भाजपा बनाम आरएसएस
भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई में जो वसुंधरा हटाओ और वसुंधरा बचाओ लॉबी के बीच उखाड़-पछाड़ चल रही है वह पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर देखी जा रही आंतरिक कलह, दिशाहीनता और केंद्रीय नेतृत्व के दिवालिएपन का सबसे ताज़ा उदाहरण है.
यूँ तो वर्ष 2004 के लोकसभा के चुनाव के बाद ही भाजपा पूरी तरह से कभी भी उबर नहीं पाई. फिर जिन्ना प्रकरण पर आडवाणी की जिस तरह हेठी हुई थी उसके बाद प्रधानमंत्री पद के पार्टी के उम्मीदवार घोषित होने के बाद में वह पार्टी में अपना पहले जैसा क़द और सम्मान दोबारा स्थापित नहीं कर सके.
वाजपेयी जी की बीमारी और सक्रिय राजनीति से सन्यास और प्रमोद महाजन की असामयिक मौत ने पार्टी को और झटका दिया और रही सही कसर पूरी कर दी राजनाथ सिंह जी ने जो दरअसल राष्ट्रीय स्तर के नेता बनने लायक़ कभी थे ही नहीं, पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन बैठे.
वर्ष 2009 लोकसभा के चुनाव की हार से पार्टी नेतृत्व और आएएसएस सीखने के बजाए एक बार फिर अंतर्कलह को बढ़ावा दिया.
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशें जारी रखीं और आडवाणी जी तो कहीं गए ही नहीं, अपितु 'आडवाणी के बाद कौन' की लड़ाई में पार्टी का समूचा द्वितीय पंक्ति का नेतृत्व एक दूसरे के सम्मुख तलवार खोल कर खड़ा हो गया.
आरएसएस की दख़लअंदाज़ी कम होने के बजाए और बढ़ रही है और पार्टी में कोई भी यह कहने को तैयार नहीं है कि आख़िरकार आरएसएस किस बात और कौन सी ताक़त के दम यह इतनी अपनी चलाना चाहता है.
ज़मीन पर सच्चाई यह है कि देशभर में आरएसएस के शाखाओं में उपस्थिति कम हो रही है और संघ की विचारधारा और कार्यक्रमों में ऐसा कुछ नहीं है जिससे देश का युवा उत्साहित या चमत्कृत हो.
भाजपा की ताक़त और उसे बल देने वाली संस्था समझे जाने वाली आरएसएस दरअसल पार्टी को कमज़ोर बना रही है और उसे पीछे खींच रही है.
पर मुश्किल यह है कि ये बात कहे कौन. बिल्ली के गले में घंटी कौन सा चूहा बांधे.
आरएसएस एक समाजिक संस्था की तरह उपयोगी है और नेहरू जी तक ने बाढ़, भूकंप इत्यादि विभीषिका के दौरान संघ के काम की प्रशंसा की थी. अगर नेहरू जी का सर्टीफ़िकेट नहीं मिलता तो भी आरएसएस के समाजिक कार्य को उनसे कोई छीन नहीं सकता और उस भूमिका में उनका काम हमेशा प्रशंसनीय रहा है.
पर उनकी राजनीतिक विचारधारा है 21वीं सदी के भारत के साथ मेल नहीं खाती और भाजपा को नुक़सान पहुँचाती है.
समय आ गया है कि भाजपा का नेतृत्व आरएसएस के साथ अपना राजनीतिक रिश्ता तोड़े. अन्यथा भाजपा और आरएसएस दोनों का ही भविष्य मौजूदा हालात में बहुत उज्जवल नहीं दिखता. अलग होने में ही दोनों पक्षों की भलाई है.
वाजपेयी जी शायद यह बीड़ा उठा पाते. पर क्या भाजपा के मौजूदा नेतृत्व में आपको एक भी ऐसा नेता दिखता है जो इस तरह की बात करने का साहस रखता हो?
मुझे तो नहीं दिखता.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
मैं आपसे कहता हूँ कि नरेंद्र मोदी ही ठीक हैं.
संजीव जी आपका आकलन एकदम सटीक है. लेकिन समस्या यह है की बीजेपी अपने प्रारंभिक दौर से ही आरएसएस की गोदी में खेल कर पली बढ़ी है. ऐसे मैं वह एकाएक साथ तो नहीं छोड़ पाएगी. उसके साथ दूसरी बड़ी समस्या नेता का अकाल है. ऐसा करने का मदद बाजपेई जी के पास था. उन्होंने प्रयास भी किया था. वे सफल भी हुए लेकिन उनके बाद आरएसएस फिर से बीजेपी को कैद करने के फिराक में है और बीजेपी की भी मजबूरी है कि वह बिना आरएसएस के स्वयं के बारे में सोचकर ही घबराने लगती है. क्योंकि यदि आरएसएस का डंडा बीजेपी पर नहीं रहेगा तो नेत्रत्व के अभाव में उसके विखरने का खतरा भी है. जो देशहित में नहीं होगा.
वाह संजीव जी वाह. अगर आप बीबीसी इस समय छोड़ देते हैं तो कॉंग्रेस सरकार आप को केंद्र में सूचना मंत्री बना देगी क्योंकि आप ने कॉंग्रेस की सभी बुराइयों को छिपा कर भारतीय जनता पार्टी की बुराइयों का लेख लिखा है.
संजीव भाई, जिस तरह बीजेपी ने खुद को बुरे दौर में फंसा लिया है, उस पर हरियाणा का एक किस्सा याद आ रहा है. एक बार एक लड़की छत से गिर गयी, लड़की दर्द से बुरी तरह छटपटा रही थी, उसे कोई घरेलु नुस्खे बता रहा था तो कोई डॉक्टर को बुलाने की सलाह दे रहा था, तभी सरपंच जी भी वहां आ गए. उन्होंने हिंग लगे न फिटकरी वाली तर्ज़ पर सुझाया कि लड़की को दर्द तो हो ही रहा है लगे हाथ इसके नाक-कान भी छिदवा दो, बड़े दर्द में बच्ची को इस दर्द का पता भी नहीं चलेगा, वही हाल बीजेपी का है. चुनाव के बाद से इतने झटके लग रहे है कि इससे ज्यादा बुरे दौर कि और क्या सोची जा सकती है. ऐसे में पार्टी कि शायद यही मानसिकता हो गयी है कि जो भी सितम ढहने है वो अभी ही ढह
जायें, कल तो फिर उठना ही उठना है. आखिर उम्मीद पर दुनिया कायम है.
संजीव जी. आप नरेंद्र मोदी को कैसे भूल सकते हैं. भाजपा को आडवाणी की जगह मोदी को लाने में देरी नहीं करनी चाहिए. मोदी पार्टी को शीर्ष में लाने में सक्षम हैं जैसा उन्होंने गुजरात में किया है.
संजीव जी, भारतीय पत्रकारों में एक स्तंभ के रूप में अगर पांच पत्रकारों के नाम आएं तो आप भी उनमें से एक हैं.दरअसल आपके शब्दबाण काफी दिलचस्प होते हैं,लेकिन इस लेख में तथ्यों की कमी नजर आई.अगर आपने आरएसएस पर निशाना साधा तो, वसुंधरा के मामले वो दोषी हैं? ये आपने सिद्ध नहीं किया.इसी तरह राजनाथ सिंह के नेतृत्व में कमी है तो आरएसएस के हस्तक्षेप को भी आपने उजागर नहीं किया.कुल मिलाकर लेख पढ़ने से यही लगा कि जगह की कमी ने इस लेख की आत्मा का अंत कर दिया.
संजीव जी, बिल्कुल ठीक आकलन है आपका. बीजेपी दो नावों की सवारी कर रही है. एक तो हिंदूवादी संगठनों का एजेंडा और दूसरा संघ की प्रतिछाया से निकलने की कोशिश. कमज़ोर केंद्रीय नेतृत्व के कारण क्षेत्रीय छत्रप भी गाहे-बगाहे बग़ावत का बिगुल फूँकते रहते हैं. निसंदेह बीजेपी एक क्रॉस रोड पर खड़ी है. किस दिशा में उसे जाना है, ये तय नहीं कर पा रही है.
अगर बीबीसी में सच लिखने की हिम्मत नहीं तो बंद कर दें ऐसे कॉलम को. मेरे भेजे हुए विचार क्यों नहीं जगह बना पाए क्योंकि वो संजीव जी के ख़िलाफ़ राय रखते थे. मेरे ही नहीं शायद अनगिनत श्रोताओं के ऐसे विचार आए होंगे. इसलिए सिर्फ़ तीन श्रोताओं के विचार यहाँ जगह बना पाए. बाक़ी के शायद संजीव जी के ख़िलाफ़ होंगे.
संजीव जी, आप वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेकिन आपका आकलन बहुत ही सतही है. बीजेपी में कलह बीजेपी का आंतरिक संकट है. ये संकट आरएसएस का नहीं है. हाँ, बीजेपी के संकट का असर आरएसएस पर कभी-कभी ज़रूर पड़ता है. आरएसएस का कार्य कितने गहरे चल रहे हैं. आप इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते. बीजेपी की चुनावी जीत-हार से इसके कार्य पर कोई असर नहीं पड़ता. आपने लिखा है कि संघ की विचारधारा में ऐसा कुछ नहीं है जिससे युवक उत्साहित या चमत्कृत हो तो आप ही बता दीजिए कि यूथ अब किस विचारधारा की ओर ज़्यादा आकर्षित हो चला है. आप वाजपेयी की बात करें या आडवाणी की, इनके विकास और उत्थान में आरएसएस की भूमिका नहीं रही है क्या? ये दोनों नेता बार-बार इस बात को कह चुके हैं कि अगर उनके जीवन में संघ न होता तो वे इतनी ऊँचाई पर भी न पहुँचते. आप जानते होंगे कि वाजपेयी पत्रकार थे उसी में करियर बना भी रहे थे, अचानक उन्हें संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक ने कहा कि जनसंघ में काम करो, तो उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू हो गई, यही किस्सा आडवाणी से भी जुड़ता है. वो भी पत्रकार थे. संघ के एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक में काम करते थे. उप प्रधानमंत्री बने तो किसकी बदौलत?
बीजेपी का संकट यही है कि बीजेपी नेता संघ को अपनी राजनीति में घसीटते रहते हैं. वो संघ का इस्तेमाल करना चाहते हैं. अगर संघ उनके हितों का पोषण करे तो ठीक न करे तो ग़लत. सच्चाई यही है कि संघ ने बीजेपी को सिर्फ़ विचारधारा के सवाल पर अपना समर्थन दिया. पार्टी जब भी विचारधारा से अलग हुई तो संघ ने उसे रास्ते पर लाने का प्रयास किया, ये प्रयास अक्सर उन नेताओं को नागवार गुज़रता है जो संघ को अपने हिसाब से हांकने का प्रयास करते हैं. सच्चाई यही है कि संघ सिर्फ़ और सिर्फ़ विचारधारा और उसके अनुरूप आचरण के आधार पर ही चलता है. नेता जब तक विचारधारा के अनुरूप रहते हैं. संघ कभी किसी मामले में नहीं बोलता लेकिन जब नेताओं के आचरण में वैचारिक गड़बड़ी होती है तो सहज ही जो होना चाहिए वह होता है. इसमें कोई नाराज़ हो या ख़ुश, निर्णय का आधार विचारधारा ही है.
पिछले 10-12 सालों में बीजेपी ने सत्ता के लिए जो जल्दबाज़ी दिखाई उसमें उनके नेता विचारधारा से दूर हुए. ये सार्वजनिक सत्य है. हमारा सार्वजनिक जीवन पिछले 20 सालों में और भ्रष्ट हुआ है, सच ये भी है. ज़िम्मेदारी तो सभी की है. आप कहेंगे कि यूथ का आकर्षण आरएसएस में नहीं है, मैं कहता हूँ कि यूथ का आकर्षण सिस्टम पर ही उठ रहा है. क्या कहेंगे आप? नक्सली आतंकवादी यूथ है कि नहीं. वहाँ आपकी सरकार का बिस्तर गोल है लेकिन वहाँ आरएसएस है, आरएसएस के कार्यकर्ता नक्सल प्रभावित इलाक़ो में स्कूल चला रहे हैं. छोटी-मोटी चिकित्सा सेवा दे रहे हैं. आपको और किसी पॉलिटिकल पार्टी के नेता को ये नहीं दिखता है. पत्रकार को इसलिए नहीं दिखता क्योंकि उसका बॉस इसे देखना नहीं चाहता.
युवा कहाँ जा रहा है? आप अच्छी तरह समझ सकते हैं. उसका रुझान अपने करियर की ओर है, होना भी चाहिए. लेकिन इसी के साथ सच्चाई ये भी है कि अगर युवा वर्ग चुपचाप किसी संस्था के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सोशल सर्विस कर रहा है तो ऐसे संस्थानों में आरएसएस सर्वोपरि है.
अंतिम बात. बीजेपी के लीडर त्याग का हिंदू आदर्श भूल गए हैं. ये त्याग करना नहीं चाहते. न पद का और न अहंकार का. सो जनता सब समझती है. बडों-बडों के अहंकार मिट्टी में मिला दिए हैं इस महान जनता ने. इमर्जेंसी याद कर लीजिए. क्या बीजेपी और क्या कांग्रेस रास्ते पर नहीं चलेंगे, तो रास्ते पर ला दिए जाएँगे.
भाजपा की स्थिति की जिम्मेदार स्वयं भाजपाइयों की सोच है। जब कथनी और करनी में फ़र्क आ जाये, या आप अपने आदर्शों के प्रति ईमानदार न हों, तो ऐसे उहापोह में फंसना लाज़मी है। चुनाव के दौरान जिस तरह अटल जी पटल से गायब रहें, उससे साफ ज़ाहिर होता है कि यहां मुल्यों को जीने वाला कोई नहीं.हिन्दुत्व, संस्कृत और संस्कारों की बात करना सिर्फ़ छलावा है. आप न जिन्ना के हुए न जगदीश के!
सही कहा आपने. राजनाथ सिंह जी को यूपी में ही रहकर होमवर्क और अपने आफ को सीधा करने की ज़रूरत है. राजनाथ ने अपने आप को ऐसा प्रोजेक्ट किया जैसे कि उनसे ज़्यादा कोई अनुभवी और क़ाबिल नेता पार्टी में है ही नहीं. उन्होंने पार्टी की हार को ऐसे ही स्वीकार किया जैसे वाजपेयी जी किया करते थे. लेकिन राजनाथ की तुलना आडवाणी से करना ठीक वैसा ही है जैसे आडवाणी की वाजपेयी जी के साथ. वाजपेयी जी एक प्रतिभाशाली और करिश्माई नेता थे और शायद अभी उनकी कोई जगह लेने वाला नहीं है. फिर भी भाजपा में बहुत प्रतिभाशाली लोग हैं जिनको शायद मौक़ा आरएसएस की दख़ल से नहीं मिल पा रहा है. अच्छे ब्लॉग के लिए धन्यवाद.
संजीव जी ने काफ़ी हद तक सही लिखा है. वाजपेयी जी के संन्यास, आडवाणीजी के बड़बोलेपन और राजनाथ जी की अयोग्यता ने भाजपा को बहुत नुक़सान पहुँचाया है. लेकिन भाजपा की वर्तमान स्थिति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कितना ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है यह पता करना कठिन है. वर्तमान में अगर कोई भाजपा का नेतृत्व संभालने योग्य है तो वह नरेंद्र मोदी हैं. चूँकि मोदी जी संघ के प्रचारक रह चुके है इसलिए संघ को उनको नाम पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. शायद राजनाथ जी की महत्वाकांक्षा ही भाजपा अध्यक्ष पद और उसके सही उत्तराधिकारी के बीच आ रही है. अगर 2009 का लोकसभा चुनाव मोदी जी के नेतृत्व में लडा़ जाता तो परिणाम कुछ और भी हो सकता था. भाजपा को पहले एक कुशल नेतृत्व की आवश्यकता है और फिर अपने बुनियादी संगठन को मज़बूत करने की तभी उसका उत्थान संभव है.
बीजेपी को ख़त्म कर देना चाहिए. इस पार्टी में अब हर आदमी पीएम इन वेटिंग है.
राजनीतिक मूल्यों मे गिरावट से कोई पार्टी अछूती नही है. लेकिन बीजेपी के संदर्भ में आरएसएस की दखलंदाज़ी मुझे तथ्यविहीन लगती है. किसी पार्टी के प्रधानमंत्री या किसी पार्टी के अध्यक्ष की योग्यता निर्धारित करना भी मुझे तर्कसंगत नही लगता है. बेहतर होता अगर आप स्वयंसेवी संस्थाओ की राजनीति में हस्तक्षेप की चर्चा करते. क्या ऐसी संस्थाएँ देश को दिशा प्रदान कर सकती हैं?
आपकी टिप्पणी से मैं सहमत हूँ क्योंकि भारतीय जनता पार्टी आज तक एक परिवार का किरदार नहीं निभा पाई है. यह सत्ता में दोबारा आ चुकी है लेकिन किसी स्थिर विचारधारा को नहीं अपना पाई.
संजीव जी के विश्लेषण से मैं सहमत हूँ क्योंकि जब तक पार्टी के आलाकमान खुद अंतर्द्वन्द्व से बाहर नहीं आएंगे तब तक पार्टी का सत्ता में वापस आना कठिन नजर आता है आडवाणी जी को पार्टी में जान लाना है तो एक अपनी पार्टी के उद्देश्यों को साफ-साफ समझना होगा. उद्देश्यों से अलग हटकर ना तो राजनीति सफल हो सकती है और ना ही छवि को सुधारा जा सकता है. आडवाणी जी ऐसे लोगों का साथ यदि छोङ देते तो शायद अभी तक उनकी आंतरिक इच्छा पूरी हो गई होती.
आधुनिक वातावरण में भारतीय जनता पार्टी को किसी कट्टरपंथी हिंदू संगठन का पिट्ठू न हो कर अधिक धर्मनिरपेक्ष होने की ज़रूरत है. जब तक यह संघ की विचारधारा को अलविदा नहीं कहती और अन्य ग़ैर हिंदू समुदायों को साथ ले कर नहीं चलती, यह राष्ट्रीय स्तर पर नई सरकार के गठन के लिए वापसी नहीं कर पाएगी.
एक कहावत है कि डूबते को तिनके का सहारा और मैं कहूँगा कि बीजेपी को जिन्ना का सहारा. आरएसएस इसे पचा नहीं सकता.
संजीव जी, मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ कि आरएसएस में लोगों का रुझान ख़त्म हो रहा है. आज आरएसएस के प्रति लोगों में पहले की ही तरह रुझान है. मैं दिल्ली में साफ़्टवेयर इंजीनियर हूँ और मेरे कई दोस्त यह कहते हैं कि अपने बच्चों को कम से कम एक या दो साल के लिए सरस्वती शिशु मंदिर में ज़रूर डालना चाहिए जिससे वे अपनी संस्कृति को सीख सकें. आपने ख़ुद ही कहा है कि नेहरू के सर्टीफ़िकेट के बिना भी आरएसएस का काम तारीफ़ के लायक है. मैं यह कहना चाहता हूँ कि आरएसएस लोगों पर हिंदुत्व थोपता नहीं है. वह तो लोगों को केवल भारतीयता सिखाना चाहता है. कहीं न कहीं हिंदुत्व और भारतीयता आपस में मिला करते हैं. जहाँ तक आरएसएस के भाजपा के मामलों में दख़ल देने की है तो वह बिल्कुल ग़लत है. उसका काम सिर्फ़ भाजपा के कामों पर नज़र रखना है. सिर्फ़ भाजपा ही क्यों वह तो सभी संगठनों के काम पर नज़र रखती है. अगर उसे कुछ ग़लत लगता है कि वह उस पर टिप्पणी भी करती है. यह अलग बात है कि बाजपा के नेता उसे गंभीरता से लेते हैं और दूसरे दल ऐसा नहीं करते हैं. रही बात भाजपा के चुनाव में प्रदर्शन की कि तो इस पर मैं सिर्फ़ मैं यही कहना चाहूंगा कि आप कांग्रेस में से गांधी परिवार को निकाल दीजिए तो फिर आप कांग्रेस का प्रदर्शन देखिए, उसके लिए पचास सीटें निकालना भी मुश्किल हो जाएगा. हमारे देश की बिडंबना है कि यहाँ आज भी लोग किसी पार्टी की नीतियों से अधिक व्यक्ति विशेष को वोट देते हैं. हमारा मीडिया भी इसी तरह का है.वह गांधी परिवार के किसी भी व्यक्ति को राजा की तरह पेश करता है. भाई मेरे यह राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है.
नमस्कार संजीव जी, आप बीबीसी पर लिख रहे हैं, तो अवश्य ऊँची चीज़ होंगे, पर भाजपा की समस्याओं का आपका आकलन देश के सैकड़ों अन्य धर्मनिरपेक्ष पत्रकारों जैसा ही है, जो अपनी बात यह ध्यान में रख कर कहते हैं कि कहीं भाजपा को सचमुच अपनी कमियों का पता न चल जाय, और उनके लेख से कहीं भाजपा को कोई फ़ायदा न हो जाय।
पार्टी के मूलभूत सिद्धान्तों को तिलाञ्जलि देने का जो आरोप भाजपा पर लग रहा है, वह अटल जी के प्रधानमन्त्रित्व के काल में ही सबसे अधिक हुआ। यही नहीं, अटल जी पार्टी के सिद्धान्तों को तोड़ने के सबसे बड़े अपराधी हैं। पार्टी की कीमत पर अपनी छवि चमकाने की उनकी नीति ने उन्हें धर्मनिरपेक्ष दलों और पत्रकारों का चहेता नेता बना रखा था। आप जैसे लोग आज भी उनका नाम इसलिए ले रहे हैं क्योंकि वह जानते हैं कि अटल जी के शीर्ष पर रहते हुए भाजपा के उभरने का कोई खतरा नहीं है। अटल जी कभी भी Man of Crisis नहीं रहे। पार्टी को लोकसभा में २ सीटों की स्थिति पर ला कर वह किनारे बैठ गये। आडवाणी ने राम मन्दिर आन्दोलन के सहारे पार्टी को १८२ सीटों तक पहुँचाया, जिसके कारण राजग बना और सत्ता में आया। आज जब भाजपा की हालत खस्ता है, तब राजग कहाँ है? अटल जी अपने चमत्कारिक व्यक्तित्व के सहारे राजग को क्यों नहीं खड़ा कर ले रहे हैं? क्या किसी को याद है कि जना कृष्णमूर्ति को अटल जी के कार्यकाल में कैसे हटाया गया?
सिद्धान्तों के विपरीत आचरण और अनुशासनहीनता अटल जी के समय चरम पर थे, और यह सब बदस्तूर जारी है, पर पार्टी और संघ के नेता तब उन चीज़ों को बर्दाश्त करते रहे, क्योंकि सभी (आडवाणी सहित) सत्ता-सुख भोग रहे थे। आज जब सत्ता नहीं है, तो वही चीजें बहुत बड़ी दिखाई दे रही हैं। आज के नेता तो किसी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी अधिकार खो चुके हैं, क्योंकि आइना देखने पर अपने को वह उसी के लिए दोषी पाएंगे, जिसके लिए वह दूसरे पर कार्रवाई करने की बात कर रहे हैं।
आज कोई कह रहा है कि आडवाणी को प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार बनाना गलत था। कोई कह रह है कि मनमोहन सिंह पर निजी हमला बोलने का नुकसान हुआ। असल बात कोई कहना नहीं चाहता, कयोंकि उससे भाजपा सचमुच फ़ायदा उठा सकती है। सत्य यह है कि १९९८ से लगातार भाजपा के नेताओं की कथनी और करनी मेंअन्तर बढ़ता जा रहा है, और इन नेताओं (आडवाणी सहित) की विश्वसनीयता आज उस स्थान पर पहुँच चुकी है, जहाँ से और नीचे जाना सम्भव नहीं है।
वर्तमान परिस्थितियों में इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि भाजपा को भंग कर दिया जाय, और हिन्दू-राष्ट्र के सिद्धान्तों के प्रति पूरणतया कटिबद्ध एक नये दल का गठन किया जाय। सत्ता चाहे न भी मिले, एक शक्तिशाली हिन्दूवादी रारनीतिक पार्टी इस समय देश की ज़रूरत है।