली मकान के मालिकों का दिमाग भी खाली होता है. मुस्लिम होने की वजह से किराए पर मकान न मिलने का शिकार मै खुद भी हो चुका हुं. मुझे लगता है यह समाज की एक अजीब समस्या है. एक साल पहले तबादला होकर जब मैं मुंबई से दिल्ली आया तब यह प्रसंग मुझे झेलना पडा. एक रिअल इस्टेट एजंटने मुझे राजेंद्र प्लेस में एक खाली घर दिखाया. बाद में मकान मालिक से मुलाकात और छोटी गुफ्तगू हुई. मकान मालिक मोहतरमा दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रसिद्ध गर्ल्स कालेज में कॉमर्स की रिडर निकली. शहर के विद्वानों की एक मशहूर संस्था की जिम्मेदार उनकी तरफ थी. उस प्रोफेसर सरदार मोहतरमा ने मुझे मेरा कामकाज, ऑफिस, परिवार, बॅकग्राऊंड सब कुछ जानकर तसल्ली कर ली. मेरी मिडिया से संलग्नता, पढाई, समाज के प्रती विचार देखकर मोहतरमा को लगा कि उनके लिए मैं एक आदर्श किराएदार हो सकता हुँ. लेकिन मेरे लिए किराया बजट से ज्यादा हो रहा था. इसलिए मैने कुछ कन्सेशन मांगा. हैरत की बात यह की मोहतरमाने मुझे कन्सेशन भी दे दिया. मैने तुरंत कुछ पैसे उन्हे ऐडवांस में भी दे दिए. शुक्रवार को यह चर्चा हुई....सोमवार को बची हुई रक़म देना तय हुआ.
बस.. बीच में आया वह मनहूस शनिवार...जिस दिन दिल्ली में पांच जगहों पर श्रृंखलाबद्ध धमाके हुए और 30 बेगुनाह देशवासियों को जान गंवानी पड़ी.
और दूसरे ही दिन मुझे मोहतरमा का फोन आया की, भाईसाहब, सॉरी…! इस साल हमारे बच्चे आइआइटी की प्रिपरेशन करने वाले है. इसलिए घर किराए पर नही देने का फैसला किया है. मै बिल्कुल शांत था. मुझे पता था ऐसा कुछ हो सकता है. मैने कहा, 'जी मकान आपका है. किराए पर देने, न देने का अधिकार आपका है. लेकिन आप जो वजह बता रही हो वह क्या सही है?. असली वजह यह नही के मै मुसलमान होने की वजह से आप नकार दे रही हो. तब वह गड़बड़ गईं. बोलीं, 'नही. हमारे तो कई मुस्लिम फ्रेंड है युनिवर्सिटी में. जामिया में भी कई फ्रेंड है. लेकिन हमें इस साल किराए पर नही देना है. सॉरी... आप पैसे कभी भी आकर ले जा सकते है.' मै शांत रहा.
खैर, मुझे तो घर मिल गया. सुप्रीम कोर्ट से क्लार्क के पद से रिटायर हुए उस मकान मालिक ने कहा, 'भाई हम हिंदू / मुसलमान को देना नही चाहते. बल्कि किसी अच्छे इन्सान को देना चाहते है. और माहौल तो खराब है ही. लेकिन आप शक किन-किन पर करेंगे. पुलिस वैरिफिकेशन तो करेंगे ही ना. तो फिर कौन सही, कौन गलत यह पुलिस पता लगाएगी. अपनी पांच साल की उम्र में विभाजन की त्रासदी सहकर पेशावर से दिल्ली आए उस सरदार बुज़ुर्ग का परिवार हमें उनके परिवार का सदस्य मानता है. सो, मै मानता हूँ जो हुआ अच्छा ही हुआ. मैने तुरंत फोन किया और यह किस्सा मेरे मुंबई के मकान में रह रहे हिंदू किरायेदार मित्र को बताया. उसे बड़ा बुरा लगा. मेरी सहानुभुती दर्शाते हुए ऐसी मानसिकता के हिंदुओं कोसने लगा.
तो जनाब, यह समस्या है. लेकिन हल भी हो सकती है.
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रफ़ीक़ शेख़
नई दिल्ली
ये मसला सिर्फ़ इमरान हाशमी से ही नहीं जुड़ता बल्कि भारत सरकार और उसकी सरकारी नौकरशाही से सीधे तौर पर जुड़ता है जिन नौकरशाहो ने अमेरिकी और संघी चश्मे से भारत के मुसलमानों को देखना,बदनाम और सताना पिछले 15-20 साल से शुरू किया हुआ है.अगर अमेरिका या यूरोप के किसी देश में कुछ होता है तो भारत में आम मुसलमानों की गिरफ्तारी और बदनामी मीडिया के जरिये शुरू कर दी जाती है.जो सरासर ग़लत है.ये यूरोप का मामला है हम क्यो अपने मुल्क के बेकसूर मुस्लिम नौजवानों को आतंकवादी साबित करने पर तुले हुए है और क्यो हम समाज को संघी और अमेरिकी चश्मा पहनाने पर तुले हुए है जिसमे हर मुस्लिम आतंकवादी नजर आए अगर भारत एक और सबका है तो हाशमी या एक आम मुस्लिम या ईसाई कही भी मकान ले सकता है और अगर ऐसा जाट धर्म की वजह से संभव नहीं है तो सरकारों को हिम्मत करके मुस्लिमों और ईसाइयों को भारत में आधिकारिक तौर पर दोयम दर्जे के नागरिक घोषित कर चाहिये.
कृपया 16वीं टिप्पणी देखें जहाँ शब्बीर खन्ना ने सब सही-सही कहा है और मैं उनसे सहमत हूँ. मीडिया को अधिक ज़िम्मादारी का सुबूत देना चाहिए क्योंकि वे आम जनत तक पहुँच रहे हैं जो मीडिया पर पूरी तरह विश्वास करते हैं और यह नहीं सोचते कि रिपोर्ट सही है या ग़लत.