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शराब विरोधी होश न गँवाएँ

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|शनिवार, 11 जुलाई 2009, 08:07 IST

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ज़हरीली शराब पीकर मरना भारत में शायद सबसे बुरी मौत है. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि बहुत तकलीफ़ होती है, इसलिए भी कि इसके शिकार वैसी सहानुभूति के हक़दार नहीं जो दूसरी दुर्घटनाओं के होते हैं.

गुजरात में 100 से ज्यादा लोग ऐसी ही मौत मरे हैं, 150 से ज्यादा मौत से लड़ रहे हैं मगर जनता, मीडिया या प्रशासन की प्रतिक्रिया वैसी नहीं है, मिसाल के तौर पर, जैसी एक बड़ी रेल दुर्घटना के वक़्त होती है.

कुछ लोग तो रेल दुर्घटना से तुलना किए जाने पर ही बिफर सकते हैं, कहेंगे- 'और पियो, ठीक ही हुआ', 'गुजरात में तो नशाबंदी थी, किसने कहा था पीने को,' 'अच्छा हुआ, शराब पीने वालों को इससे सबक़ मिलेगा...' 'रेल में मुसाफ़िरों की क्या ग़लती है, शराबी तो अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं'...

ज़्यादातर लोगों का शायद यही मानना है कि ये लोग अकारण नहीं मरे हैं, मरने का कारण है- शराब पीना, जिसके लिए वे ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. अनाथ बच्चों का चेहरा भी दिलों को शायद उतना नहीं दुखा रहा है.

शराब को लेकर भारत के मध्यवर्ग में जितने पूर्वाग्रह और पाखंड हैं उनके ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कारणों की समीक्षा एक दिलचस्प विषय हो सकता है लेकिन इतना तो साफ़ दिखता है कि उच्च वर्ग और निम्न वर्ग दोनों में यह वर्जित तरल नहीं है.

सारी समस्या उस वर्ग की है जिससे मैं ख़ुद आता हूँ. शराब पीकर गँवाने के लिए निम्न वर्ग के लोगों के पास कुछ नहीं होता, अमीर आदमी को शराब पीने के लिए घर-बार बेचना नहीं पड़ता लेकिन मध्य वर्ग शराब को लेकर गहरी चिंता में घुलता जाता है.

मध्यवर्ग की अपनी जायज़ चिंताएँ हो सकती हैं मगर शराब से वह इतना आक्रांत है कि उसका असर उसकी मानवीय संवदेनाओं पर हावी दिखता है. 'शराबी के दो ठिकाने, ठेके जाए या थाने' या 'शराब करे जीवन ख़राब' जैसे स्लोगनों से परे देखने की उसकी क्षमता ख़त्म हो गई है, ठीक एक शराबी की तरह.

गुजरात का मामला बाक़ी देश से ज़रा अलग है क्योंकि वहाँ दशकों से नशाबंदी लागू है, बिल्कुल ईरान की तरह. शराब पीने वाले अमीर दमन-दीव, गोवा, महाराष्ट्र जाते हैं या दोगुने दाम वसूलने वाले एजेंटों से मनचाहे माल की सप्लाई लेते हैं. सिर्फ़ ग़रीब ऐसी मौत मरते हैं.

इन लोगों के परिजनों को मुआवज़ा नहीं मिल सकता क्योंकि वे शराब पीने के गुनहगार हैं, अनैतिक लोग हैं. सरकार कह रही है कि दोषी लोगों को पकड़ा जाएगा, पकड़ना ही होगा क्योंकि उन्होंने राज्य का नशाबंदी क़ानून तोड़ा है.

लोग कह रहे हैं कि गुजरात में 100 से ज्यादा लोगों की मौत 'नशाबंदी के बावजूद' हो गई जो एक गंभीर बात है, लेकिन इस बात पर बहस के लिए तैयार नहीं हैं कि यह घटना गुजरात में ही क्यों हुई, कहीं नशाबंदी ही इसकी एक वजह तो नहीं?

नशाबंदी कई मायनों में एक विवादास्पद पॉलिसी है. इस पर पूरा अमल नामुमकिन है, सरकारों को राजस्व का नुक़सान होता है, माफ़िया और बेईमान पुलिसवालों को कमाई का ज़ोरदार मौक़ा मिलता है और ज़हरीली शराब का कारोबार फैलता है...ज़ाहिर है कि नशाबंदी के पक्ष में भी अनेक तर्क हैं, यानी एक सार्थक बहस की गुंजाइश है.

ये भी मत भूलिए कि शराब पीना कुछ इस्लामी देशों और गुजरात को छोड़कर बाक़ी दुनिया में क़ानूनन अपराध नहीं है.

सिगरेट, गांजा, अफ़ीम, चरस बुरी चीज़ें हैं, जुआ भी, वेश्यावृति भी और न जाने कितनी बुराइयाँ जिनकी सूची अनंत है, शराब भी उन्हीं में से एक है.

शराब अगर एक समस्या है तो उससे निबटने के सार्थक और व्यवाहारिक प्रयास होने चाहिए, कोरे नैतिकतावादी-आदर्शवादी रवैए से सबका नुक़सान होगा, लोग सदियों से शराब पीते रहे हैं, आज भी पी रहे हैं और आगे भी पीते रहेंगे, इस तथ्य को स्वीकार किए बिना कोई कारगर नीति नहीं बन सकती.

ऊपर जो भी लिखा है उसके बारे में अगर आपका ये निष्कर्ष है कि मैं शराब पीने के पक्ष में हूँ तो मुझे ऐसा ही लगेगा कि आप नशे में हैं. जो लोग बहस के बीच में व्यक्तिगत सवाल उठाने के शौक़ीन हैं उनकी जानकारी के लिए सच बताना ज़रूरी है कि ठंडी बियर मुझे सुकून देती है.

अंत में एक सलाह-- गंभीर समस्याओं पर शराब या नैतिकता के नशे में नहीं सोचना चाहिए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 10:37 IST, 11 जुलाई 2009 Iqbal Fazli, Asansol (WB):

    राजेश प्रियदर्शी ने विभिन्न मुद्दों पर एक निश्चित राय कायम कर ली है. पहले उन्होंने समलैंगिकों को समर्थन किया और अब वो शराब के समर्थन में आ गए. ये देखना दिलचस्प होगा कि वो कुछ विवादास्पद विषयों पर क्या विचार रखते हैं.

  • 2. 10:47 IST, 11 जुलाई 2009 afsar kamal:

    शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए. सरकार को विज्ञापन अभियान चलाकर हर शख्स को शराब के खतरे से आगाह कराना चाहिए. शराब पीने से न जाने कितनी बीमारियाँ लगती हैं. ये हर बोतल पर लिखा होना चाहिए. इस विषय पर जनमत लेकर सरकार को प्रतिबंध का निर्णय लेना चाहिए.

  • 3. 11:05 IST, 11 जुलाई 2009 amarjit singh:

    आपने बहुत सही बात कही है, मोदी सरकार को सोचना चाहिए.

  • 4. 11:11 IST, 11 जुलाई 2009 dinesh manohar:

    आपने सही कहा कि भारत में शराब को लेकर बहुत पाखंड है लेकिन हमारे देश का समाज बिलकुल तैयार नहीं है. शराब पर खुलेपन के साथ तर्कपूर्ण बहस होनी चाहिए.

  • 5. 11:14 IST, 11 जुलाई 2009 dhiren mishra:

    राजेशजी आपकी बात वैसे तो सही लग रही है, लेकिन अगर लोग पीते हैं तो इसका ये मतलब नहीं है कि उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया है. भारत में बीमारी से मरने वालों की चिंता नहीं की जाती तो शराबियों का ध्यान रखने की फुरसत किसे होगी. आप जैसे कुछ बुद्धिजीवी हैं जो बीच बीच में ऐसी बातें कहते रहते हैं.

  • 6. 13:10 IST, 11 जुलाई 2009 Kunal Parashar:

    जनाब नशेमन को हमेशा नशे की जरूरत नहीं.मेरे विचार से आपकी लेखनी शायद सार्वभौमिक हो सकती हैं.सवाल व्यक्तिगत पसंद-नापसंसद का नहीं है.दरअसल समस्या हमारे डिसीजन मेकर्स की इच्छाशक्ति में है.जो चीजें हमारे हुक्मरान नहीं कर सकते.वो जनता से करने की उम्मीद करते हैं.हालांकि अगर आपको ठंढ़ी बीयर सुकून देती है तो जरूरी नहीं कि सबको ये सुकून ही दे.सब गड़बड़झाला है.

  • 7. 14:28 IST, 11 जुलाई 2009 SHABBIR KHANNA:

    राजेश जी, आपने बहुत सही लिखा है. यह सच्चाई है कि इतने बड़े हादसे के बाद किसी ने भी पीड़ित परिवारों को सांत्वना नहीं दी है. आपका यह भी कहना सही है कि मुस्लिम देशों में शराब पर पूरी तरह पाबंदी होने के बाद भी वहाँ लोग शराब पीते हैं. अगर मैं सच लिख दूँ तो शायद कल का सूरज न देख पाऊं लेकिन भारत में वो भी गुजरात में ऐसा होने के बावज़ूद मुख्यमंत्री मोदी चुप हैं. यह सोचने वाली बात है. उनकी सरकार को अपनी ग़लती मारकर मृतकों के परिजनों को सहायता देनी चाहिए

  • 8. 15:23 IST, 11 जुलाई 2009 jai prakash tanwar:

    किसी वस्तु को निषेध करके कोई हल नहीं निकाला जा सकता है. उसे जनता में सुलभ बना देना चाहिए. इससे सरकार की आमदनी तो बढ़ेगी ही साथ में कुछ दिन में ही जनता में उसको लेकर उत्साह ख़त्म हो जाएगा. जिस तरह अमरीका ने 60 के दशक में अश्लील फ़िल्मों को स्वीकृति दे दी थी और कुछ ही दिनों में लोगों का रूझान उस ओर से घट गया. मनुष्य एक जिज्ञासु प्राणी है, उसे आप कोई काम करने से जितना रोकेंगे, वह उतना ही उसके लिए लालायित होगा. आसानी से जो चीज मिल जाए उसके प्रति आकर्षण नहीं के बराबर होता है.

  • 9. 15:52 IST, 11 जुलाई 2009 Idrees A. Khan:

    प्रियदर्शी साहब, समलेंगिकता शराबखोरी और ऐसे ही कई टेबू विषयों का विरोध करने वाले इतने पाखंडी नही होते जितने इनका समर्थन करने वाले होते हैं. कई लोग इन चीज़ों का समर्थन सिर्फ़ इसलिये करते हैं क्यूकि उन्हे लगता है कि विरोध करने पर उन्हे दकियानूसी होने का खिताब दे दिया जएगा. और तो और कई लोग इसलिये शराब पीने लगते हैं क्यूकि उनके कई दोस्त पीते हैं और अगर उन्होने अपने दोस्तों की हां मे हां मिलाते हुए उनका साथ नही दिया तो उन्हे पुराने ख्यालात का पिछ्ड़ा हुआ बंदा समझा जएगा, पिछ्ले दिनो अमरीका मे मिस केलिफोर्निया से उसका ताज सिर्फ इसलिये छीन लिया गया क्यूंकि उसे लगता था की शादी सिर्फ़ औरत और मर्द के बीच होनी चाहिये. अब आप बताइये एसे मे इन चीज़ों का विरोध करने का पाखंड कौन करेगा.
    रही बात भारत मे शराबखोरी की तो क्या आपको लगता है कि शराब ज़िंदगी के लिये इतनी ज़रूरी चीज़ है कि ये उस आदमी को भी पीनी चाहिये जो दिन भर मे सिर्फ़ 50 रुपये कमाता है. और जब पैसे नही मिलते तो अपने पत्नी की पिटाई करता है, उधार लेता है, घर के बर्तन गिरवी रखता है, चोरी करता है, और फिर किसी देसी के अड्डे से निकल कर रात भर सड़क के किनारे किसी नाली मे पड़ा रेहता है.

    अगर सचमुच ये इतनी ज़रूरी है कि इसके बिना जिया नही जा सकता तो सरकार से कहिये कि गेहूं चावल की तरह इसके लिये भी ग़रीबी रेखा वाले राशनकार्ड बनवा कर इन लोगों को हर महीने का कोटा मुहैया करवा दिया करे ताकि ये लोग ज़हरीली शराब पीकर यूं न मरें.

  • 10. 15:57 IST, 11 जुलाई 2009 Amit:

    यह कहना ग़लत होगा कि लोगों को शराब पीने की अनुमति दे देनी चाहिए, क्या अभिभावक अपने बच्चों की ज़हर पीने की अनुमति दे सकते हैं. इसी तरह सरकार भी कैसे किसी को शराब पीने की अनुमति दे सकती है. मुझे लगता है कि शराबबंदी के लिए समाज को पहल करनी चाहिए. अगर कोई कहता है कि शराब पीने या न पीने पर बहस होन चाहिए तो मुझे लगता है कि उसे जीवन की सही समझ नहीं है.

  • 11. 16:49 IST, 11 जुलाई 2009 Ritesh:

    इसमें क्या आश्चर्य की बात है | यह सभी जानते है कि हमारे समाज की सभी मर्यादाएं और नियम केवल मध्य वर्ग के लिए ही है और केवल मध्य वर्ग ही उनका पालन करता है क्योंकि केवल यही वर्ग है जिसके पास खोने को सब कुछ है , कुछ जमा पूंजी और मान इसीलिए वह समाज और कानून के बनाये हुए नियमो से डरता है | इस बात को समझने के लिए किसी शोध की आवश्यकता नहीं है | और यह बात केवल मदिरा सेवन पर ही नहीं सभी नियमों पर लागू होती है, पर स्त्री के साथ सम्बन्ध, मारपीट अथवा दुसरे अपराध | उच्च वर्ग को पता है की हमारे समाज में पैसा वो ढाल है जो उसे हर प्रकोप से बचा लेगा और निम्न वर्ग को पता है की उसके पास खोने को कुछ नहीं इसलिए दोनों ही अपने आप को समाज के हर नियम से परे मानते है | इसलिए किसी भी नियम पर इसलिए सवाल उठाना क्योंकि ये दोनों वर्ग इसका पालन नहीं करते अपने आप में बेवकूफी है.

  • 12. 17:48 IST, 11 जुलाई 2009 उमेश यादव :

    राजेश जी !! बड़ा ही भ्रामक लेख है आप का. अपने कहा "सार्थक और व्यवहारिक प्रयास होने चाहिए, कोरे नैतिकतावादी आदर्शवादी रवैए से सबका नुक़सान होगा". मुझे तो कोई बड़ा व्यवहारिक उपाय नहीं दिखता है. बस एक उपाय है कि "वयस्क लोग पीना चाहें तो पी सकते हैं एक ज़िम्मेदार इन्सान की तरह ".

    जैसे और वस्तुओं की तस्करी तथा गैर कानूनी व्यवसाय हो रहा है वैसे करने वाले शराब और जहरीली शराब का भी कर रहे हैं. रोक ऐसे लोगों पे लगे जो लोग इस तरह की शराब उपलब्ध कराते हैं. अगर आप का इशारा "नशाबंदी कानून" को गुजरात से हटाने की ओर है तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जहाँ पर यह कानून नहीं है वहां भी लोग ऐसी शराब पी के मर चुके हैं. रही बात ठंडी बियर की तो वह मुझे भी बहुत शुकून देती है.

  • 13. 17:54 IST, 11 जुलाई 2009 vivek kumar pandey:

    राजेश जी, आपने अच्छा मुद्दा उठाया है. मुझे आपका यह हास्य व्यंग अच्छा लगा.

  • 14. 19:05 IST, 11 जुलाई 2009 Deepak Tiwari:

    राजेश जी, शराबबंदी सही है या नहीं ये बहस का विषय हो सकता है लेकिन शायद आपको याद हो कि कई राज्यों में जहां शराब बंदी नहीं है वहां से भी ज़हरीली शराब पीकर मरने वालों की ख़बरें आती रहती हैं. हां ये अलग बात है कि मरने वालों की तादाद इतनी नहीं रहती है. इसमें दोष पीने वालों का नहीं है बल्कि उन लोगों का है जिन्होंने ये ज़हर बेचा.

  • 15. 21:37 IST, 11 जुलाई 2009 सुधीर शर्मा:

    मेरे विचार से शराब के मामले में व्यवहारिक तरीका ठीक है, इस झूठ से सबका नुकसान होता है कि लोग शराब पीते हैं लेकिन उसके बारे में बात नहीं करते हैं. भारत में लोगों को शराब के बारे में अच्छी तरह समझाने कि उससे क्या खराबी है, कितना पीना सकते हैं, ज्यादा नहीं पीना चाहिए, शराब बुरी चीज़ है लेकिन अगर उसे पुरी तरह रोका नहीं जा सकता तो उसे ठीक से नियन्त्रित करना चाहिए.उस पर पूर्ण पाबंदी लगाने से उसकी कालाबाजारी होगी और जहरीले शराब का धंधा बढ़ेगा.कहना आसान है लेकिन प्रतिबन्ध लगाना मुश्किल काम है.सही लिखा है आपने.

  • 16. 21:41 IST, 11 जुलाई 2009 munish kumar:

    आप जिस मध्य वर्ग को बुरा कह रहे हैं उसी ने भारत की संस्कृति को बचा रखा . न तो अमीरों को परवाह है और न ही ग़रीबों को. मध्य वर्ग एक समझदार वर्ग है जिसे पता है कि शराब बुरी चीज़ है. कुछ लोग अपर क्लास होने के नाम पर पीते हैं उनकी वजह से दोहरा मापदंड दिखता है. हां पूरी नशाबंदी का आइडिया भी सही नहीं है.

  • 17. 21:53 IST, 11 जुलाई 2009 vaibhav:

    आपके लेख की अंतिम पंक्ति से मैं बड़ा प्रभावित हुआ हूँ और इस लेख के लिए प्रियदर्शी जी को बधाई भी देना चाहूँगा. किसी भी योजना को क्रियान्वित करने से पहले उसके सभी सकारात्मक एवं नकारात्मक पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए. लगता है कि मोदी जी ने इस योजना के नकारात्मक पहलुओं पर विचार नहीं किया . साथ ही गुजरात सरकार का यह निर्णय समाज के एक वर्ग की सोच से ही प्रभावित लगता है . समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो इस बात को अब मान चुका है कि शराब पीना बुरा नहीं है, अगर इससे किसी को तकलीफ न हो , और जो लोग भी शराब का विरोध करते हैं या तो वे किसी धार्मिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं या फिर शराब के अत्यधिक सेवन को गलत मानते हैं और ये दोनों ही कारण किसी भी तरह से शराब पर पूर्ण प्रतिबन्ध को सही नहीं ठहराते .

  • 18. 22:28 IST, 11 जुलाई 2009 Pappu Kasai:

    भारत में शराब पीने पर एक तार्किक ब्लॉग देखकर काफ़ी प्रसन्नता हुई. मैं भी एक मध्यवर्गीय परिवार से आता हूँ, जहाँ शराब पीने को बुराई माना जाता है. मैं दुनिया के कई हिस्सों में गया हूँ, कहीं भी मुझे शराब पर प्रतिबंध नहीं दिखा.

  • 19. 09:08 IST, 12 जुलाई 2009 Rao Gumansingh:

    मैं गुजरात के सीमावर्ती राजस्थान के मारवाड़ का ग्रामीण होने के नाते इस मोदी मार्का और लोटिया पठान चिमनभाई के प्रदेश से अच्छी तरह वाकिफ़ हूँ. तथाकथित गांधीवादी इस प्रदेश में शराब राजस्थान से सस्ती और थोक भाव में शहरी व ग्रामीण क्षेत्र में बिना किसी मार्केटिंग के बिकती है. शराबबंदी के वायरस से संक्रमित मोदी सरकार ने कुछ पांच सितारा अमीर होटलों में ज़रूर शराब के परमिट जारी किए थे जिसकी तथाकथित गांधीवांदी कांग्रेसियों ने विरोध दर्ज करवा कर घडिय़ाली आंसू मिडिया के सामने बहाए थे जबकि गुजरात में सौ में से 99 फ़िसदी नेता इस कथित वायरस से पीड़ित हैं. यदि सर्वेक्षण कराया जाए तो सभी नेता और गुजराती शराब पर पाबंदी खुलवाने के पक्ष में खड़े नज़र आएंगे. राजस्थान से ज्यादा शराब गुजरात में प्रशासन की शह पर बिकने के बाद भी मधुशालाओं पर पाबंदी एक तरह का तुगलकी फ़रमान मात्र है. मोदी सरकार को राज्य और प्रजा के हित में यह आसान और सरल क़दम शीघ्र उठाना चाहिए. जिससे ग़रीब और लाचार बेमौत मारे न जाएँ.

  • 20. 10:03 IST, 12 जुलाई 2009 Prem Verma:

    राजेश जी, शराब, चरस, गांजा, भांग, हीरोइन, स्मैक आदि नशे के विविध रूप हैं. आपको इनमें से कौन सा भाता है. ख़ैर आपने तो लिख ही दिया है कि ठंडी बीयर आपको पसंद है. भारत में कोई भी नशा प्रतिबंधित नहीं होना चाहिए, आप यही चाहते हैं न. अगर ऐसा हो जाए तो क्या आप इस बात की गारंटी लेंगे कि फिर कोई ज़हरीली शराब पीने से नहीं मरेगा. रही बात ज़हरीली शराब पीने वालों की मौत की तो, उनके साथ सबकी सहानुभूति है. मीडिया पुलिस, नेता और शराब ठेकेदारों की मिलीभगत को क्यों नहीं उजागर करता है, जो इस तरह की घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार है.

  • 21. 11:11 IST, 12 जुलाई 2009 sanjay das:

    ठंडी बीयर के शौकीन राजेश जी की लेखनी का कायल हो गया. आपने ईमानदारी और निर्भीकता से अपने विचार रखे. आदमी अपना नुकसान करने के लिए बहुत काम करता है लेकिन उसे रोकने का तरीका जबरन नहीं हो सकता. उसे समझा बुझा कर सही रास्ते पर लाना चाहिए. नशाबंदी बेकार आइडिया है. कम लोगों को पता होगा कि दिल्ली में जो फ्लाईओवर बन रहे हैं उसका पैसा भी शराब पर लगे टैक्स से आया है. ब्लाग ऐसा ही होना चाहिए. बेबाक और सटीक.

  • 22. 11:24 IST, 12 जुलाई 2009 ajeet jha:

    ईमानदारी से अपने विचार रखने के लिए बधाई.. मैं शराब बिल्कुल नहीं पीता लेकिन सिगरेट को इससे अधिक बुरा मानता हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि इससे दूसरे लोगों को भी नुकसान होता है. शराब में मिलावट हो या दूध में मिलावट करने वालों के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.

  • 23. 21:38 IST, 12 जुलाई 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    मुझे तो लगता है कि छद्म और पाखण्ड भारतीय जीवन शैली के केन्द्र में हैं.गुल खायें, गुलगुलों से परहेज़ करें. शराब तो बनती रहे, उसकी आमदनी देश का 'विकास' भी हो, लेकिन शराब पीना वर्जित रहे. लेकिन आखिर कभी तो हमें इससे उबरना होगा. अलग-अलग राज्यों में शराब का खुला और बंद रहना भी एक मज़ाक है. सोचा जाना चाहिए कि क्या सरकारों के लिए इस तरह के कामों में अपनी ताकत खर्च करना उचित है? मुझे राजेश की टिप्पणी बहुत अच्छी

  • 24. 06:48 IST, 13 जुलाई 2009 Anil attri:

    लगता है कि इस विषय को राजेश जी ने ठीक से अभी नहीं समझे हैं नहीं तो उनके विचार बदले होते.

  • 25. 07:12 IST, 13 जुलाई 2009 vikas sharma:

    व्हिस्की पर गुजरात में ही क्यों पाबंदी है. क्या इसलिए क्योंकि वहाँ गांधी जी का जन्म हुआ था...

  • 26. 07:47 IST, 13 जुलाई 2009 Rustam Pashsa, Bhopal, M.P.:

    राजेश जी अनाथ बच्चों का चेहरा मेरे दिल को दुखा रहा है क्या इससे ये सच्चाई बदल जाएगी के ये लोग शराब पीकर ही मरे हैं? इसका ज़िम्मेदार कौन है इस पर बहस लंबी चल सकती है, पर आपको ये भी अच्छी तरह पता है कि ऐसी विषैली शराब पीकर उन प्रदेशों मे भी लोग मरते हैं जहां इस पर कोई पाबंदी नही है. जहां मुख्य रास्तों पर, अस्पताल और यहां तक मंदिर से सिर्फ़ 50 मीटर की दूरी पर दारू के कानूनी अड्डे चल रहे हैं, जहां हर शाम वातावरण ठर्रामयी हो जाता है, औरतों और बच्चियों को उस रास्ते से गुज़रने मे डर लगता है. क्यूंकी कुछ लोग तो अपनी बोतल लेकर चुपचाप अपने घर चले जाते हैं, पर कई लोग वहीं खड़े रेह्ते है सड़क पर, हाथों मे कटिंग चाय छाप ग्लास लेकर एक के बाद एक अपने हलक़ से नीचे उतारते हुए, वहीं ज़मीन पर या बेंच पर क्ल्लूराम की होटल का सस्ता नमकीन कटे हुए नींबू के साथ पड़ा होता है, और अगर ऐसे मे वहां से कोई लड़की गुज़र जाए तो इनमे से कई लोग उसे तब तक घूरते है जब तक वो अगले मोड़ पर आंखो से ओझल न हो जाए. ये सारा सीन बयान करके मैं शराबियों को शैतान के रूप मे पेश करने की कोशिश नही कर रहा हूं पर ये ज़रूर कहूंगा कि उच्च, मध्यम या निम्न, वर्ग कोई हो शराब ने सिर्फ़ खराबियां ही फैलाई हैं और विडंबना ये है कि ये खराबी पीने वालों तक ही सीमित नही रेह्ती उसके रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ साथ अंजान लोगों को भी अपने लपेटे मे ले लेती है.

    अंत मे एक बात के लिये मैं आपको धन्यवाद देना चाहूंगा कि शुक्र है आपने इस दुर्घटना की तुलना सिर्फ़ रेल दुर्घटना से की......!

  • 27. 10:28 IST, 13 जुलाई 2009 renu:

    राजेश जी, आपके विचार ये बता रहे हैं कि इस विषय पर आपका स्वयं का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं है. आप शराब के पक्ष में हैं या नरेंद्र मोदी के विरोध में, यह भी आपने स्पष्ट नहीं किया है. वैसे भी आजकल दुनिया में मरने वालों कि फ़िक्र किसे है. खबरों में रोज़ ही कहीं न कहीं और कोई न कोई दुर्घटना की ख़बर आती ही रहती है और ये भी सच है कि ज़्यादातर लोगों को वह सिर्फ़ ख़बर ही लगती है, इससे ज़्यादा और कुछ नहीं.

  • 28. 11:37 IST, 13 जुलाई 2009 ainy:

    राजेश जी, अगर आपने शराब के लिए धार्मिक पहलू पर भी ध्यान दिया होता तो इस तरह से शराब बंदी का विरोध और शराब पी कर मरने वालों की पैरवी नहीं करते.

  • 29. 17:18 IST, 13 जुलाई 2009 pradip kumar singh:

    ज़हरीली शराब से हुई मौत गुजरात सरकार के लिए एक सबक़ है, जो शराबबंदी पर अमल तो कर रही है लेकिन ज़मीन पर उसके कारिंदे अवैध धंधेबाज़ों के हाथों में खेल रहे हैं. वाक़ई गाँधी के देश में ये घटना भगवा ध्वजवाहकों के मुंह पर करारा तमाचा है.

  • 30. 17:39 IST, 13 जुलाई 2009 ap upadhyay:

    ये एक बुरी लत है और इस पर पाबंदी होनी चाहिए.

  • 31. 17:57 IST, 13 जुलाई 2009 kalu:

    नशा शराब में होता तो नाचती बोतल.

  • 32. 12:48 IST, 14 जुलाई 2009 Nitin Tyagi:

    अच्छी बातों की नक़ल करना अच्छी बात होती है बुरी बातों की नक़ल बुरी बात. सबको मालूम है फिर क्यों हमारा मीडिया बुरी बातों की नक़ल करके अपने को और देश को कहाँ ले जाना चाहता है? बियर मैं भी पी लेता हूं, लेकिन मैं ये कहू की बियर पीना अच्छी बात है तो ये ऐसा हुआ जैसे चोरी करने वाला कहे की चोरी अच्छी बात है. डॉक्टर भी शराबी को शराब पीने के लिए मना करता है. अब कोई बोलेगा की थोड़ी पियो तो नुक़सान कम होता है तो भाई हर गंदी शुरूआत कम से ही होती है. वैसे गुजरात के मामले में मीडिया को शराब से कुछ लेना देना नहीं है. उन्हें तो बस मोदी जी को घरने का मौका चाहिए.

  • 33. 13:09 IST, 15 जुलाई 2009 Vinit Kumar Upadhyay:

    क्या आपको लगता है कि शराब ज़िंदगी के लिए इतनी ज़रूरी चीज़ है कि ये उस आदमी को भी पीनी चाहिए जो दिन भर मे सिर्फ़ 50 रुपये कमाता है. और जब पैसे नहीं मिलते तो अपने पत्नी की पिटाई करता है, उधार लेता है, घर के बर्तन गिरवी रखता है, चोरी करता है, और फिर किसी देसी के अड्डे से निकल कर रात भर सड़क के किनारे किसी नाली मे पड़ा रेहता है. अगर सचमुच ये इतनी ज़रूरी है कि इसके बिना जिया नही जा सकता तो सरकार से कहिए कि गेहूं चावल की तरह इसके लिए भी ग़रीबी रेखा वाले राशनकार्ड बनवा कर इन लोगों को हर महीने का कोटा मुहैया करवा दिया करे ताकि ये लोग ज़हरीली शराब पीकर यूं न मरें.

  • 34. 08:43 IST, 16 जुलाई 2009 ANIL:

    शराब से ज़्यादा तंबाकू जानें लेती है और उसकी आदत भी पड़ जाती है. तो तंबाकू पर पाबंदी क्यों नहीं...क्योंकि वह पैसा देने वाली फ़सल है. किसानों का वोट बैंक कैसे खोया जा सकता है. कौन कहता है अल्कोहल किसी शराब निषिद्ध राज्य में नहीं बेची जाती. राज्य एक हाथ से राजस्व खोता है और दूसरी ओर इस तरह की मौतों पर ख़र्च करता है. जो मर गए वे भाग्यशाली थे. जो इससे बच गए वे ज़िंदगी भर के लिए अंधे भी हो सकते हैं क्योंकि इन पेयों में शामिल मेथीलेटेड स्पिरिट आँखों की रोशनी पर असर डालती है.

  • 35. 20:27 IST, 18 जुलाई 2009 Lal Bahadur Singh:

    राजेश जी, आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. यह एक बहस का मुद्दा है. हो सकता है कि वहाँ शराब बंद की वजह से मौतें हुईं क्योंकि अधिकतर ग़रीब लोग ही इसमें शामिल हैं. क्योंकि जिस को नशा करना है वह तो नशा करेगा ही. हमारे हिसाब से शराब पर खुली छूट होनी चाहिए और उसकी गुणवत्ता पर विचार करना चाहिए.

  • 36. 23:50 IST, 21 जुलाई 2009 Sanjay Kulshrestha:

    शराब अगर एक समस्या है तो उससे निबटने के सार्थक और व्यवहारिक प्रयास होने चाहिए, कोरे नैतिकतावादी-आदर्शवादी रवैए से सबका नुक़सान होगा, लोग सदियों से शराब पीते रहे हैं, आज भी पी रहे हैं और आगे भी पीते रहेंगे, इस तथ्य को स्वीकार किए बिना कोई कारगर नीति नहीं बन सकती.

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