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बलात्कार की सियासत

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|शुक्रवार, 17 जुलाई 2009, 14:53 IST

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मायावती और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा के बीच जो घमासान युद्ध हो रहा है क्या वाक़ई उस के पीछे उन गरीब दलित लड़कियों का दर्द् छिपा है जो बलात्कार का शिकार हुईं हैं?

जिन के आँसू पोछने के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार पच्चीस हज़ार रुपये दे रही है? जिनकी फरियाद सुनने के लिए पुलिस के महानिदेशक हेलीकाप्टर से गाँव गाँव जा रहे हैं...

और जिनसे रीता बहुगुणा का कहना है कि उनके बलात्कार के बदले यह रक़म कम है, इसे मायावती के मुँह पर फेंक देना चाहिए...

क्या वाक़ई यह कहानी इन मासूम और बेसहारा दलित लड़कियों के बारे में है? या उन्हें हमेशा की तरह इस राजनीतिक बिसात पर इस्तेमाल किया जा रहा है. और असल जंग दलित वोट के लिए है?

वह दलित वोट जिसने मायावती को उत्तर प्रदेश में बहुमत दिलाया और जिसके बग़ैर कांग्रेस को लगाता है कि वह केंद्र में अपने दम पर कभी सरकार नहीं बना सकती?

जवाब मुझे मालूम नहीं. और न ही यह मालूम है कि बलात्कार की मुनासिब क़ीमत क्या है-
पच्चीस हज़ार, पचास हज़ार, एक करोड़..?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:49 IST, 17 जुलाई 2009 Keshav:

    जी! बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया आपने...
    सच तो यह है कि कोई भी पक्ष ग़रीबों के भले में नहीं है, और अपनी अपनी रोटियां सेक रहे हैं. दूसरा सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश में मायावती या दलितों के खिलाफ़ बोलना ही सबसे बड़ा अपराध है ? इसके सामने बाकी सब अपराध जैसे- आगज़नी, बलात्कार, मानव तस्करी, अंग व्यपार, हत्या आदि सब मामूली नज़र आते हैं. मुझे विश्वास है कि इसका जवाब जनता वक़्त आने पर देगी.

  • 2. 15:52 IST, 17 जुलाई 2009 Saagar:

    बलात्कार की मुनासिब कीमत तो मुझे भी नहीं पता... इस हमाम में सभी नंगे है. दोनों पार्टियाँ फिलहाल एक दूसरे को यही कह रही है कि मैं तुमसे कम नंगा हूँ. क्षमा शोभती उस भुजंग को... वाले दोहे मायावती के पास भी नहीं हैं. मायावती को भी हर बात पर दलित-दलित चिल्लाने की आदत है. वो जानती हैं कि इसी से उनकी दुकान चलती है. हैलीकॉप्टर हो या मूर्ति, देश की मिट्टी पलीत कर रहे है सभी.

  • 3. 15:59 IST, 17 जुलाई 2009 Vinay Shakar:

    यह राजनीति के आलावा कुछ भी नहीं है. यह अत्यंत हास्यास्पद है की राज्य पुलिस के डीजीपी 25000 रुपये मुआवज़ा दे रहे हैं. क्या यह मुआवज़ा उसके दुख को कम करेगा? अच्छा होता यदि उसे त्वरित न्याय मिलता. बलात्कारी को सज़ा देने का आधिकार मिलता.

  • 4. 17:17 IST, 17 जुलाई 2009 abbasali:

    बलात्कार की मुनासिब कीमत तो मुझे भी नहीं पता... इस हमाम में सभी नंगे है. दोनों पार्टियाँ फिलहाल एक दूसरे को यही कह रही है कि मैं तुमसे कम नंगा हूँ. क्षमा शोभती उस भुजंग को... वाले दोहे मायावती के पास भी नहीं हैं. मायावती को भी हर बात पर दलित-दलित चिल्लाने की आदत है. वो जानती हैं कि इसी से उनकी दुकान चलती है. हैलीकॉप्टर हो या मूर्ति, देश की मिट्टी पलीत कर रहे है सभी.

  • 5. 17:38 IST, 17 जुलाई 2009 Hasmuddin, Doha:

    आजकल हमारे देश मे हर मूद्दे को वोट की राजनीति से देखने और उसकी समीक्षा करने का फैशन चल पड़ा है. श्रीमती रीता बहगुणा ने जिन शब्दों का प्रयोग किया है ठीक उतने ही बुरे शब्दो का प़योग 2007 में सुश्री मायावती ने किया था लेकिन क्या उस समय किसी की भावनाऐं आहत नहीं हुईं. रीता जी ने तो केवल शब्दों का प्रयोग किया जिसके लिए उन्हें एससी-एसटी एक्ट में गिरफ्तार किया गया और गुण्डों को भेजकर घर जला दिया गया. ये कैसा न्याय है. आज सुश्री मायावती की नज़र में दलित महिला की इज्जत की कीमत उनकी पत्थर की मूर्ति से भी कम हो गई है.

  • 6. 17:45 IST, 17 जुलाई 2009 Neeraj Kumar Sharma:

    रीता जी ने बात तो सही उठाई है पर ग़लत तरीके से. कोई उनकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा है, सब अपना वोट बैंक देख रहे हैं. कांग्रेस दिखा रही है कि रीता के साथ ग़लत हो रहा है उधर बसपा दिखा रही है कि रीता ग़लत बोल रही थी. अब मायावती को चाहिए कि रीता को माफ़ करके अपने बड़प्पन का सबूत दें. रीता बहुगुणा को चाहिए कि वो इससे पहले एक लिखित माफीनामा दें.

  • 7. 18:32 IST, 17 जुलाई 2009 गौरव कुमार प्रजापति:

    सुहैल जी नमस्कार...
    जनाब सही लिखा आपने. इस पूरे प्रकरण ने हमारी राजनीति का असली चेहरा सामने ला दिया है. बस समझने की जरुरत है. वास्तव में शर्म आनी चाहिए हमें. हम आज भी बेवकूफों की तरह जातिवाद और क्षेत्रवाद के मुद्दे पर कटपुतलियों की तरह काम कर रहे हैं और हमें आपस में लड़ाकर फायदा उठाते हैं ये नेता. बस बहुत हुआ अब समझ जाना चाहिए हमें..वरना पता नहीं कल क्या होगा.
    गौरव कुमार प्रजापति
    099-1084-1083

  • 8. 19:05 IST, 17 जुलाई 2009 Kashyap Kumar Watsalya:

    सुहैल जी, सभी अलग अलग मुद्दों को विभिन्न नज़रों से देखते हैं सच तो ये है कि जिस तरह बलात्कार की कोई क़ीमत नहीं है उसी तरह ज़िंदगी की भी तो कोई कीमत नहीं है.
    ये अवश्य है की इस ढकोसलेपन में वोट की राजनीति छिपी हुई है. अगर मायावती मुआवज़ा देने के बजाय उन ग़रीब दलितों से ख़ुद जा कर मिलतीं और बलात्कारियों को सख़्त सज़ा दिलाती तो शायद उनका दुःख कम होता. कोई भी सरकार हमेशा से जलने के बाद मिर्च लगाने का काम करती रही है. जैसा कि मायावती पच्चीस हज़ार रुपए दे कर कर रही हैं. जिस दलित से उसके घर का चूल्हा जलता है उसी के साथ रजनीति?

  • 9. 19:14 IST, 17 जुलाई 2009 anil kr gupta:

    सन 2007में ख़ुद मायावती ने मुलायम के ख़िलाफ़ ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया था फिर रीता बहुगुणा के बयान पर इतना बवाल क्यों? कोई दलित (मायावती) कहे तो कोई बात नहीं और कोई सवर्ण कहे तो जेल, ये सियसत का कैसा खेल है?

  • 10. 19:23 IST, 17 जुलाई 2009 saurabh rai:

    मायावती लोक सभा की चुनावी हार बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं. हर संभव प्रतिकात्मक और आसान रास्ते को तलाश कर रही हैं जो दलित वोट बैंक की उनकी जागीर सलामत रखे. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जीत से वह बहुत डरी और विचलित हैं.

  • 11. 19:48 IST, 17 जुलाई 2009 manglesh jain:

    कुछ नहीं हो सकता है भारत का जब तक मायवती जैसे नेता (तथाकथित) भारत में हैं. पूर्व राष्ट्रपति अबदुल कलाम ने 2020 तक भारत को विक्सित देश को रूप में देखा था लेकिन मुझे लगता है कि 3020 तक भी यह संभव नहीं है.

  • 12. 20:33 IST, 17 जुलाई 2009 Rakesh Sohal:

    एक स्वतंत्र देश जहाँ सभी जातियों और सभी धर्मों को आज़ादी से अपना जीवन यापन करने का संविधानिक अधिकार है वहां आज़ादी के 60 वर्ष बाद भी जब ऐसे भाषण नेताओं के द्बारा दिए जा सकते हैं तो इसका मतलब यही है की आज भी भारतीय समाज से जाति या धर्म आधारित भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है. आज भी भारत में जाति और धर्म आधारित राजनीति सफल है, इसका मतलब यही भी है कि अब भी भारतीय समाज इन सब से ऊपर उठ कर मनुष्यता को नहीं अपना रहा है. और तो और, आज भी अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक शादी ब्याह मुश्किल से देखने या सुनने में आते हैं. ये सत्य भी भारतीय समाज की संकीर्णता को दर्शाता है. और बहुत सी चीज़ें हैं जो जाति या धर्म के आधार पर होती हैं. और ये सब सामान्य नागरिक करता है, हम क्यों नहीं सोचते की ऐसा क्या है अपने समाज में जो हम सब को अपने धर्म या जाति से ऊपर उठने नहीं देता. जब हर नागरिक अपने-अपने स्थान पर इस प्रश्न का उत्तर निकाल कर उसे ख़त्म करने के लिए ठोस क़दम उठाएगा तब भारतीय समाज से रीता बहुगुणा द्वारा दिए गए अशोभनीय भाषण जैसी घटना नहीं होगी और न ही जाति या धर्म आधारित राजनीति सफल होगी.

  • 13. 21:00 IST, 17 जुलाई 2009 उमेश यादव :

    उत्तर प्रदेश में तो छद्म प्रजातंत्र है, मैं तो यह कहूँगा यह पूरी तरह राजतन्त्र है. सत्ताधारी पार्टी का नेता जो कहता है वही होता है; यहाँ या तो क़ानून को तोड़ा-मरोड़ा जाता है या फिर उसे ताक़ पर रख दिया जाता है. पुलिस वाले नेता के सामने दुम हिलाते नज़र आते हैं और प्रशासनिक अधिकारी तलवे चाटते हुए. राज्य लिप्सा नेताओं की इतनी बढ़ गई है कि वे वोट के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. मूलतः माया जी दलितों के लिए कुछ नहीं कर रही हैं और जो कर रही हैं वह दिखावा है तथा प्रदेश के पैसे का दुरुपयोग है. इस तरह की घटनाएँ सामान्य लोगों को बहुत दुखी करती हैं. जनसामान्य को इससे सीख लेनी चाहिए.

  • 14. 22:30 IST, 17 जुलाई 2009 himmat singh bhati:

    बलात्कार की क़ीमत सही नहीं है, कल को अगर बलात्कार की पुष्टि नहीं होती है तो क्या दलित से ये पैसा वापस वसूला जा सकता है. सही में ग़रीबों और दलितों का कोई भला करना नहीं चाहता है सभी उनसे वोट ही लेना चाहते हैं.

  • 15. 22:44 IST, 17 जुलाई 2009 satyendra prajapati:

    जी हाँ, आपने बिल्कुल सही लिखा है.

  • 16. 22:53 IST, 17 जुलाई 2009 vinit mishra:

    सुहैल जी आपने पूरी तरह से इस विषय को खो दिया हैं. रीता बहुगुणा को एससी-एसटी एक्ट में गिरफ्तार किया गया और गुण्डों को भेजकर घर जला दिया गया. रीता बहुगुणा ने जिन शब्दों का प्रयोग किया उसमें "एससी-एसटी" कहाँ से आ गया? भगवान जानता है हमारे देश में गुण्डों का राज कब खत्म होगा?

  • 17. 23:57 IST, 17 जुलाई 2009 Deepak Tiwari:

    रीता जी ने सही बात को ग़लत तरीक़े से कह दिया. मायावती की घोर जातिवादी सोच किसी से छिपी हुई नहीं है. अपनी ही मूर्तियाँ लगवा कर उन्होंने अपनी सोच के स्तर का परिचय दे दिया है. दलितों को रोटी की जगह स्वाभिमान का डोज़ देकर उनका वोट लिया जाता रहा है. पर इस घटना पर कांग्रेस का विरोध मुखर नहीं है, शायद दलित वोट का लालच अपने लोगों पर भारी पड़ रहा है, घिनौनी राजनीति का यही सच है.

  • 18. 00:00 IST, 18 जुलाई 2009 prem shankar tiwari :

    ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे नेता ऐसा भाषण देते हैं. सुहैल साहब ने सही सवाल उठाया है. हर पार्टी अपना लाभ चाहती है. यूपी राजनीति का शिकार है. यह राज्य राजनीतिक पलड़ा तो झुका देता है लेकिन दूसरे राज्यों के मुक़ाबले यहाँ प्रगति नहीं है.

  • 19. 00:56 IST, 18 जुलाई 2009 प्रभात तिवारी,इलाहाबाद:

    इन नेत्रियों को किसी के दुख दर्द से कोई लेना देना नहीं है. इन्हें किसी न किसी कारण से सुर्ख़ियों में बने रहने और अपना वोट बैंक बढ़ाने से मतलब है, नहीं तो ऐसे समय में जब पूरे देश में मंहगाई और अन्य समस्याएँ सुरसा की तरह मुंह फैलाए खड़ी हैं इन बातों का क्या औचित्य है? किसी की इज़्ज़त को पैसों में तोलने वाले इन सफ़ेदपोशों की अपनी इज़्ज़त पर ज़रा भी आँच आ जाती है तो तिलमिला जाते हैं और बखेड़ा खड़ा कर देते हैं. मुझे हँसी आती है अपने देश के उन लोगों पर जो बिना कुछ सोचे समझे इनके लिए अपना क़ीमती समय और ऊर्जा बर्बाद करते हैं जबकि ये उन्हे काम निकलने के बाद पहचानने से भी इनकार कर देते हैं.

  • 20. 01:17 IST, 18 जुलाई 2009 yousuf:

    सुहैल जी, मैं इस बारे में बस इतना कहना चाहुंगा कि मायावती को बस अपनी चिंता है, वह बस अपनी राजनीति बनाए रखना चाहती हैं और कुछ नहीं. जहाँ तक इस मामले की बात है तो ये बस दिखावा है. उन्हें उन दलितों की कोई फ़िक्र नहीं है. वो तो बस मूर्ती लगवाने में लगी हुई हैं. अगर यही सब किसी दूसरी जाति के साथ हुआ होता तो कुछ नहीं सुनाई देता या यही शब्द अगर मायावती ने ख़ुद इस्तेमाल किए होते तो भी कुछ नहीं होता लेकिन उन्हें तो अपने आपको यूपी के डॉन के रूप में स्थापित करने की चाहत है जो कभी भी पूरी नहीं होगी. वो सिर्फ़ अपनी मूर्ती और हाथी में प्रदेश का पैसा बर्बाद कर रही हैं जो अभी इनके राज में तो थमने वाला नहीं. जहाँ तक ये मामला है ये बस माया राज की ग़ुण्डागर्दी और उनकी बौखलाहट है क्योंकि उन्हें दूसरों के बारे में जो मन में आता है कह देती हैं और अपने पर जब पड़ती है तो बर्दाश्त नहीं होता है. अंत में जाते जाते एक सवाल छोड़ जाता हूँ कि जब मायावती की कोई संतान नहीं है तो फिर वो प्रदेश के विकास पर ध्यान क्यों नहीं देतीं आख़िर उनके मरने के बाद उनकी सारी संपत्ति तो दूसरों के हाथ लगेगी.

  • 21. 02:04 IST, 18 जुलाई 2009 Fauziya Reyaz:

    सुहैल जी बलात्कार की सही क़ीमत क्या है कितनी रक़म उस दर्द को भर सकती है ये तो नहीं कह सकती पर हमारे राजनीतिज्ञों की ज़ुबान वाक़ई अनमोल है. एक बयान देते हैं और सारी चर्चा का विषय ख़ुद बन जाता है. मसाला कहीं से हो कर कहीं पहुँच जाता है और बलात्कार की शिकार औरतों को मुवाज़ा मिले ना मिले इन्हें तो अपनी ज़ुबान का फ़ायदा मिल जाता है.

  • 22. 07:31 IST, 18 जुलाई 2009 tanuj jindal:

    हमें आज़ादी मिले 60 साल से ज़्यादा हो गए हैं. फिर भी आज तक बलात्कारी को फांसी की सज़ा का क़ानून हम नहीं बना पाए हैं. इसकी वजह ये है कि पुरुष प्रधान मानसिकता हमारे दिमाग पर हावी है. मेरी राय में मायावती तालियों की हक़दार है क्योंकि उन्होंने 25 हज़ार रुपये में सस्ता व्यापार किया है. किसी ग़रीब की आबरू का इससे सस्ता सौदा और क्या होगा. मायावती हों या फिर कोई और नेता किसी ने भी बलात्कार की पीड़िता के बारे में नहीं सोचा. इसी गंदगी में हिंदुस्तान को रहना है और यही हमारा नसीब है.

  • 23. 09:51 IST, 18 जुलाई 2009 gagendra gautam:

    रीता जोशी का बयान सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का हथकंडा है. अच्छा होता अगर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक पीड़ितों को पैसा देने के बदले उन्हें इंसाफ दिलाते.

  • 24. 11:53 IST, 18 जुलाई 2009 santosh triapthi:

    रीता जी ने 'जैसे को तैसा' वाले मुहावरे को बचपन में ख़ूब पढ़ा होगा. इस देश की महिलाओं की इज़्ज़त लूटे जाने पर मायावती ने 25000 रूपए देने का जो प्रचलन शुरू किया है वो अत्यंत निंदनीय है. ये अपराध कूरीतियों, शोषण को बढ़ाने और अपनी क़ानूनी व्यवस्था को कुंद करने का जीता जागता प्रमाण है.

  • 25. 12:16 IST, 18 जुलाई 2009 Shakil Surve:

    ये आग कब बुझेगी, जी हाँ सुहैल साहब, कब तक हम हर चीज़ का राजनीतिकरण होता रहेगा. बलात्कार पीड़ितों को 25000 रूपए देकर मायावती क्या साबित करना चाहती हैं और ये रक़म सही नहीं है ये कहकर रीता जी क्या कहना चाहती हैं. उसके आगे रीता जी ने जो कहा वो ग़लत था. उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया उसके बाद रीता जी के घर पर जो आगज़नी हुई वो क्या सही थी? जिस राज्य में वीआईपी इलाक़े में ऐसी घटना होती हो उस राज्य में आम जनता की सुरक्षा कैसे हो सकती है. बलात्कार पीड़ितों को पैसा देने से बेहतर है क़ानून ऐसा सख़्त कर दिया जाए कि बलात्कार करने से पहले कोई भी हज़ार बार सोचे.

  • 26. 12:57 IST, 18 जुलाई 2009 Abdul Wahid:

    असल में ये मामला इतना सहज या सरल नहीं है जिस रूप में पेश किया जा रहा है. मैं समूचे विश्व की बात नहीं करता. अपने देश के बारे में मेरा यही कहना है कि यहाँ समाज के हर स्तर पर जो नीचपन की घटना सामने आती है उसके लिए समाज ही दोषी है. बलात्कार जैसे घृणित मामले पर राजनीतिक भूंचाल देश में नैतक मुल्यों के पतन के चरम पर पहुंचने का संकेत है. इस घटना का सबसे दुखद पहलू तो ये है कि बलात्कार को भी एक सुदाय अथवा जाति विशेष से जोड़ दिया गया है. निंदनीय है राजनीति का ये रूप.

  • 27. 22:34 IST, 18 जुलाई 2009 Archana Bharti:

    जब सत्ता मिल जाती है तो सत्ता का दुरुपयोग होना शुरु हो जाता है पर जनता कोई मरूख् नहीं है वो सब देखती है. एक दूसरे के आरोप प्रत्यारोप से राजनीति तो दूषित होती ही है साथ ही उनकी छवि भी धूमिल होती है. समाज कहां से कहां जा रहा है पर अभी भी समाज में क्षेत्रवाद और जातिवाद का बोलबाला है.

  • 28. 02:07 IST, 19 जुलाई 2009 yashpal singh:

    मैं पिछले 15 साल से विदेश में रहा हूँ, लेकिन कभी भी इस तरह की बहस नहीं देखी क्योंकि पुलिस और न्यायलय वहाँ सही दिशा में काम करती है. आज इन नेताओं का व्यवहार ऐसा ही कर रहे हैं जैसाकि ब्रितानी दौर में उसके शासक किया करते थे. भगवान बचाए इन नेताओं से.

  • 29. 09:25 IST, 19 जुलाई 2009 Maneesh K Sinha:

    सच्चाई कुछ और ही है. ये नेता देश और जनता के साथ अन्याय कर रहे हैं.

  • 30. 09:45 IST, 19 जुलाई 2009 jayantilal jain:

    सुहैल आपने सही लिखा है, असली मुद्दा कोई नहीं देख रहा ह, लेकिन जनता सब देख और समझ रही है. वक़्त आने पर उंगली पर निशान लगवाकर फ़ैसला कर देंगे.

  • 31. 13:17 IST, 19 जुलाई 2009 ALTAF HUSAIN:

    रीता जी ने सही कहा था. क्या किसी की इज़्ज़त को रुपया से वापस लौटाया सकता है अगर सरकार को कुछ करना है तो ऐसा करना चाहिए कि इस तरह के काम करने वाला दोबारा इस तरह के काम करने से सौ बार सोचे. उनको जल्द से जल्द सज़ा मिलनी चाहिए.

  • 32. 19:16 IST, 19 जुलाई 2009 Suresh Kumar Raghuvanshi:

    यह केवल दलित वोट बैंक की राजनीती है, इससे अधिक कुछ नहीं. कांग्रेस अभी हाल ही में संपन्न हुए लोक सभा इलेक्शन में अपनी विजय से उत्साहित है और उत्तर प्रदेश के खोए हुए दलित वोट बैंक को फिर से पाकर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का ख्वाब देख रही है. दूसरी ओर बीएसपी को उत्तर प्रदेश का दलित वोट बैंक खोने का डर है. अच्छा होगा अगर हमारी मुख्यमंत्री जी उत्तर प्रदेश को एक उत्तम प्रदेश बनाएं और ऐसा माहौल स्थापित करें कि कोई भी माँ और बहिन, चाहे बह किसी भी जाति या धर्म की हो, सदैव सुरक्षा महसूस कर सके.

  • 33. 20:04 IST, 19 जुलाई 2009 Ghildiyal M S:

    मर्यादा की बात राजनीतिज्ञों के मुँह से अच्छी नही लगती. फिर मायावती जी से तो मर्यादा की अपेक्षा भी लोग नहीं करते. अपने राजनीतिक कैरियर मे बयान देते हुए कितनी बार अपने पर नियंत्रण रखा है, ये बात वे सब लोग जानते है ,जिन्होने मायावती जी के कैरियर को ध्यान से देखा है.लेकिन मयावती सत्ता के दंभ मे चूर है, समय ही उनको इसका उत्तर देगा.

  • 34. 22:26 IST, 19 जुलाई 2009 नदीम अख्तर:

    मुझे लगता है कि रीता बहुगुणा के मामले में मीडिया ने भी केवल एक पक्षीय विश्लेषण किया है. बलात्कार की शिकार युवतियों को पैसे देना, बतौर मुआवजा या फिर सत्तारूढ़ दल को उकसाना, किसी और ने नहीं, बल्कि खुद मायावती ने शुरू किया है. जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे, तो मायावती ने कहा था कि... क्षमा कीजिए, मैं नहीं कह सकता, इतनी गंदी बात उन्होंने कही थी. और, साहब जहां तक बात है वाजिब या गैरवाजिब कीमत की, तो मैं स्पष्ट कर दूं कि इसकी मुनासिब कीमत शरियत में सबसे अच्छी तरह से बता दी गई है. इज्जत लूटने की बात सच साबित हो तो अपराधी को मौत की सज़ा मिले. उससे कम नहीं. यही कहा था पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने, लेकिन चतुराई से उन्होंने इससे संबंधित कानून अपनी सरकार के कार्यकाल के दौरान संसद में नहीं लाया. कैसी विडंबना है. बकतन में सारे नेता रेस रहते हैं और जब बात अमल की आती है, तो सभी ग़ायब हो जाते हैं.

  • 35. 22:26 IST, 19 जुलाई 2009 मोनिका महाजन:

    सुहैल जी, बलात्कार की कोई कीमत नहीं होती. इसके लिए तो सजा होनी चाहिए. वह भी केवल एक सजा- सजा-ए मौत. क्योंकि किसी को मानसिक और शारीरिक रूप से पीड़ा पहुंचाना मार डालने के समान ही है और यदि मौत की सजा मौत है तो फिर बलात्कार की सजा भी मौत ही होनी चाहिए, क्योकि इसके बाद एक लड़की मृत के समान ही होती है. सच तो यह है कि दर्जनों को मौत के घाट उतार देने वालों, सामूहिक नरसंहार करने वालों और इसी तरह हर रोज हर जगह मौत का तांडव करने वालों को हमारी न्याय व्यवस्था सालों तक सजा नहीं दिला पाती, तो भी बलात्कारी को सजा कैसे दिला सकती है. औऱ वह भी उस जगह जहां लोग राजनीति के लिए ही जीते है और जहां दलित हमेशा वोट बैंक के रूप में ही याद आते है. वहां तो बलात्कार की कीमत ही लगाई जा सकती है. वैसे भी जब आप मानकर चले कि करना कुछ नहीं केवल दिखाना है तो इसी तरह पैसों का लालच देकर वोट लिए जाते हैं. फिर चाहे वह मुलायम सिंह की सरकार हो, मायावती की या फिर किसी और को राजनीति के चूल्हे में वोट की रोटी सेंकनी हो. सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. इनसे कुछ नहीं होना और न ही कुछ होने की उम्मीद की जा सकती है.

  • 36. 09:24 IST, 20 जुलाई 2009 शशि सिंह :

    बलात्कार की मुनासिब क़ीमत...? पता नहीं, पर बलात्कार की सियासत का इनाम बेशक सत्ता है.

  • 37. 14:17 IST, 20 जुलाई 2009 JANG BAHADUR SINGH:

    आदरणीय सुहैल जी!
    मैं समझता हूँ कि पैसा उन महिलाओं के ज़ख़्मों पर मरहम नहीं लगा सकता जो बलात्कार की प्रताड़ना से गुज़री हैं. बलात्कार की पीड़ितों को 25 हज़ार रुपये देना मामले का हल नहीं है, बल्कि मैं समझता हूँ कि इससे बलात्कार के मामले में इज़ाफ़ा ही होगा. ऐसा भी होने की अपार संभावनाएं हैं कि पैसे की लालच में पुलिस से मिलकर बलात्कार के झूठे मुक़दमे भी दर्ज कारए जाएं. रीता बहुगुणा का ग़ु्स्सा बहुत हद तक जायज़ है.

  • 38. 14:58 IST, 20 जुलाई 2009 bashir shaikh:

    मायावती ने जो बलात्कार का मुद्दा बनाया उसमें दरअसल सियासत है. बात साफ़ है बलात्कार के मामले को मीडिया ने पहले क्यों नहीं मुद्दा बनाया या उछाला. असल मुद्दे से हटकर सब बहस कर रहे हैं लेकिन कोई इस बात पर बहस नहीं कर रहा है कि बलात्कारी पकड़ा गया या नहीं?

  • 39. 15:44 IST, 21 जुलाई 2009 M.Shahid Salam(Guddu} Buland shahr:

    ये सच है कि उत्तर प्रदेश में माया के राज में दलित अगर ग़लत भी करे मगर आप मुँह नहीं खोल सकते और अगर मुँह खोला तो रीता की तरह जेल जाओ.क्योंकि माया को बस दलितों का ही दुःख दिखाई देता है और उत्तर प्रदेश में समाज भी माया को पूरी तरह एक महारानी स्वीकार चुका है जिसका उदाहरण पंडित है जो माया के पैरों में सिर रखकर लेते हुए है और अपने स्वार्थ के लिए माया को भगवान की तरह पूज रहे है. कांग्रेस शासन जाने के बाद उत्तर प्रदेश में कितने पुल बने कितने मैगावाट बिजली का उत्पादन बढ़ा कितने सरकारी अस्पताल बने ये देखने की शायद ना माया ना यूपी वासियों और ना माया को फुर्सत हे

  • 40. 19:38 IST, 21 जुलाई 2009 Brijkishor Pandey :

    राजनीतिक पार्टियाँ इस तरह के मुद्दे अपने फ़ायदे के लिए उठाती हैं. हमें इस तरह के मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है. सबसे पहले हमें अपने आप को और फिर समाज को जागरूक करने की ज़रूरत है. ताकि इस तरह की नौबत ही न आए. मायावती को मैं एक छोटी सी सलाह देना चाहूँगा कि उन्हें अपने पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से सीख लेनी चाहिए जो कि विकास के कामों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं न कि अपनी और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह की मूर्ति लगवाने पर.

  • 41. 21:22 IST, 21 जुलाई 2009 Ram Lakhan Ram, BHU, Varanasi:

    माननीय सुहैल जी, यह कॉंग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के बीच राजनीतिक खेल नहीं है. यह तथ्य है कि अब 21वीं सदी में भी कोई किसी दलित को उच्च पर पर सहन नहीं कर पाता है. मुलायम सिंह यादव, महेंद्र सिंह टिकैत, अमर सिंह और रीता बहुगुणा जोशी भी ऐसे ही लोग हैं. मुझे हैरानी है कि कॉंग्रेस वालों ने, यहाँ तक कि तथाकथित दलित प्रेमी राहुल गांधी ने भी रीता जोशी का समर्थन किया. मेरी सोनिया गांधी से गुज़ारिश है कि रीता जोशी को उत्तर प्रदेश कॉंग्रेस अध्यक्ष के पद से हटा दें.

  • 42. 11:40 IST, 26 जुलाई 2009 vikram bhukar:

    एक बार फिर राजनीति की कीमत न मायावती और ने रीता अदा कर सकती हैं.

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