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सीनियर सिटीज़ेन यानी असुरक्षित नागरिक

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|सोमवार, 31 अगस्त 2009, 12:00 IST

सुबह जब अख़बार उठाती हूँ तो पता रहता है कि उसके पांचवें-छठे पन्ने पर बुज़ुर्गों यानी सीनियर सिटीज़ेन्स की हत्याओं की दो-चार ख़बरें ज़रूर पढ़ने में आएँगी.

यह प्रवृत्ति पिछले कुछ दिन में बढ़ी है.

आम तौर पर ऐसे बुज़ुर्गों को निशाना बनाया जा रहा है जो अकेले रहते हैं. या फिर घर में बस पति-पत्नी ही हैं.

ऐसी बहुत सी हत्याएँ ऐसी कॉलोनियों में हुई हैं जहाँ गेट पर पहरा रहता है. किसी भी आने-जाने वाले की शिनाख़्त होती है.

इससे अंदाज़ा लगता है कि यह हत्याएँ जान-पहचान वालों ने की हैं. यानी जिनके आने पर घर के लोग बिना किसी शक शुब्हे के दरवाज़ा खोल देते हैं.

क्या यह हाल भारत में ही है? या विदेशों में भी बुज़ुर्ग इतने ही असुरक्षित हैं? मेरे विचार में क्योंकि विदेशों में यह प्रथा हमेशा से ही इतनी आम है, बुज़ुर्गों को अपनी सुरक्षा की चिंता करनी ही पड़ती है.

भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में अब भी अपेक्षा की जाती है कि संतान अपने बूढ़े माता-पिता का ध्यान रखेगी और उन्हें अकेला रहने पर मजबूर नहीं होना पड़ेगा.

कभी-कभी यह स्थिति अपरिहार्य भी हो जाती है. संतान अगर विदेश में है या दूसरे शहर में नौकरी पर है तो यह स्थिति लाज़मी ही है.

लेकिन तब मन बड़ा दुखता है कि उसी शहर में मौजूद बच्चों ने माता-पिता को फ़ोन किया और फ़ोन नहीं उठाया गया तो यह सोच कर निश्चिंत हो गए कि माता जी मंदिर या पिता जी बाज़ार गए होंगे.

दरवाज़ा तब तोड़ा गया जब घर के अंदर से बदबू आने लगी और पड़ोसियों का माथा ठनका.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 13:24 IST, 31 अगस्त 2009 Khushdeep Sehgal, Noida:

    सलमाजी, बुज़ुर्गों की इस हालत के लिए कहीं ना कहीं हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं. आज भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाने की खातिर हम रोबोट बने घूमते हैं और अपनी जड़ों को ही भूल जाते हैं. पश्चिम की तरह ज्यादा से ज़्यादा फादर्स डे और मदर्स डे पर बुर्जुगों को कोई उपहार देकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं. बड़े-बूढ़ों की भूमिका बस घर की रखवाली तक ही सीमित रह गई है. आजकल युवा पीढ़ी कोई रोक-टोक ना हो इसलिए संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार में ही रहना पसंद करते हैं. हमें ये भी सोचना होगा कि बुर्जुग ज़्यादातर महानगरों या बड़े शहरों में अपराधियों के हाथों निशाना क्यों बनते हैं. दरअसल छोटे शहरों-कस्बों में आज भी सामुदायिक भावना दिखती है. अगर कोई बु्ज़ुर्ग किसी घर में अकेला होता है तो पास-पड़ोस से कोई न कोई उसे पूछने आ जाता है. नोएडा जैसे आधुनिकता की पहचान वाले शहर में जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आकर बसे हुए हैं, कोई ये भी नहीं जानता कि साथ वाले घर में कौन रहता है. पीछे एक ऐसी ही घटना हुई, मेरे घर के पड़ोस में किसी घर में बुर्जुर्ग की मौत हो गई. पूरी कॉलोनी में किसी को ख़बर तक नहीं हुई.अस्पताल की एम्बुलेंस आई और शव को ले गई. कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले वक्त में ऐसे दिन भी आ जाएं कि आपको किसी शव को कंधा देने के लिए चार आदमियों की ज़रूरत है, तो उसके लिए किराए पर आदमी देने वाली एजेंसियां खुल जाएंगी. ठीक वैसे ही जैसे राजनीतिक दलों की सभाओं के लिेए भाड़े पर आदमियों का इंतज़ाम किया जाता है.

  • 2. 13:40 IST, 31 अगस्त 2009 Saagar:

    दिल्ली, एन सी आर में यह वाक़या लगभग रोज़ पढ़ता हूँ, यह बुजुर्ग संपत्ति के रखवाले मात्र बन कर रह गए हैं, कभी इन पर नौकर वार करते हैं, तो कभी पहरेदार इनका गला रेत देते हैं... यह चिंता करने वाली बात है... बुजुर्ग सचमुच असुरक्षित हैं... नौकरी और करियर के कारण बच्चे इनके साथ नहीं रह पाते जिसका फायदा परिवार और आस-पास के लोग भी यदा-कदा उठा लेते हैं...

  • 3. 14:10 IST, 31 अगस्त 2009 Rabindra Chauhan,Tezpur, Assam:

    ये सोचना कि इस तरह की घटना हो ही क्यों रही है क्या यह अपनों का करतूत है या दूसरे लोग भी शामिल हैं. किस उम्र के लोग ये काम कर रहे हैं. संपत्ति को लेकर कोई विवाद तो नहीं है. परिवारिक कलह या दुश्मनी तो नहीं. क्या इस तरह की घटना महानरों में ही हो रही है या गाँवों में भी है. दूसरी बात यह है कि जो अपने आपको भारतीय समाज से अलग समझते हैं, उन्हें इस संबंध में अपने पूर्वजों के पेश किए आदर्श को देखना चाहिए.

  • 4. 14:22 IST, 31 अगस्त 2009 भावेश:

    सलमा जी, काफी हद तक आज देश का कानून भी घर तोड़ने में मददगार है. आज के युग में ही माँ बाप अपने बच्चो में संस्कार देने में काफी हद असफल रहते है फिर दुसरे घर की लड़की घर में आते ही घर से अलग होने की बात करती है. आज के जिन्दगी की भाग दौड़, संस्कारो की कमी और नैतिकता के अभाव में युवाओ को माँ बाप को अकेला छोड़ना पड़ता है. अगर वो माँ बाप को नहीं छोड़ता और पत्नी की बात नहीं मानता तो फिर कानून की धुरी में फँस कर खुद की जिन्दगी का तमाशा बनाना होता है. इस प्रवर्ती के लिए जिम्मेदार कई कारणों में से एक कारण के चौकाने वाले आंकड़े देखने के लिए मेरे ब्लॉग के ऊपर दिए हुए लिंक पर देखे जा सकते है.

  • 5. 16:45 IST, 31 अगस्त 2009 Pankaj Parashar:

    सलमा जी, आपने इस बेहद संवेदनशील मुद्दे को उठाकर हम जैसों को अपना कर्तव्य याद दिला दिया है. सबसे पहले इसके लिए आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूं.
    पहले गांव से शिक्षा के लिए बाहर आए, फिर नौकरी के लिए बाहर रहे और जब मां-बाप को हमारी ज़रूरत हुई तो हम उनकी गोद और ममता की छांव से बेहद दूर होते चले गए. यदि देश का विकास इस क़दर शहर केंद्रित और असमान न हुआ होता तो किसी को अपना इलाक़ा, अपना गांव छोड़कर बाहर आने की ज़रूरत ही नहीं होती. यदि हमें अपना रोजी-रोटी हमारे घर के आसपास ही मिल जाए तो हम क्योंकर बाहर रहें? इस मुद्दे के बहाने हमें इस बड़े मुद्दे को लेकर भी सोचना चाहिए.

  • 6. 17:22 IST, 31 अगस्त 2009 Dhananjay Nath:

    एक काफ़ी विचारणीय और संवेदनशील मुद्दे पर चिट्ठा लिखना प्रशंसनीय है. धन्यवाद! निस्संदेह आज बुज़ुर्गों की स्थिति दिन प्रति दिन दयनीय होती जा रही है. लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है. क्या हमने कभी सोचा है. शायद आदमी सोचने की ज़रूरत भी नहीं समझता. जब कभी कहीं बात उठती है तो दो-चार शब्दों में वक्तव्य, टिप्पणियाँ, आलोचना और विवेचना के ज़रिए दुख व्यक्त कर लिया जाता है. आज इसके लिए आदमी में संस्कारों और अपनी परंपराओं निरंतर होते ह्रास को सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है. आधुनिक भारत ने लोगों की सोच में बदलाव लाने के साथ-साथ अपने बुज़ुर्गों के प्रति आदर का भाव भी ख़त्म कर दिया है. आधुनिक समाज उन्हें घर में रखना कूड़े के समान समझता है और उन्हें वृद्धाश्रम में धकेल दिया जाता है. या फिर वे घर में इतने प्रताड़ित किए जाते हैं कि ख़ुद ही घर छोड़ कर चले जाते हैं. क्या यही हमारी परंपरा और संस्कृति है...श्रवण कुमार ने भी यहीं जन्म लिया था...


  • 7. 17:43 IST, 31 अगस्त 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    सलमा जी, बहुत ख़ूब. कम से कम आपने जवान बच्चों को एहसास तो कराया कि हम अपने माँ और बाप या घर के बुज़ुर्गों के साथ कैसी बेरुख़ी करते हैं. जो माँ-बाप बच्चे को उंगली पकड़ कर दुनिया में पैदल चलना सिखाते हैं ताकि वह बच्चा भी बुढ़ापे में अपना कंधा पकड़वा कर माँ-बाप का सहारा बनेगा लेकिन इस कलियुग में श्रवण बनना तो दूर ख़ुद बच्चा उनको मारता है या मरवाता है. यह सब इसलिए क्योंकि भारत भी अब पश्चिमी सभ्यता की ओर जा रहा है. रहा सवाल सरकारों का तो जब घर में बुज़ुर्गों को इज़्ज़त या सम्मान नहीं मिलेगा तो यह बेईमान नेताओं या बेईमान सरकार से उम्मीद रखना बेवक़ूफ़ी है. बीबीसी पर ही सलमान रावी और अन्य रिपोर्टरो की रिपोर्टें सुन कर आँसू बहते हैं ऐसे माँ-बाप पर. आज भारत में भी केवल पैसा और भौतिक सुख ही देखा जा रहा है.

  • 8. 17:53 IST, 31 अगस्त 2009 G k Chaturvedi:

    ऐसी ही एक कहानी आज से 40 साल पहले कृष्णचंद्र ने लिखी थी. उसमें भी भाड़े पर रोने वालों को बुलाने का ज़िक्र था. यह हमारे स्वार्थीपन की इंतिहा है.

  • 9. 18:19 IST, 31 अगस्त 2009 Pradeep Shukla chicago:

    इस तरह की घटनाए संयुक्त परिवार के महत्व को इंगित करती है. जहाँ बड़े बूढ़े पिता-माता, दादा दादी, नाना नानी के रूप मे परिवार का मार्गदर्शन करते थे. लेकिन आज के वातावरण मे अनेक ऐसे अनेक कारण हैं जिससे संयुक्त परिवार विखरता जा रहा है. कारण जो भी हो लेकिन ये हम सब की ज़िम्मेदारी है जिस माता पिता ने हमे सुनहरा जीवन दिया उसकी देख भाल ठीक उसी तरह की जाए जिस तरह हम अपने बच्चों की देख भाल और सुरक्षा से समझौता नही करते. साथ- साथ हम अपने बच्चो के सामने ऐसा उदाहरण पेश करे कि कल जब हम बूढ़े हो तो उनको भी अपनी ज़िम्‍मेदारियो का एहसास रहे.

  • 10. 20:03 IST, 31 अगस्त 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH ,SAUDIA ARABIA:

    सलमाजी ये संयोग है कि बीबीसी पर कोलकाता से पीएम तिवारी की सच्ची कहानी भी छपी हुई है. मेरा मानना है कि यही बीबीसी और दूसरे मीडिया में फर्क है. बाप की जूती पहचान कर संस्कार कर दिया और सौतेली माँ को ख़बर तक नहीं करी. वाह रे सच्ची औलाद!

  • 11. 21:36 IST, 31 अगस्त 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    सलमा जी, आपने एक बहुत महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दा उठाया है. असल में देश का सामाजिक-आर्थिक मानचित्र बदला है, लेकिन हमारी मानसिकता जहां की तहां है. बच्चों को रोजी-रोटी का जुगाड़ करने घर और मां बाप से दूर जाना ही होता है. इसे बुराई की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. यह भी सही है कि मां बाप के लिए अनेक कारणों से, जिनमें भावनात्मक कारण मुख्य हैं, उनके साथ रह पाना मुमकिन नहीं होता. ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों के लिए समुचित सुरक्षा व्यवस्था का दायित्व राज्य और समाज पर आ जाता है. दुर्भाग्य से दोनों ने ही यह दायित्व ठीक से नहीं निभाया है. सोचा यह जाना चाहिए कि वर्तमान स्थितियों में क्या किया जा सकता है.

  • 12. 22:12 IST, 31 अगस्त 2009 sunil gogia:

    हम सबको इस बारे में कोई कड़ा क़ानून बनाना चाहिए, ताकि कोई भी बुज़ुर्गों के साथ कोई ग़लत व्यवहार नहीं सके.

  • 13. 22:36 IST, 31 अगस्त 2009 himmat singh bhati:

    सही में बुज़ुर्गों की हत्या लालच में की जाती है, चाहे नौकर हो या रिश्तेदार हो या पड़ोसी ही क्यों नहीं हो. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बुज़ुर्गों के अपने उनका सही ध्यान नहीं रखते.

  • 14. 00:26 IST, 01 सितम्बर 2009 MUZAFFAR ADNAN, NEW DELHI:

    ये हमारे लिए बड़े शर्म की बात है कि हम अपने बूढ़े माँ बाप का ख्याल नहीं रखते हैं. अगर इसके पीछे कारण देखेंगे तो पता चलेगा कि भौतिक सुख है. आज हम इतने बदल गए हैं कि माँ बाप हमें बचपन से लेकर बड़े होने तक हमारी जरा सी तकलीफ़ पर तड़प उठते हैं, हम लेकिन माँ बाप के साथ ऐसा सलूक करते हैं. माँ बाप अपनी औलाद को चाहते हैं वो एक हो या ग्यारह या उससे भी ज्यादा, वो उन्हें आराम से पाल लेते हैं. लेकिन आज की औलाद ग्यारह मिलकर भी एक बाप को नहीं पाल सकते हैं. जागो आज की औलाद, अपने माँ बाप के साथ ऐसा सलूक मत करो. रही बात उनके असुरक्षित रहने की तो वो एक आसान शिकार होते हैं. बड़े शहरों में ऐसे मामले ज्यादा पाए जाते हैं. अपराधी उन्हें आसानी के साथ शिकार बना लेते हैं, लेकिन हम अगर गहराई में जाकर देखें तो इसके ज़िम्मेदार कहीं न कहीं आधुनिक समाज का दम भरनेवाले और एकल परिवार पसंद करनेवाले लोग हैं.

  • 15. 03:03 IST, 01 सितम्बर 2009 Shafiq Khan:

    यह कलयुग है फिर इन बातों पर चर्चा कैसी?

  • 16. 07:29 IST, 01 सितम्बर 2009 Md Kamaluddin Ansari:

    सलमा जी ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को चुना है. आज की भाग-दौड़ की ज़िंदगी में अक्सर ये देखा जाता है कि माँ-बाप, घऱ संपत्ति की निगरानी करते हैं और औलाद रोज़ी-रोज़गार और पढ़ाई के लिए घर से बाहर रहते हैं. दुर्भाग्य से मेरे घर की भी स्थिति ऐसी ही है. मैं अल्लाह से दुआ करता हुँ कि औलाद हमेशा अपने माँ-बाप के साथ रह सके और उनकी ख़िदमत कर सके.

  • 17. 08:08 IST, 01 सितम्बर 2009 BALWANT SINGH, HOSHIARPUR,PUNJAB:

    सलमा जी यह समस्या हमारे भारत के बड़े और छोटे शहरों में बड़ी तेज़ गति से पांव पसार रही है. इसके कई कारण हो सकते हैं. मेरी समझ में सबसे बड़ा कारण यह है की आज हम बहुत बड़े आधुनिक बनने की फिराक में लगे हैं, जो कि हम हैं नहीं और इसी आधुनिकता के फेर में में हम लोग अपनी मूल संस्कृति को तिलांजली दे बैठे हैं. तथाकथित भरोसेमंद, शुभचिंतक हमारे बुजुर्गों की बेबसी का फायदा उठा रहे हैं. अधिकतर संताने भी आज बुजर्गों को काम की वस्तु समझते हैं, अक्सर बुजर्गों को संतानों द्वारा विदेशों में ले जाया जाता है फिर वहां भी उनसे नौकरों जैसा वर्ताव किया जाता है. जब उनका मन वहां अपनी संतानों के व्यवहार से खिन्न होता है तो हिन्दुस्तान से तथाकथित संतों को बुलाकर सत्संग,कीर्तन करवाकर बुज़र्गों का मन बहलाने की कोशिश की जाती है. लेकिन अपनो के बीच की ग़ुलामी ज्यादा देर तक नहीं सही जाती तब स्वदेश वापस आने के अलावा कोई चारा नहीं होता और यहाँ जो कुछ घट रहा है उसमे कड़ी से कड़ी जुड़ती जा रही है. जो वरिष्ठ नागरिक आज हमारे देश के छोटे और बड़े शहरों में किसी न किसी तरह से अपने ही परिवारों द्वारा उम्र के आखिरी पड़ाव में एकांत और उपेक्षित जीवन व्यतीत करने को मजबूर कर दिए जा रहे हैं वे हमारे जीवन के प्रति दोहरे मापदंडों का परिणाम है. अपने ही ज़्यादातर पीठ में छुरा घोंपने का काम कर रहे हैं, घर के भेदी ही लंका ढहा रहे हैं. क्या वृद्ध -आश्रम खुलवाने ,भजन-कीर्तन करवाने मात्र से ही हम अपने कर्त्तव्यों से मुक्ति पा सकते हैं? जिस प्रकार से हम नौकरी के चलते अपने आने वाले समय के बारे में सोचकर योजनाए बना लेते हैं उसी प्रकार से हमें बुजर्गों के लिए भी इंसानियत और फर्जों की पूंजी में निवेश करना होगा. कयोंकि यह वक़्त हर किसी को देखना है. दूसरी तरफ़ हमारी सरकारें अक्सर विदेशों की बहुत सी नीतियों का अनुसरण करतीं हैं तो सरकार को विदेशों की तरह ऐसे कड़े नियम और कानून बनाने चाहिए ताकि हमारे देश के वरिष्ठ नागरिकों के स्वावलंबन और आत्मसम्मान किसी प्रकार की ठेस न पहुंचे और वे किसी के हाथों की कठपुतली न बनें. संतानों को भी चाहिए कि जो फ़र्जों की दोशाला ओड़े बैठें हैं उसका निस्वार्थ ,छल - कपट रहित निर्वाह करें. सब वरिष्ठ नागरिक हमारे अपने हैं यह सदा- बहार छायादार वृक्ष हैं. अगर किसी का कारणवश कोई नहीं है तो उन बुजर्गों का हमारे समाज और सरकार को अपनो जैसा अपना कर हमारी वैदिक संस्कृति को सम्मानित करना चाहिए ताकि औरों की निगाहों में हमारा और देश का गौरव बढ़े.

  • 18. 13:49 IST, 01 सितम्बर 2009 kuldeep sharma kapurthala:

    सलमा जी नमस्कार. एक लघुकथा याद आ रही है. एक बूढ़ा व्यक्ति मरने लगा. पूरा परिवार उसके पास था. मरणासन्न व्यक्ति का पोता बोला, बाबा, जाते-जाते मुझे कुछ दे जा. वृद्ध की आँखें छलक आईं. बोला, बेटा, अब मेरे पास तुझे देने को कुछ नहीं है. जो कुछ था सब तेरे पिता को बहुत पहले ही दे दिया. पोता बोला, बाबा, यह जो लोटा तेरे पास है, यह मुझे दे जा. बाबा बोला, तू इस लोटे का क्या करेगा? पोताः आपने सब कुछ मेरे माता-पिता को दे दिया लेकिन बदले में मेरे माता-पिता ने आपको पूछा तक नहीं. मैं कई वर्षों से देख रहा हूँ कि आप इसी लोटे में पानी, चाय तथा दाल डाल कर खाते थे. इसीलिए यह लोटा मुझे चाहिए क्योंकि मेरे माँ-बाप को भी वृद्धावस्था में आना है तब यह लोटा उनके काम आएगा.

  • 19. 11:02 IST, 02 सितम्बर 2009 meenakshi:

    जी आपने सही मुद्दे को प्रकाश में लाया है...लेकिन मैं इसके लिए जिम्मेदार सिर्फ़ बच्चों को मानती हूँ जो अपनी प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी में आगे बढ़ने में लगे रहते हैं, वो सिर्फ़ मतलब के रिश्ते बनाते हैं.

  • 20. 14:51 IST, 02 सितम्बर 2009 मोनिका तोमर:

    सलमा जी आप ने बहुत अच्छा लिखा है. आज के बेटे शादी के बाद अपने मां-बाप के साथ रहना पसंद नहीं करते है. शादी के बाद वो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अलग शिफ्ट हो जाते है, कुछ बेटे तो जानबूझकर शिफ्ट हो जाते है तो कुछ बेटों की मजबूरी होती है. वो अपने माँ-बाप की सेवा के लिए नौकर रख देते है. आप समझ ही सकते है की जब बेटा अपना नहीं हुआ तो नौकर कैसे अपना हो सकता है, आप ने ये मुद्धा उठाया, अच्छा लगा.

  • 21. 21:05 IST, 02 सितम्बर 2009 Pradeep Aryal:

    हम और सरकार इसके ज़िम्मेदार हैं. सम्पत्ति पर बेटे और बेटी का हक़ माँ-बाप की इच्छा के अनुसार होना चाहिए. जिस ने सम्पत्ति अर्जित की है यह उसकी ही इच्छा के मुताबिक हो कि जिसको देना है, दे सकता है. कुछ सामाजिक संस्थाएँ इसकी अगुवाई कर सकती हैं.

  • 22. 01:47 IST, 03 सितम्बर 2009 Idrees A. Khan. Riyadh, Saudi Arabia.:

    सलमा जी कुछ दिनो पेहले आपने एक सवाल उठाया था "हम कब बड़े होंगे" देखिये हम लोग बड़े हो रहे हैं और ऐसे बड़े हो रहे हैं कि मां बाप सोचने पर मजबूर हैं कि काश उनके बच्चे बड़े न होते. आपने अपने लेख मे जिन हाई क्लास वृद्ध मां बाप के बारे मे चर्चा की है, वो भले ही असुरक्षित है पर इतने तो खुशकिस्मत हैं कि उनके बच्चों ने उन्हे पैसों की कोई कमी नही होने दी है, या फिर उन्होने ही अपनी जवानी के दिनो मे इतनी बचत कर ली है कि उन्हे अपने गुज़र बसर के लिये आज ग़ैरों के सामने हाथ नही फैलाना पड़ रहा, चौराहे पर खड़े होकर भीख नही मांगनी पड़ रही.
    तस्वीर का दूसरा हिस्सा देखिये जहां बूढ़े मां बाप के पास न पैसा है न सर छुपाने को ढंग का घर, अपनी जवानी कि गाढी कमाई इन बेचारों ने औलाद नाम की जिस कंपनी मे इनवेस्ट की थी वो कंपनी जवान होते ही करप्ट हो गई दीवालिया हो गई. बहू को प्राइवेसी चाहिये इसलिये बेटे का घर उसके दिल की तरह इतना छोटा हो जाता है कि उसमे दो बूढ़े मां बाप नही समा पाते. इसलिये बूढ़ा बूढ़ी को पुराने घर मे ही छोड़ दिया जाता है, बेसहारा, और नया घर भी इतनी दूर लिया जाता है कि पेहचान वाले शर्मिंदा न कर सकें कि मियां शर्म करो मां बाप भूखे मर रहे हैं और आप लोग यहां ऐश कर रहे हो.
    इस जगह मेहसूस होता है कितना अच्छा होता अगर हमने पश्चिम से सिर्फ़ उनका वेज्ञानिक ज्ञान लिया होता, संस्कृति और मोराल वेल्यूज़ हम हमारे वाले ही रेहने देते जहां कोई बेटा सिर्फ़ अपने बाप की बात रखने के लिये बिना सवाल किये 14 साल के लिये जंगल जाने को तैयार हो जाता है, कोई धर्म केहता है कि अगर जायज़ कारणों से नाराज़ हुई मां औलाद को दूध न बक्शे तो उस औलाद ने कितनी ही इबादत की हो कितने ही नेक काम किये हों उसे खुदा कि आदालत मे सीधे जहन्नम का रास्ता दिखाया जाएगा. पर आज की तेज़ रफ़तार ज़िन्दगी मे मां के क़दमों के नीचे जन्नत वाली बातें ज़्यादातर लोगों को बोरिंग ही लगती हैं.
    मुझे लगता है कि ऐसे नाशुक्रे बच्चों से निपटने के लिये कोई ऐसी स्वयंसेवी संस्था होनी चाहिये जो बच्चों द्वारा दुत्कारे गए मां बाप का पता लगा कर उनकी मदद करे और साथ मे ही इनके बेटे या बेटों का फ़ोटो किसी अच्छे अख़बार मे उनके नाम और पते के साथ छपवाएं और साथ मे ये भी लिखा जाए कि उनके मां बाप कैसी ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं. इससे वो बच्चे भले ही अपने मां बाप से और भी ज़्यादा नाराज़ होंगे पर दूसरों को सबक़ मिलेगा. मैने बेटी को इसलिये शामिल नही किया क्यूंकि वो तो पेहले ही किसी दूसरे पर निर्भर होती है, और क्या पता वो भी वहां अपने सास ससुर के साथ वो ही कर रही हो जो इधर उसकी भाभी उसके मां बाप के साथ कर रही है.
    जहां तक अकेले रहने वाले संपन्न वृद्धों की सुरक्षा का सवाल है उनके घरों में कुछ हाई टेक सुरक्षा इंतेज़ाम किये जा सकते हैं उदाहरण के तौर अलार्म सिस्टम इंस्टाल कर दिया जाए ताकि मुसीबत के वक़्त पड़ोसी उनकी मदद करने आ सकें. रिहाइशी इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था को चाक चौबंद किया जाए. घर पर काम करने वालों और उनसे मिलने आने वालों का पुलिस रिकार्ड चेक करवाया जाए, अगर वो अपराधी न हों तो भी उनको ये एहसास करवा दिया जाए कि उनकी सारी जानकारी यहां मौजूद है ताकि कोई अपराध करने से पहले वो 10 बार सोचें.

  • 23. 10:17 IST, 03 सितम्बर 2009 Rachana Srivastava:

    सलमा जी
    इतने संजीदा विषय के लिए शुक्रिया. आपका मत बिलकुल ठीक है और अच्छा होता अगर हम सब अपने माँ बाप के साथ रह सकते पर कई कारणों से हमेशा ये नहीं हो पाता. कई बार कारण आवश्यक होते हैं और कई बार बेहद स्वार्थी और निजी. इस सन्दर्भ में अक्सर मैं सोचती हूँ कि भारत में हमारे बुजुर्ग शायद बेहतर और सुरक्षित होते अगर हमारा पुलिस तंत्र सक्षम होता. यहाँ अमेरिका में ९० वर्ष के व्यक्ति भी अकेले रहेते हैं और ऐसा जीवन वे स्वेच्छा से जीते हैं क्योंकि यहाँ का पुलिस तंत्र इनकी न सिर्फ सुरक्षा करता है बल्कि इनकी हर जरूरत को पूरी करने कि कोशिश करता है. ९११, ये नंबर यहाँ कि जीवन रेखा है. आप अचानक बीमार हुए और किसी को दिल का दौरा पड़ा, ९११ डायल करते ही सिर्फ २-३ मिनट में पुलिस आपको अस्पताल ले जाने में सक्षम है. अपनी हर छोटी और बड़ी परेशानियों का हल ९११ के पास है, पर अफ़सोस कि भारत मे ऐसा कुछ होने की तो कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकी मैंने सब कुछ बदलते देखा है अपने देश में बस नहीं देखा तो बदलता हुआ पुलिस तंत्र. जिस दिन ये बदलेगा, समाज अपने आप बदल जायेगा.

  • 24. 12:50 IST, 03 सितम्बर 2009 YOGESH KUMAR SHEETAL:

    यह एक ज्वलंत मुद्दा है इसमें संदेह नहीं है. मैं आपसे सहमत हूँ लेकिन साथ ही इस ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि हमारा संविधान इस बारे में बहुत सतर्क है और कई जागरूक सामाजिक कार्यकर्ता भी इस बारे में काम कर रहे हैं.

  • 25. 00:43 IST, 04 सितम्बर 2009 sanjay kumar:

    बुज़ुर्गों की स्थिति देश में कैसी है इसके बारे में कहने की ज़रूरत नहीं है. देश के अधिकांश हिस्सों में बूढ़े माता पिता अपने बच्चों के साथ रहते हैं और कुछ हदतक ख़ुश रहते हैं जबकि शहरों में बुज़ुर्गों को बहुत ही तकलीफ़ का जीवन गुज़ारने पड़ते हैं.

  • 26. 16:00 IST, 04 सितम्बर 2009 balwant:

    ये भारत के लिए बहुत ही गंभीर विषय हैं लेकिन अमीर लोगों के मुक़ाबले कम अमीर लोगों के यहाँ बूढ़े लोग अधिक ख़ुश हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है कि क्योंकि अमीर लोगों के लिए पैसा ही सब कुछ है.

  • 27. 07:06 IST, 06 सितम्बर 2009 dr parveen chopra:

    आपने एक बिल्कुल गंभीर मुद्दे को छुआ है। बिल्कुल सही है कि बच्चों को अपने वृद्ध मां-बाप की देखभाल करनी चाहिये। लेकिन पता नहीं जैसे संसार में बहुत कुछ बदल सा गया है ---भारत जैसे देश में भी यह सब कुछ देखने को मिल रहा है। और यह जो आपने मकान से निकलने वाली बदबू से बुज़ुर्गों की हत्या आदि के पता चलने की बात कही है, यह अब भारत में भी आम सी बात हो गई है।
    कईं कईं बार तो जिन बुजुर्गों की हत्या की जाती है वे इतने वृद्ध होते हैं कि विश्वास ही नहीं होता कि कैसे कोई इतने कमज़ोर शरीर को खत्म कर सकता है। मैं न्याय-प्रणाली पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूं ---लेकिन जो मैंने एक राय कायम की है वह यह है कि इन सिरफिरे कातिलों को समाज का डर तो होता ही नहीं है, अब इन्हें कानून भी शायद डरा नहीं पाता है। केस इतने इतने लंबे चलते हैं कि ये पागल वहशी कातिल दरिंदे पहले तो पकड़े ही नहीं जाते लेकिन अगर पकड़ में आ भी जाते हैं तो कोर्ट-कचहरी की प्रक्रिया इतनीं लंबी होती है कि क्या कहें।
    बस बुज़ुर्गों की सुरक्षा की कामना के साथ ही विराम लेना चाह रहा हूँ.

  • 28. 20:22 IST, 13 सितम्बर 2009 Chandra Mohan:

    बूढ़े माँ बाप की सेवा के लिए माँ बाप ही जिम्मेदार होते है. क्यों कि हर माँ बाप चाहता है कि उनका लाडला भी एक दिन उन ऊँचाइयों को छुए जिनकी वो तमन्ना रखते है. और इस कारण से बच्चे को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाते हैं. लेकिन वो बच्चे में शिक्षा के साथ संस्कार देना भूल जाते है या फिर रिश्तो नातो से बच्चो की पहुँच दूर रखते है. ताकि वो अपनी शिक्षा पर अच्छे से मन लगा सके. और अंत में परिणाम ये होता है कि बच्चा अच्छी शिक्षा तो ले लेता है और जनता की सेवा भी करता है लेकिन उन माँ बाप को ये पता नहीं रहता है कि वो उस सेवा के हक़दार नहीं है. तब पता लगता है कि बच्चे को शिक्षा तो अच्छी दिला दी लेकिन अच्छे संस्कार नहीं दिए.

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