कौमार्य से ज़्यादा भी कुछ ज़रूरी है
एक लड़की का बचपन में ही उसके एक संबंधी ने बलात्कार किया.
मध्यमवर्गीय माता-पिता ने लोकलाज के डर से यह बात ज़ाहिर नहीं होने दी.
वयस्क होने पर मध्यप्रदेश के शहडोल समाज के ज़रिए उसकी शादी तय हुई. कौमार्य परीक्षण के दौरान वे घाव फिर कुरेदे गए जिससे लड़की और उसके माता-पिता बड़ी मुश्किल से उबर पाए थे.
यह एक काल्पनिक स्थिति है. लेकिन वास्तविक भी हो सकती थी.
अब ज़रा दूसरी ओर देखिए.
एक लड़का शादी से पहले अनगिनत औरतों से यौन संबंध बना चुका है.
उसे खुली छूट है कि वह किसी कुवाँरी लड़की को अपनी जीवनसंगिनी बनाए.
परीक्षण हो तो इस बात का हो कि लड़का या लड़की किसी यौन रोग से पीड़ित तो नहीं हैं.
उनके ख़ून की जाँच हो ताकि पता चले कि आने वाली पीढ़ी में किसी संक्रमण का ख़तरा तो नहीं है.
कौमार्य परीक्षण से क्या सिद्ध किए जाने का इरादा है?
क्या किसी विधवा, तलाक़शुदा, परित्यकता या बलात्कार की शिकार लड़की को अपना जीवन दोबारा बसाने का अधिकार नहीं है.
कौमार्य पर इतना ज़ोर क्यों?

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दरअसल यह हमारे समाज की कुंठित मानसिकता का परिचय है। इसे तो कुंठित भी नहीं कहेंगे दोगली मानसिकता कहेंगे। इसका इलाज इतनी आसानी से नहीं हो पाएगा। इसके लिए ऒवरहॉलिंग की जरुरत पड़ेगी। जिसके लिए समझदार लोगों को आगे आना होगा।
सही कहा आपने. पता नहीं भारत में कब लोग समझदार होंगे ?
देखिये, इस मसाले पर म.प्र. सरकार का नज़रिया गलत नहीं, लेकिन अन-जस्टिफाइड है. वो इसलिए क्योंकि किसी अच्छे मकसद के लिए यदि लडकी का कौमार्य परीक्षण किया जाना गलत नहीं तो लड़के को इससे छूट मिलना भी अतार्किक है. लेकिन आपके द्वारा सुझाया गया नज़रिया काबिले-गौर है कि यौन रोगों या अन्य परीक्षण! शायद पुरुष प्रधान मानसिकता इतना आगे की सोच भी न पाए. पर ये सच है कि हमारा मकसद आने वाली पीढी को अपंग या अल्प-विकसित होने से बचाना होना चाहिए.
कुछ मूर्ख लोग ही इस तरह के कामों पर ज़ोर देते हैं. वे इतने मूर्ख हैं कि उन्हें यह भी नहीं पता कि इस तरह के परीक्षणों से कुछ सिद्ध नहीं होता है. उन्हें इन ग़ैरक़ानूनी कामों के लिए दंडित किया जाना चाहिए. महिला का कौमार्य परीक्षण भी यौन उत्पीड़न और भेदभाव की श्रेणी में ही आता है.
मरी हुई मानसिकता के लोग यह कहाँ समझ पाएँगे कि किसी के भर चुके ज़ख़्म को कुरेदने की पीड़ा क्या होती है.
यही तो हम भारतीयो की दोहरी मानसिकता दर्शाता है. इस तरह के लोग पाखंडी होते हैं.
सलमा ज़ैदी ने कौमार्य पर इस रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं.
यह एक मानसिक स्थिति है सलमा जी, लोग इसमें 'कंफर्ट' फील करते है... वही लकीर के फ़क़ीर वाली...
सरकार पर भी इतना बोझ है... वोट भी चाहिए... कुछ अड़ंगे लगा कर...
विधवा, तलाक़शुदा, परित्यकता या बलात्कार की शिकार लड़की को अपना जीवन दोबारा बसाने का अधिकार है
पर ताने सुनते हुए... जलील होते हुए... पब्लिक और सरकार अपना मनोरंजन और नये स्कीम कैसे लाएगी फिर इनके लिए... बताइए ...
आपलोग किस मानसिकता को उन्नत मानसिकता कहते हैं. वह मानसिकता जिसमे यौन संबंधो मे खुली छूट रहती है. जहाँ शादी को संभोग का एक साधन भर माना जाता है और एक दो साल के बाद मन नगर जाने पर साथी बदल लिया जाता है. हम पाश्चात्य संस्कृति को ही सबसे अच्छा संस्कृति क्यों मानते हैं. इस जाँच से कम से कम बिन्दास लड़कियों में डर पैदा होगा और वे कुछ ग़लत कदम उठाने से डरेंगी.
कौमार्य परीक्षण सही है. आज नहीं तो कल पता चल ही जाएगा. क्योंकि झूठ की बुनियाद पर रिश्ते की नींव नहीं रखी जा सकती है. और साथ ही विधवा की शादी छिपा कर नहीं की जा सकती है. लड़के-लड़की दोनों को चेक करो ताकि इस नाज़ुक रिश्ते पर कोई आँच न आए.
सलमा जी, आपने अपने इस ब्लोग मे एक खास मुद्दे को छुआ है....
कौमार्य जाँचने का जो छोटा काम एक सरकार ने शुरु किया है वो केवल निन्दा के लायक है.
मै तो कहूँगा कि समाज के लिए खतरनाक है. सरकार के इस पहल से समाज के उन लोगों को बल मिलेगा जो आज भी लड़कियों के उपर नैतिकता की तलवार लिए खडे होते हैं.
दूसरी बात जो मै यहाँ कहना चाहूँगा कि इस मुद्दे पर भारतीय मीडिया में एक चुप्पी देखी जा रही है. ऐसा क्यों?
इसका एक कारण जो मुझे लिखता है कि भारिय मीडिया मे काम करने वाले, समाचार बनानेवाले और समचार को छापने वालों के लिए यह एक घ्टना मात्र है. जबकि इस घटना के आधार पर सरकार और समाज मे व्यापत उन लोगो से सवाल होने चाहिये थे जो लड्को और लड्कियों के लिए दोहरा माप्दण्ड रखते हैं, लेकिन अफ्सोस कि ऐसा नही हो रहा है.
दम्पत्ति के बीच रिश्ता बेहतर बनाने के लिए यह जाँच ज़रूरी है.
हमारा भारतीय समाज अपनी रूढ़ियों को कभी नहीं तोड़ सकता. एक तरफ़ तो पश्चिम की मान्यताओं का खुल कर स्वागत करते हैं. पर दूसरी तरफ़ ये सब लोग दोहरी मानसिकता के शिकार इसलिए हैं क्योंकि हमारा समाज ही ऐसा है. पता नहीं लोग कब इन सब बातों को समझेंगे. इनकी मानसिकता है दूसरों की बुराई ढूँढो उनकी अच्छाई मत देखो.
आपकी बात सही है. एचआईवी टेस्ट बहुत ज़रूरी है. कई बार निर्दोष लोग अपने साथी की वजह से इसका शिकार बन जाते हैं.
आपकी बात से मैं भी सहमत हूँ लेकिन यह हमारे समाज की सबसे बड़ी परंपरा कहें या फिर हमारी ओछी मानसिकता की बात है. अग्नि परीक्षा तो सीता माता को भी देनी पड़ी थी लेकिन यही बात भगवान राम के लिए क्यों नहीं. क्या सिर्फ़ एक चरित्रहीन स्त्री ही परिवार को बरबाद करती है? क्या चरित्रहीन पुरुष यह काम नहीं करता? अगर ग़ौर से देखें तो यह पुरुषों द्वारा बनाया एक ढोंग है जो ज़बरदस्ती नारी पर थोपा जा रहा है. मैं भी पुरुष हूँ लेकिन मैं कभी ऐसा नहीं सोचता कि नियम केवल स्त्री के लिए हों. अगर हों तो दोनों के लिए वरना किसी के लिए नहीं.
कहते हैं ज़माना बदल गया लेकिन हम लोग अब भी वही सौ साल पीछे चल रहे हैं. जब हम समान अधिकार की बात करते हैं तो महिलाओं को भी अपना जीवन अपनी इच्छा से जीने का हक़ होना चाहिए. कौमार्य तो किसी भी तरह से नष्ट हो सकता है. इससे उसके चरित्र पर शक नहीं करना चाहिए. और यह टेस्ट केवल महिला ही क्यों दे. इसके लिए जो लोग ज़िम्मेदार हैं उनके ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए.
मैं आपसे सहमत हूँ. मैं नहीं जानता कि लोग इतने दक़ियानूसी क्यों हैं. आपकी बात सही है कि वे दोनों के स्वास्थ्य की जाँच कराएँ ताकि एक स्वस्थ पीढ़ी जन्म ले सके.
सलमा जी, आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ. हर औरत को अपनी ज़िंदगी फिर से शुरू करने का हक़ है. लेकिन हर इंसान अलग होता है और यदि कोई चाहता है कि उसकी होने वाली पत्नी का कौमार्य परीक्षण होना चाहिए तो इस पर क़ानूनी रोक उचित भी नहीं है और यह बुद्धिमानी भी नहीं है. इससे कम से कम यह तो पता चल जाएगा कि वह आदमी शक्की है और माँ-बाप ऐसे लड़के के साथ अपनी बेटी को ब्याहने से बच जाएँगे.
कई अनुत्तरित प्रश्नों की तरह इसका भी उत्तर हमें ही खोजना है क्योंकि जिन्हें उत्तर देना है वे ही अनुत्तरदायी हो गए हैं.
कौमार्य के नाम पर जो कुछ हुआ वो ग़लत था. लेकिन जिन परिवारों ने ग़लत करके दो-दो बार पैसे लिए वो भी क़सूरवार हैं. सरकार का शादी कराने की योजना सही है लेकिन कुछ लोग इसका ग़लत प्रयोग करना चाहते हैं जोकि सरकार के लिए समस्सया है. ऐसे में भ्रष्टाचार के माहौल में सरकार के लिए कोई ऐसी योजना बनाने में भी परेशानी आएगी. मेरी राय में सरकार को शादी कराने की इस योजना में विधवा, तलाकशूदा औरतों को भी शामिल करना चाहिए. और जो इसका ग़लत प्रयोग करते हैं उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जानी चाहिए.
मैं आप से पूरी तरह से सहमत हूँ, इस परंपरा को रोका जाना चाहिए.
आपकी सोच पूरी तरह से सही है कि परिक्षण कौमार्य का नहीं बल्कि स्वास्थ्य का होना चाहिए. लेकिन, मध्यप्रदेश में हुए इस मामले में एक उद्देश्य ऐसे लोगों को पकड़ना था जोकि बाल-बच्चेदार होने के बावजूद भी यहाँ शादी करने आ जाते थे केवल उस धन राशि के चक्कर में जोकि राज्य सरकार यहाँ देती थी. अब अगर लोग अपनी नीयत साफ़ रखते और पैसों के चक्कर में ये काम न करते तो शायद ही ये हादसा होता. माना कि सरकार ग़लत है लेकिन, आम जनता के ऐसे लालच पर भी कुछ लिखा जाना चाहिए.
सलमा जी बहुत ही शानदार विचार आपने पेश किया है. मुझे हैरत है कि उन राजनेताओं और सरकारी पर जो 6500 रुपये के लिए नारी का ऐसा जाँच करवाते हैं. धिक्कार हो ऐसे लोगों पर.
मध्य प्रदेश सरकार की मंशा क्या थी ये तो वही जाने. मुझे ये लगता कि सरकारी बाबू शायद यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि इस सरकारी योजना का दुरुपयोग कोई शादीशुदा जोड़ा न कर सके. यदि मंशा ये ही रही होगी तब भी किसी के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाली इस क़वायद की सिर्फ़ और सिर्फ़ निंदा ही की जा सकती है.
सलमा जी वास्तव में आपने बहुत ही अच्छा लेख लिखा है और आपकी बात सही है.
सलमा जी बहुत-बहुत धन्यवाद. आप शत प्रतिशत सही कह रही हैं. ये हमारे समाज की दोग़ली मानसिकता का परिचायक है. लेकिन आपने इसको बहुत ही सही रुप दिया है. बिल्कुल आपने जो कहा है केवल उन्हीं चीज़ों की ज़रूरत है. इस तरह की मानसिकता समाज के लिए अभिशाप है.
सलमा जी! ये हमारे देश के लिए दुख की बात है कि अब तक किसी तथाकथित धार्मीक संगठन या राजनीतिक पार्टी ने इस विषय पर कुछ भी अपना बयान नहीं दिया है. (राजनीतिक पार्टियों की टिप्पणियों को अलग कर देखा जाना चाहिए). बहरहाल आपने बड़ी मज़बूती से इस विषय को उठाया है और हम उम्मीद करते हैं कि इससे आम लोग जागरूक होंगे.
सही लिखा है आपने, स्त्री रोग का परीक्षण खून की जाँच से हो जाता है, वह होना चाहिए, कौमायॅ परीक्षण से किसी की मानसिक भावनाओं पर चोट करना होगा.
कौमार्य पर इतना ज़ोर क्यों? पता नहीं भारत में कब लोग समझदार होंगे ? फोरम इन सवालों से भरा हुआ है? जो लोग ये सवाल पूछ रहे हैं उन्हें शायद लगता है कि वे खुले मन के हैं. विधवा, तलाक़शुदा, परित्यकता या बलात्कार की शिकार लड़की को अपना जीवन दोबारा बसाने का अधिकार निश्चित है. किन्तु सवाल होना चाहिए - लड़का या लड़की खुली छूट किसी को नहीं है परीक्षण हो तो चरित्र का हो. कहीं ऐसा न हो, खुले मन और पाश्चात्य संस्कृति के कारण से, हम अपनी संस्कृति के बारे में भूल जाएँ.
मैं इस लेख से बिल्कुल सहमत हूँ की शादी से पहले स्त्रियों का कोई कौमार्य परिक्षण नहीं होना चाहिए. लेकिन मैं जनता हूँ आप ने यह लेख भारत के मध्य प्रदेश में किए तथाकथित "गर्भ" या मीडिया के अनुसार "कौमार्य" परिक्षण को ही ध्यान में रख कर लिखा है. क्या बीबीसी ने इस की जाँच की है ? मेरा मानना है कि इस तरह के मामलों को सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. ब्लॉग का सन्देश बिलकुल सही है; स्त्रियों के सम्मान से कोई खिलवाड़ नहीं होना चाहिए. गर्भ परिक्षण किसी तरह अनुचित नहीं है, लेकिन कौमार्य परिक्षण नहीं होना चाहिए.
सलमा जी मैं आप से सहमत हूँ. हमारे भारतीय समाज में ही कमी है, हम कभी भी महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना नहीं चाहते.
सलमा जी जो जानकारी मिल रही है उससे ऐसा लगता है कि सरकार गर्भ परीक्षण करा रही थी न कि कौमार्य. पर जब बात नारी की अस्मिता की है तो सरकार को कोई और तरीक़ा अपनाने की आवश्यकता है.
सलमा जी! कौमार्य एक ऐसा शब्द है जिसकी शिकार केवल महिलाएँ होती हैं... लड़कियों से ही कहा जाता है कि तुमहें अनछुआ रहना है क्योंकि ये तुम्हारी इज़्ज़त है तुम्हारी ज़िंदगी है. इतना दोहरा मामला क्यों????
जो बात मीडिया की ओर से कही जा रही उससे यह बात कही जा सकती है कि कौमार्य परीक्षण ग़लत था. लेकिन सरकार ने ऐसा इस किया था कि ताकि कोई महिला दोबारा सिर्फ़ पैसे की लालच में शादी के लिए लाइन में खड़ी न हो जाए. हम मानते हैं कि सरकार को इसे रोकने के लिए कोई तरीका अपनाना चाहिए, लेकिन सरकार की आलोचना करने से पहले उसकी मंशा को देखने की भी ज़रूरत है.
बहुत बढ़िया, भारत में पुरुष जवाबदेही से परे है. यहाँ केवल वनवे ट्रैफ़िक चलता है. ये बाबू वाहियात और मूर्ख सरकारी सांड हैं.
केवल एक बीमार समाज ही इतना बर्बर और महिलाओं के प्रति अपमानजनक रवैया रखने वाला हो सकता है--और हम वही हैं.
मैं आपके ब्लॉग पर दूसरी टिप्पणी भेज रहा हूँ. मैंने देखा कि कई लोगों ने शादी से पहले एचआईवी आदि की जाँच की ज़रूरत बताई. लेकिन इससे बचाव तभी सुनिश्चित किया जा सकता है जब दोनों पक्षों की जाँच हो. गाड़ी के दोनों पहिए जाँचने चाहिएं.
मेरे विचार में यह सिर्फ़ कौमार्य परीक्षण की ही बात नहीं है. इसका उद्देश्य यह देखना भी है कि लड़के या लड़की में से किसी को ऐसी कोई बीमारी तो नहीं है जो दूसरे को लग जाए.
मध्यप्रदेश में कौमार्य परीक्षण नहीं हुआ बल्कि सामान्य परीक्षण से यह बात सामने आई कि ये लड़कियाँ पहले से विवाहित थीं और पैसे के लालच से वह पुनः विवाह के लिए आ गईं. मीडिया ने दूसरी तरफ़ ही ध्यान बंटा दिया.
सलमा जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ. बहुत दिनों के बाद कियी ने यह मुद्दा उठाया है. हमारे समाज में लड़कियों के साथ यह भेदभाव क्यों...लड़की और लड़का दोनों का परीक्षण होना चाहिए. मैं शुक्रगुज़ार हूँ आपका कि आपने इस अनछुए मुद्दे को उठाया.
कौमार्य भी ठीक उसी तरह है जिस तरह इंसान की इज़्ज़्त. यह बनाए रखना हर कोई चाहता है और उसके लिए हर तरह के जतन करने भी पड़ते हैं. पर एक बार दाग़ लग जाने से उसे मिटाया नहीं जा सकता. यह सही है कि उसे भुलाने की कोशिश ज़रूर की जा सकती है. पर उसे कुरेदने वाले हर जाति, हर समाज और हर धर्म में मिल जाते हैं. पर इसका मतलब यह भी नहीं कि कोई विधवा या परित्यकता महिला से शादी करना चाहता है तो कुछ ग़लत भी नहीं है. शादी तभी संभव है जब दोनों पक्ष शादी के लिए तैयार हों. यह सही है कि जाँच दोनों की होना चाहिए जिससे बीमारी आदि का पता चल सके और होने वाले बच्चे उस बीमारी का शिकार न बनें.
सलमा जी, मैंने बहुत बार सुना है " मिट गए मिस्र-रोमा जहाँ से कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी" तो यहाँ मैं इन संस्कृति के जानकारों से जानना चाहता हूँ कि क्या हमारी संस्कृति यही थी कि हम औरत पर जुल्म करें, उस पर अत्याचार करें, उसको हमेशा बताते रहें कि वो एक पुरुष के अत्याचार सहने के लिए है. तो मैं उनसे बिलकुल सहमत नहीं हूँ. उन्हें पाँच हजार साल पहले देखना होगा पाँच सौ साल नहीं, यदि फिर भी वो नहीं सहमत तो मुझे शर्म आती है उस संस्कृति पर कि क्यों वो आज तक नहीं मिटती. दोस्तों अब समय है अपने भारत के बारे में सोचने का . तो कृपा करके जो करें अपने देश को ध्यान में रख कर करें. अच्छी अच्छी संस्कृतियाँ बनाओ. जो अच्छा नहीं मिटा दो उसे जहाँ से. नयी सोच और परिवर्तन का समय है. समय के साथ चलो.
हम भारतीय कपड़ों से लेकर कार तक की होड़ कर सकते हैं पर समझदारी के मामले में पीछे हैं. अब हालात कुछ बदले हैं पर सभी भारतीयों की सोच बदलने में समय लगेगा.
कौमार्य से ज़्यादा भी कुछ ज़रूरी है- इस पर मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ..
कौमार्य परीक्षण हमारे सभ्य समाज के लिए ठीक तो नहीं है, लेकिन यह भी सुनिश्चित होना चाहिए लड़की या लड़के दोनों का चरित्र ठीक है, क्योंकि आपके अनुसार चरित्र कोई मायने नहीं रखता लेकिन हमारी संस्कृति को बचाने हेतु यह सुनिश्चित होना चाहिए कि शारीरीक संबंध सिर्फ पति-पत्नी के बीच होने चाहिए ........
मैं सही काम के लिए सरकारी कौमार्य परीक्षण का समर्थन करता हूँ लेकिन हम इसे किसी व्यक्ति के चरित्र का पैमाना कैसे मान सकते हैं. आज की दुनिया में किसका कौमार्य सुरक्षित है. यदि आप कुछ ऐसा सोच रहे हैं या कर रहे हैं जिससे यौन भावनाएँ भड़कें तो आप का कौमार्य बचा नहीं रह सकता.
आपका मुद्दा सही है. ख़ास तौर पर जो आख़िरी लाइन आपने लिखी है क़ाबिले तारीफ़ है. जय हो. लेकिन सिक्के के दो पहलू होते हैं, जब तक हमें यह नहीं पता कि यह परीक्षण क्यों हो रहा है तब तक हम कुछ नहीं कह सकते.
मैं सलमा से सहमत हूँ. काश ऐसी सोच भारत में हर नागरिक की होती. पर मुझे काफ़ी अफ़सोस है कि आज भी हमारे भारत में दक़ियानूसी विचाधारा वाले लोग हैं. कौमार्य बहुत महत्वपूर्ण नहीं है जिसका शादी से पहले परीक्षण होना चाहिए. ये ऐसी चीज़ है जो बिना सेक्स के भी खो जाती है. वैसे अगर ये सब होता है तो सिर्फ़ महिला के साथ ही क्यों. आदमी का भी पूरा चेकअप हो. वैसे किसी का भी चेकअप करना सिर्फ़ ये जानने के लिए कि वह कुंवारी या कुंवारा है या नहीं, ये हमारी घटिया सोच को दर्शाता है. हमारे देश में औरतों की स्थिति काफ़ी ख़राब है. उन्हें हमेशा परिक्षा की स्थिति से गुज़रना पड़ता है. मुझे समझ में नहीं आता कि कब हमारी औरतों को दूसरे देशों की तरह मर्दों के साथ चलने और आदमियों की ही तरह इज़्ज़त मिलेगी.
सलमा जी मैं मध्य प्रदेश का रहने वाला हूँ और मुझे पता है की सरकार ने कुछ ग़लत नहीं किया. सरकार ने एक अच्छा काम किया कि शादी के लिए पैसे देना शुरू किया. इन पैसों को पाने के लिए कुछ पहले से विवाहित लोगों ने अपना रजिस्ट्रेशन दुबारा शादी के लिए करवा लिए और पहले से विवाहित इन जोड़ों ने दुबारा शादी की और सरकार से ग़लत तरीके से पैसे ले लिए सरकार ने इस कार्य को रोकने के लिए कौमार्य परीक्षण कराया. अब इसमें सरकार कहाँ ग़लत थी. अगर सरकार ये होने देती तो बढ़िया था. या फिर शादी के लिए जो पैसे दिए जा रहे थे वो स्कीम ही वापिस ले लेती. चन्द घटिया लोग जो सरकार को बेवकूफ बना रहे थे वो पकड़े गए थे तो उन्होंने इस परीक्षण कि दिशा ही मोड़ दी और आप जैसे समझदार पत्रकारों ने बिना समाचार कि गहराई जाने उसका ग़लत मतलब निकला और सिर्फ इसलिए कि आप एक अच्छी सोच वाली अच्छी लेखनी वाली पत्रकार कहलायें आपने सरकार को दोषी ठहरा दिया. आपकी तारीफ तो जब थी जब आप घटना कि बुनियाद भी बताते कि आखिर सरकार को आखिर ये कदम क्यों उठाना पड़ा और आप ये सलाह देते कि लोग इस स्कीम का गलत फायदा न उठा पाए इसके लिए कौन से क़दम उठाये जा सकते थे.
सिर्फ़ लड़कियों का कौमार्य परीक्षण क्यों? लड़कों का क्यों नहीं ?
कथित परीक्षण के संदर्भ को समझना भी जरूरी है. जहां कुछ पैसे के लिए गर्भवती महिला शादी के लिए पहुंच जाती हैं.
किसी भी व्यक्ति या सरकार को यह अधिकार नहीं है की वह किसी की निजी जिंदगी में दखलंदाजी करें. मध्यप्रदेश में एक योजना के तहत 150 गर्भवती महिलाओं की शादी का मुद्दा जब उठा तब सभी की ऩजरे इस ओर गई वरना अभी तक तो किसी ने इस मुद्दे को नहीं उठाया था. राजनीतिक लाभ और जनता के सामने बार-बार मीडिया से फोक्स होने की यह क़वायद बंद होनी चाहिए.
मैडम जिस प्रकरण के बाद आपने ये मुद्दे उठाया है... मै ज़रा उसकी हक़ीक़त आपको बयां करना चाहता हूं.... असल में मध्यप्रदेश में कुछ जगहों पर सरकारी धन के लालच में शादीशुदा जोड़े दोबारा शादी कर रहे थे... और कुछ मामलों में तो गर्भवती महिलाएं भी इसमें शामिल हुई थीं... लिहाज़ा राज्य सरकार ने ऐसे आयोजनों में शामिल होने वाले जोड़ों से प्रेगनेंसी टेस्ट करवाने की बात की... तकि फ़र्जी लोगों दुर्पयोग ना कर सकें... लेकिन क्योंकि सरकार बीजेपी की है... इसलिए मामले ने जोर पकड़ा और मीडिया के विशेष भाग ने इस पूरे प्रकरण को ग़लत तरीके से पेश किया है.
ये कुछ लोगों की ग़लत सोच का नतीजा है. हम लोगों को लड़कों और लड़कियों के स्वास्थ्य, हुनर और आचरण की जाँच करनी चाहिए, ताकि दोनों के बीच बेहतर समझ बन सके.
कैसे-कैसे लोग हैं और कैसी-कैसी ग़लत सोच है. तेज़ दौड़ में भी कौमार्य टूट जाता है तो इसका क्या हल है?
कौमार्य परीक्षण होना अच्छी बात नहीं है. हम इस बात से सहमत हैं कि होने वाले जोड़े की मेडिकल जाँच होनी चाहिए, ताकि उनमें पहले से किसी संक्रमण के बारे में पता चल सके. ये समाज और आने वाले बच्चे के लिए अच्छा होगा.
पुरुष यह भूल जाता है कि उसे भी किसी औरत ने जन्म दिया है. उसकी माँ भी औरत है. मैंने बिहार में यह कुप्रथा देखी है कि लड़की की पढ़ाई रुकवा दी जाती है. मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूँ जिन्होंने कन्या भ्रूण की हत्या कर दी. वे यह भूल जाते हैं कि लड़की ही पीढ़ी को आगे बढ़ाती है.
यह एक बड़ी दुखद बात है. लोगों को अपनी मनःस्थिति बदलनी होगी.
अगर सही काम हो तो समाज में एक अच्छी सोच पैदा हो ताकि ऐसे सवाल ही न उठें.
क्या ऐसे ही हम 21वीं सदी में जाएँगे? अगर यह दक़ियानूसी विचार नहीं छोड़े गए तो लगता है हम फिर मानव सभ्यता के पहले अध्याय पर पहुँच जाएँगे. इस तरह की जाँच की निंदा करते हुए वहाँ की सरकार से कहना चाहता हूँ कि उसे कोई अधिकार नहीं किसी को सरे आम बेइज़्ज़त करने का. ख़ुदा ऐसी सोच वालों को सदबुद्धि दे.
मैं भी समीर गोस्वामी और देवेन्द्र रावत कि बात से पूरी तरह सहमत हूँ. सलमा जी बीबीसी जैसी उच्च संस्था की संपादक होने के कारण आपने आपने विचार प्रकाशित करवा लिए चाहे वो सही हों या ग़लत. अगर आपके द्वारा लिखा गया लेख सही है तो आपको समीर गोस्वामी के द्वारा आपके बारे मैं लिखी गयी टिप्पणी का जवाब ज़रूर देना चाहिए जिसमे उन्होंने आप पर आरोप लगाया है कि "आप एक अच्छी सोच वाली अच्छी लेखनी वाली पत्रकार कहलायें आपने सरकार को दोषी ठहरा दिया. आपकी तारीफ तो जब थी जब आप घटना की बुनियाद भी बताते कि आखिर सरकार को आखिर ये कदम क्यों उठाना पड़ा?
अगर आप उनके इस आरोप का जवाब नहीं देती हैं तो लगेगा कि बीबीसी भी एक विश्वसनीय संस्था नहीं है और उसके उच्च अधिकारी अपने पद का दुरूपयोग करते हैं. और वे अधिकारी सिर्फ जो मन मैं आया वो लिख देते हैं तार्किक कुछ भी नहीं होता.
आखिर बीबीसी को भी तो अपने पाठकों के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए और पाठकों को समाचार का सच जानने का हक भी है.
सलमा जी मैं भी ब्लॉग में लिखी आपकी बातों से सहमत हूँ लेकिन अगर विषय ये नहीं होता तोमध्य प्रदेश शासन ने इस प्रकरण में जो भी किया वो मुझे गलत नहीं लगता क्योंकि परिस्थितियां समझाना ज़रूरी है समीर गोस्वामी, देवेन्द्र रावत और अजय अवस्थी ने जो लिखा है वह शब्दशः सही है न कि वो जो आपने लिखा है
आपको इन मित्रों द्वारा उठाए गए प्रश्नों का जवाब देना ही चाहिए क्योंकि आपके द्वारा लिखे गए लेख का समाज पर जो प्रभाव पड़ेगा उसके लिए केवल आप ही जिम्मेदार होंगी इसलिए एक संवेदनशील पत्रकार की जिम्मेदारी निभाएं और समस्त मित्रों द्वारा उठाये गए सवालों का जवाब दें यदि आप ऐसा नहीं करती हैं तो हमें आपकी संवेदनशीलता पर संदेह होगा कृपया मेरी किसी भी बात का बुरा न मानते हुए स्पष्ट करें कि लेख में आपका मंतव्य क्या है. ज़बरदस्ती सरकार को दोषी ठहराना उचित नहीं है.
मैं आपकी भावनाओं का आदर करती हूँ और मेरा उद्देश्य किसी पर आक्षेप लगाना भी नहीं था. न सरकार पर और न ही इसे कार्यान्वित कर रहे अधिकारियों पर.
ठीक है, हो सकता है इस परीक्षण की जाँच का उद्देश्य यह जानना हो कि शादी करने आई महिला गर्भवती तो नहीं है...लेकिन फिर पुरुष का क्या? क्या इस तरह का कोई परीक्षण है जो यह सिद्ध कर सके कि इस आयोजन में शामिल पुरुष पहले पिता बन चुका है? जब तक ऐसा संभव नहीं होता तब तक महिला को ही क्यों इस कठघरे में खड़ा होना पड़ेगा? सवाल महिला की अस्मिता का है. सच-झूठ की परख तो दोनों की ही होनी चाहिए न...
देखिए, कुछ लोगों को समझाना सच में नामुमकिन होता है. ऐसे में कुछ अच्छा हो जाए. ऐसा वे कैसे देख पाएँगे.
आपकी बात बिलकुल सही है. काहे का कौमार्य, कैसा कौमार्य. हक़ीक़त तो यह है कि दानिशमंद लोग चर्चा बहुत करते हैं लेकिन जो लोग कौमार्य की बात करते हैं उन तक न किसी दानिशमंद की पहुँच है और न ही उन तक पहुँच कर कोई इस बारे में जागरूक करने वाला है. चर्चा जारी है.
सिर्फ़ यौन रोग का परीक्षण होना चाहिए. कौमार्य का परीक्षण पूरी तरह से अनुचित है. ऐसे विचार सिर्फ़ वही पुरुष रखते हैं जिन्होंने ख़ुद किसी औरत का कौमार्य भंग किया हो.
बहुत ही अहम और संवेदनशील मसला है यह. भारतीय समाज और इसमें रहने वाले हर व्यक्ति की इस पर लगभग एक ही जैसी सोच है, यानि कुंठित और पुरातनपंथी. पुरुष समाज की बात छोड़िए महिलाएं भी इस मसले पर महिलाओं से सहानुभूति नहीं रखती हैं. उनका भी रवैया कुछ अलग नहीं है. हायम्नोप्लास्टी के इस ज़माने में भी एक ऐसी बात पर ज़ोर दिया जाना, जिसकी ग़ैरमौज़ूदगी के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं सिवाय उस एक के जिसे आमतौर पर माना जाता है. बदलाव की बयार बहनी शुरू नहीं हुई है ऐसा कहना भी ग़लत होगा लेकिन हां उसकी गति अभी मंद ज़रूर है. पश्चिमी जीवन-शैली का अनुसरण करने में हम किसी से पीछे नहीं हैं लेकिन इस मसले पर दिमाग के तालों पर लगा जंग हटने में अभी काफ़ी वक़्त लगेगा. कुंडली और गुण मिलाने की बजाय स्वास्थ्य जांच अधिक ज़रूरी और तार्किक बात है, लेकिन किसी को इन फालतू (जो नहीं करते उनके लिए) बातों में वक़्त जाया करने का ख़्याल ही नहीं आता.
हां, जो नियम लड़कियों पर लागू होता है, वो नियम लड़कों पर भी लागू होना चाहिए.
बिलकुल सही कहा आपने. इन परम्पराओं को बदलना ही होगा.
जब ये मालूम हो चुका है कि 80 फीसदी लड़के और लड़कियां 13 से 16 साल की उम्र में ही सेक्स कर लेते हैं तो फिर बाल विवाह पर रोक का क्या फायदा.