एक तीर कई निशाने!!!
अगर यह सब कुछ सच में नहीं हो रहा होता, अगर इसके मुख्य पात्र भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी और पिछले तीन दशकों से उस पार्टी की प्रथम पंक्ति में खड़े एक नेता नहीं होते तो भाजपा-जिन्ना-जसवंत की इस तिकड़ी का किस्सा एक अलग किस्म की ग्रीक त्रासदी होती जिसके अंत में शायद रोना कम और हँसी ज़्यादा आती.
पूरे प्रकरण को दो तरह से देखा जा सकता है. मैं दोनों विश्लेषण लिख देता हूँ, आप जिसे चाहें सही मानें और उसी विश्लेषण का चश्मा पहन भाजपा का भविष्य देखें.
पहला विश्लेषण
यह एक दिशाहीन नेतृत्व द्वारा लोगों का ध्यान, भाजपा को चुनौती दे रही अगली समस्याओं से हटाने की कोशिश है. पार्टी के समक्ष चुनौती है- आडवाणी के बाद कौन? सत्ताधारी नेतृत्व का कांग्रेस का नेतृत्व किस युवा दिशा में जा रहा है सबको दिख रहा है. भाजपा में आडवाणी फ़िलहाल पद छोड़ने के मूड में नहीं हैं और सुषमा, जेटली, नरेंद्र मोदी, अनंत कुमार जैसे उनके समर्थकों की टोली को अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा.
2004 और 2009 के दो आम चुनाव हारने के बाद भाजपा के समक्ष संगठन को वापिस खड़ा करने और कांग्रेस के सामने मज़बूत विपक्ष की भूमिका अदा करने की चुनौती है. राजनाथ सिंह का कार्यकाल भी अगले साल की शुरुआत में समाप्त होने जा रहा है. पार्टी को यह सोचना चाहिए कि उनके बाद पार्टी की बागडोर किसके हाथ में होगी ना कि आडवाणी बनाम राजनाथ सिंह के छद्म युद्ध में फँसना चाहिए.
पार्टी को राजस्थान में चल रही बग़ावत पर ध्यान देना चाहिए. साथ ही 2014 में लगातार तीसरा चुनाव वो ना हारे इस बारे में चिंतन करना चाहिए.
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा में टकराव नहीं सामंजस्य कैसे बढ़े इस पर सोचना चाहिए. भाजपा का भविष्य पिछले पाँच-छह सालों के मुकाबले और उज्ज्वल करने का एक मात्र रास्ता स्वस्थ और ईमानदार आत्मचिंतन ही होगा.
पर चिंतन बैठक में क्या होता है? जिन्ना पर पुस्तक और उसकी प्रशंसा जसवंत सिंह की पार्टी से विदाई का कारण बनती है. और एक नॉन इश्यू को इतना तूल दे दिया जाता है कि वो चिंतन बैठक में आगे होने वाली सभी कार्यवाही पर हावी हो जाता है.
कुल मिला कर पार्टी अनुशासन और सिद्धांतों के नाम पर काफ़ी वाहवाही बटोरने की कोशिश करती है पर अंत में असली मुद्दों का सामना करने का साहस नहीं जुटा पाती.
अब विश्लेषण के दूसरे पहलू पर भी नज़र डालें जिसे भाजपा नेता मीडिया को बेचने का प्रयास कर रहे हैं.
इस वर्ग का कहना है कि पार्टी में अब अनुशासनहीनता बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी चाहे नेता कितना ही बड़ा क्यों ना हो अगर वह पार्टी के सिद्धांतों, सोच और दर्शन के ख़िलाफ़ जाएगा तो उसके साथ वही होगा जो जसवंत सिंह के साथ हुआ है.
जसवंत सिंह को उदाहरण बनाना पार्टी के लिए आसान भी है. कहने को तो वो बड़े कद्दावर नेता हैं, रक्षा, विदेश और वित्त मंत्रालय सँभाल चुके हैं. पर ज़मीनी राजनीति पर उनके पार्टी में रहने या नहीं रहने से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता. जसवंत सिंह कभी भी जननेता नहीं रहे हैं. तो पार्टी उन पर निशाना साध कर वसुंधरा राजे जैसे नेताओं को भी चेता रही है जिन्होंने बाग़ी तेवर अपनाए हुए हैं.
भाजपा नेतत्व जसवंत के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर आरएसएस को भी मनाने का प्रयास कर रहा है जो मौजूदा वक़्त की ज़रूरत है. जसवंत कभी भी आरएसएस की पसंदीदा सूची में शामिल नहीं थे और मामला इस बार सिर्फ़ जिन्ना का ही नहीं था.
जसवंत सिंह ने अपने बयानों में आरएसएस के दिल के सबसे क़रीबी कांग्रेसी नेता वल्लभ भाई पटेल पर भी प्रहार कर पार्टी से अपनी बर्ख़ास्तगी का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त किया है. कुल मिला कर इस वर्ग का यह मानना है कि समय सख़्त कार्रवाई और राजनीतिक संदेश देने का था और पार्टी ने वही किया है. एक तीर से कई निशाने साधे गए हैं.
दोनों में से कौन सी सोच सच्चाई के ज्यादा क़रीब है यह फ़ैसला मैं आप पर छोड़ता हूँ. हाँ एक बात तय है कि अगर जसवंत सिंह के ख़िलाफ़ मुद्दा सिर्फ़ और सिर्फ़ ज़िन्ना पर उनकी पुस्तक है तो मैं जसवंत सिंह के उस बयान से सहमत हूँ कि विचारों पर प्रतिबंध और कार्रवाई की राजनीति कोई बहुत स्वस्थ परंपरा नहीं है.

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वास्तव में विचार की स्वतंत्रता एक आवश्यक उपकरण है लोकतंत्र में, और उस अभिव्यक्ति के लिए न जाने कितने ही मंच हैं. पर यह उदगार और उदघोष भाजपा के मंच से होना आश्चर्य की बात है. हर लोकतंत्रीय पार्टी का अपना मूल्य और आदर्श होता है. उसका पालन करना उस पार्टी के हर सदस्य का कर्तव्य है. ऐतिहासिक तथ्यों की विवेचना भी करें तो लेखक के निष्कर्ष (जिन्ना के बारे में) किसी भी कसौटी पर खरे नहीं उतरते. लेखक जसवंत सिंह यह भली प्रकार जानते हुए भी सिर्फ इस लिए किया कि उन्हें संभवतः किसी प्रकार की लोकप्रियता मिल जायेगी.
मैं चाहूँगा कुछ इस प्रकार का संवाद हो देश में जिससे इन बातो का विश्लेषण किया जा सके. यह बात भाजपा या कांग्रेस की नहीं, गाँधी, नेहरु या पटेल की नहीं - बल्कि इतिहास के सन्दर्भ की है, और इस पर बहस तो होनी ही चाहिए.
मुझे आपके दोनो विश्लेषण सटीक लगते है और दोनो ही सही प्रतीत होते है.
राजनाथ सिह जी एवम आडवाणी जी, कान्ग्रेस के विकल्प का मटियामेट करके ही छोडेंगे.
कल तक उत्तर भारत की प्रमुख पार्टी आज अपने अस्तित्व के चिन्तन को मजबूर है.
यह दिखाता है कि आरएसएस का भाजपा पर कितना दबाव है. आरएसएस और अन्य हिंदू संगठनों के दबाव में जसवंत सिंह को पार्टी से निकाला गया है. क्या भारत में सही मायने में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? बिल्कुल नहीं.
जसवंत सिंह जैसे नेता जिनका कोई जनाधार नहीं है. उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. अगर वे पार्टी का वोट बढ़ा नहीं सकते तो कम से कम घटाएँ तो नहीं. पटेल की आलोचना का कोई मतलब नहीं है. उनके कारण ही आज हैदराबाद भारत में है. हाँ नेहरू में गल़लियाँ की. उन्हें सभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देना चाहिए था लेकिन उनकी आर्थिक नीतियाँ आज के मुक़ाबले अच्छी थीं. इसी कारण भारत में मध्य वर्ग का उदय हुआ.
ये तय है कि बीजेपी में निराशा और कुंठा का माहौल है, आडवाणी की महत्वाकांक्षाओं ने पहले चुनाव में पार्टी कि लुटिया डुबोई और अब पार्टी की.. आडवाणी भूल गए कि उन्होंने खुद भी जिन्ना की तारीफ में कसीदे निकाले थे वो भी पाकिस्तान की ज़मीन पर.. उधर वसुंधरा खुले आम ताल ठोंक रही हैं.. अन्ततोगत्त्वा शायद पार्टी में एक ही आदमी बचे और वो होंगे आडवाणी साहब उनके हाथ में एक बैनर होगा; मैं प्रधानमंत्री बनना चाहता हू.
आपके लिखे पर प्रतिक्रिया जाहिर करने का कोई मतलब नहीं है. आप पाठक की प्रतिक्रिया को भी अपने हिसाब से जगह देते हैं. प्रतिक्रिया प्रतिक्रिया होती है, उसे हर हाल में जगह मिलनी ही चाहिए.
संजीव जी, ऐसा लगता है कि आप का तीर सिर्फ़ एक ही है और वह है कॉंग्रेस का पक्ष लेना. आप को भारतीय जनता पार्टी की इतनी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. जो पार्टी दो बार देश में सत्तासीन रही वह आने वाले दिनों में एक बार फिर आसीन होगी . अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह भारतीय जनता की बदक़िस्मती होगी क्योंकि आज़ादी के बाद कॉंग्रेसियों ने देश को दोनों हाथों से लूटा है.
नमस्ते संजीव जी, मैं आपके विश्लेषण में एक बात और जोड़ना चाहूँगा कि आडवाणी के बाद भारतीय जनता पार्टी में नेता भेड़ों की जमात लगते हैं. जसवंत सिंह का दार्जिलिंग सीट जीत कर आना और फिर भाजपा में जिन्ना जैसे विवादास्पद मुद्दे पर एक किताब लिखना उनको पार्टी में ऊँचा पद दिला रहा था जिसे सामंतवादी नेत सहन नहीं कर पाए और जसवंत सिंह भ्र्ष्ट राजनीति का शिकार हुए.
एक बहुत पुराना गीत था मंडुए तले गरीब के दो फूल खिल रहे. ऐसी ही कुछ कहानी जिन्ना के गमले में दो फूल खिलने की है. एक फूल खिलाया था आडवाणी ने 4 जून 2005 को पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें सरोजिनी नायडू के हवाले से हिन्दू-मुस्लिम एकता का महान राजदूत करार देकर. वहीँ दूसरा फूल खिलाया जसवंत सिंह ने 17 अगस्त 2009 को अपनी किताब में जिन्ना के कसीदे पढ़कर. जसवंत के जिन्ना नायक है और नेहरु-पटेल खलनायक. आडवाणी संघ के तीर सहने के बाद भी पार्टी में नंबर एक बने रहे. वहीँ संघ को खुश रखने के लिए जसवंत पर आँख झपकते ही अनुशासन का डंडा चला दिया गया. कभी party with difference का नारा देने वाली बीजेपी आज party with differences बन चुकी है. इन दोहरे मानदंडो में ही बीजेपी की हर समस्या छिपी है या यूं कहिये समाधान भी.
भाजपा ने कांग्रेस का एक साफ़-सुथरा विकल्प देने की कोशिश शुरू कर दी है. पार्टी कुछ समय के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं सुरक्षित कर रही है लेकिन उसका आज अंधकारमय है. यह पार्टी जब सत्ता में थी तो उस समय इसकी कार्य संस्कृति कांग्रेस की तरह लग रही थी. उस तरह का भ्रष्टाचार राष्ट्रीय स्तर पर था और पार्टी सत्तालोलुप लोगों से घिरी हुई थी लेकिन आज जिनका भाजपा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है वे भी घड़ियाली आँसू बहा रहे हैं जैसे कि वे भाजपा के शुभचिंतक हों. यह ऐसा समय है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इसमें हस्तक्षेप कर पार्टी की विचारधार के ख़िलाफ़ जा रहे लोगों को किनारे करना चाहिए. अगर ऐसे में कुछ नेता पार्टी छोड़ भी दें तो इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए.
मैं आप के दोनों विश्लेषण से पूरी तरह से सहमत हूँ. किसी को भी अपने विचार प्रकट करने में कोई पाबन्दी नहीं होनी चाहिए. देश के विभाजन को लेकर सब के अपने-अपने मत है. ये जरूरी नहीं कि मेरा जो मत है आप उससे पूरी तरह से सहमत हो. जसवंत सिंह जैसा मानते है उन्होंने वो ही विचार आपनी पुस्तक जिन्ना-इंडिया, पार्टीशन, इन्दिपिदेंस के द्वारा हम सब को वयक्त किये है.
मैं इसको बीजेपी का आपसी कलह मानता हूँ. उसके शिकार इस बार जसवंत सिंह हुए है. ये सभी को मालूम है कि बीजेपी किसी भी पॉइंट पर स्ट्रोंग होती नहीं दिखाई दे रही है. बीजेपी एक पोलटिकल पार्टी कि तरह नहीं बल्कि एक बिजनिस कंपनी कि तरह चल रही है जिस के मालिक लाल कर्षण आडवानी है.
प्रवीण कुमार
जनाब आपके दोनों विश्लेषण अपनी जगह दुरुस्त हैं. लेकिन मेरी नज़र में पहला ज़्यादा सटीक है. इस फ़ैसले से यह साबित होता है कि कहीं का ग़ुस्सा कहीं निकला. अगर अनुशासन की बात है तो फिर इस से पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई. आख़िर आडवाणी जी जिनको जनता नकार चुकी है क्यों ज़बर्दस्ती लोकप्रिय नेता बने रहने की ज़िद करते हैं. हम अमरीका की बात करते हैं तो जब वहाँ कोई राष्ट्रपति का चुनाव हार जाते हैं तो उन्हें दोबारा मनोनीत नहीं किया जाता. यानी जनता का नकारा हुआ नेता. फिर हम क्यों उसी को दोबारा मौक़ा देते हैं जिसको जनता नकार चुकी हो. अब यहाँ जनता-जनार्दन केवल कहावत का हिस्सा है.
आडवाणी जी जिन्ना की तारीफ़ करें या जसवंत सिंह पटेल की बुराई करें, इससे आज़ादी के 62 साल बाद किसी के मूल विचारो को नही बदला जा सकता. साथ साथ जिस किताब पर जितना प्रतिबंध लगेगा उसे पढ़ने की उत्सुकता उतनी ही बढ़ेगी. हाँ एक बात साफ़ है कि बीजेपी एक भ्रम के दौर से गुजर रही है. खुराना, कल्याण, उमा भारती जैसे नेताओ को पार्टी से जोड़ने कि ज़रूरत है ना ही खोने कि. मै तो यही कह सकता हू कि अपना ग़म ले के कहीं और ना जाया जाए. घर में बिखरी हुई चीज़ो को सजाया जाए.
जसवंत सिंह पिछले चार-पाँच साल से भाजपा के लिए परेशानी का सबब बने हुए थे. इसके प्रमाण राजस्थान में मिलते हैं जहाँ के वह रहने वाले हैं. राजस्थान में भाजपा कभी गुटों में नहीं बंटी हुई थी. वहाँ ग़लत उम्मीदवारों के चयन और पुराने उम्मीदवारों के न बदले जाने के कारण पार्टी को हार का मुँह देखना पड़ा. जसवंत सिंह को पता था कि वे राजस्थान से चुनाव नहीं जीत पाएँगे इसलिए उन्होंने राजस्थान की जगह दार्जीलिंग से चुनाव लड़ा. मुझे लगता है कि उनकी किताब में आया जिन्ना प्रकरण केवल किताब की बिक्री बढ़ाकर पैसे कमाने के लिए हैं. पैसे के लिए उन्होंने पार्टी की विचारधारा को भी दूर कर दिया. वह भाजपा के सच्चे नेता नहीं हैं. इसलिए उन्हें पार्टी से निकाला गया है.
मुझे तो ये लगता है भाजपा के कुछ लोग हिंदूवादी प्रवृत्ति से निकलना चाहते हैं. इस तरह की कोशिश पार्टी के बड़े नेता समय -समय पर कर चुके है ---बाजपेयी से लेकर अडवानी तक सब ने एकबार लिबरल होने का प्रयास किया है .पर इसके लिए सिर्फ जिन्नाह ही क्यों ? दूसरे मुद्दे भी है .सबसे महत्वपूर्ण बात है कि पार्टी अपना जमीनी आधार खोती जा रही है ..क्या तीन इकाई की संख्यावाली इस पार्टी में एक भी सांसद ऐसा नहीं है जो नीतिश कुमार जैसे काम कर सके या राहुल गाँधी जैसे गाँव में जाकर आम लोगो के बारे में सोच सके . सारी नीतियाँ असफल रहेंगी जबतक कोई नेता जमीनी तौर पर काम न करे.
संजीव जी
आपके दोनों विश्लेषण आपकी लेखनी के हिसाब से कमतर लग रहे है. लगता है कि आपने अनमने ढंग और आधे- अधूरे मन से लिखा है. जिस तरह आपके दोनों विश्लेषण हैं कुछ उसी प्रकृति के जसवंत सिंह और बीजेपी के कार्य है. जसवंत सिंह ने बेमतलब बिना सोचे समझे यह पुस्तक लिख डाली और जिन्ना को हीरो बनाते हुए सरदार पटेल को खलनायक बना दिया. नेहरु में सत्ता मोह था और गाँधी जी भी नेहरु को रोकने असफल रहे थे. इसके उदाहरण तो मिल जाते हैं लेकिन पटेल के संबध एसा कोई प्रमाण नहीं मिलता है. उनका कद आज भी सरदार है. जिस तरह जसवंत सिंह ने जिन्ना जिन् विना सोचे समझे बहार निकाल लिया उसी तरह बीजेपी का नेत्रत्वा सठिया गया है. सबके सब अपनी कुर्सी बचाने मैं है. सभी को कुर्सी खिसकती महसूस हो रही है. एसा इसलिए है क्योंकि मौजुदा नेताओं में से किसी में भी मजबूत भारत की मजबूत सत्ता के मजबूत विपक्ष के नेता होने का दमख़म नहीं है. जिनमे है वे पीछे धकेल दिए गए हैं ल यह देश के हित में नहीं है. दुर्भाग्य से विपक्ष में होने के बाबजूद बीजेपी नेतृत्व को देश की चिंता नहीं बल्कि स्वयं की चिंता है. इसी का परिणाम है की बीजेपी की चिंतन बैठक मैं हार के कारणों को तालशने/ नेत्रत्व परिवर्तन करने/ पार्टी को मजबूत करने आदि मुद्दों से ध्यान हटाने और संघ कों तुष्ट करने के लिए जसवंत सिंह कों बाहर कर दिया गया है. जसवंत का पुस्तक लिखना और उसके बाद बीजेपी से उनका निष्कासन दोनों फैसले ही बचकाने के स्थान पर सठियाने हैं. बीजेपी कों चाहिए की वह मंहगाई. सूखा. बद्र्ता आतंकवाद/नक्सलवाद. चीन की और से आ रहा खतरा आदि मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित करे. और विपक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन ईमानदारी व मजबूती से करे वर्ना रास्ट्रीय पार्टी से क्षेत्रीय पार्टी बनते देर नहीं लगेगी. संभव है की आने वाले दशको में उसका कोई नामलेवा भी न बचे. कियोंकि भारत और भारतीय जागरूक हो रहे हैं और वे भारत माता. राम-क्रष्ण. गाय- गंगा का तुष्टिकरण हरगिज नहीं सहेंगे. यही बात संघ कों भी समझनी चाहिए और बीजेपी कों बेहतर झुझारू पार्टी बनानी चाहिए /
यह भाजपा के दीमागी दिवालिएपन की निशानी है कि उसने जसवंत सिंह को पार्टी से निकाल दिया. अगर उन्होंने केवल जिन्ना की बड़ाई की होती तो वे बच जाते लेकिन उन्होंने बल्लभ भाई पटेल की बुराई कर दी जिससे उन्हें पार्टी से निकाला गया. हमारा देश यह सच्चाई स्वीकार नहीं करता है लेकिन सच्चाई यही है कि नेहरू और पटेल ने देश का विभाजन करवाया. उन्हें डर था कि जिन्ना जैसा महत्वाकांक्षी नेता उनके लिए सिरदर्द बन जाएगा. इतिहास इतना पुराना भी नहीं है कि उसकी सच्चाई न मालूम हो.अखंड भारत का जो लोग नारा देते हैं, शायद वे लोग भी डरते होंगे कि अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा? अंग्रेज देश छोड़कर तो चले गए लेकिन वे फूट डालो और राज करो कि नीति यहीं छोड़ गए.
मैंने जसवंत सिंह की पार्टी की प्राथमिक सदस्या ख़त्म किए जाने पर आपका ब्लॉग पढ़ा.यह सच है कि अगर कोई पार्टी छोड़ता है या निकाला जाता है तो यह काफ़ी दुखदाई होता है क्योंकि लंबे समय तक साथ रहने और काम करने से उनसे भावनात्मक लगाव होता है. लेकिन समय और परिस्थितियाँ भी अपनी भूमिका निभाती हैं जिसे हम नज़रअंदाज नहीं कर सकते हैं. आज भारत या दुनिया के किसी भी संगठन या परिवार के लिए अनुशासन बहुत ज़रूरी है.इससे कोई भी संगठन या परिवार या व्यक्ति मज़बूत बनता है. इसलिए जसवंत सिंह का पार्टी से निकाला जाना मीडिया के लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं होना चाहिए कि बुनियादी और ज़रूरी मुद्दों से ध्यान ही हट जाए. मुझे आशा है कि एक पत्रकार के रूप में हम अपनी ज़िम्मेदारियों पर विचार करेंगे.
लोकसभा चुनाव में हुई भाजपा की हार का विधवा विलाप अभी ना जाने कितने लोगो को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखायेगा.जसवंत सिंह से पहले आडवाणी भी ज़िन्ना प्रेम में उनकी तारीफ के कसीदे पढ़ चुके है मगर उन्हें पार्टी से नहीं निकाला गया.भाजपा का थिंक टैंक काँग्रेस से अल्पसंख्यक वोट बैंक छीनने के फिराक में कुछ ऐसा कर जाता है कि जिससे अल्पसंख्यक तो मिलते नहीं उलटे बहुसंख्यक वोट बैंक और खिसक जाता है
संजीव जी, मैं इसे अंग्रेज़ी के कहावत के मुताबिक़ इसे ‘अंत की शुरुआत कहूँ’ या ‘शुरुआत का अंत’. यह आपके विश्लेषण का तीसरा पहलू है. मुझे लगता है कि भाजपा की सबसे बड़ी परेशानी है, उसकी विचारधारा, नेतृत्व और अधकचरा व्यवहार कि वह आखिर चाहती क्या है. आज भाजपा जिन्ना के उस पाकिस्तान की स्थिति में पहुँच गई है जिसका न कोई दर्शन है और न कोई मंथन. आज भारत को एक मज़बूत विपक्ष की ज़रूरत है लेकिन आश्चर्य की बात है कि कल तक जो लोग मज़बूत सरकार की बात करते हैं उन्हें ही यह नहीं पता है कि संगठन और संचालन क्या होता है. भाजपा ने अटल जी को छोड़ दिया और आडवाणी जी उसके लिए गले की हड्डी बने हुए हैं.आडवाणी की जी कहीं न कहीं एक अंतरराष्ट्रीय छवि है और संघ की मानसिकता वाले लोग उसे पहचान नहीं पा रहे हैं. रही बात जसवंत सिंह की तो यह उन लोगों के लिए सीख है जो भाजपा की भड़काऊं मानसिकता से प्रभावित हो जाते हैं. जसवंत सिंह की दार्शनिक सोच वाली राजनीति और सोच के दो अलग-अलग पहलू हैं. इससे उन्हें नुक़सान हो गया. लेकिन असल नुक़सान तो हुआ भाजपा का, उसका दूरद्रिष्टी वाला एक व्यक्ति जाता रहा. संघ को जिन्ना के ऊंचे क़द से अधिक डर इस बात का है कि हिंदुत्व की जो राजनीति वह करती आई है वह बल्लभ भाई पटले के नाम के खिंच जाने से ख़त्म हो जाएगी. अगर नेहरू और जिन्ना से ग़लती हो सकती है तो क्या पटेल आसमान से उतरे थे जिनसे ग़लती की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. मैं एक मुसलमान हूँ इसके बाद भी मेरी न कोई जिन्ना साहब से कोई हमदर्दी है और न पाकिस्तान से. मेरा दिल हमेशा से अपने देश भारत के लिए धड़कता है. इसका सबूत देना मैं ज़रूरी नहीं समझता. इसके बाद भी राष्ट्रवाद के नाम पर इतनी कुंठित मानसिकता क्यों. भाजपा यह तय क्यों नहीं कर पाती है कि उसे चाहिए क्या.
संजीव जी, आपके दोनों आकलन सही हैं. भाजपा अपने अंतरकलह के साथ-साथ नेतृत्व की समस्या से भी दो-चार हो रही है. इसके साथ ही पार्टी में अनुशासनहीनता का मामला भी गाहे-बगाहे सामने आ जाता है. ऐसे में पार्टी जनहित की बात करने की जगह अपने अंदर के मामलों से ही जूझती रहती है. जब कोई पार्टी सत्ता से दूर होती है तो उसमें असंतोष पैदा होना स्वभाविक है. लेकिन इस दौर से जो सही से नहीं निपट सकता, उसका अस्तीत्व भी ख़त्म हो जाता है. इसलिए भाजपा को चाहिए कि वह अपने अंदर की अंतरकलह को दूर करे. कहीं ऐसा न हो कि पार्टी अपनी ही लोगों की लगाई आग में झुलस जाए.
इस लेख में संजीवजी ने यह विश्लेषण किया है कि भाजपा ने जसवंत सिंह को क्यों निकाला | परन्तु मैं यह सोच रहा हूँ कि जसवंत सिंह ने आखिर वह किताब लिखी ही क्यों | इसको लेकर मेरी दो धारणाएं हैं | पहली : जसवंत सिंह अपनी नई पार्टी बनाना चाहते हैं | उन्हें भाजपा में अपना कोई भविष्य दिख नहीं रहा था या शायद उन्हें भाजपा का ही कोई भविष्य नहीं दिख रहा | ऐसे में एक विवादास्पद किताब या लेख लिख कर ही वे इतना प्रचार पा सकते हैं कि अपना एक स्वतंत्र राजनितिक अस्तित्व खड़ा कर सके | लेकिन जिन्ना पर ही किताब क्यों | जिन्ना की प्रशंसा करके और बटवारे का उत्तरदायित्व नेहरूजी पर डालकर शायद वे कांग्रेस और भाजपा दोनों से अपने आप को अलग बताना चाहते हों | राजस्थान में लोग भाजपा और कांग्रेस दोनों को आज़मा चुके हैं और दोनों से ही लोगों को गहरी निराशा हाथ लगी है | शायद जसवंत सिंह राजस्थान में एक तीसरे विकल्प के रूप में उभारना चाहते हो | जो व्यक्ति विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री जैसे पदों पर रह चुका हो वो भी ऐसे समय जब कारगिल युद्ध और विमान अपहरण जैसी घटनाएँ हुई हो उसके पास लिखने के लिए सामग्री की तो कोई कमी नहीं होनी चाहिए | पर उन सब विषयों पर तो राजनीति से सन्यास लेने पर ही किताबें लिखी जाएँगी | अभी तो कोई ऐसी किताब चाहिए जो उन्हें राजस्थान की राजनीति में स्थापित कर सके | दूसरी धारणा यह है कि वे पाकिस्तान का कोई पुरस्कार पाने के जुगाड़ में हैं वर्ना कोई 62 साल पुराने गडे मुर्दे क्यों उखाडेगा | यह सर्वविदित है वह जिन्ना ही थे जिनकी अध्यक्षता में मुस्लिम लीग ने 1940 में अलग राष्ट्र पाकिस्तान की मांग रखी थी और जिन्ना के आह्वान पर ही 1946 में धार्मिक दंगे शुरू हुए थे | ऐसे में कोई कैसे जिन्ना को बटवारे के लिए दोषी ठहराने को गलत बता सकता है | ऐसा हो सकता है कि बटवारे पर अंतिम मुहर नेहरूजी और कांग्रेस ने लगाई हो लेकिन इससे जिन्ना और मुस्लिम लीग की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती | यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि मेरी इन धारणाओं में से कौन सी सही साबित होती है |
जसवंत सिंह ने जो किया वो अपने हिसाब से किया. क्या बीजेपी हाई कमान को जसवंत सिंह को पार्टी से निकाले जाने को लेकर एक बार विचार नहीं करना चाहिए था. जसवंत जी अटल जी की पंक्ति के नेता हैं. जब आडवाणी जी के खिलाफ़ पूरी पार्टी थी तब जसवंत जी ही उनके साथ खड़े थे. उन्हें सोचना चाहिए था.
संजीव जी, अपके विश्लेषण में जो बात सामने आ रही है वो है भाजपा को सीख देना. आपके इस लेख में मुझे ये बात दिख रही है कि कहीं न कहीं आपके मन में भाजपा के लिए सॉफ़्ट कॉरनर है जो अपने पोस्ट के माध्यम से एक शिक्षा या एक मार्गदर्शन करता दिख रहा है. लेकिन इस बात को याद रखना ज़रूरी है कि अटल जी के बीजेपी अध्यक्षपद से हटने के बाद से ही पार्टी नेतृत्व को लेकर समस्या बनी हुई है जिसका असर दोनों चुनावों में देखने को मिला. और एक बात ये कि अगर अटल जी नेतृत्व में होते तो शायद ही इस तरह के अनुशासन की बात की जाती. जसवंत सिंह जैसे बड़े नेता तो जिन्ना के नाम पर बलि का बकरा ही बन रहे हैं. भाजपा अगर इसी तरह रही तो शायद ही कभी सेकुलर छवि बना पाएगी.
यथार्थ प्रस्तुत करने के लिए संजीव जी को हार्दिक बधाई. मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि आडवाणी जी प्रधानमंत्री बन गए और राजननाथ सिंह की बारी है.
समय के साथ साथ जो स्वयं को नहीं बदलता वह समाप्त हो जाता है. रुका हुआ पानी भी सड़ने लगता है. भाजपा पता नहीं कौन से जमाने में अटक गयी है. इसे ज़माने के बदलावों को पहचान स्वयं को जल्द बदलना होगा नहीं तो इसका हाल क्या होगा दिख ही रहा है.