पानी में भी भेदभाव
हाल में मुंबई में फ्रांस से आये एक पत्रकार से मैंने पूछा कि पेरिस से यहाँ ज़िन्दगी कितनी अलग है? कोई तकलीफ तो नहीं?
उनका जवाब था कि उन्हें कोई ज़्यादा फ़र्क महसूस नहीं हो रहा है. कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने कहा कि बिजली और पानी 24 घंटे उपलब्ध है शायद इसलिए. उनका कहना था कि वो भारत में बिजली और पानी की कमी के किस्से सुनकर इस से जूझने के लिए तैयार हो कर आए थे.
पांच साल पहले जब मैं लदंन में कई साल रहने के बाद मुंबई रहने आया था तो मुझे भी इस तरह का अनुभव हुआ था. लेकिन कुछ साल यहाँ रहने के बाद समझ में आया कि हम लोग उन कुछ लाख खुशनसीबों में से हैं जिन्हें पानी और बिजली 24 घंटे उपलब्ध हैं.
अगर आप मुंबई के उपनगरों में जाएँ तो वहां के लोग बताते हैं कि बिजली कई घंटे नहीं रहती और सुबह सवेरे उठकर पानी जमा न करें तो पीने और नहाने के लिए पानी दिन भर नहीं मिलता है.
अब शहर की महानगरपालिका ने पानी की सप्लाई में 30 प्रतिशत कमी कर दी है जिस से इन उपनगरों में पानी की किल्लत और भी बढ़ जाएगी.
लेकिन क्या अब उन प्रगतिशील मोहल्लों में रहने वालों को भी सुबह उठकर पानी जमा करना होगा? क्या उन्हें भी पानी की किल्लत महसूस होगी? मेरे विचार में नहीं.
अभी कल रात ही जब मैं घर लौटा तो हमारी बिल्डिंग सोसाइटी के अध्यक्ष ने कहा एक अच्छी खबर है. मैंने पूछा क्या फ्लैटों में रहने वाले कूड़ा करकट बिल्डिंग के बाहर न फेंकने के लिए तैयार हो गए हैं जिसके खिलाफ मैंने कई महीनों से अभियान छेड़ रखा है?
वो मुस्कुराए और बोले बिल्डिंग के अहाते में एक और मोटर लग गया है जिस से पानी की कमी के संकट से जूझा जा सकता है. मैंने कहा क्या हम पड़ोस वालों का हक नहीं मार रहे हैं, जवाब था पानी पर सब का अधिकार है.
अधिकार तो है लेकिन बराबरी का नहीं. जिन घरों और इमारतों के पास बोरिंग और मोटर के लिए पैसे हैं शायद उनपर पानी के सप्लाई में कटौती का कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा.
पानी में भी अमीरों और ग़रीबों के बीच भेद भाव आम है.

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ज़ुबैर साहब यह सिर्फ़ मुंबई की ही दास्तान नहीं है, ऐसा सभी महानगरों में होता है. चंद लोग जिनके पास पैसा है वे बोरिंग करवा लेते हैं और जिनके पास नहीं है वे पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसते हैं. जब नल से पानी आने का समय होता है तो पड़ोसी मोटर लगाकर अधिक से अधिक पानी ले लेता है और दूसरे लोग इससे परेशान होते हैं. देश के कई गाँवों में आज भी पीने का पानी नहीं है, बिजली नहीं है, लेकिन जहाँ यह है वहाँ इसकी बरबादी हो रही है. हमारी भी यह आदत हो गई है कि हम तभी जागते हैं जब चिड़िया खेत चुग जाती है. इन समस्याओं के लिए जितना सरकार ज़िम्मेदार है उतने ही ज़िम्मेदार हम भी हैं. आम लोगों को ही कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे.
'रहिमन पानी राखिए, पानी बिन सब सून'. पानी की अहमियत आज से सैकड़ों साल पहले रहीम को मालूम थी. आज उपभोक्तावाद के इस दौर में सब कुछ बिकाऊ है और सरकार व्यापारियों और जनता के बीच बिचौलिए की भूमिका में है. अब पानी के स्रोतों का निजीकरण होने जा रहा है. बीबीसी की हाल की ख़बरों के मुताबिक़ हमारा आज का आधुनिक जीवन पानी के उपभोग पर आधारित है. ज़ुबैर जब कहते हैं कि अमीर ग़रीबों के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं. यह सही समय है जब सरकार को सामने आकर पानी पर कोई नीति बनानी चाहिए.
ज़ुबैर साहब आज के ज़माने में भी कोई आदमी ग़रीबों के लिए पानी के बारे में इस तरह सोच सकता है, यह जानकर बहुत अच्छा लगा. आपने जो बात रखी है उसके बारे में सभी को इतना तो करना ही चाहिए कि वे पानी का दुरुपयोग बंद कर दें जिससे पानी सबको मिल सके.
ज़ुबैर साहिब, हिंदी के चर्चित कवि आलोक धन्वा की कविता की पंक्तियाँ शायद कुछ इस तरह हैं-लोग तो लोग मैंने सोचा था पानी को भी भारत में बसना सिखाऊंगा...और आगे...मैं भी भारत में पैदा होने का कोई मतलब पाना चाहता था, लेकिन अब वो भारत भी नहीं रहा जिसमें मैंने जन्म लिया...मुंबई के उन बदनसीब लोगों की जुबान को यदि थोड़ी जगह और देते तो शायद और बेहतर तरीके से पता चलता है कि पानी जुटाने में किस कदर पानी-पानी होती हैं महिलाएं और जब पानी न मिले तो आंखों से बह निकलता है पानी...
मैं मध्य प्रदेश के उज्जैन में रहता हूँ जहाँ ये सब पिछले तीन महीनों से हो रहा है. मेरा मानना है कि हमारे गुनाह बहुत ज़्यादा हो गए हैं और अब हमें अपने गुनाहों की माफ़ी माँगते हुए अल्लाह- ईश्वर से पानी माँगना चाहिए औऱ जो इंसानियत की भलाई की तमाम ज़रूरियात हैं वो माँगनी चाहिए जिससे तमाम इंसानियत का भला हो.
जुबैर साहब ग़रीब हमेशा ही पीसा गया है. एक बात ज़रूरत है कि अगर सरकारें चाहें तो सब कुछ हो सकता है. आपकी ये सोच बिल्कुल सही है कि हर इंसान मोटर लगाकर नल से पानी को अपने लिए ले रहा है लेकिन वो अपने ग़रीब पड़ोसी का ख़्याल नहीं कर रहा है कि उसे भी इस पानी की ज़रूरत है. इसका बहुत सीधा इलाज है कि जब पानी की आपूर्ति हो तो बिजली की कटौती कर दी जाए जिससे मोटर चला ही न सकें. न रहेगी बाँस न बजेगी बाँसुरी और सबको पानी मिलेगा.
जनाब, जून-जुलाई और अगस्त के महीने में सब को पानी की समस्या और किल्लत याद आती है. पर जब ये महीने निकल जाएँ उसके बाद पूरे साल जनता सोती है. ये हमारे शहरों और गाँवों की एक बड़ी समस्या है. कई जगहों पर पानी तो है मगर वो बहुत ही ख़राब है जबकि कई जगहों पर पानी है ही नहीं. मेरे विचार से अब समय आ गया है कि हम भविष्य में पानी और बिजली की उपलब्धता पर विचार करें. हर चीज़ के लिए पानी की ज़रूरत पड़ती है और उसकी आपूर्ति के लिए बिजली की ज़रूरत. अगर हमने अभी काम नहीं किया तो देश को और परेशानियाँ दे देंगे.
जुबैर साहब !! यह "भारत" और "इंडिया" का अंतर है. जो लोग भारत में रहते हैं उन्हें तो बहुत परेशानी झेलनी पड़ती है, "इंडिया" वाले अपेक्षाकृत ज्यादा अच्छे हालात में हैं. पानी पर इस लेख के लिए धन्यवाद !!
सब माँग और पूर्ति के नियम पर आधारित है. मानव की पूर्ति अधिक है और पानी की कम इसलिए मानव की क़ीमत कम और पानी की ज्यादा. कुत्ते भी मनुष्य से कम हैं इसलिए तो उनकी भी कीमत मानव से अधिक है. मानव में भी मानव कम और अन्य पशु अधिक हैं. मानवों में जो मानव हैं वे अपने पड़ोस के बारे में भी ख्याल कर लेते हैं.
बिल्कुल सही कहा है ज़ुबैर साहिब! ऐसी स्थिति में भाव आता है कि ग़लत या सही कैसे अमीर बनाए जाए?
कोई भी पानी के बग़ैर ज़िंदा नहीं रह सकता. तुलसी दास ने बहुत पहले कहा था, सामर्थ को नहीं दोष गोसाईं! इन शब्दों में कहा गया है कि ऊपर वाला कुछ भी कर सकता है. जबकि आप तो केवल पानी की बात कर रहे हैं.
लोग पानी के प्रति पूरी तरह से असंवेदनशील है. मैंने अपने पड़ोसी से पानी को बर्बाद करने के मामले में शिकायत की थी. वे नल से अपनी कार की सफ़ाई कर रहे थे. बताएं नलकी से कार को धोना कहाँ कि अक़लमंदी है? मैं समझता हूँ कि बीबीसी को इसके ख़िलाफ़ मुहिम चलाना चाहिए.
बिल्कुल पानी को लेकर ग़रीबों और अमीरों के बीच भेदभाव है. ख़ास बात ये है कि दोनों ही पानी की बर्बादी की परवाह नहीं करते. हर कोई जानता है कि लगभग 20 फ़ीसदी तक पानी की बचत हो सकती है, लेकिन कोई भी इस दिशा में पहल नहीं करता.
जल ही जीवन है. लेकिन जीवन की इतनी ज़रूरी चीज़ बाज़ार में बोतल में मिलती है.
आप अपने मुद्दे को अभियान बनाएँ.
सभी महानगरों की यही कहानी है. दूसरों का हक़ मारने की बात तो है ही पानी की बर्बादी भी हो रही है. एक विधायक का कहना है कि उनके इलाक़े में जल बोर्ड का पानी भैंसों की धुलाई के लिए बेच दिया जाता है. सरकार को दोष देना हमारी आदत है, पर सच्चाई ये है कि अधिकतर मामलों में गलती हमारी ही होती है.
जुबैर जी मैं भी पत्रकार हूँ. आपका ब्लॉग पढ़ा, ये सच्चाई के एकदम क़रीब है. मैं ग़ाजियाबाद में रहती हूँ और आपने पानी और इंसानों के बारे में जो लिखा है वो बिल्कुल सच्चाई है. जिन लोगों के पास पैसा है वो सबमर्शिबल लगा लेते हैं, वो कार धोते हैं और खूब पानी बर्बाद करते हैं.