देर आयद दुरुस्त आयद!
दिल और दिमाग़ में एक बहस चल रही है.
मन कह रहा है कि मैं भारत सरकार के इस क़दम का स्वागत करूँ कि छह से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य किए जाने के प्रयास हो रहे हैं.
दिमाग़ है कि इन बच्चों के भविष्य को सोच-सोच कर परेशान है.
आठवीं पास 14 साल का बच्चा, चाह कर भी आगे पढ़ाई नहीं कर पाएगा. हो सकता है उसकी आर्थिक परिस्थिति इसकी इजाज़त न दे.
नौकरी वह कर नहीं सकता क्योंकि यह बालमज़दूरी की श्रेणी में आएगा.
मेरे आलोचक ज़रूर सवाल उठाएँगे कि मैं निराशावादी हूँ, अच्छी बात पर ख़ुश होने की जगह उसमें ख़ामियाँ ढूँढ रही हूँ लेकिन क्या करूँ...
आज़ादी के बासठ साल बाद, एक पीढ़ी के बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँचने के बाद और दूसरी पीढ़ी के किसी तरह खींचखांच कर पढ़ाई पूरी करने, या किसी मजबूरी के तहत न पूरी करने के बाद, सरकार को इसकी सुध आई.
क्या करूँ, शाबाशी दूँ या इस बात का रोना रोऊँ कि इस आधे-अधूरे क़दम का नतीजा क्या होगा.
अरे भाई, बच्चे को दसवीं तो पास करा दो. क्या उसके माता-पिता से यह अपेक्षा कर रहे हो कि वे अपना पेट काट कर अभी से पैसा जोड़ना शुरू करदें ताकि अपने बच्चे की दो साल की मंहगी पढ़ाई का ख़र्चा उठा सकें.
फिर, एक सवाल यह भी है कि केवल 25 फ़ीसदी तक इसका फ़ायदा पहुँचने से अन्य 75 प्रतिशत का क्या होगा. या एक चौथाई का शिक्षित होना ही हर समस्या का अंत है.
लेकिन, यह बेहतरी की दिशा में एक क़दम है इसमें दो राय नहीं हैं.
देर आयद दुरुस्त आयद!

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सच्ची देर आयद- दुरुस्त आयद! स्वागत कर सकते है बस... कीजिये वाह-वाह
सलमाजी बहुत अच्छा और सटीक लिखा है आपने. निश्चय ही सरकार का क़दम सराहनीय है लेकिन 14 साल के बाद की भी तो कुछ व्यवस्था होनी चाहिए. आज भी भारत में ऐसे गाँव हैं कि जहाँ पर लोगों को जानकारी नहीं है और वे बच्चों को स्कूल नहीं भेजते हैं. इसका कारण ग़रीबी और पैसे का अभाव. आजादी के इतने साल बाद ही सही सरकार को बच्चों की सुध तो आई.
क़ुरान की बहुत सारी आयतें ऐसी हैं जिनमें अल्लाह ने इंसान को पढ़ने और इल्म हासिल करने को कहा है. अल्लाह ने क़ुरान के ज़रिए पहला संदेश मानव जाति को पढ़ने का दिया. इक़रा एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है पढ़ो. पढ़ने के लिए पहला संदेश जिब्राईल अल्लाह की तरफ़ से मोहम्मद और तमाम इंसानों के लिए ले कर आए थे. यह संदेश 1400 बरस पहले आया था. हम देर से आए पर दुरुस्त आए.
सलमा जी बहुत अच्छा लिखा आपने. लेकिन क्या यह भी महान भारत में संभव होगा. आपको समय हो तो छोटे-छोटे शहरों और गाँवों में जा कर अपनी आँखों से देखें की ग़रीबी के कारण कितने छोटे-छोटे बच्चे मज़दूरी करते हैं अपने ग़रीब माँ-बाप का सहारा बन कर. इन्हें आठवीं या दसवीं तक पढ़ाई करा कर क्या यह बेईमान सरकार, बेईमान नेता देश की बेरोज़गारी को दूर करने के प्रति सोचते हैं? नहीं कभी नहीं. ये नियम भी दूसरे नियमों की तरह काग़ज़ों में बंद हो जाएगा और इसका फ़ायदा भी अमीरों को ही मिलेगा. यहाँ पर वह राजस्थानी कहावत याद आती है-ख़ुद का पूत कुँवारा डोले, पड़ोसी का फेरा, मेरे एक भाई ने पवित्र क़ुरान की सूरत का हवाला देकर लिखा है. यह सूरत या आयत भीपैग़ंबर मोहम्मद के लिए है कि अगर तुम्हें दीन हासिल करने के लिए बाहर (विदेश) भी जाना पड़े तो हासिल करो लेकिन आज दीन नहीं रोटी के लिए जाना पड़ता है तो वह भी हमारे देश के बेईमान नेताओं के कारण.
अब्दुल सलाम जी, यह क्या बात हुई कि इस्लाम धर्म ने ही सबसे पहले पढ़ने की शिक्षा दी. विश्व में बहुत धर्म हैं जिन्होंने इससे भी पहले शिक्षा पर बात की है. शिक्षा को इस्लाम तक ही सीमित न करें.
यह पहले मुर्ग़ी या पहले अंडा आने की बात नहीं.
यह लेख पर बहस या लेख पर लेख लिखने की बात नहीं.
यह बहस पर बहस की भी बात नहीं.
यह तो अपनी-अपनी राय की बात है जो एक दूसरे से अलग हो सकती है, क्योंकि सच तो सिर्फ़ ईश्वर जानता है और हम सच के इर्दगिर्द घूमते रहते हैं.
मेरी बात तो सिर्फ़ इतनी सी है कि ख़ुदा जिस संदेश को क़ुरान के द्वारा 1400 सौ बरस पहले इंसान को दे चुका, वही बात ख़ुदा ने अलग-अलग समय में अलग-अलग तरीक़ों से इंसान तक उनके दिल-दिमाग़ में उतारी. पर क्रिया का कार्यान्वयन हमारे देश में होते-होते समय लग गया. वह भी आधा-अधूरा. फिर भी यह शुरू तो हुआ, देर आए दुरुस्त आए.
राहुल जी, आपने शायद जल्दी में अपनी टिप्पणी भेज दी. और आपने स्वयं विषय को धर्म से जोड़ने की कोशिश की है, अब्दुल सलाम ने सिर्फ़ यह लिखा है कि इस्लाम ने शिक्षा का संदेश 1400 साल पहले दिया है. यह कहीं नहीं लिखा है कि सबसे पहले इस्लाम ने शिक्षा की बात की है. प्लीज़ राहुल जी, एक सच्चे हिंदुस्तानी बनिए जो कि सब धर्मों के सम्मान का संदेश देता है.
सलमा जी अपने लेख में जिन मुद्दों को उठाया हैं वह वाजिब है. सवाल यहां छह साल से 14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य या मुफ्त शिक्षा देने का नहीं बल्कि देश के सभी बच्चों को समान शिक्षा और अवसर देन का है. जो सरकार के इस फैसले में कहीं दिखाई नहीं देता है. आज जरूरता है देश की पूरी शिक्षा प्रणाली को जांचने की और इसमें सुधार करने की. सरकार सिर्फ नीतियां ही नहीं बनाए बल्कि जमीनी स्तर पर इसकी गुणवत्ता की जांच भी करें, सरकार के इस कदम का हाल कहीं मिड डे मील योजना की तरह न हो जाए, जो पूरे देश में बुरी तरह से फ़्लॉप हो रही है.
ये कोई विवाद का विषय नहीं, ये भारत सरकार की एक अच्छी पहल है जिस पर सलमा जी की बेहतरीन प्रतिक्रिया है. चलिए एक महात्मा को लेते हैं जो सीधी बातें करता था. जिसकी जद्दोजेहद के नतीजे आज का हिंदुस्तान है जिस भी शक्ल में है, भला या बुरा, वो हमारा है और हमारे सामने है. मानवता और इंसानियत का एक बड़ा पाठ पढ़ाया उसने, और अहिंसा से स्वराज की प्राप्ति की, उसने कहा कि कोई एक गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो. पर आज तो ये हाल है कि दूसरा गाल कम पड़ता है, हमें तो तीसरा, चौथा और पाँचवाँ गाल भी चाहिए. अब ऐसे में आप कहीं न कहीं तो रुक जाएँ, क्योंकि ईश्वर दो गालों से ज़्यादा नहीं देता.
ईमानदारी से हमारे पाठक बताएँ कि क्या वे अपने किसी ऐसे रिश्तेदार को नहीं जानते जो बच्चों को अपने घरों या दुकानों और होटलों में काम करने के लिए नहीं रखते हैं. तो बहस करते रहें, नेट पर आने वालों की मानसिकता ही अलग है.
भारत में हर क्षेत्र में क्या हो रहा है वह किसी से छुपा नहीं है और क्या होना चाहिए इस पर सरकार ही नहीं नेता और धर्म और समाज के ठेकेदारों को कोई चिंता नहीं है. सभी यही चाहते हैं कि भारत की धीमी गति से बढ़ने में ही सबका फ़ायदा है. इसके लिए मीडिया भी बराबर की ज़िम्मेदार है. ये बहाना कब तक कि देर है अंधेर नहीं. क़ानून अंधा है फिर भी न्याय करता है चाहे समय कितना भी लगे. क्यों नहीं समय और बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए हर क्षेत्र में बढ़ती ज़रूरतों को लेकर 100 साल आगे की सोचते हुए योजना बना कर काम किया जाए. शिक्षा तो होनी चाहिए पर पेट की आग बुझने के बाद. पानी नहीं, सड़कें नहीं, बिजली नहीं, स्वास्थ सेवा नहीं, आदि आदि का रोना ही चलता रहेगा. इसपर दिल क्या कहता है और दिमाग़ क्या कहता है!
सरकार के हर सकारात्मक कदम की सराहना होनी चाहिए. अगर अब तक यही काम कोई नहीं कर सका और यह सरकार कर रही है, तो अच्छा ही है. सरकार की यह अच्छी पहल है.
सलमा जी, नमस्ते. यह मेरी पहली प्रतिक्रिया है.
मैं आपके विचार से सहमत हूँ. आपने ख़ुद से बनाई हुई मजबूरियाँ नहीं लिखीं. आपने वह लिखा है जो यहाँ की स्थिति है. यह क़दम बिलकुल स्वागत योग्य है. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में योजनाएँ तो बड़े जोश के साथ शुरू होती हैं लेकिन उतने जोश के साथ पूरी नहीं होतीं.
लंदन के एयरकंडीशंड कमरे में बैठ कर यह सब लिखना और आलोचना करना बहुत आसान है. यह आप जैसे लोगों की बिगड़ी मानसिकता ही है कि भारत का आज यह हाल है. आख़िर मीडिया को हो क्या गया है?
यदि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में कुछ न करे तो आप लोग रोना रोते हैं. और जब इस बारे में क़दम उठाए जा रहे हैं तो आप ही लोग सबसे पहले आगे आ कर इस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
बेहतर होगा यदि सरकार शिक्षा को अनिवार्य के साथ-साथ जनता के अधिकार के रूप में भी घोषित करदे. अपने बच्चों को प्राथमिक शिक्षा न दिलाने का मुख्य कारण आर्थिक परिस्थिति का ख़राब होना है. लोगों को भोजन और कपड़े जैसी बुनियादी सुविधाएँ ही नहीं मिल रही हैं. वे शिक्षा पर कैसे ख़र्च करेंगे?
राहुल जी, शिक्षा की बात हो रही है, धर्म की नहीं. अब्दुल सलाम ने सिर्फ़ यह लिखा है कि 1400 साल पहले भी शिक्षा की बात इस्लाम ने की थी. यहाँ यह मुद्दा नहीं है कि किसने पहले की या किसने बाद में की. यहाँ हम सब यही बात कर रहे हैं कि भारत सरकार ने शिक्षा को बहुत देर से महत्व दिया.
ठीक ही है. कम से कम योजना तो बना रहे हैं न.
सलमा जी, सबसे पहले इतना अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए आपका शुक्रिया. ये सरकार का एक अच्छा क़दम है, पर अभी सरकार को इसे और आगे बढ़ाना चाहिए. सिर्फ़ इतने से ही भला होने वाला नहीं है.
सभी माता-पिता अपनी औलाद को चलना सिखाते हैं और जब वह बड़ा हो जाता है तो अपना रास्ता ख़ुद ढूँढ लेता है. हमें उम्मीद है कि सरकार का यह इरादा इसी प्रक्रिया से जुड़ा है.
लोकतंत्र मे अनिवार्यता का अर्थ तानाशाही भी है. सर्वप्रथम शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाए जाएं, योजनाओं और नीतियों की समीक्षा होनी चाहिए. एक कल्याणकारी राष्ट्र राज्य मे शिक्षा का जिस तेजी से निजीकरण किया गया है वह अकल्पनीय है. वर्ष 1964 की शिक्षा नीति से गाँवों के हायरसेकेन्ड्री स्कूल, हाईस्कूल कक्षा 10वीं तक ही रह गए जिससे 11वीं और 12वीं की पढ़ाई के लिए कई-कई किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है, जिससे बालिका शिक्षा प्रभावित हुई है. आश्चर्यजनक लगता है कि हमारे देश में अलग-अलग माध्यम के छात्र एक साथ महाविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे हैं. सरकार कानूनबना रही है. लेकिन बाजार शिक्षक, विद्यार्थी, समाज, सरकार और जनतंत्र सबका दोहन कर रहा है, अर्थात शिक्षा के मूल्य समाज और देश चुका रहा है.
माननीय महोदया जी
शिक्षा एक बहुआयामी प्रक्रिया है,यह जरूरी नही है कि आप स्कूल मे पढे।
लोकतंत्र मे अनिवार्य शिक्षा का अर्थ तानाशाही भी हो सकता है। सर्वप्रथम शिक्षा के क्षेत्र
मे सुधार लाये जावे ।योजनाओं एवम् नीतियो की समीक्षा होना चाहिए थी किन्तु हम
कानून बना रहे है।
एक कल्याणकारी राष्ट्र राज्य मे शिक्षा का जिस तेजी से निजीकरण
किया गया है वह अकल्पनीय है। १९८६ की शिक्षा नीति से गाँवो के हायरसेकेन्ड्री
स्कूल हाईस्कूल कक्षा १०वीं तक ही रह गये जिससे ११ ...१२वी स्तर की पढाई
हेतु १० कि.मी .दूर जाना पड़ रहा हैजिससे बालिका शिक्षा प्रभावित हुई है।
आश्चर्यजनक लगता है कि हमारे देश मे अलग अलग माध्यम के विध्यार्थी एक साथ
महाविध्यालयो मे पढाये जा रहे है । सरकार कानूनबना रही है । बाजार शिक्षक,विद्यार्थी.
समाज, सरकार और जनतंत्र सबका दोहन कर रहा है।अर्थात् शिक्षा के मूल्य समाज और
देश चुका रहा है।
कमलेश कुमार दीवान
अध्यापक एवम लेखक
होशंगाबाद म.प्र.भारतवर्ष
सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ मुफ्त दोपहर भोजन की सुविधा होते हुए भी सरकार अपने कर्मचारियों को उनके बच्चों की शिक्षा के नाम पर प्रति बच्चा अलग से एक उँची रकम देती है!यानि सरकार ये मानती है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर निम्न है जहाँ सरकारी कर्मचारियों के बच्चे नही पढ सकते।
तो फिर मुफ्त शिक्षा का मतलब क्या रह जाता है? मुफ्त भोजन का लालच देकर सरकारी स्कूलों के रजिस्टर भरने की खानापूर्ति? सिर्फ साक्षरता? या फिर गरीब बच्चों के भविष्य के साथ जान बूझकर खिलवाड़! ईमानदारी की बात तो यह होती, कम से कम सरकारी शिक्षकों को बाध्य किया जाता कि वे अपने बच्चे सरकारी सकूलों में हीं पढायें।
क्या आपको सचमुच लगता है कि ऐसी व्यवस्था को देर आया दुरूस्त आया कहा जा सकता है??
मैंने सर्वशिक्षा अभियान के दौरान हज़ारों स्कूलों का भ्रमण किया है. जिसमें पाया कि कोई भी सरकारी स्कूल गाँव की निजी शालाओं से अधिक सुविधायुक्त है. बस ज़रूरत है तो शिक्षकों को इस बात की छूट देने की कि वे केवल बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दें, शिक्षा का अधिकार सफल हो जाएगा. वरना वही ढाक के तीन पात.