सुरक्षा ज़रूरी, लेकिन किसकी?
डर किसे कहते हैं कल पहली बार महसूस हुआ जब मैं काबुल के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्र में एक मुलाक़ात के लिए पँहुची.
जनाब यहाँ आ कर पता चला कि अगर आज के राजे महाराजे किले बनाते तो वो कैसे होते. और आज आप काबुल में अमरीकी और पश्चिमी देशो के लोगो को यहाँ के राजे महाराजे समझ सकते है.
इनका कहना है कि ये यहाँ अफगानिस्तान की सुरक्षा के लिए आए हैं. सच, पर ये तो खुद बिल में छुपे चूहों की तरह रहते है.
मोटी बुलेट प्रूफ़ जैकेटो और हेलमेटों में से काले चश्मे पहने गोरे चेहरे नज़र आते है - हाथों में ऑटोमेटिक राइफ़िलें लिए सड़क किनारे चौराहों पर या अपनी इमारतों के सामने, उनकी सुरक्षा करते.
जब इन राजाओं के बख्तरबंध रथ निकलते है तो लोगो को दूर रहने की सलाह दी जाती है. ये कहते है पास आओगे तो गोली चल जाएगी.. तो भला आप ही बताइए कि जो लोग यूँ अपने हाथों स्वयं बंदी बने हुए हैं क्या वो लोगो के दिलो में विश्वास पैदा कर सकते है कि उनका भविष्य इनके हाथों में सुरक्षित है.
मुझे तो पहली बार इस तामझाम को देख डर लगने लगा, सोचा कि ऐसा इंतिज़ाम तो न कश्मीर में देखा न लिट्टे से लड़ रहे श्रीलंका की सेना को यूँ बंद पाया.
और इस सबके बीच इसी क्षेत्र में शनिवार को आत्मघाती हमला हुआ और सात लोग मारे गए वो धमाका जो मैने अपने होटल के कमरे से साफ सुना था.
इस धमाके का नतीजा भी वही हु्आ जो अकसर होता है... अब नैटो और अमरीकी दूतावास जिस सड़क पर हैं वहाँ आप पैदल नहीं जा सकते, अपनी किराए की टैक्सी भी नहीं लेजा सकते. यानी सख्ती आई पर बहुत देर के बाद.
ये सब यहाँ के शहरियों को पच नहीं रहा क्योकि इनकी सुरक्षा के लिए जो आए है वो बस अपनी सुरक्षा की सोच रहे हैं.
हर धमाके में सबसे ज्यादा घायल और मरने वालो की तादाद आम अफ़ग़ानों की है. तो फिर क्या इन राजाओं की वाकई ज़रूरत है?
ये सवाल मेरा नहीं इन लोगों का है..क्या है आपके पास कोई जवाब?

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रेणुजी, आपका लेख पढ़ कर ना जाने क्यों काबुलीवाला फिल्म का गीत याद आ गया- ए मेरे प्यारे वतन, ए मेरे बिछुडे चमन, तुझ पे दिल कुर्बान . आप काबुल में है तो आप खुद ही देख रही होंगी की चमन की क्या हालत हो गयी है. अगर काबुल का यह हाल है तो बाकी अफगानिस्तान का क्या हाल होगा. अमेरिका के भरपूर समर्थन के बावजूद करजई सिर्फ काबुल के ही राष्ट्रपति बन सके, अफगानिस्तान के नहीं. कभी तालिबान को रूस के खिलाफ़ खडा करने वाला अमेरिका नौ साल तक पूरी ताकत झोंकने के बाद भी ओसामा बिन लादेन या मुल्ला उमर की हवा तक भी नहीं पकड़ पाया. अमेरिका खुद ही सोचे कि तालिबान जैसे दरिंदो से मुक्ति पाने के बाद भी आम अफगानी क्यों अमेरिका से खुश नहीं है. ज़ाहिर है गुलामी में महलों में रहने से भी कई बेहतर है झोंपडे में ही आज़ादी की हवा में सांस ली जाए.
रेणु जी, यह बात कोई अफ़ग़ान कहता तो उस पर तालेबान होने का ठप्पा लगा दिया जाता.
सबसे पहले तो इस साहसिक रिपोर्टिंग के लिए धन्यवाद. रेणु जी आपकी बात अपनी जगह सही है. पर दूसरों की सुरक्षा के लिए अपनी सुरक्षा भी ज़रूरी होती है. इतनी सुरक्षा के बावजूद सैनिक मारे जा रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान में बहुत से परिवर्तन आए हैं. अब वहाँ तालेबान की सरकार नहीं है. चुनाव भी होने जा रहे हैं लेकिन इन सब के बीच अमरीकी और ब्रितानी सैनिक मानवाधिकारों का भी ख़ूब हनन कर रहे हैं. तालेबान समस्या अमरीका की ही बनाई हुई है. तालेबान को मज़बूत अमरीका ने ही किया था. मुझे आश्चर्य हो रहा है कि ह्मूमैनराइट्स वॉच चुप्पी क्यों साधे हुए है. शायद इसलिए कि यह नेक काम अमरीका कर रहा है?
रेणु अगाल, आपका लेख बिलकुल आशयहीन है. ना तो आपको युद्धनीति की मालूमात है ना ही वहां की राजनीति का ज्ञान है. आतंकवादियों से लड़ने का हौसला तो अमरीकी और पश्चिमी देशो के लोग रखते है हम तो उतना भी नही कर पाते हमपर कई बार हमले होकर भी. सोचिए.
हाँ, अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों ने अफग़ानिस्तान के साथ खिलवाड़ किया. अफ़ग़ानिस्तान कभी सिकन्दर, कभी शापुर, कभी ग़ज़नवी, कभी नादिरशाह तो कभी ज़हीर शाह की कर्मस्थली बना पर उससे क्या? इससे पूरी दुनिया को यही सबक मिलता है कि गुनाह सहना, गुनाह होने देना दोनों गुनाह करने के बराबर है.
अफ़ग़ानिस्तान भी भारत के कश्मीर की तरह ख़ूबसूरत है. वहाँ भी प्रकृति मेहरबान है. पर दोनों देशों की बस यही समानता है. अफ़ग़ानिस्तान बस उजड़ता ही रहा. उस पर पहले रूस ने क़ब्ज़ा करना चाहा और अब अमरीका भी उसे उजाड़ रहा है. यह सही है कि आम जनता की सुरक्षा में लगे लोग अपनी ही सुरक्षा में लगे हैं फिर भी आम लोग मरते हुए भी इन्हें लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर रहे हैं. सुंदर जगह को नर्क इन गोरे लोगों ने ही बना रखा है.
रेणु जी, कितना सच हिम्मत के साथ लिखा आपने, अगर यह हालत है वहाँ पर इसका मतलब अफ़ग़ानिस्तान अब भी सुरक्षित नहीं है. क्योंकि यह रिपोर्ट एक बीबीसी रिपोर्टर ने दी है जो कभी झूठ नहीं हो सकती है. रेणु जी सच की जानकारी बीबीसी पर देने पर आप का लाख-लाख शुक्रिया.
शुक्रिया रेणु जी,अफ़गानिस्तान के निर्दोष लोगों की अमेरिकी सुरक्षा के बारे में सोचिए तो दिलोदिमाग़ में छा जाते हैं बाड़े में बंद बकरे की माँ के छौने.
अफ़ग़ानिस्तान की आँखोंदेखी तो वाक़ई दिलचस्प है. लेकिन आपने आख़िर में उलझा के रख दिया है. हल क्या है? क्या वहाँ की जनता को दोबारा तालेबान के सहारे छोड़ दिया जाए? या फिर करज़ई प्रशासन इतना मज़बूत और सक्षम हो गया है कि अपने लोगों की रक्षा ख़ुद कर सके? आशा है रेणु जी उलझन सुलझाने का प्रयास करेंगी.
रेणु जी,
इसका जबाब तो अमेरिका ही दे सकता है. क्योंकि सब कुछ उसीका किया धरा है. पहले अपने स्वार्थ के लिए सपोले को दूध पिलाकर तालिबान बना दिया. जब वह उसे ही निगलने लगा तो अफगानिस्तान पर धावा बोलकर वहां वृहद स्टार पर लडाई लड़ी गई. लेकिन वह जीतने के वावजूद हार गया. जिसका प्रमाण आपके लेख में है. अफगानी भाइओं से कहियेगा की वे एक होकर आतंक के विरूद्व लडाई लड़े. क्योंकि अमेरिका की नियत ठीक नहीं है.
रेणु जी आप अपना ख्याल रखियेगा l
ये कथित ''हिंदुस्तानी'' भी सही कह रहे हैं ''आतंकवाद से लड़ने का हौसला तो अमेरिकी और पश्चिमी देशों के लोग रखते हैं'', क्योंकि अपने मुनाफे के लिए, हथियारों के धंधे और तेल के लिए, वे ही लोगो लाखों निदोर्षों को आतंकवादी कह कर मौत के घाट उतार सकते हैं।
रेणूं जी, आपकी रिपोर्टिंग और इस लेख के लिये धन्यवाद्, पर माफ़ कीजिये आपके सवाल का जवाब ढूंडने से पेहले मुझे आपसे एक सवाल करना पड़ रहा है, आप ये बताइये आपको ये क्यूं लगा कि ये रथ और क़िले वाले राजा इन बेचारे अफ़ग़ान लोगों की सुरक्षा करने आए हैं?
आपकी समीक्षा ज़रा ग़लत है ये यहां सिर्फ़ अमरीकन और पश्चिमी हितो कि सुरक्षा को सुनिश्चित करने आए हैं न की अफ़ग़ानिस्तान या अफ़ग़ानियों की सुरक्षा करने, और इनकी मुहिम का सिद्धांत ये है कि अगर एक तलिबान को मारने मे बीस बेक़सूर अफ़ग़ान मरते हैं तो उन्हे मरने दो. फ़िर चाहे वो नेटो कि मिसाइलों से मरें या तालिबान के आत्मघाती हमलों से.
इतिहास गवाह है अमरीकन फ़ौजें जब जब स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की रक्षा या दुष्टता के ख़िलाफ़ जंग के नाम पर जिस किसी देश मे गई हैं उस देश की जनता को एक बदतर ज़िंदगी जीने पर मजबूर होना पड़ा है और ऐसे आतंक से दो चार होना पड़ा है जिसकी कल्पना भी उन्होने पेहले नही की होगी. और इसके लिये इतिहास मे वियतनाम तक जाने की ज़रूरत नही है इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान को आप देख ही रही है.
पूरी दुनिया मे प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के ये झंडाबरदार किसी ऐसे देश मे कभी नही जाते जहां से इनके देश का फाएदा सीधे तौर पर न जुड़ा हो, भले ही वहां कितने ही ज़ुल्म और ज़्यादतियां हो रही हों. अगर आप इनके किसी मित्र देश के पड़ोसी हैं और उसकी बराबरी करने की कोशिश कर रहे हैं तो आपकी खैर नही और इनके किसी शत्रु देश के पड़ोसी हैं फिर आपकी हालत चक्की के दो पाटों के बीच फसे हुए गेहूं के दाने जैसी हो जानी है.
रही बात आपके सवाल की तो आप इन फ़ौजों को अभी यहीं रेहने दें, रिसेशन के इस दौर मे इस अस्थिर देश की वजह से आसपास के कई देशों कि ख़ुफ़िया एजेंसियों और एजेंट्स की दाल रोटी चल रही है. कई मोर्चों पर अफ़ग़ानिस्तान स्क्रिप्टेड कुश्तियों अखाड़ा बना हुआ है, कई कुश्तियां पेहले से ही तय है. फ़िर भी हर पहलवान दूसरे को रिंग से बाहर फ़ेंकने की कोशिश मे लगा है या फिर कोशिश करने का दिखावा कर रहा है, और सारे ड्रामे से बेख़बर पब्लिक (जो अफ़ग़ान भी नही है) तालियां पीट रही है या अफ़सोस कर रही है.
जिस दिन ये फ़ौजे अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलेंगी इस क्षेत्र के राजनीतिक और ख़ुफ़िया समीकरणों मे बड़ा भारी उलट फेर होगा जो शायद हम जैसे लोगों को दिखाई न दे. उस दिन अफ़ग़ान जनता आज से कहीं ज़्याद सुरक्षित और ख़ुश होगी, लेकिन इस क्षेत्र की सुरक्षा का क्या होगा खुदा जाने.
तो आप क्या चाहती है रेणु जी?
अफगानिस्तान पुनः तालिबान को सौप दिया जाए और उसे आतंकवादियो की जन्म और कर्मभूमि बनने दिया जाय. इसके साथ साथ आम जनता को इस्लाम के नाम पर दमन भरी जिन्दगी जीने दे.
किसी भी स्थिति की समीक्षा जजबाती होकर नही बल्कि वर्तमान एवं भूतकाल को नाप-तोल कर करें.
आप से ऐसी आशा नहीं थी...
रेणु अगाल, पहले तो इतना शानदार काम करने के लिए बधाई. लेकिन मेरा मानना है कि आपका नज़रिया एकतरफ़ा है. प्रत्येक को अपनी सुरक्षा करने का अधिकार है. यदि अमरीकी और अन्य पश्चिमी लोग अपनी सुरक्षा के अतिरिक्त उपाय कर रहे हैं तो वह इसलिए क्योंकि वहाँ रहने, काम करने और पुनर्वास के लिए यह ज़रूरी है. अब हमारे देश में ही जब प्रधानमंत्री या कैबिनेट मंत्रियों का काफ़िला निकलता है तो अन्य लोग न तो वाहन चला सकते हैं न सड़कों पर निकल सकते हैं. तो क्या उसे भी आप अमरीका या पश्चिमी किलाबंदी कहेंगी?
अमरीका जो दुनिया के हर देश पर मानवाधिकार हनन का आरोप लगाता है, ख़ुद भी अफ़ग़ानिस्ता में यही कर रहा है. पहले वहाँ तालेबान का ख़ौफ़ था, अब अमरीका और ब्रिटेन का. हालाँकि तालेबान की जड़ें हिला कर अमरीका ने उसको कुचल तो दिया है पर तालेबान अभी मरा नहीं है.
रेणु जी आपके विचार काफ़ी नेक हैं. पर जो ख़ुद इतनी बेचारी हो वह दूसरों की मदद कैसे कर सकती है. अफ़ग़ानिस्तान का चुनाव तो बस एक दिखावा है, दरअसल अमरीका अपनी नाकामी पर पर्दा डालना चाहता है.
अफ़सोस है कि यह सब देखने के लिए आपको अफ़गानिस्तान जाना पड़ा।