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हम कब बड़े होंगे?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|गुरुवार, 23 जुलाई 2009, 14:37 IST

टीवी कार्यक्रम 'सच का सामना' को लेकर संसद में हंगामा हुआ. कहा गया कि यह कार्यक्रम अश्लील है, परिवार के साथ देखने लायक़ नहीं है. और यह भी कि इससे कई परिवार टूटेंगे, दोस्तियाँ ख़त्म होंगी.

पहले बात पहली दलील की. यह कार्यक्रम रात साढ़े दस बजे प्रसारित होता है. यह समय बच्चों के सोने का होता है, टीवी देखने का नहीं. इसके अलावा कार्यक्रम पर बार-बार यह संदेश दिखाया जाता है कि इसे अभिभावकों की मर्ज़ी से ही देखा जाए.

पश्चिमी देशों में रात नौ बजे के बाद कई वे कार्यक्रम दिखाए जाते हैं जो केवल वयस्कों के लिए ही होते हैं. हम कई मायनों में पश्चिम का अनुसरण करते हैं. यहाँ तक कि जिस कार्यक्रम की बात हो रही है वह भी अमरीकी टीवी शो मूमेंट ऑफ़ ट्रुथ का हिंदी संस्करण है.

हम अपने बच्चों को और कई बुराइयों से बचाते हैं तो टीवी पर यह तथाकथित अश्लील कार्यक्रम देखने से क्यों नहीं.

कभी यह जानने की कोशिश की जाती है कि बच्चा इंटरनेट पर सर्फ़िग करते करते किस साइट पर पहुँच गया है? और कई जागरूक माता-पिता यह जानते भी हैं. तो वे बच्चो को रोकेंगे या उस वेबसाइट पर पाबंदी लगाने की बात करेंगे?

और अब दूसरी बात-परिवार टूटने की.

इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले सभी लोग वयस्क हैं. वे जब इसमें शामिल होने की हामी भरते हैं तो अपनी आँखें और कान खुले रख कर.

यदि उनके लिए पैसे की इतनी अहमियत है कि उन्हें परिवारजनों के दिल टूटने या उनको चोट लगने की चिंता नहीं है तो हम आप नैतिक पुलिस की ज़िम्मेदारी क्यों उठाए हैं.

यह सब पढ़ कर यह मत सोचिएगा कि मैं इस कार्यक्रम की बड़ी भारी प्रशंसक हूँ. मुझे न तो लोगों के निजी जीवन में झांकने का शौक़ है और न ही मैं ऐसे रियल्टी शोज़ को कोई अहमियत देती हूँ.

मैंने तो कल संसद में हंगामा होने के बाद पहली बार इसे देखा.

लेकिन इस हंगामे ने मुझ जैसे श्रोताओं की बदौलत इसकी टीआरपी में तो जरूर इज़ाफ़ा कर दिया होगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:29 IST, 23 जुलाई 2009 ऋचा :

    एकदम सही बात लिखी है सलमाजी, हम लोग जाने अनजाने विवाद खड़े कर ऐसे अनेक कार्यक्रमों की टीआरपी बढ़ा देते हैं जिनको इस विवाद से पहले कुछ ही लोग देखते होंगे. इतनी छोटी छोटी सी बातों पर ऐसे विवाद होने देश के लिए अच्छी बात नहीं है.

  • 2. 15:41 IST, 23 जुलाई 2009 kuldeep kumar jain:

    आपने बिलकुल ठीक कहा. हम एक राष्ट्र के तौर पर बड़े नहीं हुए हैं. किताबों पर प्रतिबंध लगाने के लिए भी इसी तरह के तर्क दिए जाते हैं.

  • 3. 15:59 IST, 23 जुलाई 2009 Shaheer A. Mirza:

    दरअसल बात यह है कि एक आम हिंदुस्तानी को ख़ुद पता नहीं है कि वह चाहता क्या है. कभी विकसित देशों की बराबरी में लग जाता है तो कभी संस्कार के नाम पर हाय-हाय करता है. मीडिया को उसकी औक़ात से ज़्यादा तरजीह देना और यह भूल जाना कि मीडिया का काम ख़बर पहुँचाना है, ख़बर बनाना नहीं, इस सामाजिक बदहाली की ख़ास वजह है.
    में इस सब के लिए लोगों को ख़ुद ज़िम्मेदार मानता हूँ और कम से कम हमख़याल लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि वह ख़ुद तय करें कि वह चाहते क्या हैं.

  • 4. 16:30 IST, 23 जुलाई 2009 Anwar Rizvi, HALLAUR (U.P):

    हमको हर ऐसे काम से बचना चाहिए जो समाज में बुराई फैलाता हो. या जिसकी वजह से समाज के ज़्याद लोग प्रभावित हो रहे हों. सच का सामना में बहुत बार ऐसा होता है कि आप शर्मिंदा हो जाते हैं. कार्यक्रम को हद में रह कर सवाल पूछना चाहिए.

  • 5. 17:23 IST, 23 जुलाई 2009 आलोक:

    शायद आप भूल रही हैं कि हिन्दुस्तान के घरों में आज भी सब लोग मिल के टीवी देखते हैं। क्या आपको लगता है कि अगर आपको पता होता कि मेरे माँ बाप मज़े से चटाखेदार टीवी देख रहे हैं, तो आपको नींद आ जाती?

  • 6. 18:18 IST, 23 जुलाई 2009 ashraf:

    आपने बिलकुल सही लिखा है. आदमी पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार है.

  • 7. 19:15 IST, 23 जुलाई 2009 विकास कुमार, बान्थु, बिहार:

    सलमा जी, आपने अपने इस ब्लोग में मेरे मन की बात कह दी....
    पढ़कर लगा कि आपने मेरे मन मे चल रहे विचारों को ही शब्द दे दिये.
    हमारे देश में शुरु से नैतिक पुलिस बनने का प्रचलन रहा है और इस काम को वही लोग करते हैं जिनकी समाज के लिए कोई अहमियत नही है.
    जब कोई अपनी मर्जी से शो में भाग ले रहा है और देखने वाले अपनी मर्जी से टीवी से चिपकते हैं क्यों किसी को मिर्ची लग रही है?
    मुझे तो लगता है कि इस शो मे हमारे सारे नेताओं को बिठाया जाना चाहिये और फिर उनसे सवाल पुछे जाने चाहिए....

  • 8. 19:27 IST, 23 जुलाई 2009 Asif Iqbal:

    टीआरपी यह सिर्फ़ एक शब्द मात्र नही है बल्कि एक ऐसा ज़हर है जो पूरी की पूरी टेलीवुड इंडस्ट्री को दीमक की तरह खा रहा है. ना कोई सामाजिक सरोकार ना कोई लोक-लाज आज का पूरा टीवी. इंफोटेनमेंट आधारित रह गया है.
    संसद मे चर्चा होना इस बात का सबूत है की पानी सर से कितना उपर निकल गया है.
    तुच्छ सोप ओपेरा पर तो तत्काल रोक लगनी चाहिए.

  • 9. 19:50 IST, 23 जुलाई 2009 SHABBIR KHANNA:

    मैंने तो यह कार्यक्रम नहीं देखा है लेकिन सलमा जी आपके लेख को पढ़कर तो यह लगता है कि आप भी लंदन में रहकर पश्चिमी सभ्यता की तरफ़दारी कर रही हैं. बहुत अच्छा समझाया आपने कि हम रात में देर से क्यों सोते हैं. ये कार्यक्रम तो रात के 10.30 बजे आता है. आने वाले दिनों में आप ये भी कहेंगी कि हम रात को सोते ही क्यों हैं ताकि हमारे घरों में चोरियाँ न हो. एक कहावत है राजस्थानी में- चोर को क्यों चोर की माँ को ही मार दो ताकि बच्चे पैदा न करे. अगर ऐसे कार्यक्रम टीवी पर आएँगे ही नहीं तो बच्चे या कोई भी देखेगा कैसे.

  • 10. 19:54 IST, 23 जुलाई 2009 vikram bhukar:

    आप बिल्कुल सही हैं लेकिन ये इंडिया है.

  • 11. 21:03 IST, 23 जुलाई 2009 Purushottam Parihar:

    मीडिया की ओर से भी नैतिकता के लिए कुछ क़ायदे होने चाहिए. ये नैतिकता की निगरानी का सवाल नहीं बल्कि बच्चों और वयस्कों की शिक्षा का मामला है. ख़ासकर बच्चे बिना तर्क के अपने पंसदीदा लोगों की नकल करते हैं. आजकल टीवी मीडिया का एकमात्र लक्ष्य पैसा बनाना है. इन सबके बीच वे अपनी अहम भूमिका भूल गए हैं. वे सामाजिक उत्थान और नैतिक शिक्षा देने की भूमिका निभा सकते हैं. टीवी पर कोई धारावाहिक चलते रहते हैं, जिनका कोई अंत नहीं होता और जिनमें घटिया-घटिया कल्पनाएँ की जाती हैं. ये समाज में अच्छा संदेश नहीं देते.

  • 12. 21:25 IST, 23 जुलाई 2009 Abdul Wahid:

    आप का लेख पसंद आया. हमारे देश की असल समस्या पर कोई भी ध्यान देने को तैयार नहीं है. लेकिन उन चीज़ों को बहुत ज़्यादा उछाला जाता है जिनका सरोकार मात्र देश के दो या एक फ़ीसद धनाढ्य व्यावसायिक घरानों या गलैमर को एक नया आयाम देने वालों से है. देश के मीडिया चैनल मानसिक दिवालिएपन से भी आगे निकल गए हैं. ख़बरों के नाम पर या तो हिंसा है या फिर भौंडे कार्यक्रम. मेरी राय में तो पत्रकारिता के नाम पर धंधा करने वाले चैनलों पर रोक लगानी चाहिए.

  • 13. 21:38 IST, 23 जुलाई 2009 समीर गोस्वामी, छतरपुर, मध्य प्रदेश :

    सलमा जी मुझे एक चीज़ समझ मैं नहीं आ रहा की कोई व्यक्ति यदि अपनी जिंदगी के सच बोल रहा है वो भी जब जबकि वह जानता है कि करोड़ों लोग उसे देख रहे हैं तो क्या उसके हिम्मत की दाद नहीं देना चाहिए. रही बात घर टूटने की तो वो बेचारा तो सिर्फ़ अपना घर तोड़ेगा. हो सकता है कि एकाध घर और ले ले. लेकिन उन सीरियलों का क्या जो हर घर तोड़ रहे हैं. मैं बात कर रहा हूँ सास बहु के सीरियल की. इन के लिए कभी कोई आगे नहीं आया. मैंने इस सीरियल में युसूफ़ हुसैन को देखा उन्होंने इसमें अपनी ज़िंदगी के बहुत कड़वे सच अपनी बेटी, बीवी, दामाद और भाई के सामने बोले. बाद में एक टीवी पर मैंने उनके दामाद का इंटरव्यू देखा तो उनके दामाद बोल रहे थे की युसूफ जी का सच बोलने से मन हल्का हो गया है और क्योंकि उन्होंने सच बड़ी ईमानदारी से बोला तो उस सच को बड़ी हिम्मत स्वीकार करने के कारण हम सब घर वालों के दिल के वो और क़रीब आ गए हैं. हमारे बीच प्यार और बढ गया है. अब ऐसे में ये नेता क्या कहेंगे. नेताओ को डर ये सता रहा है कि कहीं इस सीरियल वाले उन्हें न पकड़ ले अगर देश के नेताओं को ऐसा सामना करना पद गया तो पैंट तो ठीक उनकी चड्डी उतर जाएगी. सास बहु के सीरियल उन्हें ऐसा कोई नुक़सान नहीं पहुँचाने वाले. और रही बात श्लील और अश्लील की तो आज की फ़िल्मे कितनी श्लील और अश्लील हैं-ये सभी जानते हैं. फिर भी वो सेंसर पास कर देता है. रोज़ अख़बार में हीरोइन के कैसे-कैसे फोटो छपते हैं सब को दिखता है इन पर कोई अंकुश लगाने की कोशिश नहीं करता. और जहाँ तक मैं बात करूं संदेश की तो इस सीरियल से कम से कम हर व्यक्ति के दिल में एक ख़ौफ़ ज़रूर पैदा होता है कि कहीं ऐसा न हो मुझे ऐसी हॉट सीट पर बैठना पड़ जाए. अगर ऐसी दहशत ही लोगों के मन मैं आ गई तो लोग कम से कम ग़लत काम करने के पहले सोचेंगे ज़रूर. अगर लोग कहते हैं स्वर्ग और नरक कर्मो से मिलता है तो हम महसूस कर सकते हैं की जब हमे स्वर्ग या नरक जाने के लिए कर्मो का हिसाब देना पड़ेगा तो वो सीट कुछ ऐसी ही होगी.

  • 14. 22:39 IST, 23 जुलाई 2009 Purushottam Parihar, d-37,bapunagar, jaipur:

    मीडिया को कुछ नैतिक मापदंड अपनाने पड़ेंगे. यह नैतिक पुलिस बनने की बात नहीं है बल्कि बच्चों और यहाँ तक कि बड़ों के भी सीखने की बात है. बच्चे आमतौर पर अपने फ़ेवरिट चरित्रों की नक़ल करते हैं और इसमें किसी तर्क की गुंजाइश नहीं होती. आज टीवी का काम केवल पैसा बनाना रह गया है और वह अपनी यह महत्वपूर्ण भूमिका भूल गया है कि कैसे वह सामाजिक उत्थान और नैतिक शिक्षा में अपना योगदान दे सकता है. कई टीवी सीरियल चलते चले जाते हैं, उनका कोई अंत ही नहीं होता. उनमें निकृष्ट कल्पना का इस्तेमाल होता है, महिलाएँ षडयंत्र रचती हैं, कई बार विवाह करती हैं आदि. इसमे समाज के लिए कोई अच्छा संदेश नहीं होता है.

  • 15. 23:08 IST, 23 जुलाई 2009 Pappu Kasai:

    मैं सलमा जी से पूरी तरह सहमत हूँ. मुझे लगता है कि हर चीज़ की एक क़ीमत चुकानी पड़ती है. इस मामले में टूटे दिलों, रिश्तों या विश्वास की क़ीमत पैसा है. जो भी इस शो में हिस्सा ले रहा है वयस्क है और इसकी क़ीमत जानता है. तो हम इसमें क्यों दख़लंदाज़ी करें. अगर हम हर चीज़ पर प्रतिबंध लगाने की ही बात करते रहे तो लोकतंत्र और तानाशाही में क्या फ़र्क़ रह जाएगा. हमें अब परिपक्व हो जाना चाहिए और यह बनावटीपन छोड़ देना चाहिए.

  • 16. 23:52 IST, 23 जुलाई 2009 Brahtsaam:

    बिलकुल सही सलमा जी...क्योंकि आपकी नज़र में बड़े होने का मतलब है कि हम अपने माँ-बाप के सामने खुल कर बोलें कि हम किसी लड़की को किस करने के लिए लेडीज़ टॉयलेट में घुसे...आप जैसे लोग कभी नहीं समझेंगे कि यह धीमा ज़हर हमें कहाँ तक ले जाएगा. आधुनिक होने का मतलब केवल खुली बात या अपनी संस्कृति की धज्जियाँ उड़ान नहीं होता.

  • 17. 00:13 IST, 24 जुलाई 2009 Yogeshwar Sanchihar:

    "यह कार्यक्रम रात साढ़े दस बजे प्रसारित होता है. यह समय बच्चों के सोने का होता है......" पहली बात मैं यह जानना चाहता हूँ कि किस घर में बच्चे रात नौ बजे ही सो जाते हैं?
    "उन्हें परिवारजनों के दिल टूटने या उनको चोट लगने की चिंता नहीं है तो हम आप नैतिक पुलिस की ज़िम्मेदारी क्यों उठाए हैं......." क्योंकि इस तरह के कार्यक्रम हमारे घरों पर भी असर डाल रहे हैं..... इसके अलावा, मैं जानता हूँ कि इसमें भाग लेने वालों को इस सब पर अपराध बोध नहीं होता है लेकिन इससे उन्हें दूसरे घरों का माहौल बिगाड़ने की अनुमति नहीं मिल जाती. यह तो ऐसा ही हुआ कि लोगों को खुलेआम यौन संबंध बनाने की अनुमति दे दो और माँ-बाप से कहो की वे अपने बच्चों की ओर से आँखें मूंद लें. क्या यह पागलपन नहीं है.

  • 18. 02:26 IST, 24 जुलाई 2009 moshahid:

    सलमा जी आपने क्या बात कही है जैसे मेरे मन की बात छीन ली हो. इन नेताओं को कोई मुद्दा नहीं मिलता चर्चा का. विकास की बात तो करेंगे नहीं बस लोगों की आम ज़िंदगी में ख़लल पैदा करेंगे.

  • 19. 02:40 IST, 24 जुलाई 2009 Fauziya Reyaz New Delhi:

    सलमा जी, जहाँ तक बात परिवार के साथ इस शो को न देखने की है वह बेहद हास्यास्पद है. सच का सामना साढ़े दस बजे टेलीकास्ट होता है जिस टाइम पर कभी एक ऐसा सीरियल आता था जिसमें हर कैरेक्टर की कम से कम तीन बार शादी हो चुकी थी और हर किसी की ज़िंदगी में विवाहेतर संबंध चल रहा होता था. इसके अलावा मैं बताना चाहूँगा कि इस शो को न सिर्फ़ मेरा पूरा परिवार साथ बैठकर देखता था जिसमें दो बहिनें, एक भाई और माँ है. बल्कि हमारे मोहल्ले के सभी घरों में यह शो सब साथ बैठ कर देखते हैं. वैसे इस शो के अन्य संस्करण 23 देशों में टेलीकास्ट हो रहे हैं और हर जगह ही इसके फ़ॉर्मैट को लेकर विवाद हुआ है. पर कहीं भी यह मुद्दा संसद में नहीं उठाया गया. अब जानना यह चाहती हूँ कि क्या हमारे पास मुद्दों की, परेशानियों की कमी है जो एक शो का चलना या बंद होना इतना अहम हो गया है.

  • 20. 03:53 IST, 24 जुलाई 2009 ARUN MUDGIL:

    मैं इस शो में कोई समस्या नहीं देखता. जब एक व्यक्ति यह जानता है कि किस तरह के सवाल होंगे और वह तैयार हो कर आता है तो किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए. यह तो आपके ऊपर है कि आप इसे देखें या न देखें. हमें इन लोगों पर गर्व होना चाहिए जो सच बोलने की हिम्मत रखते हैं. और जहाँ तक रिश्ते टूटने की बात है तो यह भी उसी वयक्ति पर निर्भर करता है. मुझे तो यह शो पसंद है.

  • 21. 09:21 IST, 24 जुलाई 2009 Satnam Singh:

    आजकल मीडिया मनोरंजन का साधन कम सेक्स परोसन का साधन ज़्यादा बन गया है. आज अगर हमारी सोच में अंतर है तो वह केवल मीडिया के कारण है. आज से बीस साल पहले हमारे पंजाब में लड़कियाँ सिर पर चुन्नी ओढ़े रहती थीं. पर आज चुन्नी गले में डालने के ही काम आती है या फिर होती ही नहीं है. फ़िल्मों में पहले पक्षियों को चोंच मिलाते दिखाया जाता था या लाइट बंद कर दी जाती पर आज तो इतना कुछ दिखाया जाता है कि अगर किसी का दिल न भी करे तो भी उसका दिल मचल जाता है. हमारे देश में जो दिखता है उसको कोई कुछ नहीं कहता पर कोई ऐसा शब्द बोल दे तो हंगामा हो जाता है. सेंसर फ़िल्मों से सेक्स सीन तो नहीं ख़त्म करता लेकिन ऐसे शब्दों को काट दिया जाता है. ऐसा क्यों होता है.

  • 22. 10:00 IST, 24 जुलाई 2009 Keshav Kaushik:

    सच या झूट से इस कार्यक्रम का कोई लेना देना नहीं है यह तो सिर्फ विज्ञापनों से होने वाली मोटी कमाई के लिए है, जिसके लिए नैतिकता को ताक पर रख दिया गया है | जब यह कमाई कम हो जाएगी तो कार्यक्रम आपने आप ही बंद हो जाएगा |

  • 23. 10:12 IST, 24 जुलाई 2009 Bharat:

    सलमा जी, दलील तो आपकी भी हमें समझ नहीं आ रही है. अगर कार्यक्रम १० बजे के बाद प्रसारित हो रहा है और बच्चो के सोने का टाइम है तो टीवी पर पोर्नोग्राफी भी दिखाई जा सकती है. क्योंकि वो भी मनोरंजन का साधन और जीवन की सच्चाई है. लेकिन सच्चाई ये है की साढ़े दस बजे का शो इस देश में बच्चे बहुत आराम से देखते हैं और देख सकते हैं. शो का टाइम बच्चो को न देखने की गारंटी नहीं हो सकता.
    २. सन्देश और चेतावनी तो सिगरेट के पैकेट पे भी लिखी और दिखाई जाती है तो उससे क्या बच्चो और लोगो ने सिगरेट पीनी छोड़ दी है क्या? आप पश्चिमी देशो को यहाँ किस बिना पे घसीट रही है जबकि वहा और यहाँ के हालत बिलकुल अलग है. यहाँ पर इतने अनपढ़ लोग जो की संस्कृति की वजह से गलत काम करने से बचते है, जब वोही लोग अपने से उच्च स्तर के लोगो को "वेश्यागमन, विवाहोत्तर सम्बन्ध" स्वीकारते हुए देखेंगे तो क्या उन्हें इस राह पर जाने की वजह और बल नहीं मिलेगा? सामाजिक पतन देश के भी पतन का कारन होता है. मैं भी पश्चिम देश में ही रहता हूँ. यहाँ भी नैतिक पतन को रोकने के लिए लोग बहुत चिंतित हैं और काम कर रहे हैं. और जहा तक इन्टरनेट सर्फिंग की बात है तो दुनिया के हर देश में गलत साइट्स को रोकने के लिए काम हो रहे है. भारत में भी लोग इस बात को लेकर सजग हैं. अब अनपढ़ लोग तो इन्टरनेट के बारे में बात नहीं कर पाएंगे न.
    जो भी है आपका लेख बहुत कमजोर सा लगा. कब बड़े होंगे.....

  • 24. 11:09 IST, 24 जुलाई 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    सलमा जी, आपके तर्कों से मैं तो पूरी तरह सहमत हूं. मुझे यह भी लगता है कि हमारी संसद को इस तरह के क्षुद्र मुद्दों पर वक़्त बर्बाद करने की कोई ज़रूरत नहीं है. जो लोग इस तरह के कार्यकर्मों में जाते हैं, वे भी कोई बच्चे नहीं हैं. वे जानते हैं कि उनसे कैसे सवाल पूछे जाएंगे, और उन जवाबों का उनकी निजी और पारिवारिक ज़िन्दगी पर क्या असर होगा. वे लोग कोई भूखे नंगे भी नहीं हैं कि शाम की रोटी के जुगाड़ के लिए इस तरह के कार्यक्रम में सहभागिता कर रहे हैं. तो, उनकी चिंता में तो दुबले होने का कोई मतलब नहीं है. और जहां तक दर्शकों का सवाल है, क्या उनका अपना कोई विवेक नहीं है कि वे क्या देखें और क्या न देखें? अगर उन्हें लगता है कि इस तरह के कार्यक्रम उनके और उनके परिवार के हित में नहीं हैं तो इन्हें न देखें. कोई जबरन तो उन्हें दिखा नहीं रहा है. हमें बड़ा होना चाहिए और इस तरह की बेमानी बहसों में अपना वक़्त बर्बाद करने से बचना

  • 25. 12:02 IST, 24 जुलाई 2009 himmat singh bhati:

    सच का सामना को लेकर संसद में हंगामा क्योंकि इस में अश्लीलता है और परिवार टूटने और रिश्ते ख़त्म होने की संभावना है. यह दलील भी दलील भी दी जा रही है कि ऐसे कार्यक्रम अभिभावकों की मर्ज़ी से ही देखें. यह सही है कि अभिभावकों की मर्ज़ी होती है तभी ऐसे कार्यक्रम बनते हैं और लोग देखते हैं. नहीं तो ऐसे कार्यक्रम बनते ही नहीं. यह सही है कि पश्चिमी देशों में रात को प्रसारित होने वाले कार्यक्रम हमारे लोग भी देखेंगे. यही कारण है कि इनका चलन है. हमें अपने बच्चों को बचाना है तो घरों में कंप्यूटर क्यों लगवा रहे हो, क्या पता नहीं है कि कंप्यूटर पर कैसी-कैसी साइट्स हैं. क्यों स्कूलों में यौन शिक्षा की बात की जा रही है. जिन लोगों को हंगामा करने की आदत है उन्हें तो कोई बहाना चाहिए.

  • 26. 14:14 IST, 24 जुलाई 2009 nitin tyagi:

    मीडिया को अपसंस्कृति की पैरोकारी करते लज्जा नहीं आती |यौन चर्चा ही भारत में अश्लील है। अंतरराष्ट्रीय बाजारवाद ने भारतीय संस्कृति को रौंदा है। विदेशी पूंजी के साथ विदेशी जीवन मूल्य और विदेशी सभ्यता भी आई है। समाज का जन्म संयम और व्यवस्था देने के लिए हुआ।आप संस्कृति के विरुद्ध कैसे जा सकती है?

    मीडिया वाले बड़े क्यों नहीं होते |

  • 27. 14:21 IST, 24 जुलाई 2009 Amit Kumar Yadav:

    सलमा जी आपके विचार आधुनिकता के काफी करीब लगते हैं...और आपके विचारों में पश्चिमी समाज की वकालत दिखती है...खैर इसमें कोई बुराई नहीं है...लेकिन इस शो की बात करने से पहले हमें अपने समाज और संस्कृति के बारे में जानना होगा...ये सही है कि हम पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करते हैं...लेकिन ऐसा नहीं है कि अगर हम उसकी अच्छाईयां ग्रहण करते हैं...तो उस समाज की बुराइयों को भी ग्रहण कर लें...ये बात सच है कि इस परिवार से अमेरिका में कई परिवार टूटे हैं... और इसका भारतीय समाज पर पश्चिम से ज्यादा कुप्रभाव पड़ सकता है...क्योंकि हमारे यहां अभी इतना खुलापन नहीं है...हमारा भारतीय समाज इसकी इजाजत नहीं देता...

  • 28. 15:30 IST, 24 जुलाई 2009 ashish:

    मैंने नहीं कहता हूँ कि ये कार्यक्रम बंद कर दिया जाये या जारी रखा जाये लेकिन ये जरूर कहूँगा कि इसे देखने के बाद मुहँ का स्वाद कड़वा हो जाता है|
    सभी बड़े होने पर भी इस कार्यक्रम को नहीं पचा पाते हैं| बच्चे तो सो जायेंगे लेकिन जवान बेटे -बेटी इसे माँ-बाप के साथ नहीं देख सकते हैं(यह सभी परिवारों के लिए सार्वभौमिक नहीं है, कुछ लोग को इसे पचाने में दिक्कत नहीं होगी लेकिन जब हम समाज कि बात करते तो हम ५-१०% कि बात नहीं करते हैं)|
    ऐसे सवाल कि जिसमे जिस्मानी संबंधो कि ज्यादा चर्चा हो क्यूँ पूछे जाते है, सच कई तरह के होते है|
    जिसे जो दिखाना है दिखाए और जिसे जो देखना है वो इसे देख लेकिन आप को बता दूं कि इसका दोबारा प्रसारण भी दिन होता है|
    मैंने इस केवल विनोद काम्बली और सचिन के बारे में जानने के लिए देखा लेकिन देखने के बाद सवालों का चयन सही नहीं लगा|

  • 29. 15:56 IST, 24 जुलाई 2009 shashank:

    हां आप ठीक कह रहे हैं. हम लोगों की नैतिक पुलिस बनने की कोशिश करो. लेकिन मुझे तो बस एक बात का जवाब दे. एक रात, आप टीवी पर वयस्क सामग्री देख रहे हैं और बच्चे भी देख रहे हैं. उस पर क्या प्रभाव होगा?

  • 30. 16:48 IST, 24 जुलाई 2009 Haider:

    सलमा जी असल में आप ज़्यादा लंदन में रही हैं इसलिए आपको हिंदुस्तान के समाज की बात समझ में नहीं आएगी. सच का सामना या कोई भी और प्रोग्राम जो समाज को ग़लत संदेश देता है उसकी हिमायत करना बिल्कुल ठीक नहीं है.

  • 31. 17:59 IST, 24 जुलाई 2009 मोनिका महाजन:

    बिल्कुल सही बात कही आपने। इस तरह किसी कार्यक्रम को विवादों में डालकर उसकी टीआरपी ही बढ़ायी जाती है। बात जहां तक नैतिक और अनैतिक की परिभाषा की है तो इसका निर्धारण हर व्यक्ति अपनी निजी जिंदगी में अपने अनुसार करता है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में नैतिक अनैतिक की परिभाषा हमेशा सामान्य ज्ञान पर आधारित होनी चाहिए। आप भारतीय परिवार की सीमा से वाकिफ है, आप भारतीय संस्कृति में आपत्तिजनक और गैर आपत्तिजनक के वर्गीकरण से वाकिफ है। फिर इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिए कि नैतिक या अनैतिक की चिंता हम करने वाले कौन होते है। आपने बात कही यह प्रोग्राम देर रात में देता है प्रोग्राम में समय समय चेतावनी दी जाती है। क्या सिगरेट, शराब और तंबाकू के पैकेट पर चेतावनी नहीं होती। क्या अश्लील फिल्मों पर चेतावनी नहीं होती, लेकिन बच्चे उसे चोरी छिपे देखते ही है। इसलिए चेतावनी दे देना ही अपने कर्तव्यों से मुक्ति पा लेना भर नहीं है। वह चीज चले ही क्यों जो परिवार के बीच में देखा ना जा सकें। ऐसी बातें जो पारिवारिक जीवन का अंग न हो, उसे मनोरंजन के क्षणों में बैठकर देखना कहां की बुद्धिमानी है। इलाज करने से बेहतर है बीमारी को फैलने नहीं दिया जाये और इस तरह की अपसंस्कृति फैलाने वाले कार्यक्रम का तुरंत विरोध होना चाहिए। सब कुछ चलता है कि तर्ज पर कुछ भी करने के लिए छोड़ देना और इस बात की वकालत करना कि अपने घर में पाबंदी लगाये कहां की बुद्धिमानी है।

  • 32. 08:00 IST, 25 जुलाई 2009 उमेश यादव:

    कहीं ना कहीं तो एक सीमा रेखा खीचना ही पड़ेगी. आप यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकते की लोग वयस्क है और जो चाहे करें. बात यह कि आप समाज के किस तबके से आते हैं; बहुत कुछ इसी से निर्धारित हो जाता है.

  • 33. 14:13 IST, 25 जुलाई 2009 kishore prabhudas pahuja:

    सच का सामना हमारे देश के हिसाब से बहुत ही बेहूदा कार्यक्रम है. मैं तो इसके बारे में सुन कर ही इसे देख नहीं पाया हूँ हम सिर्फ पाश्चात्य संस्कृति की नक़ल करके क्या हासिल करना चाहते हैं?

    मैं यह नहीं कहना चाहता कि ऐसे कार्यक्रम प्रसारित नहीं करने से कोई बुराई समाप्त की जा सकती है.
    किन्तु हमें अपनी संस्कृति को संवारना चाहिए और आने वाली पीढी को संस्कृति की धरोहर संभाल कर देनी चाहिए.

    आज हमारी मानसिकता सिर्फ पैसा हो गयी है. हम पैसे के लिए सब कुछ भूलना चाहते है.

    हम कितनी भी पश्चिम की नक़ल कर ले अंत में हमारी पुरानी चीजें ही काम आएँगी .

    आज से पंद्रह बीस साल पहले योग अभ्यास करने वाले पर लोग हंसते थे अब वही जब पश्चिम से योगा बनके वापस आया है तो बड़ा अच्छा लगता है

    हम कब पश्चिम का अन्धानुकरण छोड़ेंगे?

  • 34. 00:54 IST, 26 जुलाई 2009 Idrees A. Khan, Riyadh, Saudi Arabia:

    सलमा जी एक कहावत है कि दुनिया मे जब तक बेवक़ूफ़ ज़िन्दा हैं चालाक लोगों की रोज़ी रोटी मज़े से चलती रहेगी. चालाक लोग वो हैं जो रियेल्टी शो के नाम पर लिखी लिखाई स्क्रिप्ट पर जजों की आपस मे लड़ाई करवाते हैं, ख़बरों के नाम पर एक जोकर को कैमरे के सामने खड़ा कर देते हैं जो शब्दों को चबा चबा कर इंच भर की रस्सी को 10 गज़ का सांप दिखाने की कोशिश करता है.

    और बेवकूफ़ वो हैं जो बग़ल मे टिफ़िन दबाए ट्रेन मे बस मे ऑफ़िस और स्कूलों मे बीती रात दो जजों के बीच हुई लड़ाई को किसी नेशनल इश्यू की तरह डिस्कस करते हैं, बहस करते है.

    यहां आपकी एक बात से मैं 100% सहमत हूं कि ऐसे प्रोग्रामों पर हो हल्ला करने से इनकी टीआरपी मे इज़ाफ़ा ही होता है और कुछ नही, देखिये संसद मे हंगामे वाली ख़बर के बाद भी मैने इस प्रोग्राम को नही देखा, लेकिन जब आपने उस हंगामे पर ये ब्लाग लिखा तो मुझे लगा देखना चाहिये कि ऐसा क्या है इस प्रोग्राम में. और अब मैं उस प्रोग्राम पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा हूं यानी देखा जाए तो हम सब वो ही कर रहे हैं जो इस प्रोग्राम के निर्माता और चैनल के मालिक चाहते हैं, ये वो चेन रिएक्शन है जिसके रुकने तक एक घटिया प्रोग्राम, फ़िल्म या किताब हिट हो जाती है.

    मैने इंटरनेट पर सबसे पहले मैंने जो एपिसोड देखा था उसके बाद समझ नहीं आ रहा था कि जवाब देने वाले को बहादुर कहूं या बेशर्म, हॉट सीट पर बैठे हुए आदमी की बेटी भी वहीं बैठी है और प्रोग्राम का एंकर सवाल करता है कि क्या आपने कभी अपनी बेटी से भी कम उम्र की लड़की से शारीरिक संबंध बनाए हैं, ये उस प्रोग्राम मे पूछे गए कई वाहियात सवालों मे से एक उदाहरण है.

    मेरा सवाल यहां न तो बच्चों पर पड़ने वाले असर का है, न ही टूटते हुए परिवारों का, मै सिर्फ़ ये सोच रहा हूं कि क्या हम भारतीय दूसरों के बेडरूम में झांकने के इतने शौक़ीन हैं कि एक चैनल लोगों को पैसे देकर हम लोगों के लिये ये सनसनीख़ेज़ मनोरंजन मुहैया करवा रहा है.

  • 35. 12:05 IST, 26 जुलाई 2009 Abdul Salaam:

    हम कब बड़े होंगे. हम तब बड़े होंगे जब हम धोती और खद्दर पहनना बंद कर देंगे.

  • 36. 13:12 IST, 26 जुलाई 2009 madanlal:

    पश्चिम से उधार की अकल लेकर हमें बड़े नहीं होना है. हमें गंवार ही छोड़ दो. क्या पाश्चात्य की मान्यताएँ ही हमें बड़े होने का प्रमाणपत्र देती हैं? वे आपकी संस्कृति को लठ मारते हैं और आप जैसे लोग उनका समर्थन करते हैं. बंद करो ये सब,

  • 37. 06:26 IST, 27 जुलाई 2009 उमेश यादव - न्यूयार्क अमेरिका:

    कहीं ना कहीं तो एक सीमा रेखा खीचना ही पड़ेगा. आप यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकते की लोग वयस्क है और जो चाहे करें. बात यह की आप समाज के किस तबके से आते हैं; बहुत कुछ इसी से निर्धारित हो जाता है.

  • 38. 14:06 IST, 27 जुलाई 2009 kuldeep singh rathour:

    रियैल्टी शो में हमेशा महिला निशाने पर रहती है.

  • 39. 14:42 IST, 27 जुलाई 2009 Abdul Salaam:

    आस्तीन का साँप कौन है कैसे पता हमें
    हमने क्यों ज़िंदगी को तेरे नाम कर दिया
    चीरा जो आस्तीन को सच का सामना हुआ
    वाह क्या कि ज़िंदगी को यूँ बदनाम कर दिया
    शोहरत तो अब मिली भले बदनाम हम हुए
    अगले इलेक्शनों में टिकट का काम कर दिया

  • 40. 18:41 IST, 27 जुलाई 2009 अभिनव कुमार :

    सलमा जी, बेशक आपकी कही गयी बातें सही हैं लेकिन सच कहने और कपडे उतार के खड़े हो जाने में बहुत अंतर होता है, रियलिटी टीवी के नाम पे जो कुछ हो रहा है वो सिर्फ चन्द बिकाऊ चमकीली पन्नी में लपेटी गयी सस्ती चीज़ों के अलावा कुछ नहीं है, जिसका सच से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है.

  • 41. 10:47 IST, 28 जुलाई 2009 shabbir malik:

    यह कार्यक्रम एकदम बढ़िया है इसमें हिंदुस्तान की संसद को आमंत्रित करना चाहिए. एक ज़िंदादिल प्रोग्राम है. इसमें सच के अलावा कुछ नहीं बोलना है.

  • 42. 11:13 IST, 28 जुलाई 2009 raza husain:

    सलमा जी, मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि इस कार्यक्रम पर इतना बवाल क्यों हो रहा है. समाज के ठेकेदारों ने कभी सोचा है कि जहाँ बच्चे की उम्र 10 साल तक भी नहीं पहुँचने पाती माँ-बाप कंप्यूटर दिला देते हैं. इंटरनेट पर बच्चा क्या गुल खिला रहा है किसी को नहीं पता. आज छोटे-छोटे बच्चे नेट पर गंदी साइट देख रहे हैं, घर पर सीडी प्लेयर पर ब्लू फ़िल्में देख रहे हैं, पूरा माहौल गंदा है. इसकी किसी को चिंता नहीं है. बच्चे देश के भविष्य होते हैं. सिर्फ़ किसी प्रोग्राम को लेकर इतना बवाल मचाना सही नहीं है. पहले हमें अपने घर और आसपास का माहौल दुरुस्त करना होगा. मेरा मशविरा है कि सच का सामना में नेताओं को आना चाहिए. आख़िर देश के लोगों को उनकी भी सच्चाई जानने का हक़ है. समाचार चैनेलों पर ब्रेक में कैसे गंदे-गंदे विज्ञापन आते हैं क्या वे परिवार के साथ देखने लायक़ हैं? क्या इनको कोई रोकने वाला है?

  • 43. 10:58 IST, 29 जुलाई 2009 Chander Bishnoi:

    यह बहुत ही घृणास्पद बात है कि एक इंसान पैसे के लिए अपनी निजता को इस प्रकार सार्वजनिक कर सकता है. वह पैसे की ख़ातिर अपने संबंधियों और मित्रों तक की परवाह नहीं करता.

  • 44. 11:48 IST, 29 जुलाई 2009 AVINASH CHANDRA:

    हर किसी की ज़िंदगी में एक अच्छा और एक बुरा पक्ष होता है. वैसी सोच जो परिवार को तोड़ती है उसे सच का सामना करने का क्या मतलब. और इसके लिए कोई पैसा बनाता है तो इससे ज़्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है. आप पैसे कमाने के लिए किसी से ज़बरदस्ती सच क़बूल करवाएँगे? और ऐसे लोग जो एक करोड़ रुपये पाने के लिए अपने परिवार और रिश्तों को बलि चढ़ा देते हैं, समझ में नहीं आता कि वे किस तरह के लोग हैं. मतलब वे पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

  • 45. 17:48 IST, 29 जुलाई 2009 manu rastogi:

    यह दुनिया को समझाना मतलब भैंस के आगे बीन बजाना है. यह नेता डरते हैं इस तरह के कार्यक्रमों से कि कहीँ उनको न पड़ जाए. तो उनकी पोल खुल जाएगी. इसलिए वे इसको बंद कराने की सोच रहे हैं. मुझे तो इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती. सच का सामना करने के बजाय उस से भाग रहे हैं, बस.

  • 46. 21:09 IST, 31 जुलाई 2009 Mohd Ali Zaidi, Bahuwa:

    सलमा जी खूबसूरत ब्लॉग लिखने के लिए आपका शुक्रिया. आज बस हर तरफ टीआरपी के लिए दौड़ चल रही है. कोई भी इस पर ग़ौर नहीं कर रहा है. टेलीविज़न प्रोग्राम हमारी नई पीढ़ी को कहाँ लेकर जा रहे हैं. ज़रूरत है कि एक लाइन खींची जाये, जिसे लांघने का हक किसी को न हो वरना हमारी संस्कृति तबाह हो जाएगी.

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