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पहले अंडा या पहले मुर्गी

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|शनिवार, 25 जुलाई 2009, 23:07 IST

भारत में विकास को लेकर ज़्यादातर बहसें इसी तरह ख़त्म होती हैं- पहले अंडा या पहले मुर्गी.

बहुत सारे लोगों को ये बहस बेमानी लगने लगी है क्योंकि हम पहले मर्सिडीज़ फिर सड़क, पहले पेप्सी फिर पानी, पहले आईआईटी फिर प्राइमरी स्कूल वाले ढर्रे के आदी हो चले हैं.

मुझे एक वाक़या याद आता है जब झारखंड में सुदूर इलाक़े के एक गाँव में शौचालय बनाने पहुँचे एक एनजीओ के लोगों को खदेड़ दिया गया, गाँव के लोगों ने कहा कि पहले खाएँगे तभी तो शौचालय जाएँगे.

इतना सहज और प्राकृतिक क्रम विकासवादी घटाटोप में ओझल हो गया दिखता है.

बताया गया है कि नेशनल आइडेंटिटी डेटाबेस बन जाने से देश का विकास हो जाएगा.

नंदन निलीकेनी को काम सौंपा गया है, सवा अरब लोगों के बारे में पुख्ता जानकारी जमा की जाएगी और हर व्यक्ति को एक नंबर दिया जाएगा.

बिल गेट्स योजना को लेकर उत्साहित हैं, पार्टनर बनना चाहते हैं. सैकड़ों अरब रुपए की लागत वाली इस योजना को लेकर कुछ ऐसा माहौल है मानो बड़े-बड़े लोग कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे.

इतनी बड़ी रकम का यही सबसे अच्छा इस्तेमाल है, इस पर कोई सार्थक बहस कहीं नहीं दिख रही है.

देश की जनता को यूनिक नंबर देने से विकास होता तो अफ़्रीका के बीसियों देशों में हर व्यक्ति के पास नेशनल आईडी कार्ड है, अमरीका और ब्रिटेन पिछड़े देश होते क्योंकि वहाँ यह काम नहीं हो पाया है.

सरकार का कहना है कि सबको नंबर दे देने से विकास आसान होगा, देश की बड़ी आबादी यही कहेगी कि नंबर ज़रूर देना लेकिन पहले दाना-पानी तो दे दो. यानी यूनिक आइडेंटिटी की बहस भी पहले मुर्गी या पहले अंडा वाली ही है.

मुर्गी और अंडे वाली बहस का प्रैक्टिकल जवाब है कि नाश्ता करना हो तो अंडा, डिनर करना हो तो मुर्गी.

जिनको दाना-पानी मिल गया है उनको नंबर का आइडिया अच्छा लग रहा है, जिनको नहीं मिला है उनकी बात सुनने का नंबर, नंबर बँटने के बाद आएगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 00:07 IST, 26 जुलाई 2009 JG:

    राजेश, फिर एक बार तारीफ लिख रहा हूँ. क्या आप कभी मौका नहीं दोगे कि तुम्हारे लिखे में कुछ कमी निकाल सकूँ. खैर उस वक़्त का मुझे इंतज़ार रहेगा. अभी केवल बधाई स्वीकारों. दूसरी बात मेरे एक मित्र ने कहा कि इस पूरी योजना में उन लोगों का क्या होगा जो अभी तक भारतीय नागरिक ही नहीं है (जैसे बांग्लादेशी अप्रवासी या लंकाई) जाने दो मेरे जैसों का ही क्या होगा, जो केवल पासपोर्ट के वेरीफिकेशन के लिए अभी 200 रू. एक ऐसे कांस्टेबल को दे कर आ रहा है, जो शायद ही जानता हो कि वेरीफिकेशन फार्म में अंग्रेजी में क्या लिखा है. अफ्रीका का तो सर्वोच्च उदाहरण आपने दे दिया है.ग़रीबी, बदहाली की जो दास्तानें इकट्ठा कर रहा हूँ, उससे लगता है कि तुलसी बाबा ठीक कह गए हैं कि हरि अनंत हरि कथा अनंता. यहाँ हरि से अर्थ क्या है, समझ गए न.

  • 2. 01:04 IST, 26 जुलाई 2009 kapil:

    मेरा मानना है कि यूनिक आईडी नंबर देना सर्वश्रेष्ठ आइडिया है. इससे अपराध रोकने में मदद मिलेगा. अमरीका तो अच्छा उदाहरण है. अमरीका में सबके पास एसएस नंबर है, किसी भी चीज़ के लिए आपको इसका इस्तेमाल करना है.

  • 3. 01:29 IST, 26 जुलाई 2009 SHABBIR KHANNA:

    वाह, राजेश जी वाह. कितने शानदार तरीक़े से लिखकर हम बीबीसी श्रोताओं को समझाया है आपने. काश इस लेख को देश के बेईमान नेता पढ़कर समझ जाते तो बेहतर होता. मैं भी JG के विचारों से 100 फ़ीसदी सहमत हूँ. कितनी सच्चाई लिखी है JG ने. मुझे लगता है कि मेरा भारत महान एक बार फिर ग़ुलामी, भूखमरी, ग़रीबी की तरफ़ बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. राजेश जी, मालिक आपकी उम्र को 1000 साल की करे और बीबीसी श्रोता आपका शानदार पहलू को पढ़कर देश की सच्चाई को पहचान सकें. अगर इन बेईमान नेताओं का वश चलेगा तो यह एक साथ मुर्गी और अंडे दोनों को ही खा जाएँगे.

  • 4. 01:39 IST, 26 जुलाई 2009 manoj yadav:

    हमेशा किसी योजना के बारे में नकारात्मक सोचना ग़लत है. किसी देश में ये योजना सफल रही है या कहीं ये फ़्लॉप भी हुई है. ज़्यादा महत्वपूर्ण ये है कि हमारे देश के नेताओं ने एक
    नई दिशा में सोचा. मेरा मानना है कि योजना अच्छी है और इसे जारी रखना चाहिए.

  • 5. 01:56 IST, 26 जुलाई 2009 Mahesh Kumar Mishra:

    राजेश जी आपने पोस्ट में बहुत ही अच्छी तरह से व्यंग्य किया है. क्रमिक विकास की बात को मुर्गी और अंडे से लेकर राष्ट्रीय पहचान आँकड़ों से जोड़ा है. बेहतरीन लगा. अब अगर सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना पर बात करें तो योजना का खाका ठीक है. लेकिन इसे अमली जामा पहनाने में वक़्त लगेगा. और रही बात दक्षिण अफ़्रीका और किसी अन्य देश की, तो हम उनसे बेहतर तरीक़े से काम कर सकते हैं. एक अरब लोगों का अगर डेटाबेस तैयार हो जाएगा, तो सोचिए कोई भी व्यक्ति शायद ही अपने बारे में झूठ बोल पाएगा. इसके अलावा देश में आतंकवाद पर तो ज़रूर रोकथाम करनी होगी. तो राजेश जी, सिर्फ़ नकारात्मक विचारधारा रखकर तो हम सरकार की इस योजना को ग़लत नहीं कह सकते.

  • 6. 03:31 IST, 26 जुलाई 2009 Rabindra chauhan,Tezpur,Assam:

    मै इसे एक उम्दा योजना समझता हूँ बशर्ते कि इसे सही ढंग से लागू किया जाए और असम तथा पूरे देश में रह रहे लाखों बांग्लादेशियों को एक बार ठीक ढंग से पहचान लिया जाए. सबसे बड़ी बात है जब हम दूसरी जगह जाते है तो हमसे प्रूफ़ माँगा जाता है .नया सिम कार्ड नहीं मिलता ,भारतीय नागरिक की हैसियत से उचित सुविधा नहीं मिलती .मेरे ख्याल से इसे इतना मजबूत समझा और बनाया जाए कि ---राशन कार्ड,स्थाई निवासी प्रूफ़, वोटर आईडी, ज़मीनी पट्टा अदि की अनिवार्यता ख़त्म हो जाए ----हाँ इसके दुरुपयोग को पहचाना जाए .

  • 7. 03:32 IST, 26 जुलाई 2009 Rabindra chauhan,Tezpur,Assam:

    इसे मैं एक उम्दा योजना समझता हूँ बशर्ते की इसे सही ढंग से लागू की जाए और असम तथा पूरे देश में रह रहे लाखों बांग्लादेशियों को एक बार ठीक ढंग से पहचान लिया जाए.सबसे बड़ी बात है जब हम दूसरे जगह जाते है तो हमसे प्रूफ़ माँगा जाता है .नई सिम कार्ड नहीं मिलता ,भारतीय नागरिक की हैसियत से उचित सुविधा नहीं मिलती .मेरे ख्याल से इसे इतना मज़बूत समझा और बनाया जाए की -राशन कार्ड,स्थाई निवासी प्रूफ़, वोटर आईडी, ज़मीनी पट्टा आदि की अनिवार्यता ख़त्म हो जाए ----हाँ इसके दुरुपयोग को पहचाना जाए .

  • 8. 04:37 IST, 26 जुलाई 2009 Virendra:

    Rajesh Ji, Per Aapne ye to nahi bataya ki aap kya chahte hai?
    राजेश जी आपने ये नहीं बताया कि आप चाहते क्या हैं. आईडी नंबर देने से विकास नहीं होगा ये बात शायद सच है लेकिन उससे देश में विकास में सहायता ज़रूर मिलेगी.

  • 9. 08:21 IST, 26 जुलाई 2009 उमेश यादव:

    राजेश जी मैं आप से सहमत नहीं हूँ. यह सरकार का एक सकारात्मक कदम है और यह आगे उपयोगी भी होगा. अगर आप यह कहना चाहते हैं की भारत चाँद पर जाने का प्रयास तब करे जब सभी भारतीय संपन्न हो जाएँ; तो हज़ारों साल लग जायेंगे और बहुत देर हो जाए
    एगी. क्या विकसित देशों में गरीब या बेघर नहीं होते? अगर होते हैं तो वे लाखों डालर चाँद या मंगल पर जाने में क्यों खर्च करते हैं? ऐसा मत सोचिये नहीं तो "ना नौ मन सोना होगा, ना राधा नाचेगी".

  • 10. 08:48 IST, 26 जुलाई 2009 शशि सिंह :

    60 सालों में सबका राशन कार्ड तो बनवा नहीं सके. बनवाते भी कैसे? फिर सबको राशन भी देना पड़ता. हां अगर बांग्लादेशियों के वोट पक्के करने मामला है तो फिर ठीक है. रही बात अंडे और मुर्गी की... तो बेचारे शाकाहारी क्या करेंगे?

  • 11. 10:20 IST, 26 जुलाई 2009 amita:

    सही कहा, राजेश और जेजी की प्रतिक्रिया भी अच्छी है. अच्छा काम जारी रखें.

  • 12. 11:48 IST, 26 जुलाई 2009 vikram bhukar:

    राजेश जी आपके जैसे लोगों को यही काम बचा है क्या. कभी तो अच्छा सोच लिया करो.

  • 13. 12:56 IST, 26 जुलाई 2009 Lavesh Kumar Agrawal:

    आप सही कह रहे हैं. पहली प्राथमिकता रोटी कपड़ा और मकान है और फिर आईडी. आपने जो बात नहीं की वो है भारत में भ्रष्ट्राचार. इसे आईडी बनाकर रोका जा सकता है. ब्रिटेन और अमरीका में और भी तरीके हैं जिनसे लोगों के बारे में पता लगाया जा सकता है.
    वे लोग ट्यूब, बस वगैरह में कैमरे लगाते हैं. इस ओर भी ध्यान देना चाहिए.

  • 14. 13:04 IST, 26 जुलाई 2009 anwaral haque:

    जो हो रहा है अच्छा हो रहा है. जो होगा अच्छा होगा. बुराई हर जगह है. सिर्फ़ नेताओं को दोष देना सही नहीं है. आतंक पर अंकुश लगेगा लेकिन पूरी तरह नहीं.

  • 15. 13:51 IST, 26 जुलाई 2009 Pathak:

    प्रिय बीबीसी, यूनीक आईडी देने से विकास नहीं होगा. ऐसा दावा भी कोई नहीं कर रहा. यह आईडी तो स्वयं विकास की प्रक्रिया का एक हिस्सा है. हां, उससे यह सब जरूर होगा.

    1. फिलहाल भारत में पचासों तरह की आईडी मौजूद है जैसे राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, पासपोर्ट आदि. फिर भी उनमें हमारी ज़रूरत की सारी अहम जानकारी नहीं होती. यूनीक आईडी पत्र में वह सब होगा जिसकी ज़रूरत आम नागरिक को अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए पड़ती है. उसे ढेर सारे अलग-अलग किस्म के पहचान पत्र लेकर चलने की ज़रूरत नहीं होगी.

    2. उपरोक्त सभी आईडी के निर्माण में भ्रष्टाचार व्याप्त है. यूनीक आईडी पहचान पत्रों के निर्माण में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को दूर करने में मदद करेगी, क्योंकि इसका सेंट्रल डेटाबेस होगा और वह भी पूरी तरह कंप्यूटरीकृत होगा जिसमें हेरफेर करना संभव नहीं होगा.

    3. एक ही व्यक्ति कई पैन कार्ड और कई ड्राइविंग लाइसेंस बनवा लेता है ताकि उनका जरूरत के अनुसार दुरुपयोग किया जा सके। यूनीक आई.डी. के साथ ऐसा करना संभव नहीं होगा।

    4. सरकारी योजनाओं के अमल में भारी भ्रष्टाचार होता है. अब यूनीक आईडी को इन पर अमल की प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा. इन आईडी पत्रों में आपकी आय का ज़िक्र मौजूद होगा. इसलिए नरेगा जैसी योजनाओं में, जिन्हें सिर्फ गरीबों के लिए लाया गया है, गलत लोग नहीं घुस सकेंगे.

    5. बैंक खाता खुलवाने से लेकर टेलीफोन कनेक्शन लेने और स्कूल-कालेज में दाखिले से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक, नया वाहन खरीदने से लेकर नया घर लेने तक, इनकम टैक्स संबंधी मामलों से लेकर विदेश यात्रा तक, दुर्घटनाओं में मृतकों की पहचान का पता लगाने से लेकर नौकर, किराएदार आदि के वैरीफिकेशन तक, किसी वर्ग विशेष के लिए उपलब्ध योजनाओं (जैसे एस.सी., एस.टी. आदि) के लिए पात्रता का दावा पेश करने से लेकर जन्मतिथि के प्रमाण पत्र के तौर पर, आपके आपराधिक रिकार्ड की निशानदेही करने से लेकर मुआवज़ो की दावेदारी तक यह एक ही पहचान पत्र पेश करना काफी होगा.

    6. यह पहचान पत्र आपके बारे में पंद्रह अहम जानकारियां रखेगा और इन जानकारियों की संख्या बढ़ाई भी जा सकेगी। यानी आपके पर्स में एक छोटा सा कार्ड ही सभी जरूरतों के लिए पर्याप्त होगा।

    7. सरकारों को देश के आर्थिक मुद्दों, स्वास्थ्य संबंधी मसलों, लिंग भेद से जुड़े विषयों, सरकारी योजनाओं पर अमल संबंधी आंकड़ों, शिक्षा से जुड़ी जानकारियों, धर्म-जाति आदि से जुड़े मुद्दों आदि के अध्ययन में बेहद मदद मिलेगी. सामान्य नागरिक, मीडिया और संगठन भी यूनिक पहचान पत्र प्राधिकरण से संपर्क कर विभिन्न मुद्दों पर देशव्यापी जानकारी पा सकेंगे.

    8. दुनिया के एक तिहाई देशों में ऐसे कार्ड मौजूद हैं और उनमें से अधिकांश भारत जैसे देश हैं. खुद पाकिस्तान तक में विशेष कार्ड की योजना पर अमल चल रहा है. कार्ड से विकास नहीं आता लेकिन विकास की प्रक्रिया पर नजर रखने में जरूर मदद मिलती है.

    मैं इस प्राधिकरण से जुड़ा हुआ नहीं हूं. लेकिन कई देशों का भ्रमण करने और भारत की विकास प्रक्रिया के साथ उनकी तुलना करने के आधार पर मुझे लगता है कि महज तीन सौ करोड़ रुपए की यह योजना अर्थहीन नहीं है. ऐसी चीजों को प्रोत्साहित करना चाहिए.

  • 16. 15:39 IST, 26 जुलाई 2009 Rishu Tandon:

    ये विकासशील विचार लगता है. हालांकि जो बातें उठाई गई हैं वो जायज़ है. हमारे यहाँ बड़ी समस्याएँ हैं. राष्ट्रीय डाटाबेस से वे हल नहीं होंगी हालांकि इससे हमें ये पता चलेगा कि हम कितने कमज़ोर हैं या हमारी ताकत क्या है.
    .

  • 17. 16:24 IST, 26 जुलाई 2009 Piyush:

    राजेश जी ये काफ़ी निराशावादी रवैया है. गणित या विज्ञान में भी हम लोग पहले कुछ चीज़ें मानकर चलते हैं. आपने जो मिसाल दी है उसके मुताबिक अगर मान लें कि अंडा पहले आया तो मेरे पास कम से कम आगे बढ़ना का एक ज़रिया तो है.

    राजीव गांधी ने कभी कहा था कि एक रुपए मे से केवल 15 पैसे ही लोगों तक पहुंचते हैं. कुछ चीज़ों को आधार मानने के बाद ये राशि 30 पैसे हुई है. अगर ये 50 पैसे हो जाए तो निवेश सफल हो जाएगा.

  • 18. 19:59 IST, 26 जुलाई 2009 arun kalwani:

    आपकी जानकारी के लिए बता दें तो अमरीका और ब्रिटेन में हर व्यक्ति का यूनीक आईडेनटीफ़िकेशन नंबर है. मैं आपसे सहमत नहीं हूँ क्योंकि मैं सोचता हूँ बड़े स्तर पर कुछ सकारात्मक काम करने के लिए बेहतर प्रणाली की ज़रूरत है. निराशावादी सोच से कुछ नहीं होगा. विकास के लिए सकारात्मक सोच चाहिए और रणनीति बनानी होगी.

  • 19. 20:28 IST, 26 जुलाई 2009 महेंद्र सिंह लालस :

    ज़्यादा मज़ा नहीं आया राजेशजी. थोड़ी तैयारी से लिखते तो अच्छा रहता. नेशनल आइडेंटिटी डेटाबेस कई काम करेगा और इसका अंडे या मुर्गी दोनों से ताल्लुक है . इससे अपराध की पकड़ और रोकथाम में मदद मिलेगी, चाहे तो स्वास्थ्य इंडेक्स भी तैयार हो सकता है. लोगों की आर्थिक स्थिति की जानकारी मिल सकती है सरकारी और गैर सरकारी योजनाएँ सही लोगों तक पहुच सकती है, यह विचार अच्छा है. आप जैसे निराशावादी लोग और उनके विचार देश की तरक्की के लिए किए जा रही किसी काम को ज़्यादा देर रोक नहीं पाएंगे. आप जिस इन्टरनेट से ब्लॉग लिख रहे हैं वह भी देश की व्यवस्था ने ही दिया होगा, यहाँ मुर्गी और अंडा कहाँ गए? अपना नज़रिया सकारात्मक रखें बस.

  • 20. 20:36 IST, 26 जुलाई 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    मेरी पत्नी का वोटर कार्ड खो गया और हम दो साल से नया कार्ड लेने की कोशिश कर रहे हैं. दो साल से वो वोट भी नहीं कर पाईं. ये उन लोगों की दास्तां है जो पक्के घरों में रहते हैं. कच्चे घरों और बेघरों की पहचान कैसे होगी. वे ऐसे दस्तावेज़ को संभाल कर कहाँ रखेंगे.


  • 21. 21:58 IST, 26 जुलाई 2009 Zargham Naqvi:

    पहले मुर्गी या अंडा...चाहे जो हो पर कुछ तो पहले आए क्योंकि मुर्गी आएगी तो अंडा देगी और उससे दूसरी मुर्गी आएगी. अंडा आएगा तो उससे मुर्गी निकलेगी और उससे प्रक्रिया तो आगे बढ़ेगी. यह सरकार का एक साहसिक कदम है क्योंकि अगर सब कुछ कंप्यूटर पर होता है तो चोरी करना बहुत मुश्किल हो जाएगा. और एक आदमी का डाटाबेस पूरे देश में मौजूद हो, उसका वित्तीय ब्यौरा, उसका चरित्र- ऐसा हो मुझे नहीं लगता कि कोई गड़बड़ी कर सकेगा.

    ,

  • 22. 00:33 IST, 27 जुलाई 2009 Prem Verma:

    वाह राजेश जी बहुत ख़ूब लिखा है आपने मज़ा आ गया. मेरे पास मेरा वोटर आईडी कार्ड है जिसमें मेरी सूरत मेरी ही पहचान में नहीं आती. मेरी पड़ोसी के पास तीन चुनाव क्षेत्रों के वोटर आईडी है. उनकी जहाँ इच्छा होती है वहाँ वोट करते हैं, आईडेनटीफ़िकेशन से क्या होगा.
    जनता, अदालत,पुलिस सभी जानते हैं कि मुजरिम कौन है पर क्या अपराधियों को सज़ा मिलती है? सज़ायाफ़्ता भी जेलों में बिरयानी खा रहे हैं.
    .

  • 23. 08:58 IST, 27 जुलाई 2009 CHANDAN KUMAR,BEGUSARAI, BIHAR.:

    मेरे ख्याल से हर आदमी की यूनिक आइडेंटिटी होनी चाहिए, सोवियत संघ में यूनिक आइडेंटिटी की वजह से ही अपराध कम होता था. ये अच्छी बात नहीं है कि हर अच्छे काम से पहले हम वीटो लगा दें कि पहले हमारा पेट भरो तब काम होगा. वीटो लगाने से पहले सोचना चाहिए, हम गरीब क्यों हैं, हमारे कितने बच्चे हैं. क्या आगे चलकर कहेंगे कि बच्चों का पेट भरो फिर आईडी बनाना. गरीबी को दिखाकर अच्छे काम को रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए.

  • 24. 09:30 IST, 27 जुलाई 2009 AVINASH CHANDRA:

    यूनिक आइडेंटिटी से एजेंटों को नए अवसर मिलेंगे. हम राशन कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस के लिए पैसा भरते रहेंगे. मेरा सवाल है कि क्या इस कार्ड से बेरोज़गारी दूर होगी, क्या इस कार्ड से गरीबी दूर होगी, क्या इस कार्ड से भ्रष्टाचार ख़त्म होगा, अगर जवाब नहीं है, तो फिर इस कार्ड को देश और समाज के लिए क्यों उपयोगी बताया जा रहा है,

  • 25. 10:33 IST, 27 जुलाई 2009 madan:

    चलिए हम आपको ही काम सौंप देते हैं, आप ही बताइए कि सरकार का पैसा कैसे योजनाओं के तहत गरीबों तक पहुँचाया जाए. आलोचना आपका धंधा है, खाना खाकर मीनमेख निकालना आसान है, पकाकर सबको खिलाएँ तब जानें. काम भी होगा, कमियाँ भी रहेंगी. आप जैसों की मानें तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें और आपको लेख लिखने का पैसा मिलता रहे. आप भी तो कुछ रचनात्मक काम करके दिखाएँ.

  • 26. 11:50 IST, 27 जुलाई 2009 दीपक चौबे:

    प्रिय राजेश
    आपकी दलीलों में दम है, लेकिन मुद्दा गलत चुन लिया। बेशक एक एक बात सही है, सड़क से पहले मर्सिडीज आती है और शौचालय से पहले खाना। लेकिन कायदे से ये पता तो चले कि भूखा कौन कौन है और कहीं भूखे की लाइन में खड़ा शख्स सेठ तो नहीं। अभी तक तरह तरह के पहचान पत्र बनाकर जो तात्कालिक समाधान ढूंढते रहे हैं, क्यों ना एक स्थायी निदान तलाशा जाए। पैसे तो खर्च होंगे ही लेकिन ये एक भगीरथ प्रयास होगा। और आधा जीवन हमारा और अगली नस्लों को कई दफ्तरों से चक्कर लगाने से मुक्ति मिल जाएगी। कुछ काम भविष्य के लिए भी सोच कर किए जाते हैं। इसे एक तरह का निवेश समझा जाए तो एतराज कम हो जाते हैं।

  • 27. 12:48 IST, 27 जुलाई 2009 समीर गोस्वामी छतरपुर मध्य प्रदेश:

    राजेश जी
    मुझे समझ मैं नहीं आ रहा की आप अपना घर कैसे चलते हैं? आप बिलकुल नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति मालूम होते हैं. घर से जब सब्जी लेने बाज़ार के लिए निकलते होंगे तो पता नहीं क्या क्या सोचते होंगे. पहिले बच्चों की फीस भर लूं फिर सब्जी लूं या फिर गाड़ी की किस्त जमा कर दूं फिर सब्जी लूं. पाहिले ऑफिस का कम ख़त्म करना ज़रूरी है जो सब्जी के लिए पैसे देता है उसे ख़त्म कर दूं तो सब्जी लूं इस तरह से तमाम बाते आपके दिमाग मैं आती होंगी और आप घर में परिवार से कहते होंगे की कितने काम बाकी हैं और तुम्हे खाने की पड़ी है और उस रात घर के सभी लोग भूखे सो जाते होंगे. है ना? अगर ऐसा नहीं है तो राजेश जी जिंदगी और दुनिया मैं हर काम ज़रूरी होता है अगर आप किसी दूसरे अधूरे काम से किस कार्य को तोलेंगे तो मैं दावे से कह सकता हूँ की कभी देश आगे नहीं बढ पायेगा. देश मैं अगर कोई अच्छा काम हो रहा है तो उसे किसी दूसरे कार्य से तुलना करना छोड़िए और ऐसे अच्छे कार्य को प्रोत्साहित करिए. अगर आपकी मानसिकता ही होत्स्ताहित करने की है तो आपका कोई कुछ नहीं कर सकता.
    बाकि मैं यूनिक आइडेंटिटी नंबर के बारे मैं बहुत कुछ लिखना चाह रहा था लेकिन श्री पाठक ने १४ न. पोस्ट पर कमोबेश सारी चीजे लिख दी हैं. और मैं उनकी बात से सहमत भी हूँ.

  • 28. 13:32 IST, 27 जुलाई 2009 Vinit Kumar Upadhyay:

    राजेश जी, आप तो कुछ ज़्यादा ही निराशावादी और रूढ़िग्रस्त लग रहे हैं मुझे. 39100 करोड़ रुपये जा रहे हैं नरेगा में (हमने जो 40,000 रुपये टैक्स में दिए थे उसका भी 4000 रुपया है इसमें). इसका मतलब यह होना चाहिए कि भारत के हर ग़रीब परिवार को मिलेंगे 8000 रुपये सालाना. क़ायदे से ग़रीबी ख़त्म.
    अब आप जैसे लोग हैं जो लीडर-मीडिया-ब्यूरोक्रेसी का घातक गठजोड़ बना कर यह सारा पैसा कूड़ेदान में डाल देंगे और ग़रीबी फिर जस की तस. आप लोग कोई अच्छा काम होते देख नहीं पाते हैं क्या. कभी तो ठीक दिमाग़ से सोचिए. करदाताओं के पैसे की जवाबदेही बहुत ज़रूरी है. जिस दिन यह हो जाएगा उस दिन भारत ग़रीब नहीं रहेगा और आपका गठज़ोड बेरोज़गार हो जाएगा. उस पल की प्रतीक्षा में हैं हम...


  • 29. 20:32 IST, 27 जुलाई 2009 vidya dhar tiwari:

    राजेश जी आपकी टिप्पणी के लिए शुक्रिया.

  • 30. 20:55 IST, 27 जुलाई 2009 Sandeep Kumar Mahato:

    मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ. मेरी नज़र में Unique identification होना जरुरी है. लेकिन क्या भारत जैसे देश मैं इसका सही इस्तेमाल हो पायेगा इस पर मुझे शक है. क्या पुलिस को ये अधिकार होगा की वो किसी को सिर्फ शक के बुनियाद पर उसका ID चेक कर सके? क्या अब हर किसी को इसी ID के आधार पर SIM कार्ड दिए जायेंगे या फिर इसी ID के आधार पर टिकेट बुकिंग के सुविधा होगी? जिससे की आतंकवादियों को पहचानने मैं सुविधा हो. दूसरी बात क्या ये ID प्राप्त करना उनके लिए काफी मुश्किल होगा जो भारत के नहीं होंगे? मेरी राय मैं शायद नहीं. दूसरी बात क्या इस्सी ID card को उपलब्ध करने के बहाने कुछ सरकारी ऑफिसर गरीब लोगों से पैसे ऐंठने लगंगे जैसा की अभी तक आपको पासपोर्ट आदि बनाने के लिए देना पड़ता है.

  • 31. 21:12 IST, 27 जुलाई 2009 Adi:

    अरे भइया कुछ तो हो रहा है, अंडे खाओ, मुर्गी क्यों गिनते हो. नल होंगे तभी तो पानी आएगा.

  • 32. 22:44 IST, 27 जुलाई 2009 Chandan:

    जैसा कि अन्य कई लोगों ने कहा है, इस योजना के कई फ़ायदे हैं. लोगों ने इसके फ़ायदे अच्छी तरह गिनाए हैं और मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ. मैं मानता हूँ कि भारत दूसरे देशों के मुक़ाबले अलग है और हमें दूसरे देशों की ग़लतियों से सीखना चाहिए. भारत में लाखों लोग निरक्षर हैं वे अपना नंबर कैसे याद रखेंगे, भारत में लाखों लोगों को अपनी जन्मतिथि पता नहीं है. अगर इस योजना को सफल बनाना है तो इस सभी मुद्दों का खयाल रखना होगा. लेकिन यह भारत को विकसित देश बनाने की दिशा में ही उठाया गया एक कदम है.

  • 33. 01:43 IST, 28 जुलाई 2009 Naresh Chander :

    राजेश जी, आपके ब्लाग पर आपके विचार नहीं हैं बल्कि यह बीबीसी के मानसिक दिवालिएपन को दिखाता है. भारत सरकार अच्छा काम कर रही है, बीबीसी को होश में आना चाहिए और भारत विरोधी विचारों को रोकना चाहिए.

  • 34. 02:52 IST, 28 जुलाई 2009 Sanjay Sharma:

    राजेश जी,

    आपने कई प्रश्न तो बहुत सही उठाएं है, परन्तु ये एक बड़ा सकारात्मक कदम है सरकार का. सफलतापूर्वक इसका प्रतिपादन होने पर, इससे कई तरह के फायदे आम लोगो को मिल पायेंगे. ज्यादा विस्तार में नहीं जाऊंगा, पाठक जी ने बहुत बढ़िया लिखा है पहले ही.

  • 35. 21:07 IST, 28 जुलाई 2009 himmat singh bhati:

    सवाल मुर्गी और अंडे भर का नहीं है, सवाल ये है कि हमें पहले कौन सा काम करना चाहिए और कौन सा बाद में. पर पहले देखा जाता रहा है कि काम बीरबल की खिचड़ी की तरह होता है जो कभी पकती ही नहीं. क्या हमारे पहचानपत्र नहीं बने हैं. ऐसे बहुत से लोग के नाम मतदाता सूचियों में नहीं हैं.

  • 36. 23:38 IST, 28 जुलाई 2009 Deepak Tiwari:

    दवा ख़रीदनेभर से बीमार ठीक नहीं हो जाते, पर दवा खाने के लिए ख़रीदना भी ज़रूरी होता है. यूनिक आईडी नंबर भर से देश का विकास नहीं होगा लेकिन प्रयोग में आने के बाद ये विकास के लिए बेहतर साबित होगा.

  • 37. 02:06 IST, 29 जुलाई 2009 vinit mishra:

    राजेश जी मैं भी आप से सहमत नहीं हूँ. यह सरकार का एक सकारात्मक क़दम है और यह आगे उपयोगी ही ज़रूर होगा. किसी भी विचार पर ताना देना आसान है. अमरीका में लोग सौ साल आगे के अपने विकास के बारे सोचते है, वर्तमान परिस्थितियों के बावजूद हमें लगातार हमारे विकास के बारे में सोचना चाहिए.

  • 38. 06:25 IST, 29 जुलाई 2009 Rishikesh Chaki:

    भाई राजेश जी आप की तारीफ़ तो करनी ही पड़ेगी क्या खूब ढूंढ के निकला है आपने अमरीका के सोशल सिक्युरिटी नंबर का अस्तित्व मिटा दिया; अब देखिए देश में ग़रीबी है, बेरोज़गारी है और भी बहुत कुछ है कंप्यूटर के आने से क्या हो गया, हम जैसे युवा ऑनलाइन बात कर ब्लॉग बनाने लगे, समय का तो कोई मोल ही नहीं रह गया. गाँव में सड़क नहीं है दिल्ली में मेट्रो बनवा दी, कितनी ग़लत बात है ना. परिवर्तन समय की मांग है इसे या तो मान लो या फिर न मानो समय तो बदलेगा ही और रही बात नीति निर्माताओं की तो ये काम कुछ देरी से भले हो रहा हो परन्तु सक्षम लोगों के द्वारा किया जा रहा है, ऐसा मेरा विश्वास है. कह गुजरने में कुछ नहीं लगता ज़रुरत कुछ करने की है और अगर नहीं कर सकते तो चुप रहना चाहिए.

  • 39. 20:37 IST, 29 जुलाई 2009 DINESH KUMAR:

    राजेशजी आपने बहुत अच्छा लिखा है, लेकिन हमें इस पचड़े में न पड़ते हुए देश के बारे में सोचना चाहिए. यूनिक आईडी नंबर का आइडिया अच्छा है लेकिन इसके नकारात्मक असर की तरफ भी ध्यान दिया जाना चाहिए. याद रहे कि ब्रिटेन और भारत में काफ़ी अंतर है, वहाँ की परिस्थितियों को यहाँ पर लागू नहीं किया जा सकता.

  • 40. 22:21 IST, 29 जुलाई 2009 Maharaj Baniya:

    राजेशजी आपने एक बार फिर इस परियोजना पर बहस के लिए शानदार लेख लिखा है. हम सभी सहमत हैं कि सरकार को आम लोगों की ज़रूरत के अनुसार अपनी परियोजनाओं की प्राथमिकता तय करनी चाहिए. हमें हर शख्स की ज़रूरतों पर ध्यान देना चाहिए. हमें लोगों को साफ़ पीने की पानी 24 घंटे उपलब्ध कराने की ज़रूरत है, साथ ही ऐसी व्यवस्था करने की ज़रूरत है कि सिंचाई के लिए किसान मॉनसून पर कम निर्भर रहें. यदि ये सब नेशनल आईडी परियोजना से संभव है तो हम इसके पक्ष में हैं, मुझे लगता है कि भारत को इस परियोजना की ज़रूरत है ताकि भारत भी विकसित देशों की कतार में शामिल हो सके और विदेशी कंपनियाँ और निवेशक भारत में बेहतर व्यवस्था पा सके. लेकिन कंपनियों को मूलभूत समस्याओं से भी दोचार होना पड़ेगा जो इस देश के हर गांव, शहर में हैं. मुझे उम्मीद है कि भारत बेहतर स्थान बनेगा और लोग यहाँ आराम से रह सकेंगे.

  • 41. 22:56 IST, 29 जुलाई 2009 sumit:

    सरकार खराब सड़कों और ख़राब परिवहन व्यवस्था और बिजली के बारे में क्यों नहीं सोचती है. उन्हें शिक्षा के बारे में सोचना चाहिए. ये आईडी कुछ नहीं है, मुझे नहीं लगता कि आईडी की कुछ ज़रूरत है.

  • 42. 06:02 IST, 30 जुलाई 2009 Santosh Kumar:

    मुझे लगता है कि अन्य योजनाओं की तुलना में ये योजना कम खर्चीली है. राजेशजी आपने बातें सही लिखी हैं पर मुद्दा ग़लत चुना है, ये भी सच है कि माइक्रोसाफ्ट बहती गंगा में हाथ धो रहा है इसलिए वो समर्थन में गीत गाएगा ही.

  • 43. 11:05 IST, 30 जुलाई 2009 HIMMAT SINGH BHATI:

    भारत में पहले मुर्गी या पहले अंडे वाली बात चली गई, अब तो जमाना चल निकला है- हाथ में हो डंडा और हो लोगों की भीड़, साथ में जो नहीं माने, उसे जबर्दस्ती मना. ये ही अब विकास का चलन चल गया है.

  • 44. 11:18 IST, 30 जुलाई 2009 deepak singh rawat:

    कहते हैं अगर भविष्य को सुधारना है तो इतिहास को जानना अत्यंत आवश्यक है. राजेश जी मैं आपकी बात से बिल्कुल सहमत हूँ. हमारे विद्वान नेता गण योजनाएं तो बना देते हैं किन्तु वो योजना सफल हुई या नहीं भविष्य में उससे कुछ लेना देना नहीं. अच्छी योजनाएँ या नीतियां सब ठंडे बस्ते में, उन पर विरोध करके आगे बढ़ने ही नहीं देना, यही है हमारे देश की वस्ताविकता जिसे हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा. आज तक हमारे वोटर आईडी कार्ड सही तरीके से नहीं बने तो अब ये नेशनल आइडेंटिटी डेटाबेस बनाकर सरकार कौन सी नई विजय पताका फहराना चाह रही है? मैं तो इसके बारे में यही कहूँगा की "मुँह में नहीं दाने , अम्मा चली भुनाने" | साहब इस पैसे से ग़रीबों का भी कुछ भला कर दो, केवल कागजों में नहीं वास्तविकता में. इस तरह हमेशा की तरह खयाली पुलाव पकाने से बेहतर है कि वास्तविकता को स्वीकारो.

  • 45. 10:52 IST, 31 जुलाई 2009 Yogeshwar Sanchihar:

    मुझे लगता है बीबीसी में हर कोई इस वायरस से ग्रस्त हो रहा है. सलमा ज़ैदी बच्चों को अनिवार्य शिक्षा की आलोचना कर रही हैं तो आप आइडेंटिटी डेटाबेस प्लान की आलोचना कर रहे हैं. आपके हिसाब से तो सरकार को चुपचाप बैठे रहना चाहिए क्योंकि आप तो सरकार के किसी भी कदम की सराहना नहीं करेंगे. मैं कहता हूँ कि सिर्फ़ आलोचना करने के बजाय क्यों नहीं राजनीति में आ जाते ?

  • 46. 11:47 IST, 01 अगस्त 2009 Arunesh:

    आपकी टिप्पणी पढ़कर बहुत दुख हुआ. पत्रकार को तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए. आपने तो अमरीका में आइडेंटिटी नंबर का अस्तित्व ही मिटा दिया. जो लोग अमरीका के बारे में नहीं जानते, वे तो आपकी बात पर यकीन कर अंधेरे में ही रहेंगे. मैं कहना चाहूँगा कि अगर भारत में सरकार कुछ नया प्रयास कर रही है तो उसकी किरकिरी क्यों की जाए. आप जैसे ही लोग अतीत में मतदाता पहचान पत्र, इंटरनेट जैसी चीज़ों का विरोध करते रहे हैं. देश की तरक़्की के लिए नए क़दम उठाने ही होंगे. ग़रीबी का रोना रोते रहने से ग़रीबी नहीं हटेगी, इसके लिए सदप्रयास ज़रूरी हैं. मुझे नहीं पता आप भारत के बारे में कितना जानते हैं, लेकिन हक़ीक़त से काफ़ी दूर हैं.

  • 47. 01:55 IST, 17 अगस्त 2009 kanishka Kashyap, Jamia Millia Islamia , New Delhi:

    इतनी सारी टिप्पणियों को देखने के बाद यह ज़ाहिर है कि राजेश जी से कोई सहमत नही दिख रहा।
    गौरतलब बात यह है कि रजेश जी ने इस योजना की सार्थकता को लेकर तो सवाल नहीं उठाया। उनके कहने का अर्थ यह नहीं कि यह योजना उपयोगी नहीं होगी। परन्तु, सवाल यह है कि क्या यह सही वक़्त है, जब भारत को भी नेशनल आइडेंटिटी डेटाबेस की दरकार है? पुरूष होने कि लिए दाढ़ी का निकलना आवश्यक तो है, परन्तु यही दाढ़ी अगर 10 वर्ष की उम्र मे आ जाये तो इसे रोग कहते हैं।
    जहां आज रोटी और रोजगार पहली समस्या है, वहां यह पहचान की क्या आव्श्यकता।
    हां अब अप भिखारी को भीख देने से पहले उसका UIN पूछ लेंगें। और विदर्भ या छत्तीसगढ़ मे आत्महत्या किये किसानो की लाशों को जरूर एक पहचान दे पायेगी यह योजना।

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