समलैंगिकों, तुम्हें सलाम !
समलैंगिकता सही है या ग़लत, प्राकृतिक है या अप्राकृतिक, क़ानून के दायरे में है या बाहर,
इन सब सवालों पर तो दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद न जाने कबतक बहस जारी रहेगी.
लेकिन मैं एक बात विश्वास के साथ कह सकता हूं और वो ये है कि समलैंगिकता से प्यार और एकता बढ़ती है.
क्या समलैंगिकों में भी, ये तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन उन लोगों में अवश्य जो कमर कस कर इसके विरूद्ध आ खड़े हुए हैं.
इसकी एक मिसाल बृहस्पतिवार को दिल्ली प्रेस क्लब में नज़र आई जब समलैंगिकों के ख़िलाफ़ एक दूसरे के सुर से सुर मिलाने के लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई और जैन धर्मों के नेता एक ही मंच पर जमा हुए.
दुनिया में बड़े बड़े समुद्री तूफ़ान आए, सूनामी में लाखों लोग मारे गए, कितने ही बच्चे आज भी कभी दवा के बगैर तो कभी रोटी के बगैर दम तोड़ रहे हैं, कितनी औरतों की इज्ज़त हर घड़ी नीलाम हो रही है...लेकिन क्या आपको याद है कि हमारे धार्मिक नेता पिछली बार कब एक साथ इस तरह से एक मंच पर आए थे?
यह काम हमारे उन भाई-बहनों ने एक ही झटके में कर दिखाया, यौन संबंधों में जिनकी पसंद हम से ज़रा अलग है.
समलैंगिकों, तुम्हें सलाम !

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
मैं वाक़ई इस बात की सराहना करना चाहता हूँ कि आपने इस मुद्दे को कैसे देखा. आपने जो कहा है वही सच्चाई है.
सुहैल भाई, बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने. इस पोस्ट को पढ के आपका पहले का पोस्ट याद आ गया!!
खैर अब मुद्दे की बात हो जाए, हमारे धार्मिक नेता चाहे वो हिन्दू, मुस्लमान या किसी दूसरे धर्म से सम्बन्ध रखने वाले हो ये केवल धार्मिक नेता नही हैं बल्कि अपने अपने धर्म के संस्कृति के ठेकेदार हैं.
इनका सरोकार भूखे बच्चों, बलात्कार की शिकार महिलाओं से नही है. ये तो बस सभ्यता और संस्कृति के पहरेदार हैं.
सुहैल जी आप क्या कह रहे हैं मैं समझा नहीं ... अगर आप ये बताने की कोशिश कर रहे हैं की समलैंगिकता के कारण ही सभी धर्म के लोग एक जुट हुए हैं तो मैं बताना चाहूँगा कि ये आपकी अपनी सोच है . गलत को गलत नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे ये और बात ही की समुद्री तूफ़ान या सूनामी के समय में सभी एक जुट नहीं हुए लेकिन उसके बारे में अपनी प्रतिक्रिया तो प्रकट करते हैं . हालाँकि मैं आपकी एक बात से सहमत हूँ और खुश भी हूँ कि सभी धर्म के नेता एक साथ आगे आये . लेकिन समलैंगिकों को सलाम क्यों ? किस ख़ुशी में ?
सुहैल साहब एक तरह से आपका कहना ठीक है और एक तरह से ग़लत. लेकिन मैं टाइटल नहीं समझ पाया. रही बात एकता की तो कोई भी धर्म नहीं कहता है कि आपस में लड़ो बल्कि ये कहता है कि आपस में मिल कर रहो, भाईचारा रखो.
लेख अच्छा लगा.
समलैंगिक लोग आपस में पति-पत्नी की तरह कैसे रह सकते? ईश्वर ने तो नर-नारी बनाए थे, पलस-माइनस तार से लाइट जलती है. पलस-पलस जोड़ कर अंधेरे में ही बैठे रहेंगे या माइनस-माइनस से भी वही हालात रहेंगे. ये तो दाल से दाल खाने जैसी बात हुई, दाल और रोटी दुनिया खाती है. ये तो बड़ा ही अनूठा अंदाज़ है. सारी सृष्टि पशु-पक्षी, चर-अचर सभी अलग लिंग को जीवन साथी बनाते हैं, क्या मनुष्य ही ऐसा है जो नए नए तरीक़े ईजाद करता रहता है.
वाह क्या नज़रिया है सोचने का. बिल्कुल अलग लेकिन शानदार.
प्रिय सुहैल जी, दिमाग़ को हिला कर रख दिया धर्म के ठेकेदारों के बारे में. लेकिन जब आप विदेशी आँख से भारत को देखते हैं तो क्या आप ऐसे भारत पर गर्व करेंगे जहां सारे गे हों? क्या गे भारत को युद्ध से बचा सकेंगे? हम कैसे अपनी प्रार्थनाओं में ध्यान लगा सकेंगे जब सारी जगह मंदिर, मस्जिद चर्च और गुरूद्वारे में गे ही गो हों. क्या आप आने वाली नसल को गे देखना चाहते हैं?
अच्छा लगा इस विकट समस्या को अलग ढंग से देखने का आप का नज़रिया. धर्म के ठेकेदारों पर आप का कटाक्ष अच्छा लगा. कुछ भी हो, समलैंगी व्योहार समाज और देश दोनों के लिए ख़तरनाक है, मैं मानता हूँ ये एक रोग है और इसका इलाज होना चाहिए. समलैंगी लोगों को हॉस्पिटल में जाकर अपने "हारमोंस का संतुलन" ठीक कराना चाहिए ताकि वे सामान्य ढंग से सोच सकें, सड़क पर आकर नृत्य करने से कुछ नहीं होगा.
ये कैसा सलाम है. अगर आतंकवादियों के विरुद्ध पूरा देश एक होता है तो सुहैल भाई आतंकवादियों को सलाम करेंगे.
क्या बात है. बहुत ख़ूब सुहैल जी. मैं भी सोच रही थी कि जो काम हज़ारों बेक़सूर लोगों की जान नहीं कर सकी, जो काम मासूम बच्चों के आँसू नहीं कर सके, वो काम हमारे समलैंगिक देशवासियों ने कर दिखाया.
हमारे देश में बहुत सारे लोग ट्रांसजेंडर हैं. उनको कभी सरकार ने कोई आरक्षण नहीं दिया. न कोई घर, न शिक्षा, ना ही सम्मान! कोई उनकी पढ़ाई या मानवाधिकार के लिए बातें नहीं करता लेकिन समलैंगिकता के बारे में तो सभी मुँह फाड़े खड़े हैं. शायद अच्छा हो, हम पश्चिम की नक़ल न करें और समलैंगिकता को मानसिक बीमारी ही रहने दें नहीं तो कल ये कुछ और अप्राकृतिक बातों को अपना अधिकार कहने लगेंगे.
सुहैल जी, जो आप कह रहे हैं वो आपकी अपनी सोच है. सच तो ये है कि समलैंगिकता भारतीय संस्कृति से बिलकुल परे है. ऐसे मुद्दों को अपने ब्लॉग में जगह ना ही दें तो बेहतर है.
सुहैल जी, मैं आपकी राय से बिल्कुल सहमत हूँ क्योंकि हमारे देश में इस तरह की बातों से ही सभी धर्मो के लोगों या धर्म गुरुओं का ध्यान आकर्षित होता है. चलो मेरे ख़्याल से ये एक शुरुआत हो सकती है, यदि हमारे देश में नेताओं, धर्म गुरुओं और साथ ही आम लोगो में यह धारणा घर कर जाए कि न सिर्फ़ समलैंगिकता जैसे मुद्दों पर एकमत हों बल्कि हर तरह के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक पहलुओं पर एकत्रित होकर अपनी राय स्वतंत्र रुप से अभिव्यक्त करें और साथ ही सभी संवेदनशील मुद्दों पर लोगों को जागरुक करें. धन्यवाद.
समलैंगिक यौन संबंध एक अप्राकृतिक संबंध है, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं एक विज्ञान का छात्र हूँ. जन्तु जगत में सबसे निम्न प्राणी से लेकर विशाल काय व्हेल तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ एक ही लिंग के जन्तु यौन सम्बन्ध बनाते हैं, संतान उत्पन्न करते हों. रही बात नज़रिए की तो मैं कहना चाहता हूँ कि मैं समलंगिकता का इसलिए समर्थन करूँगा क्योंकि इसमें एक मानवीय पहलू ये हैं की शारीरिक एवं यौन रूप से अक्षम लोगों को भी सेक्स का अधिकार होना चाहिए क्योंकि वह अपने समान लोग से ही ऐसा कर रहे हैं. इसी क्रम में यदि कुछ शारीरिक एवं यौन रूप से सामान्य लोग भी ऐसा करते है तो जनसंख्या तो कुछ कम होगी और भारत जैसे देश का कुछ भला भी हो जाएगा.
इस्लाम के लिहाज़ से अल्लाह ने प्रेम के लिए मर्द और औरतें बनाईं. समलैंगिकता इस्लाम में पूरी तरह से वर्जित है. इसका वर्नण क़ुरान में है और हम क़ुरान में विश्वास करते हैं. हम क़ुरान के ख़िलाफ़ कैसे जा सकते हैं.
बीबीसी की ये आदत बनती जा रही है कि यह ऐसे मुद्दे उठाती है जिसकी कोई बुनियाद नहीं है. क्या सुहैल जी ये कहना चाहते हैं कि समलैगिकता क़बिले क़बूल है? मैं कहुंगा कि मैं पूरी तरह से इसके ख़िलाफ़ हूँ.
समलैंगिकता अप्राकृतिक है. इसका सबूत ये है कि अगर प्रकृतिक होता तो उन्हें सेक्स के नतीजे में बच्चा क्यों नहीं होता? जब भगवान ने ही उसे प्राकृतिक नहीं रखा तो हम कौन हैं उसे सही बताने वाले.
सुहैल जी, धारा 377 पर अभी बहस शुरू ही हुई थी कि सारे मीडिया वाले समलैंगिकों के समर्थन में चले गए. और अब आप भी. आपके देश में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबकी अपनी अपनी धारणाएँ हैं. ये ऐसा मुद्दा है जो भारत जैसे देश में स्पष्ट है. बहुत बार वे एक साथ आए हैं. मुझे हैरत है कि आपने उन्हें 26/11के मुंबई हमले में एकजुट कैसे नहीं देखा. ये सिर्फ़ एक उदाहरण है. मैं आपको बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ जब वे देश और समाज के हित में एक साथ सामने आए. अब आपके पास सिर्फ़ दो ही रास्ते हैं या तो समलैंगिकों को सलाम नहीं करें या फिर क़साब जैसे लोगों को भी सलाम करें क्योंकि उनकी वजह से भी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एक मंच पर आए.
बिल्कुल सही कहा आपने, इनको किसी की भावना से कुछ भी लेना देना नहीं. बस अपनी ही फ़िक्र है. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि इस पर इतना बवाल क्यों हो रहा है. शायद इसलिए कि कहीं समलैंगिकता से धार्मिक बंधन ख़त्म हो जाते हैं, भेद-भाव ख़त्म हो जाता है जो कि धर्म के ठेकेदार नहीं चाहते. नहीं तो मैं नहीं समझता कि अगर कोई गे है तो इस बात से उनका क्या लेना देना है.
सुहैल भाई को शायद ये नहीं मालूम कि समलैंगिकों में भी काफ़ी एकता है जो आम ज़िंदगी में सोची भी नहीं जा सकती. उदाहरण के लिए मैं ऐसे कई समलैंगिक जोड़ों को जानता हूँ जो सामान्य ज़िंदगी में एक दूसरे से शायद ही कभी मिलते या वास्ता रखते उनके सामाजिक विरोधाभासों की वजह से. लेकिन वे आज एक साथ हैं क्योंकि उनकी चाहत एक है. इनमें एक पाँच हज़ार कमाता है और 10वीं पास है तो दूसरा एक कंपनी का सीइओ है और वह लाखों में कमाता है पर वे एक दूसरे के बग़ैर नहीं रह सकते. और हाँ, एक हिंदू है तो दूसरा मुसलमान, ऐसी कई मिसालें हैं जिनमें आर्थिक रूप से कोई समानता नहीं लेकिन वे एक साथ हैं. क्या ऐसा और कहीं संभव है.
कश्यप जी सलाम इसलिए क्योंकि आख़िर जो काम बड़े बड़े दंगों ने, तूफ़ानों ने, आपदाओं ने नहीं कराए वो काम और कौमी एकता समलैंगिकों के एक फ़ैसले से हो गया. बड़ा सुंदर नज़ारा था. पंडित, मौलवी, पादरी और गुरू आपस में लगे भाई भाई. क्या इस देश में इसी मुद्दे पर उन्हें एक साथ आने की ज़रूरत है क्यों नहीं बाक़ी ऐसे ज़रूरी मुद्दों पर ठेकेदारों की आँखें खुलती हैं?सुहैल साहब का कहना बिल्कुल वाजिब है, ये धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों पर तमाचा है.
सुहैल साहब, आप मुस्लिम होकर ऐसी बातें करते हैं. आपने क्या क़ुरान की तफ़सीर नहीं पढ़ी. कि अल्लाह ताला ने पैग़म्बर लूत के अनुयाइयों पर अज़ाब भेजा. इसकी वजह ये थी कि वे लोग समलैगिक थे. पैग़म्बर ने उन्हें कहा था ऐसे गुनाह न करें और जब उन्होंने मानने से इंकार कर दिया तो अल्लाह ने फ़रिश्ते जिब्रील को भेजा. फ़रिश्ते ने सारे लोगों को अपने पर पे उठा लिया और आसमान की ऊंचाई से ज़मीन पर दे मारा. समलैंगिकता से बचने के लिए इसे हमें सब लोगों से कहना चाहिए. इसी तरह से हम सारी दुनिया के लोगों को बता सकते हैं कि आए दिन क्यों नई नई बीमारियाँ पैदा हो रही हैं क्योंकि पैग़म्बर ने कहा जब व्यभिचार आम हो जाएगा तब नई बीमारियाँ पैदा होंगी. हमें दुनिया को अच्छा बनाना है इसलिए हमको बुराईयों के विरूद्ध होना चाहिए. हमें प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाने की क्या ज़रूरत है. महिला-पुरूष यही प्रकृति का नियम है.
मैं भी सुहैल साहब को सलाम करता हूँ. मुझे समझ में नहीं आता कि पाठक बिना समझे अपनी टिप्पणी कैसे लिख देते हैं. मैंने जो समझा वो ये है कि सारे धर्म मजबूरों की मदद करने के लिए कभी एक साथ नहीं आते जहाँ उनकी ज़रूरत है और वहाँ एक साथ आए हैं जहां इसकी ज़रूरत नहीं है, जहां न वे मजबूर हैं और न उन पर कोई दबाव है. मैं ये नहीं कहता कि ये चीज़ अच्छी है मेरा ये कहना है कि दूसरे अहम मुद्दों के मुक़ाबले ये ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है.
धर्म वाले आपस में लड़ते हैं लेकिन कभी किसी एक मुद्दे पर इकट्ठा भी हों तो आपको नागवार गुज़रता है जो आप इतनी हल्की टिप्पणी कर बैठे. बात धर्म की इसलिए है क्योंकि हमारा धर्म चाहे कोई भी हो वो केवल नारी और पुरुष की शादी को ही मान्यता देता है. अब कोई पुरुष कहे कि किसी पशु से शादी करुँगा तो धर्म चुप नहीं रह सकता. हमारे ऊपर ये धर्म आदि काल से नियंत्रण करता आया है. यदि धर्म नहीं होगा तो अधर्म ही बचेगा जो हम सबको ले डूबेगा. जिसका ज़िक्र इक़बाल ने अपनी गीत में किया है, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी.
सुहैल जी आप सही बात कह रहे हैं लेकिन इस बिनाह पर आप समलैंगिकों का समर्थन नहीं कर सकते. समलैंगिक मानसिक रूप से बीमार होते हैं और उन्हें उपचार की ज़रूरत है.
बहुत ही अच्छा लेख है
आपके विचार अच्छे लगे, काश इस छोटी से बात को सब समझ पाते कि जाती, धर्म, भाषा है देश प्रेम परिभाषा, जय हिंद.
han samlanigkta ko salam, kyun ki
हाँ समलैंगिकता को सलाम क्योंकि
बढ़ेगी बीमारी यौनाचार से, कम होगी आबादी इस व्यवहार से
क्योंकि नर और नर के मिलन से पैदा कभी नहीं होती संतान है
और इस यौनाचार से बढ़ेंगे यौन रोग और कीड़ों की तरह मरेंगे वो लोग
सुहैल साहब आप मुसलमान हैं. आपको इस्लाम के बारे में नहीं पता. पहले क़ुरान पढ़ें तब टिप्पणी करें.
अगर ऐसा है तो अपने घर में ही इस चीज़ को रखो बहुत बेहतर होगा.
सुहैल साहब ने सही लिखा है या ग़लत मैं कह नहीं सकता. जो भी लिखा है ये उनका नज़रिया है. मगर इस पूरी बात ने एक सबक़ ज़रूर दिया है कि ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत रखो और पूरी ताकत से अपनी कहो. ये देखे बग़ैर कि इसमें आपका कितना फ़ायदा या नुकसान है.
मैं सुहेल जी की बात से सहमत हूँ. कोई व्यक्ति अपने हिसाब से जीना चाहता है तो एक लोकतांत्रिक देश को इससे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. अगर वोह किसी को कोई नुक्सान न पंहुचा रहा हो. जहाँ तक सर्वधर्म सम्मेलन की बात है तो ये ज़ाहिर सी बात है कि जब भी समाज में कोई नई धारणा जन्म लेती है उसका विरोध होता है. विरोध तो जात-पात और और छुआ-छूत विरोधी आंदोलनों का भी हुआ था.अंत में वो ही विजयी होता है जो सही होता है.
आपकी ज़िम्मेदारी थी आपने कहा और लिखा भी. लेकिन जो प्रतिक्रिया है उससे कुछ लोगों को लगता है कि वो जो सोचते हैं वही सही है.
मैं ख़ुश हूँ कि आपने समलैंगिकता के मुद्दे पर कोर्ट के फ़ैसले को समझा है. सच में धार्मिक नेता इस मुद्दे पर तो इकट्ठा हो गए हैं लेकिन दूसरे ज़रूरी मुद्दों पर आँख बंद करके बैठे रहते हैं.
सुहैल भाई भगवान ने हमें आदमी और औरत बनाकर क्यूँ भेजा इसका जवाब देंगे तो फिर मैं आपके विचारों के बारे में लिखूँगा.
आपका नाम सुहैल है लेकिन आप कहीं से मुसलमान नहीं लगते.
समलैंगिकता एक घोर अपराध है और कई अपराधों की जड़ है. सिर्फ़ कुछ वाह-वाही बटोरने के लिए आप एक ग़लत काम की ख़ूबसूरतियाँ बयान कर रहे हैं.
सुहैल साहब समलैंगिकता सही है या ग़लत ये तो शायद कोई नहीं बता सकता. लेकिन बात राजनेताओं और धार्मिक संगठनों के एक साथ आने की है तो इसमें उनका फ़ायदा है तभी साथ हैं. सही बात सूनामी और दूसरे किसी प्रलय की तो उसमें ये लोग कहाँ वक़्त निकालेंगे उनके घर जाकर उनका हाल चाल जानने का, तब उस काम में इन्हें अपने मुनाफ़े की रोटी सेकने को नहीं मिलेगी.
सुहैल साहब सलाम
आपने ठीक फ़रमाया कि देश दुनिया में इतनी बड़ी बड़ी घटनाएँ घटीं पर हमारे धर्म गुरु कभी एक मंच पर नहीं आए मगर समलैंगिक के मामले में सभी एक सुर में और एक मंच पर बात कर रहे हैं. सुहैल साहब को मालूम होना चाहिए कि इस पृथ्वी में अगर जीवन चक्र को बचाए रखना है तो समलैंगिकता को क़ानून बनने से हमें रोकना होगा नहीं तो लोग समलैंगिकता की तरफ़ आकर्षित होते चले जाएँगे और मनुष्य का जन्म रुक जाएगा.
राजेश प्रियदर्शी ने बताया था कि उनको ठंडी बियर से सुकून मिलता है, सुहैल साहेब ने समलैंगिकता के बारे में लिखा है. बीबीसी को क्या हो गया है, गलत चीज़ों की पैरवी करने की आदत सी बना ली है आप लोगों ने.
सुहैल जी आपके पास मीडिया की ताक़त है लेकिन इसका इस्तेमाल ग़लत चीज़ों के लिए मत करें. अगर कुछ ग़लत है तो ग़लत है. ज़रा सोचिए कि आपका बेटा या बेटी भी इनमें से एक हो तो आप क्या करेंगे. भगवान ने औरत और मर्द को बनाया है और उनमें यौन संबंध होना स्वाभाविक है. कल को आप कहेंगे कि जानवर के साथ भी यौन संबंध बना सकते हैं. ये सब ग़लत है और इसीलिए लोग विरोध कर रहे हैं. हर धर्म में इसे ग़लत माना गया है तो कुछ तो ख़राबी होगी इसमें. इसलिए किसी को सलाम करने की ज़रूरत नहीं है.
ये सब इस्लाम के ख़िलाफ़ है.
कहीं पे निगाहें, कहीं पे इशारा
मार डाला रे जालिम, मार डाला
सुहैल सा’ब, अंदाजे बयां के कायल हैं हम आपके.
समाज के कमज़ोर वर्गों को होने वाली तकलीफ़ों के मुकाबले ये मसला उतना गंभीर नहीं है. ऐसे में एड्स फैलने का भी ख़तरा है, सिर्फ़ वही लोग इस मुद्दे पर बहस कर रहे हैं जिन्हें ग़रीबी, शिक्षा जैसे सामाजिक मुद्दों में रुचि नहीं है.
सुहैल जी आपको शर्म आनी चाहिए. आप मुस्लिम होकर समलैंगिकता का समर्थन कर रहे हैं, इस्लाम में इसकी इजाज़त नहीं है. हिंदुस्तान में बहुत से धर्म हैं. कोई धर्म इसकी अनुमति नहीं देता. इसको समर्थन देने के एक नए वायरस को इजाद होने का न्यौता न दें. भारत में सब समलैंगिक हो जाएँगे तो देश को कौन संभालेगा.
एडवर्ड का कहा बिल्कुल ठीक लगा। सुहैल साहब ने तो बहुत ही अच्छी बात कही कि धर्म गुरु एक मंच पर आये, तो क्यों आये, एक ऐसे मुद्दे को लेकर जिससे कम से कम किसी की जान तो नहीं ही जा रही है, लेकिन इनका उन मुद्दों पर एक साथ नहीं खड़ा होना ज्यादा अखरता है, जिनमें इन्हें चट्टानी एकता प्रदर्शित करनी चाहिए। एडवर्ड भाई, आप जो कोई हैं, मैं एक बात कहना चाहूंगा कि बीबीसी में पाठकों की प्रतिक्रिया बहुत ही निम्न स्तर की होती है। बिना समझे बात को कह देना लोगों ने शगल बना लिया है। असल में इसका कारण क्या है, मैं बताता हूं। चूंकि बीबीसी एक प्रतिष्ठित मंच है और हर छोटे-बड़े अकलमंद, पैंतराकार या फिर बुगुर्वा वर्ग के नासमझ लोगों की यह दिली ख्वाहिश रहती है कि वह इस प्रतिष्ठित मंच में अपनी उपस्थिति दर्ज कर दे। और चूंकि नेगेटिव पब्लिसिटी इज़ द बेस्ट पॉलिसी अपने यहां चल निकली है, इसलिए लोग बिना सोचे समझे लगते हैं लेखक को गरियाने। वैसे जो लोग मुद्दों को समझते हैं, जानते हैं और गहराई से विषय पर सोचते हैं, उन्हें एक नज़र में पता चल जाता है कि ये टिप्पणीकार किस स्तर के हैं। मैंने तो वुस्तुल्लाह खान साहब के ब्लॉग में भी टिप्पणीकारों को खूब समझाया कि भाई ऐसा मत करो, लेखक के भाव को समझो, लेकिन मुझे नहीं लगता कि विवेक कहीं से भी धर्मान्धता पर हावी हो सकता है। कम से कम भारतीय या पाकिस्तानी समाज में तो फिलहाल इस तरह की समझदारी मुमकिन नहीं दिखती। वैसे इसका सुखद पक्ष ये है कि अतिराष्ट्रवाद या प्रतिक्रियावाद की आग में सुलग रहे इन बेचारों की संख्या काफी कम है। एक अरब 30 करोड़ के आसपास आबादी है और नासमझों की संख्या इस टिप्पणी बाक्स के आंकड़े को सैंकड़ा तक भी नहीं छू पा रही है।
यह बहुत ही ख़राब लेख है. जब किसी के पास कोई आइडिया नहीं होता तो ऐसा लेख लिखा देता है कि ताकि लोग यूं ही बहस करते रहें.
बकवस लेख, ऐसे विषयों पर कोई भी लेख, कोई भी सिनेमा, कोई भी रचना, केवल साबित करता है कि लोग कम रचनात्मक हो रहे हैं. उन लोगों के करने के लिए कुछ भी अच्छा बचा नहीं है.
मेरे ख़्याल से कोई भी धर्म एक पुराना क़ानून है और इन क़ानूनों में संसोधन होते रहना चाहिए. लोगों की आज़ादी ज़बर्दस्ती नहीं छिननी चाहिए. ध्यान देने की बात है कि जहाँ समलैंगिक क़ानून के दायरे में रहते हैं वहाँ कोई समस्या नहीं है. मैं समलैंगिकों के समर्थन में हूँ, ऐसी बात भी नहीं है, पर इस मामले में धर्म गुरू के मुक़ाबले कोर्ट को अधिक महत्व देना चाहिए.
बिल्कुल सटीक विवेचना की है सुहैल साहिब. बेहतरीन सोच रखते हैं आप. पर सुकून इस बात से है कि एक शुरूआत तो हुई. पहली बार ही सही किसी मुद्दे पर सभी धर्मों के लोग एक साथ आएं तो हैं, उम्मीद की जानी चाहिए कि एक बार मिले तो आगे भी मिलते रहेंगे. अफ़सोस है कि कुछ लोगों ने प्रतिक्रिया देने के बजाए पाठकों पर प्रतिक्रिया देने लगे हैं. अच्छा होगा कि लोग ब्लॉग पर प्रतिक्रिया दें. एक बात का ख़्याल रखें.
सवाल ये नहीं है कि शीशा टूटा या नहीं
सवाल ये है कि पत्थर किधर से आया.
सुहैल भाई ऐसा लगता है कि आपको भी बीबीसी पर सच लिखना पसंद नहीं है. वैसे भी आपको समलैंगिकों के सिए सलाम के बजाए सैलूट का शब्द प्रयोग करना चाहिए.
लगता है कि बीबीसी को सच लिखना पसंद नहीं है.
मैं एडवर्ड और नदीम अख्तर से पूरी तरह सहमत हूं. देख रहा हूं कि सुहैल जी ने बस एक ताना मारा था धर्म के इन ठेकेदारों पर, और लोग सुहैल जी को बिलावजह कोस रहे हैं मानों वो समलैंगिकों के पक्षधर हैं. बीबीसी के पाठकों से यह चूक कैसे हो गई?
जनाब सुहैल साहिब! प्रकृति का जो नियम वेद या कुरान में बताया गया है कि वही ठीक है इसको नकार से तरह तरह के अजाब आते हैं. जहाँ तक पश्चिम की बात है तो उनकी नक़ल करना छोड़ दिया जाए. समलैंगिकता को पूरी तरह से बंद किया जाना चाहिए. सरकार को ग़रीब और बेसहारा लोगों के बारे में सोचना चाहिए.
आपने बहुत ही अच्छा लिखा है.
जनाब सुहैल साहिब अगर सारे मज़हब के लोग एक मंच पर आ गए हैं तो ये अच्छी बात है लेकिन इसका योगदान एक ग़लत काम को दे रहे हैं और उसको सलाम कर रहे हैं. बहुत ही अफ़सोस हुआ, आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी. जो क़ुदरत के ख़िलाफ़ है उसे सलाम कर रहे हैं.
सुहैल साहब का समलैंगिंकों सलाम किस बात के लिए? दुनियाँ बनाने वाले ने आदमी के लिए औरत बनाई थी, आदमी नहीं, यह बहुत ही सीधी सी बात है.
सुहैल भाई हम देख रहे हैं कि बहुत से लोग आपको कोस रहे हैं, अगर धर्म की बात करें तो सभी धर्मों में ये कहा गया है कि कोई भी काम ख़ुदा, भगवान की मर्ज़ी के बिना नहीं होता, तो समलैंगिक होने की मर्ज़ी भी भगवान की है. ऐसे में मेरे भाई इसको क़बूल किया जाना चाहिए.
सुहैल भाई सुरसुरी छोड़ कर ग़ायब हो गए अब पढ़ो कुरान और इस्लाम से नावाकिफ होने के बारे में नसीहतें, फतवा जरी हो गया तो हम बचा नहीं पाएंगे आपको हमसे भी पूछ लिया गया तो कह देंगे कौन सुहैल कैसा सुहैल ? हाँ थोड़ा और लिखते तो मज़ा आता टिपण्णी छोटी लगी...
"अनेकता में एकता" भारत की विशेषता है. इससे पहले भी भारतीय सैकडों नहीं हज़ारों मुद्दों पर एक हुए हैं. व्यक्तिगत रूप से आप समलैंगिकों को सलाम करें या सजदा आप स्वतंत्र हैं. मगर एक जिम्मेदार पत्रकार के रूप में (मुझे नही मालुम ये विचार आपके अपने हैं या बीबीसी के ) समलैंगिकता के मुद्दे पर एकता का नाम लेकर आपने भारत की राष्ट्रीय एकता का मजाक उड़ाया है.