विवाद होगा तो बिक्री भी होगी
अकबर इलाहाबादी कह गए हैं- 'बाज़ार से गुज़रा हूँ, ख़रीदार नहीं हूँ'... सदी गुज़र गई किसी ने नहीं लिखा--'बाज़ार में बैठा हूँ, दुकानदार नहीं हूँ'.
तरह-तरह के दुकानदार होते हैं. कुछ मोलभाव करते हैं, कुछ 'फ़िक्स्ड प्राइज़' का बोर्ड लगाते हैं, कुछ कहते हैं, 'नहीं ख़रीदा तो पछताओगे, मेरे क्या है, मैं तो लुटा रहा हूँ.' कुछ ऐसे भी होते हैं जो कहते हैं कि मैं तो दुकानदार ही नहीं हूँ, जनकल्याण कर रहा हूँ. संत-समाजसेवी टाइप.
कई हैं जो बेचते कुछ हैं, बताते कुछ और हैं. सैकड़ों मिसालों में सुविधा के लिए दो नाम-- अटल बिहारी वाजपेयी और विश्वनाथ प्रताप सिंह...
कवि थे लेकिन ग़लती से राजनीति में आ गए, दूसरे चित्रकार थे राजनीति के रंग में दुर्घटनावश से रंग गए. कवियों की संगत में नेता, नेताओं की संगत में चित्रकार, माया मिली और राम भी.
पता नहीं कौन-कौन, कहाँ-कहाँ, क्या-क्या बेच रहा है, लेकिन आजकल दो नाम चर्चा में हैं जिन पर बेचने का आरोप लगाया जा रहा है मानो बेचना कोई बुरी बात हो. वैसे भी बुरी चीज़ नहीं बेच रहे हैं, एक को फ़िल्म बेचनी है, दूसरे को किताब.
दुनिया के बाज़ार में सब दुकानदार हैं, मुक़ाबला सख़्त है, जो अक्ल लगाए, बेच ले जाए. सैकड़ों फिल्में बनती हैं, कितनी हिट होती हैं? सैकड़ों किताबें छपती हैं, कितनी बिकती हैं?
करोड़ों खर्च करके इतनी पब्लिसिटी नहीं मिलती, जितनी इस तरह मिली है.
'प्रधानमंत्री के दफ़्तर के भेदिए' की पीठ पर लादकर किताब बेचने की, अमरीका की रंगीनियाँ दिखाकर फ़िल्में बेचने की कोशिशें हो चुकी हैं. इस बार 'विलेन' को 'हीरो' बनाकर किताब बेचने की, अमरीका को 'नस्लवादी' बताकर फ़िल्म बेचने की बारी है.
नीतियों, सिद्धांतों, विचारों, उसूलों की बात करने वाले बातें करते रहेंगे. ख़रीदार तय करेंगे, क्या बिकेगा, क्या नहीं.
बाज़ार की नीति, सिद्धांत, उसूल एक ही है-- सिक्का वही खरा है जो चल जाए. चाहे मुझे-आपको बुरा लगे या भला.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
यह आपके मार्केटिंग हुनर का कमाल है कि आप चाहे तो गंजों के घर में कंघे बेच दें , अंधों कि बस्ती में आइने बेच दें. बस आपको चेहरे पर मासूमियत हमेशा टपकती रहनी चाहिए. खुदा ना खास्ता आप पहले से ही नाम वाले हैं तो कहना ही क्या. आप जो कहेंगे- झूठ-सच पत्थर की लकीर माना जाने लगेगा. अब किसी को मिर्ची लगे तो आप क्या करें. नकद-नारायण की कृपा-दृष्टि आप पर बनी रहनी चाहिए. अब शाहरुख़ बेचारे क्या करें, लंदन समेत दुनिया के तमाम बड़े शहरों में आशियाने बनाने का ख़्वाब भारत के दर्शकों के भरोसे बैठे-बैठे ही कोई पूरा हो जाएगा. सुन रहे हो ना अमरीका वालों- .'माई नेम इज़ ख़ान' . अब रही बात जसवंत जी की तो भैया राज्य-सभा में विपक्ष के नेता की कुर्सी तो पहले ही जा चुकी है, व्हिस्की की बोतल पर ख़ुद जसवंत जी लोकसभा में प्रणब बाबू से शिकायत कर चुके हैं कि हज़ार रुपए से कम की नहीं आती. यह कमल-कमंडल वालों के चक्कर में रहते तो भैया कहीं के ना रहते, भला हो जिन्ना का... किताब के ज़रिए बैंक-बैलेंस का तो अच्छा इंतजाम कर दिया है, रही बात राजनीति की तो पिक्चर अभी बाकी है दोस्त. दार्जिलिंग में अपने नए गोरखा दोस्त हैं ना.
दुकानदार बनने की ही एक और कहानी है न कि जब एक ग़रीब अपना कोई अंग बेचकर ग़रीबी दूर करना चाहता है तो सोचने को मजबूर होता है मेरी एक आँख एक लाख की तो पूरा शरीर कितने का होगा...विडंबना यही है क्या बेचकर हम क्या ले आते हैं. बेचने दीजिए तथाकथित बड़ों को फ़िल्म हो या किताबें लोगों को सिर्फ़ इतना बताते रहिए अपनी आँख, कान, ज़बान बचाए रखें. इन्हीं से ईमान भी बचता है.
राजेश जी , आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है | आज अगर मार्किट की बात करें तो यह कहना गलत न होगा की सिर्फ और सिर्फ "विवाद " ही आजकल मार्किट में बिकता है | विवाद नहीं तो मार्किट में आपकी कोइ पूछ नहीं ,कोइ कीमत नहीं| इस भेड़ चाल में शामिल होने की इतनी जबरदस्त होड़ लगी है कि कोइ कुछ भी कर गुजरने को आमदा है | कयोंकि इसके लिए न तो कोइ कोर्स करने करने की जरूरत है न ही कोइ नियम कानून का पालन करना है | हाँ बस एक कला का ज्ञान होना जरूरी है जिसमे तो बस गिरगिट ही माहिर होता है | शायद यही वजह है की आज मानवता और संस्कारों का रंग विवादों के धब्बे के सामने फीका पड़ चुका है | अब इसी वजह से Christopher Sandford को भी लगा की क्यों न बहती गंगा में हाथ धो लिया जाये भले ही फिर एक मरहूम शख्शियत बेनजीर भुट्टो ही क्यों न हो | रही बात जसवंत सिंह जी की तो शायद इतिहास का सतही ज्ञान उन्हें ले डूबा | मेरे ख्याल से उन्हें इस प्रकार की लोकप्रियता की आवश्यकता न थी | खेर सब कुछ लुटा के विवाद पा लिया तो सब कुछ पा लिया | इस दुकान में नहीं तो बाज़ार में और बहुत हैं.........................
बीबीसी स्वाइन फ़्लू, महंगाई, बिजली की समस्या, पानी की परेशानी, सब को भूल कर भारतीय जनता पार्टी और जसवंत सिंह की किताब के पीछे क्यों पड़ गई है. हक़ीक़त तो यह है कि कोई भी पुस्तक छपने के बाद आप सही और सच्ची बात से पाठकों को अवगत कराएँ. राजेश जी आपसे प्रार्थना है कि आप इस बात को उजागर करें कि जसवंत जी ने जो लिखा वह कितना सच है.
दिल्ली क्या सारे जहाँ में बिल्डर से लेकर सबका यही हाल है .. सहगल जी ने बेहतरीन टिप्पणी लिखी है... 100 करोड़ मजाक समझा है क्या आपने... शाहरुख़ भी फ़िल्मी हीरो की तरह है...
/फ्लैश बेक/
"मेरे पापा के पास एक भी घर नहीं था...
/आज /
आज मेरा हर मुल्क में एक घर है...
... समहाउ इम्प्रॉपर है यह...
जसवंत जिन्ना जी के जस गाने लगे... यह एक आला मंत्री रह चुके है... और भी बहुत कुछ... बस लेखक होने बाक़ी रह गए थे... अब वो भी हो गए.. बधाई... तो हमारे जैसे टटपूंजिया लेखक तो बनेगे नहीं, अरे भाई ! इंडिया शाइनिंग, फ़ील गुड वाले, बड़े सोच वाले बड़े मंत्री, तो बडी बातें... तो बड़े कारनामे.,.. उखड़ना कुछ है नहीं... तो रिटायरमेंट एन्जॉय कर रहे हैं...
शुक्र है हमारे पास चर्चा करने का एक और काम तो आया... हम भी ना सीबीआई हो गए हैं... नहीं ?
सवाल ये नहीं है कि दुकानदार क्या बेच रहा है, सवाल तो ये होना चाहिए कि आज के ख़रीदार को क्या हो गया है. क्या उसे इतनी भी तमीज नहीं कि उपभोक्तावाद के इस ज़माने में क्या अच्छा है और क्या बुरा. मैं आपके तर्क से दुर्भाग्यवश सहमत नहीं हूँ क्योंकि जिन दो दुकानदारों की ओर संकेत है उनमें कोई समानता नहीं है. मैं मानता हूँ कि फ़िल्म बेचने वाले इस प्रकार की हरकत कर सकते हैं. लेकिन इस मामले में ऐसा है- इस पर संदेह है. अब तो इस प्रकार के संकेत आ रहे हैं कि कारण कुछ और ही थे. यहाँ ये कहना बहुत ज़रूरी है कि जिस देश की बात है, वहाँ सब कुछ साफ़-सुथरा नहीं है और रंगभेद हमेशा रहा है और रहेगा. उन्नति की चमक उसे छिपा सकती है ख़त्म नहीं कर सकती. रही बात दूसरे दुकानदार की, तो मैं ये भी नहीं मानता कि किताब के लेखक को अपनी किताब बेचने के लिए ऐसा करने की ज़रूरत है. मैं आप जैसे बीबीसी के मँझे हुए विश्लेषक से ये उम्मीद नहीं रखता कि बाज़ारवाद की भावना कभी दर्शन पर हावी हो सकती है.
क्या राजेश जी. जसवंत सिंह साहब की दुर्गति देख कर आप भी डर गए. अरे भई बीजेपी और बीबीसी के नाम भले ही मिलते हों, लेकिन कामों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है इसलिए आप बिलकुल सुरक्षित हैं. क्योंकि एक राजनीतिक पार्टी है जिसका काम (हर दूसरी राजनीतिक पार्टी की तरह) भोले-भाले लोगों को उल्लू बना कर वोट हासिल करना होता है. आपका यानी बीबीसी का काम भोले-भाले लोगों को उल्लू बनने से बचाना है. लेकिन आप यहाँ चूक गए आपने जसवंत सिह की दुकान की और मुनाफ़े की तो ख़ूब चर्चा की पर दुकान पर बिकने वाले सामान के बारे में कुछ नही बताया. ज़िन्ना आम भारतीय के लिए पहले भी एक विलेन थे और हमेशा विलेन ही रहने वाले हैं. फ़र्क इतना है कि असानी से उल्लू बनने वाली जनता के लिए वो बड़े विलेन हैं और मुश्किल से उल्लू बनने वाली जनता के लिए मध्यम दर्जे के विलेन. इन दोनों टाइप की जनता में भारत के मुसलमानों का एक बड़ा तबका भी शामिल है, जिन्हें ये महसूस होता है कि अगर बँटवारा न होता तो भारत में कुछ लोग उन्हे महज़ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल न कर पाते. मुश्किल से उल्लू बनने वाली जनता थोड़ी पढ़ी-लिखी होती है, इसलिए इतिहास का थोड़ा बहुत ज्ञान होता है जिसके अनुसार जिन्ना बहुत आज़ाद ख़्याल के व्यक्ति थे, खुले लफ़्ज़ों मे कहा जाए तो नाम के मुसलमान थे. शुरुआत में मुस्लिम लीग के विरोधी थे और कांग्रेस के ज़्यादा क़रीब थे. ख़िलाफ़त मूवमेंट को कांग्रेस और गांधीजी का पूरा समर्थन मिला हुआ था जो मुसलमानों ने मज़हबी वजहों से ब्रिटेन के खिलाफ़ तुर्की के समर्थन मे चलाया था. जिन्ना ने उसका भी ये कह कर विरोध किया था कि सियासत में मज़हब को न शामिल करो, ये हिंदू मुस्लिम एकता के लिए ख़तरा है. फिर उनका सांप्रदायिक चेहरा देखने को मिला. आप अपने व्यंग्य में जसवंत सिंह की किताब न सही इतिहास की किसी किताब का हवाला देकर इतना तो बता देते कि जसवंत सिंह अगर 100% सही नहीं हैं तो 100% ग़लत भी नही हैं, लेकिन शायद अभी आपने उनकी किताब पढ़ी नही होगी. बहरहाल काम की बात ये है कि आप इस सजी-धजी दुकान धोखे में मत आइए. ये दुकान तो पहले से उल्लू जनता को और उल्लू बनाने के लिए खोली गई है. इस दुकान के पीछे वाले कमरे से कुछ सीढ़ियां नीचे एक तहख़ाने मे जाती होंगी. उस तहख़ाने में क्या रखा है वो अभी अपको नहीं पता तो हम जैसे आसानी से उल्लू बनने वाले लोगों को कैसे पता होगा. वैसे आपने कभी किसी जौहरी को अपनी भारी मुनाफ़े वाली हीरे जवाहरात की दुकान बंद करके परचून की दुकान खोलते देखा या सुना है?
बात कुछ हज़म नहीं हुई जनाब! अपने इस आलेख में आप कहना तो कुछ चाह रहे हैं, कह नहीं पा रहे हैं. बस इशारों में ही बात चल रही है. पर इशारों में बात करने का अपना अलग ही मज़ा है. किताब की बिक्री हो या नहीं, सच तो आख़िर सच ही होता है. आज नहीं तो कल यह बात भी कोई कहने वाला होता ही और ख़ासकर भारत के संदर्भ में यह बात अगर जसवंत सिंह जैसे बड़े नेता की ओर से आ रहा है तो लोग सोचने को तो ज़रूर मजबूर होंगे एक बार.
कहने को सब कहते हैं राष्ट्रवाद की बात पर कोई करता क्यों नहीं. जब हम आप कर ही नहीं सकते, तो कहते क्यों हैं. चुप रहने में ही भलाई है. यदि करने का इरादा है तो कुछ करिए बोलिए मत.
यह कोई लेखक या कवि बनने का खेल नहीं है. बूढ़े ख़ुर्राट नेता लोग हैं. हाथी भी हज़म कर जाएँ और पता भी न चले. कोई न कोई बड़ा षडयंत्र है जिसके प्लॉट पर काम हो रहा है. कहानी का क्लाइमैक्स हमें अभी पता नहीं है. पर यह सब एक स्क्रिप्ट के तहत हो रहा है. देखते हैं फ़िल्म कब रिलीज़ होती है.
बिलकुल सही लिखा आपने,
आजकल सब कुछ बिकता है बस बेचने का तरीका आना चाहिए। हालांकि, जसवंत सिंह या कोई भी व्यक्ति किसी भी मुद्दे पर अपनी निजी राय रखने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन श्रीमान् जसवंत सिंह साहिब को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वे एक व्यक्ति होने के साथ ही एक दल से भी संबद्ध हैं, जिसकी विचारधारा उनकी कही गई बातों से बिल्कुल उल्टी है।