'इंडिया ग्रेट है और भारत महान'
फ़ेसबुक की एक बिरादरी में शामिल होने का न्यौता आया है, तक़रीबन एक हज़ार मेंबरों वाली बिरादरी का नाम है- 'इंडिया इज़ नॉट ए थर्ड वर्ल्ड कंट्री यू मैड्स'. इस फ़ेसबुक ग्रुप के मॉडरेटर चाहते हैं कि एक ग्लोबल अभियान चलाकर दुनिया को बताया जाए कि इंडिया एक पिछड़ा देश नहीं है.
इंडिया भला पिछड़ा देश कैसे हो सकता है, उसके उपग्रह अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे हैं, उसके पास परमाणु बम है, उसके सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के दम पर सिलकॉन वैली की चमक है, उसके डॉक्टरों के बिना यूरोप-अमरीका में लोग बेमौत मर जाएँ...
फ़ेसबुक ग्रुप का कहना है कि जो सहमत नहीं हैं वे अपने विचार अपने पास रखें और उन लोगों की ख़ुशी में ख़लल न डालें जो इंडिया की तरक़्क़ी का जश्न मनाना चाहते हैं. इस ग्रुप के मॉडरेटर चाहते हैं कि इंडिया को 'थर्ड वर्ल्ड' की सूची से हटाया जाए, दुनिया आख़िर और कितने सबूत चाहती है इंडिया की कामयाबी को लेकर.
इस ग्रुप के ज़्यादातर मेंबरों की उम्र 20 के साल के क़रीब है और वे 'इंडिया इज़ ग्रेट', 'नेक्स्ट सुपरपावर', 'आइ लव माइ ग्रेट इंडिया', 'अमेज़िंग इंडिया'....जैसे दूसरे ग्रुप्स के भी सदस्य हैं.
जिस तरह के जोश-जुनून और जज़्बे के साथ वे इंडिया को फ़र्स्ट वर्ल्ड में तत्काल कोटे से रिज़र्वेशन दिलाना चाहते हैं वह काफ़ी दिलचस्प है, वे इस बात को लेकर बहुत परेशान हैं कि भारत को यूएन सिक्यूरिटी काउंसिल की स्थायी सदस्यता क्यों नहीं मिल रही है या एच1बी वीज़ा को लेकर अमरीकी इतना भाव क्यों खा रहे हैं.
अपनी तरफ़ से ज़ोरदार रिसर्च करके इन लोगों ने साबित किया है कि इंडिया थर्ड वर्ल्ड कंट्री नहीं है, कई तरह के आंकड़े हैं जैसे इंडिया की ग्रोथ रेट, इंडिया की साइंटिफ़िक एंड एजुकेशनल सक्सेस, इंडिया के लोगों की दुनिया भर में शानदार परफॉर्मेंस, सबीर भाटिया, इंदिया नूई और विक्रम पंडित जैसे नामों की सूची....
मैं काफ़ी देर तक पसोपेश में रहा कि इस ग्रुप की सदस्यता की पेशकश करने वाले अपने मित्र से क्या कहा जाए, ग़रीबी-बेरोज़गारी, भुखमरी, पीने के पानी की कमी, स्कूल-अस्पतालों की बदहाली सब ख़त्म हो गए हैं क्या?
ख़ास वक़्त बर्बाद करने के बाद ख़याल आया कि वे इंडिया की बात कर रहे हैं और मैं भारत के बारे में सोच रहा हूँ. ये तो बिल्कुल ही दूसरी बहस है, इसमें किसे शक है कि इंडिया ग्रेट है और मेरा भारत महान है.

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राजेश जी नमस्ते !!
लेख में मैं आप के पसोपेश को तभी समझ गया था जब आप ने कहा ऐसे लोग "इंडिया को फ़र्स्ट वर्ल्ड में तत्काल कोटे से रिज़र्वेशन दिलाना चाहते हैं". बात आ गयी न "रिज़र्वेशन" की, योग्यता के बिना ही लोग भारत को फ़र्स्ट वर्ल्ड में ले जाना चाहते हैं. मैं मानता हूँ ऐसे लोग भारत के बारे में बहुत ज्यादा नहीं जानते हैं. ऐसे लोग ईमेल करने वाली इंडिया, ब्लोगिंग करने वाली इंडिया, नॉएडा, गुडगाँव, बंगलोर के कॉलसेंटर और सॉफ्टवेर कंपनी वाली इंडिया की बात कर रहे हैं. मेरा मानना है, इस तरीके के ग्रुप और लोग "भारत " के अथार्थ से बहुत दूर हैं. ये लोग उस भारत को भूल गए हैं जहाँ अज भी आधार-भूत सुविधाएँ नहीं है और जहाँ लाखों का शोषण होता है और सरकार कुछ नहीं करती. भारत तरक्की कर रहा है इसका जश्न जरूर होना चाहिए लकिन यथार्थ से परे नहीं.
मैं मूलतः भारत में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले का हूँ और अभी न्यूयार्क में रहता हूँ. लेकिन मेरे गाँव और आस-पास के कई गाँवों में अभी भी बिजली नहीं पहुँची है और जहां तार बिछ गए हैं वहां बिजली दिखावे के लिए ही आती है.
आपने बिलकुल सही फ़रमाया. इंडिया और भारत में जमीन आसमान का फर्क है. इंडिया वो है जो ये फेसबुक वाले बोल रहे है, इंडिया वो है जहाँ के सॉफ्टवेर इंजिनियर दुनिया में धूम मचा रहे है, जहाँ के IIT और IIM के लोग अमेरिका की बड़ी बड़ी कंपनियां चला रहे है. भारत वो है जहाँ आज बलात्कार की क्या कीमत है इस पर नौटंकी हो रही है, अपराधियों, बलात्कारियों , गुंडों, हत्यारों को सजा मिले या न मिले लेकिन केवल भाषण में किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ कुछ कह देने वालो को उनके जबान से निकले प्रत्येक शब्द के लिए सजा देने में पुरे सरकारी तंत्र का दुरूपयोग किया जा रहा है. अस्पताल में दवाई के बिना चाहे कोई मर जाए लेकिन दलित के नाम पर मूर्ति की माया कही से भी कम न होने पाए. फर्क सिर्फ इतना है कि काली अंधियारी रात है और दूसरा सुबह का चढ़ता सूरज.
बहुत अच्छा लेख है. मुझे पढ़ कर बहुत ख़ुशी हुई.
आपके विचार पढ़ कर मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि चलो कोई तो है जो भारत और इंडिया में फ़र्क़ समझता है. मुझे हैरानी होती है जब हमारे लोग और मीडिया आज़ादी की बधाई 'हैप्पी इंडिपेंडेंस डे' के रूप में देते हैं. ग़ुलामी की भाषा में आज़ादी की बधाई. भारत में जहाँ हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाएँ बोलने वाले अनपढ़, गंवार, जाहिल, असभ्य का ठप्पा लगाए घूमते हैं...पुलिस सरकारी अधिकारी, न्यायिक व्यवस्था और नेता जिन्हें नोच रहे हैं...ख़ून का हर क़तरा नोचने के लिए तैयार बैठे हैं.
वहीं इंडिया में इंगलिश मीडियम स्कूलों में पढ़े-लिखे, प्रायवेट कॉलेज में मोटी-मोटी फ़ीस भर कर डॉक्टर, इंजीनियर बने लोग जिनकी मातृभाषा अंग्रेज़ी और मातृभूमि अमरीका तथा अन्य पश्चिमी देश हैं, एसी कमरों में रहने वाले, हर सुविधा से संपन्न ये लोग हैं जिन के दम पर हमारी सरकार इंडिया को दुनिया में विकसित देशों को चुनौती देते शाइनिंग इंडिया के रूप में खड़ा करता है. सच्चाई यह है कि इंडिया जगमगा रहा है और भारत को दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
राजेश जी आपका लेख अच्छा लगा लेकिन आज ये तो मानना पड़ेगा कि इंडिया पहले जैसा नहीं रहा, भारत ने अपना परचम विदेशों में भी लहराया है. जो लोग इस बात पर खुश हैं ये उनकी पॉजिटिव सोच है, वैसे नेगेटिव नज़रिए से देखने पर अमरीका, इंग्लैंड, चीन से लेकर दूसरे सभी देशों में भी कुछ न कुछ मिल जाएगा. भ्रष्टाचार, हिंसा, भूख, बेरोज़गारी वगैरह इंडिया के लिए नई बात नहीं है. रही बात भारत की तो मैं आपको बता दूँ कि भारत विश्व का गुरू रहा है और आगे भी रहेगा. एक गाने की चंद लाइनें याद आ रही हैं- सुनो गौर से दुनियावालों, बुरी नज़र न हमपे डालो, चाहे जितना जोर लगा लो, सबसे आगे होंगे हिंदुस्तानी.
राजेश जी शानदार लिखा है. हकीकत यही है कि इंडिया और भारत में रात और दिन का फर्क है. जिस देश में समलैंगिकों को सही ठहराया जाता है, महिलाओं की बलात्कार की कीमत लगाई जाती है, शादी के नाम पर औरत को ज़लील किया जाता है कि उसे अपना कौमार्य साबित करना होगा, जिस देश की जनता भूखी और नंगी सोती है, फिर भी कहते हैं कि हमारा इंडिया ग्रेट है.
देखिए हम जैसा सोचते हैं चीज़ें वैसी ही हो जाती हैं. अंगेरज़ों की नीति थी कि भारत के मूल्यों और संस्कृति के प्रति हीन भावना पैदा कर दो और फिर आराम से राज करो. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत. हम हार गए, हमने मान लिया कि उनका सब कुछ अच्छा है और हमारा सब कुछ बेकार. गांधी जी ने इस बात को समझा और असहयोग आंदोलन चलाया और सफलता प्राप्त की. जो ये कह रहे हैं कि भारत पिछड़ा हुआ है वो मन से हारे हुए लोग हैं. इतिहास उठाकर देखिए 1825 तक भारत संसार के जीडीपी में 20 प्रतिशत का योगदान देता था, ये बात तो स्कूलों की किसी किताब में बताई भी नहीं जाती. समय खराब आया और हम लोग गरीब हो गए लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि हम गरीब ही रहेंगे. जो लोग अपराध की बात कर रहे हैं वो बताएँ कि क्या अमरीका या दूसरे विकसित देशॉं में क्राइम नहीं है. क्या वहाँ गरीबी नहीं है, समस्याएँ नहीं है. हमें अच्छी चीज़ों पर गर्व करना चाहिए और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए. उमेश जी, मेरे गाँव में बिजली भी है और खंभे भी, बिजली 24 घंटे आती है लेकिन बिल सिर्फ़ 30 प्रतिशत लोग भरते हैं. अब बताइए कि भारत या इंडिया इसमें क्या करे. इतना भी बुरा नहीं है मेरा भारत.
आज हमारे मुल्क में ऐसे कई नौजवान हैं जो इंडिया को नंबर वन साबित करने की लड़ाई में जी जान से लगे हुए हैं लेकिन ये लड़ाई इंटरनेट की कुछ साइटों के बाद ख़त्म हो जाती है. इंडिया से जुड़ी कई गलत सलत जानकारियाँ इंटरनेट पर मिलती हैं. इंतज़ार उस दिन का है जब हमारी नौजवान पीढ़ी इंटरनेट पर अपने देश की बड़ाई करने और दूसरों को गालियाँ देने के बदले कुछ ठोस काम करने का प्रयास करेंगी.
मैंने कहीं पढ़ा है कि कानपुर से बंगलौर के बीच एक विभाजन रेखा है जो देश को दो हिस्सों में बाँटती है, भारत और इंडिया. भारत का पूर्वी क्षेत्र सोने की चिड़िया था और है, जहाँ कोयला, लोहा, बॉक्साइट, ऊपजाउ ज़मीन है जबकि पश्चिम भारत में रेगिस्तान और कच्छ का रण है लेकिन विडंबना है कि वहाँ रहने वाले अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं और ठाकरे-मोदी जैसे लोग पूर्वी भारत को थर्ड वर्ल्ड समझते हैं.
इन लोगों की भावनाओं को सलाम, अगर थोड़ी देर के लिये विज्ञान को भूल जाएं तो पता चलता है कि भावनाएं दिमाग़ से कम और दिल से ज़्यादा संचालित होती हैं, इसलिये सचमुच किसी को ये हक़ नही है जो इनकी खुशी मे ख़लल डाले, लेकिन ये लोग बिलकुल उस शुतुरमुर्ग़ की तरह हैं जो रेत मे अपना सर घुसेड़ कर सोचता है की सब कुशल मंगल है. ये लोग उस ग्रुप से ताल्लुक़ रखते हैं जो किसी बड़ी पश्चिमी शख्सियत के मुंबई आने पर धारावी को होर्डिंग बोर्ड से ढांक देना बेहतर समझते हैं. इनमे से कई ने तो धारावी को पेहली बार शायद उस अंग्रेज़ डेनी बॉयल की फिल्म "स्लमडॉग मिलियनेयर" मे ही देखा होगा.
अपने अपने दिमाग़ की बात होती है, इन लोगों की ज़ोरदार रिसर्च ही ये साबित करती है कि इंडिया को फ़र्स्ट वर्ल्ड कंट्री बनने मे अब भी वक़्त है.
इंडिया के सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के दम पर सिलकॉन वैली की चमक है, क्यूंकि उन इंजीनियर्स को पता है कि इंडिया मे उन्हें वो नही मिल सकता जो अमरीका मे मिल रहा है. इंडिया के डॉक्टरों के बिना यूरोप-अमरीका में लोग बेमौत मर जाएँ, और यहां इंडिया मे पेहले से ही हज़ारों लोग डॉक्टर और दवाओं के अभाव से मर रहे हैं.
फ़र्स्ट वर्ल्ड कंट्रीस में थर्ड वर्ल्ड कंट्रीस के योग्य लोगों को न्योता दे देकर नौकरियां बांटी जाती हैं, और इंडिया मे नौकरी पाने की सबसे बड़ी योग्यता उम्मीदवार की जाति होती है.
अगर इस तरह के पैमाने फ़र्स्ट वर्ल्ड कंट्रीस मे भी होते तो इंडिया के इन प्रोफ़ेशनल्स को उन देशों मे अपनी परफ़र्मेंस दिखाने का मौक़ा कभी नही मिलता.
इंडिया जिस दिन फ़र्स्ट वर्ल्ड कंट्री बन जाएगा उस दिन इन लोगो को कोई ग्लोबल अभियान छेड़ने ज़रूरत नही पड़ेगी, और न ही इनके पास ऐसे किसी अभियान के लिये फ़ुर्सत होगी.
किसी देश या व्यक्ति के महान होने की सबसे बड़ी दलील ये होती है कि दूसरे यहां तक की उसके शत्रु भी उसकी महानता को स्वीकार करते हैं. अपने मुंह मिया मिट्ठू होना कोई अक़्लमंदी की बात नही है.
अभियान चलाना है तो इंडिया को फ़र्स्ट वर्ल्ड कंट्री बनाने का चलाओ न कि सिर्फ़ मनवाने का.
राजेश जी, बुराइयों के मातम और अच्छाइयों की खुशी में तो अंतर होता ही है. बेशक भूख है, गरीबी है, भ्रष्टाचार है लेकिन हमारे यहाँ भी कुछ अच्छाइयाँ हैं. नैतिक मूल्यों का पतन तो विश्वव्यापी है. भारत की बुराइयों को मिटाने के लि युवा आगे आ रहे हैं लेकिन अगर कुछ लोग अच्छाइयों की खुशी मना रहे हैं तो उसमे बुरा क्या है?
बहुत अच्छा लिखा है आपने, आपकी लेखनी और विचार दोनों प्रशंसनीय हैं और इससे असहमत होने का सवाल ही नहीं होता है.
राजेश जी आपकी राय और विचार से पूरी तरह से सहमत हूँ.
राजेश जी नमस्ते !!
ख़ास वक़्त बर्बाद करने के बाद ख़याल आया कि वे इंडिया की बात कर रहे हैं? आपकी आलोचना बिल्कुल सही है. पागलों की तरह पश्चिमी दुनिया का पीछा कर रही नई पीढ़ी को यह समझने की ज़रूरत है, कि जबतक ग़रीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, पीने के पानी की कमी, स्कूल-अस्पतालों की बदहाली मौजूद है, इंडिया को फ़र्स्ट वर्ल्ड में गिनना व्यर्थ हैं.
मैं बस यह कहना चाहता हूँ कि भारत तीसरी दुनिया का देश नहीं है, लेकिन पहली दुनिया का भी नहीं है. हमें भ्रष्टाचार मिटाने, बिजली की कमी दूर करने, बेरोज़गारी और ग़रीबी के उन्मूलन पर ध्यान देना चाहिए. तब हमें ऐसे अभियान चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.
हमारे पास दुनिया को दिखाने के लिए बहुत कुछ है जिससे साबित होता है कि भारत एक महान देश है लेकिन नेताओं ने देश की हालत बिगाड़ रखी है. अब समय बदलने वाला है दुनिया को मानना ही होगा कि भारत नंबर वन देश है. भारत आईटी में नंबर वन है, इतने अच्छे डॉक्टर हैं, इतने इंजीनियर हैं, इतनी महान संस्कृति है, मेरा भारत महान है.
मेरे दिल में आया कि जोश में आ कर पोस्ट कर दूँ कि मैं इससे समहत हूँ. पर तभी लाइट चली गई. इंटरनेट बंद हो गया. लाइट किसी इमरजेंसी की वजह से नहीं बल्कि लोड शेडिंग की वजह से गई थी. इस अंधेरे में मेरे विचार बदल रहे हैं-लाइट आने पर देखता हूँ कि सहमत होता हूँ या नहीं.
सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है, आज हमने तरक्की कर ली है तो क्या सबकी तरक्की हो गई है. हमें अपनी तरक्की में सबकी भागीदारी देनी होगी, हम बढ़ें सब बढ़ें ऐसी भावना होनी चाहिए. पश्चिमी देशों की नकल करके हम अपनी पहचान खो रहे हैं, हम इंडियन हो गए हैं, भारतीय नहीं. अभी बहुत कुछ होना बाकी है तब जाकर भारत विकसित देश की श्रेणी में आएगा.
बहुत खूब, आपका ब्लाग पढ़कर रफ़ी साहब का गाना याद आ रहा है, जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं. एक बार पूरा गाना सुन लीजिए तो इंडियन और भारत का अंतर पता चल जाएगा.
आप ने सही फरमाया. वो लोग आंखे बंद करके सपना देख रहे है....... आंखे खुल जाये तो यह पढ लें....शायद ऐसी न्यूज़ हेडलाइन्स UK, USA में पढने को मिले ना मिले.
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राजेश जी,आपने इंडिया और भारत के अन्तर को जिस तरह कम -से कम वाक़्यो मे फ़ेसबुक के एक उस तबके को समझाया की इंडिया और भारत मे अभी ज़मीन और आसमान का अन्तर है.वो बहुत ही लाजबाब है .वो तबका जो सिर्फ़ इंडिया के बारे में जनता है . जिसे भारत के बारे मे समझ ही नही है. उन एक हज़ार लोगो को सिर्फ़ इंडिया के एक फीसदी लोगो की तरक्की नज़र आती है. बाकी 99 प्रतिशत लोगो की बदहाली नज़र नही आती .उन्हे भारत की भुखमरी, ग़रीबी, भूख से होती मौते , बलात्कार की शिकार महिलाए नही नज़र आती है क्या ?वो लोग जिस प्रकार का जीवन जी रहे है .वही जीवन उन्हे भारत के इंडिया मे नज़र आता है .उन लोगो का संगठन जिनकी उम्र अभी बीस वर्ष से भी कम है, वे लोग भारत मे इंडिया को ही देखेगे ना की भारत को भारत मे .कुछ मुट्ठी भर लोग भारत की तरक्की को नही निर्धारित कर सकते.
अगर हमें फर्स्ट वर्ल्ड और थर्ड वर्ल्ड का डिफ़िनेशन मिल जाए तो फेसबुक वालों और राजेश जी दोनों का काम आसान हो जाएगा. लेकिन क्या हमें इस तरह के विचार मंथन से अमृत मिलेगा या ज़हर यही तो पते की बात है. हमें गरीबी के खिलाफ़ लड़ाई लड़नी चाहिए, अगर भारत के सभी लोगों को दो वक़्त का खाना, तन पर कपड़ा और सिर के ऊपर छत मिल जाए तो हमारा भारत अपने आप नंबर वन बन जाएगा.
राजेश जी, इंडिया एक पूर्ण विकसित समुदाय है इसमें कोई शक़ नहीं है। गौर करें इंडिया को मैंने समुदाय कहा जिसे भारत की भौगोलिक सीमा में बांधना उतनी ही बड़ी भूल होगी जितना उसे विकसित ना मानना। तकलीफ तो भारत को लेकर है जो अभी भी विकास की दौड़ में सदियों पीछे चल रहा रहा है। उससे भी बड़ी तकलीफ इस बात की है कि किसी भी इंडियन को उसकी फिक्र करता नहीं देख पाता हूं। और तब आघात लगता है जब कोई भारतीय किसी तरह ऐड़ियां घिसकर इंडियन तो बन जाता है मगर जल्दी ही भारत के खाते से अपना नाम कटाने की फिराक में लग जाता है।
राजेश जी आपका लेख बहुत पसंद आया. भारत और इंडिया एक ही सिक्के के दो पहलू हैं लेकिन वे एक दूसरे को नहीं देख सकते. भारत असली चेहरा और इंडिया एक मुखौटा है. भारत में अब भी पच्चीस प्रतिशत आबादी को एक वक़्त का खाना मुश्किल से मिलता है. मैं उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले के एक छोटे से गाँव से आता हूँ और अब अमरीका में अटलांटा में रहता हूँ. मैं उमेश जी से पूरी तरह सहमत हूँ कि जो लोग इंडिया शाइनिंग की बात कर रहे हैं वे भारत को नहीं जानते हैं, वे सब समृद्ध परिवारों से आते हैं और उनकी मुलाक़ात अपने जैसी पृष्ठभूमि वाले लोगों से होती है तो उन्हें लगता है कि उनके आसपास के सारे लोग तरक्की कर रहे हैं इसलिए पूरा देश तरक्की कर रहा है लेकिन यह सच नहीं है. गरीब लोग तो दिल्ली, मुबंई, बैंगलोर में भी हैं लेकिन जब भारत की प्रगति की बात होती है तो इन लोगों को भूल जाते हैं मानो वे देश का हिस्सा ही नहीं हैं क्योंकि वे इंडिया का हिस्सा नहीं है, वे भारतवासी हैं. हमें भारत के बारे में सोचना होगा तभी देश का सच्चा विकास हो सकता है. हमें भारतीय लोगों की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए, मुझे बहुत अच्छा लगता है कि एक भारतीय ने हॉटमेल शुरू किया, एक भारतीय मूल की महिला पेप्सी की सीईओ है लेकिन हमें भारत को नहीं भूलना चाहिए. जिस तरह इंडिया शाइनिंग नहीं, भारत शाइनिंग होगा उस दिन हमारा देश सुपर पावर होगा.
आपका चेहरा और आपकी फ्रेंच कट दाढ़ी देखकर तो यही लग रहा है कि आप भी इंडिया वाले हैं, भारत वाले नहीं.
भाषा या समृद्धि को देश के नागरिकों के बीच मत लाइए. मैं हरियाणा एक गरीब व्यक्ति हूँ, ये मत समझिए कि मैं अमीरों का तरफ़दार हूँ. लेकिन मैंने बहुत सारे अमीर लोगों को देखा है जो देश के लिए सचमुच कुछ करना चाहते हैं. मैं युवाओं से कहना चाहता हूँ कि सिर्फ़ बात करने से काम नहीं चलेगा देश के लिए कुछ ठोस करना होगा. आप क्या और कैसे कर सकते हैं? पिछले दिनों आपने हिलेरी क्लिंटन और आमिर ख़ान की चर्चा देखी थी शिक्षा के बारे में. यही समय है अपने लक्ष्य तय करने का. भारत के नौजवानों आगे बढ़ो तुम्ही भारत को बदल सकते हो. भारत को आपकी ज़रूरत है.
जय हिंद
राजेश जी, इंडिया और भारत दोनों ही जीतेंगे जी ...इसमें कोई शक़ नहीं है।
आपका लेख पढ़कर अच्छा लगा आपने भारत और इंडिया का अंतर अच्छी तरह से समझाया है. लेकिन आप भी एक भूल कर रहे हैं जो इंडियंस कर रहे हैं, जब आप इंडियन बनकर भारत के बारे में सोचते हैं और भारतीय बनकर इंडिया के बारे में सोचते हैं तो ठीक है लेकिन जैसे ही आप इंडियन बनकर इंडिया के बारे में सोचते हैं, या भारतीय बनकर भारत के बारे में तो यहीं से गड़बड़ शुरू हो जाती है. देश एक है आप उसे इंडिया और भारत में कैसे बाँट सकते हैं. ऐसा नहीं हो सकता कि जहाँ विकास हो गया है उसे रोककर सारा ध्यान पिछड़े हुए पर दिया जाए, हाँ ये ज़रूर है कि विकसित हिस्सों के साथ अविकसित पर भी ध्यान दिया जाए तभी इंडिया और भारत एक होगा.
Umesh Bankaria
लेख अच्छा है, आज के दौर में ये बहुत जरूरी हो गया है कि अपनी आवाज़ कोई भी संचार माध्यमों के ज़रिए दुनिया तक पहुँचाई जाए. मगर जो इंडियन लोग हैं उन्हें अपने भारतीय भाइयों पर भी ध्यान देना होगा ताकि ये अंतर कम हो सके. तभी भारत/इंडिया को विश्व उसका सही स्थान मिल सकेगा. ये स्थान न तो इंडिया दिला सकता है और न सिर्फ़ भारत, दोनों मिलकर ही ये काम कर सकते हैं.
राजेश जी बिलकुल सही आर्टिकल पेश किया है, मैं एक बात फिर से कोट करना चाहूँगा जैसा की आपने लिखा है, "इस ग्रुप के ज़्यादातर मेंबरों की उम्र 20 के साल के क़रीब है", बस यही कारण है इनका इस तरह के ग्रुप बनाने का. असल में इनमे अभी पूरी तरह से विवेक का विकास नहीं हुआ है की सही गलत क्या है, ये वही किशोर हैं जो डी.जे. (रंग दे बसंती) की सब जवानी वाली हुलड़बजियों का खुले दिल से स्वागत करते हैं,लेकिन माइकल मुखर्जी (युवा) की तरह के संघर्ष और साहस के जरिये राजनीती में प्रवेश करते हुए समाज को सुधारने हिम्मत नहीं जुटा सकते. कंप्यूटर पर बैठकर ओर्कुटिंग या सोशल नेट्वर्किंग करने से ही देश का विकास नहीं हो जाता है, सपनों की हसीं दुनिया और वास्तविकता की कटु दुनिया में ज़मीन और आसमान का फर्क है, ये उसका सामना करने के लिए अभी तैयार नहीं है.
रही बात तीसरी दुनिया के देश, कमजोर देश, शक्तिशाली देश आदि की, तो मैं ये बताना चाहूँगा की जो ताकतवर होता है उसे कभी बोलकर बताने की जरुरत नहीं पड़ती दुनिया उसका लोहा खुद-ब-खुद मानने लगती है, गुलाब को चीख कर नहीं बताना पड़ता की मेरा पेड़ इधर है, लोग खुद उसकी सुगंध से खींचे चले आते है. क्या आप लोगों ने वो शेर और हाथी वाली कहानी नहीं सुनी ?
राजेश जी आप बधाई के पात्र हैं. बिलकुल सही जगह आपने हथोड़ा मारा है और उसमे निखार दिया है रियाध, साउदी अरब के इदरीस ए. खान ने. दरअसल जो लोग ये बात कर रहे हैं. उन्होंने वाकई भारत को देखा ही नहीं है. ये वो लोग हैं जो इंडिया गेट के सामने आइसक्रीम खाते हुए भारत के अच्छे बुरे के बारे मैं चिंतन करते हैं. मुद्दे की बात ये है कि यदि वाकई इंडिया या भारत जो भी है फर्स्ट वर्ल्ड का देश है तो हमारे यहाँ से पड़े बड़े लोग अमेरिका आखिर करने क्या जाते हैं? या उन्हें ये पता है कि भारत मैं जितने चिकित्सक हैं वो १ अरब कि जनसँख्या के लिए पर्याप्त से ज्यादा हैं. थोड़ा सा राजेश जी उनसे पूछने कि ज़रुरत तो है...... थोड़ा सा ये भी पता करने कि ज़रुरत है कि क्या जितने लोगो ने वो ग्रुप ज्वाइन किया है उसमे कितने लोग ऐसे हैं जिनकी मासिक आय ५००० रुपये से कम है (जो कि भारत के प्रति व्यक्ति आय से तो ज्यादा ही है). क्या है राजेश जी जब पेट भरा हो तो सब अच्छा लगता है. हाँ ये सब इसलिए ठीक है कि शायद हमारे देश मैं पले बड़े वो लोग जिन्हें पाला तो भारत माँ ने है और सेवा वो किसी और माँ की कर रहे हैं ये सुनकर वापिस आ जाये कि चलो भाई अब मेरी माँ के पास भी पैसा आ गया है वो भी अब सुन्दर हो गयी है. इन लोगों को कुरूप और गरीब माँ से नफरत है चाहे वो फिर अपनी ही क्यों न हो.
100 में से 99 बेईमान फिर भी मेरा भारत महान.
लफ्जों में नहीं खेलना चाहता ....
सिर्फ यही कहना चाहता हूँ ...
चाहे आप उसे भारत कहे, या इंडिया कहें या फिर हिंदुस्तान कहें...
क्या अलग नाम देने से लोग बदल जायेंगे?
सच ये है, बहुत तरक्की की हमने, और बहुत करनी बाकी है...
तरक्की का फायदा नीचे तक नहीं पहुंचा
रही बात हम फर्स्ट वर्ल्ड है या थर्ड वर्ल्ड ...
तो भाई, काम कीजिये, तरक्की कीजिये...
किसी भी जगह पर एक प्रोफाइल बना कर या फिर कोई ग्रुप बना कर कुछ नहीं होगा....
चीन को देखें, वो किसी से नहीं कहता की उसे फर्स्ट वर्ल्ड का देश माना जाए...
दुनिया मानती है....
सारी दुनिया वहा का बना सामान ले रही है
और रही बात अमेरिका या यूरोप में भारतीय कुशल कामगारों की...
तो भारत उनके पैसे से तरक्की नहीं कर सकता... भारत उन के भारत में आ के काम करने से ही तरक्की कर सकेगा...
शब्दों से न खेल कर, अपने देश के लिए काम करें....
जय हिंद...
प्रियदर्शी जी, अगर देश तरक्की कर रहा है और अब विकसित देशों के साथ कंधा मिला रहा है, तो इसमें ख़राबी कुछ नहीं है. बात सिर्फ़ यह खटकती है कि आज देश दो वर्गों में बंटा नज़र आता है. इंडिया की तरक्की से हम खुश हो तो लें, पर भारत को देखकर मन भर आता है. यही वज़ह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह मानना पड़ता है कि हम नक्सलवाद से नहीं लड़ पा रहे हैं या उन पर विजय नहीं पा रहे हैं. उनके इस बयान में दमन की भाषा का भाव है, लेकिन भारतीय इस पर चुप हैं, जबकि भारत नक्सलवाद को पोषने के लिए मज़बूर किया जा रहा है. भारत है, इसलिए तमाम पुलिस, सेना के होते हुए भी नक्सवाल से निपटा नहीं जा पा रहा है. यह मनमोहन या उनकी जमात के नेताओं को कौन समझाए, कौन बताए. अब वाम दल भी भारत से दूर हाते नज़र आ रहे हैं.
देश में जब तक भूखे, नंगे लोग रहेंगे और दूसरी ओर चमचमाती कारें, बिल्डिंगें और ऐय्याशी के थरूरी बयान कायम रहें, तबतक नक्सलवाद जिंदा रहेगा, तुम जो करना चाहते हो कर लो. समानता, स्वतंत्रता का अधिकार दिए बगैर आप कुछ नहीं कर सकते हैं. इंडिया वाले यदि भारत को भी अपने साथ जोड़ लेते तो शायद समस्याएँ बहुत हद तक सुलझ सकती हैं. लेकिन ईलाज़ बताने वाले डॉक्टरों की सुनता कौन है. उल्टी गंगा बहाने वालों की जय हो रही है. कबीरा खड़ा बाजार में रो रहा है. सब कुछ होते हुए देख रहा है.