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वर्चुअल दुनिया में रियली अकेला

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|शनिवार, 05 सितम्बर 2009, 02:59 IST

लंदन के अख़बारों में ख़बर छपी है कि पति ने पत्नी को मार डाला क्योंकि वह फेसबुक जैसी वेबसाइटों पर बहुत ज्यादा समय बिताती थी.

शायद असली वजह कुछ और रही होगी. अगर कंप्यूटर पर अधिक समय बिताना क़त्ल किए जाने की असली वजह होता तो मेरे जैसे कितने ही लोग अपनी जान गँवा चुके होते.

मेरे घर में एक लैपटॉप और एक ही टॉयलेट है, अक्सर दूसरे लैपटॉप और दूसरे टॉयलेट की ज़रूरत महसूस होती रहती है, पत्नी से झगड़े भी हो जाते हैं, शुक्र है कि बात क़त्ल तक नहीं पहुँचती.

ज़रूरत के वक़्त टॉयलेट का दरवाज़ा बंद पाकर या लैपटॉप पर पत्नी को चैट करते देखकर एक ख़ास तरह की बेचैनी होती है. लगता है, कब फ्लश की आवाज़ आए या कब वो लॉग आउट करे.

सिर्फ़ रात को सोने के बाद और सुबह उठने से पहले इंटरनेट की ज़रूरत नहीं रहती. दिन भर दफ़्तर में, सुबह-शाम घर में, और रास्ते में मोबाइल फ़ोन पर...

इंटरनेट जब से ख़ुद तारों के बंधन से मुक्त हुआ है तबसे उसने हमें और कसकर जकड़ लिया है. वाईफ़ाई यानी वायरलेस इंटरनेट और मोबाइल इंटरनेट के आने के बाद तो ब्लैकबेरी और आईफ़ोन ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है.

मेरे फ़ेसबुक वाले दोस्तों की संख्या 146 है, असली वालों का पता नहीं.

फ़ेसबुक वाले दोस्तों का हाल जानने के बाद ख़्याल आता है कि पत्नी का हाल तो पूछा ही नहीं, बच्चा स्कूल की किसी कारस्तानी के बारे में बताना चाहता था उसकी बात सुन ही नहीं पाया, अब तो वह सो गया.

आपमें से बहुत लोग बिछड़े दोस्तों को मिलने की बात कहेंगे, इंटरनेट को वरदान बताएँगे, मैं कब इनकार कर रहा हूँ. आप कहेंगे कि हर चीज़ की अति बुरी होती है, मुझे रियल वर्ल्ड और वर्चुअल वर्ल्ड में संतुलन बनाने की ज़रूरत है.

मैंने संतुलन बनाने की कोशिश की लेकिन अभी यही तय नहीं हो पा रहा है रियल वर्ल्ड कहाँ ख़त्म होता है और वर्चुअल वर्ल्ड कहाँ से शुरू होता है, संतुलन कैसे बनाऊँ, आप कैसे बनाते हैं? कई बार तो लगता है कि इंटरनेट कनेक्शन ड्रॉप होना और बिजली का जाना उतनी बुरी चीज़ नहीं है जितनी लगती है.

हम अकेले पड़ते जा रहे हैं इसलिए हमें सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ज़रूरत है या सोशल नेटवर्किंग साइट्स ही हमें अकेला बना रही हैं? अकेलेपन के मर्ज़ की दवा हम इंटरनेट से माँग रहे हैं, यह अपनी ही परछाईं को पकड़ने की नाकाम सी कोशिश नहीं लगती?

असली रोग, बाहरी लक्षण और इलाज सब इस जाल के एक सिरे से शुरु होते हैं थोड़ी दूर जाकर उलझ जाते हैं, दुसरा सिरा कभी नहीं मिलता.

अपने कमरे में बैठकर आप पूरी दुनिया से जुड़ जाते हैं और अपने ही घर से कट जाते हैं.

वर्चुअल दोस्त, वर्चुअल खेल, वर्चुअल बर्थडे केक, वर्चुअल गिफ्ट्स, रियल अकेलापन, रियल बेचैनी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 08:37 IST, 05 सितम्बर 2009 JG:

    राजेश, आपने जो कहा वह ठीक है, लेकिन मैं इससे भी अधिक एक त्रासद दृश्य को आपसे शेयर करना चाहता हूँ. दिल्ली में (या किसी भी महानगर में) सुबह-सुबह घरों में काम करने के लिए जाने वाली लडकियाँ अपने कान में छोटे से स्पीकर फोन लगाए सेलफोन से एफ़एम रेडियों सुनती रहती है. यही स्थिति बहुत सारे निम्न मध्यम वर्ग के लोगों की भी है. सच बात है कि पड़ोस की ख़बर नहीं, जार्ज बुश की परवाह. यहाँ प्रश्न केवल तकनीक की सामाजिकता का है और कम से कम मेरे हिसाब से कोई भी तकनीक अपने चरित्र में सामाजिक नहीं होती है.

  • 2. 09:39 IST, 05 सितम्बर 2009 BALWANT SINGH HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    राजेश जी इस बार आपने बिल्कुल सही विषय चुना है. इसके सताए हुए लोगों की गिनती में पहले तो बेचारे कामकाजी पुरुषों-महिलाओं की गिनती हुआ करती थी. वो कहते हैं न कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है. फिर धीरे-धीरे यह संक्रमण घरों की चारदीवारी के भीतर सेंध लगाने में सफल हो गया. यह कहना ग़लत न होगा कि इस नशे के आगे सोमरस का नशा भी फींका सा लगता है. कई अच्छे-ख़ासे घर इसके चलते बर्बाद हो चुके हैं. यह एक मृगतृष्णा ही है. अपनों को छोड़ कर ग़ैरों में अपनापन खोजने के चक्र में घर-परिवार, रिश्ते-नाते शक और संशय पर टिके हैं. कहा गया है कि यह संसार भोगने योग्य है. ज़िंदगी के हर रंग का अहसास और आनंद लेना चाहिए, लेकिन इतना भी किसी रंग में डूबने का क्या फ़ायदा कि ख़ुद की पहचान ही ख़त्म हो जाए. आज विज्ञान, तकनीक की हर जगह ज़रूरत है. सोशल नेटवर्किंग, फ़ेसबुक, इंटरनेट चैटिंग में कोई बुराई नहीं बशर्ते ये हमारे कंधों पर सवार न हो जाए ताकि सीधे खड़े ही न हो पाएँ. दीन-दुनिया से कटे सो अलग. अति तो फिर अति ही होती है. यह सब जानते हैं कि इसके जनक देश अपने नागरिकों को इस रोग से छुटकारा पाने के हेतु मनोरोग विशेषज्ञों का सहारा लेने की सलाह दे रहे हैं. इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता स्वयं ही खोजना होगा. आत्मसंयम की बहुत आवश्कयता होगी. पत्राचार, बधाई पत्र तो अब गुज़रे ज़माने की बात हो गए हैं. शायद आज फिर ज़रूरत है कि लेखनी कंप्यूटर के माउस पर हावी हो.

  • 3. 10:48 IST, 05 सितम्बर 2009 Khushdeep Sehgal, Noida:

    राजेशजी, ये वर्चुअल वर्ल्ड इंसान का ही बनाया हुआ है. वर्चुअल वर्ल्ड ने इंसान को नहीं बनाया है. ये ठीक है कि इंटरनेट ने आज दुनिया को एक गांव बना दिया है. पलक झपकते ही दुनिया के किसी कोने में भी आप संपर्क कर सकते हैं. ब्लॉगर और न्यूज़ चैनल प्रोड्यूसर होने के नाते मेरे लिए बिना इंटरनेट सब सून वाली स्थिति है. लेकिन कभी-कभी लगता है कि इंटरनेट के अत्यधिक प्रयोग की वजह से मैं सोशल सर्किल से कटता जा रहा हूँ. इसके लिए मुझे लताजी का एक पुराना गीत भी याद आ रहा है- किसी के तुम इतने क़रीब हो कि सबसे दूर हो गए..वैसे कभी-कभी मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, इन सब की क़ैद से दूर ऋषिकेश में गंगा किनारे पानी में पांव डालकर बैठना देवलोक जैसा आनंद देता है...राजेश जी कभी ट्राई करके देखिए.

  • 4. 10:52 IST, 05 सितम्बर 2009 Deepak Tiwari:

    राजेश जी, ये सच है कि इंटरनेट के बिना सब अधूरा सा लगता है. लेकिन वेब और रियल वर्ल्ड में सामंजस्य बनाना ज़रूरी है क्योंकि रियल वर्ल्ड में बैक का ऑप्शन नहीं होता.

  • 5. 11:12 IST, 05 सितम्बर 2009 Ashok Bhargava:

    सिर्फ़ इंटरनेट ही नहीं टीवी और अख़बार भी आपको वास्तविक दुनिया की जानकारी और अपने आप से दूर करते हैं.

  • 6. 12:54 IST, 05 सितम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी बहुत लंबे समय के बाद आपका लेख बीबीसी पर आया, बुहत ही अच्छा विषय आपने चुना है. आपने काफ़ी अच्छा लिखा है. ये विषय काफ़ी गंभीर है.

  • 7. 14:36 IST, 05 सितम्बर 2009 Pankaj Parashar :

    बहुत सामयिक और ज़रूरी मुद्दे पर आपने बहस छेड़ी है. अगर मैं भूल नहीं रहा हूं तो इस मुद्दे पर एक बार और आपको बीबीसी पर ही पढ़ चुका हूं. आज आलम ये है कि कुछ दोस्त ऐसे हैं जो आसपास होते हुए भी वर्चुअल दुनिया में ही मिलना पसंद करते हैं. अब ये ख़ुदा जाने कि रियल दुनिया में वाक़ई उनके पास वक़्त नहीं है या फिर कुछ और. टीवी पर टपकती हुई मानवता और भावुकता स्टूडियो को सराबोर करती रहती हैं, पर शायद उनकी ज़िंदगी को ज़रा भी नहीं भिगोती.

  • 8. 18:06 IST, 05 सितम्बर 2009 sushil:

    हाँ मेरा भी एक दोस्त है जिससे मुझे इतनी दिक़्क़त है. हर समय मेरा लैपटॉप इस्तेमाल करता है. जबकि मैं चाहता हूँ कुछ समय तो मेर लैपटॉप फ़्री हो. कभी-कभी तो जब मुझे दफ़्तर का काम करना होता है तो वह याहू पर चैटिंग कर रहा होता है. उस समय ख़ून खौल कर रह जाता है.

  • 9. 18:11 IST, 05 सितम्बर 2009 naveen sinha:

    राजेश, आपकी गंभीर सोच को पढ़ने के बाद एहसास हुआ कि क्या सचमुच हम वर्चुअल दुनिया में तो नहीं जीने लगे हैं. मैं एक काफी प्रतिष्ठित डॉट कॉम कंपनी के लिए काम करता हूँ. आपके इस लेख को पढ़ने के बाद मैं सोचने लगा कि मैं अपने दफ्तर में शायद ही कभी अपने सीनियरों और सहकर्मियों से आमने सामने बात करता हूँ, हमारी सारी बातें मेल के ज़रिए होती हैं. चाहे वह छोटी बात हो या बड़ी. आज मैं वास्तविक दुनिया से ज्यादा अच्छी तरह से इंटरनेट की दुनिया को जानता हूँ. यह एक बिल्कुल समानांतर दुनिया है, यहाँ ऐसे अनेक लोग हैं जिनसे हम कभी मिले भी नहीं हैं लेकिन वे हमारे अच्छे दोस्त हैं. इस दुनिया की अच्छी बात ये है कि ये कोई टेंशन नहीं देता, मेरे आपके जैसे बहुत सारे लोग हैं जो सिर्फ़ रात का खाना खाने और सोने के लिए घर जाते हैं और मुश्किल एक दो घंटे घर में बिता पाते हैं. काम के बोझ से ये वर्चुअल दुनिया ही राहत देती है, मेरे परिवार के सारे लोग और दोस्त ऑनलाइन चैट ही करते हैं, और डिस्कस करते हैं कि आज रात में क्या खाना है.

  • 10. 18:22 IST, 05 सितम्बर 2009 शशिभूषण:

    राजेश जी,
    आज ऑफ़िस में कम्प्यूटर लाग ऑफ़ करते हुए
    एक बात ज़ेहन में आई
    मेरे घर का कम्प्यूटर मुझसे दुखी रहता होगा
    किसी कम्प्यूटर का भीतर इतना विशाल होता है कि
    कि आप दावे के साथ यह नहीं कह सकते
    कम्प्यूटर आपके बारे में सोचता नहीं होगा
    मैं ऑफ़िस में पूरे वक़्त कम्प्यूटर के सामने ही बैठा हुआ
    सारे प्रोग्राम,सारी फ़ाइलों तक पहुँच नही पाता
    पहुँचना संभव नहीं
    किसी एक हिस्से में ही अपना सारा काम निपटाकर
    मैं इसे बंद कर देता हूँ
    इस सबमें घर के कम्प्यूटर के लिए समय नहीं बचता
    हालांकि इसे ख़रीदने के लिए मैंने सालों इंतज़ार किया
    एक दिन आएगा जब मेंरे घर कम्प्यूटर होगा ऐसे सपने देखे
    अब मेरा ख़याल नहीं रख पाना
    ज़रूर उसे तक़लीफ़ देता होगा
    कितनी बुरी बात है
    मैं उसके दिल के सारे कोने छूना तो दूर
    कभी कभी उसके बारे में सोचता तक नहीं
    अपने अकेलेपन में मुझे स्वार्थी समझता होगा
    घर का कम्प्यूटर.

  • 11. 21:29 IST, 05 सितम्बर 2009 जगदीश भाटिया:

    आभासी दुनिया का यही सच है।

  • 12. 21:48 IST, 05 सितम्बर 2009 Shafiq Khan:

    यह दौरे-शर (कलियुग) है जनाब और सब चीज़ें शैतानों का औज़ार हैं. ग़ौर से सोचिए कि आज शर को घर देना कितना आसान है हम सब की ज़िंदगियों में. अब बहुत देर हो चुकी है. क़यामत (प्रलय) साफ़ नज़र आती है बस ज़रा इल्म की आँखें चाहिएं.

  • 13. 00:59 IST, 06 सितम्बर 2009 Prem Verma:

    राजेश जी, अब तो हमको इसकी लत हो चुकी है. नेट एक नशा है और हम सब घोर नशेड़ी. दुनिया के अन्य नशों का इलाज है पर वर्चुअल दुनिया में जीने का इलाज नहीं. कहीं कोई इलाज मिले तो ज़रूर बताइएगा. चुने गए सामयिक और गंभीर विषय के लिए साधुवाद.

  • 14. 06:00 IST, 06 सितम्बर 2009 Pankaj:

    मुझे लगता है कि आपकी बात पर एक बार ग़ौर करने की ज़रूरत है, लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं. मैं बिना कंप्यूटर के पला बढ़ा हूँ, मैं पहली बार तीसेक साल की उम्र में कंप्यूटर का इस्तेमाल किया और अब मुझे लगता है कि इंटरनेट मेरी ज़रूरत है. लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि कंप्यूटर हमें अपनों से दूर ले जा रहा है, मेरी पत्नी मुझसे चार हज़ार किलोमीटर दूर है लेकिन मैं उसे देख सकता हूँ, उससे बात कर सकता हूँ, अपनी भावनाएँ उस तक पहुँचा सकता हूँ, यह कैसे हो रहा है, इंटरनेट के ही ज़रिए न. अगर इंटरनेट न हो तो आप ज़रा सोचिए कि रोज़ कैसे चिट्ठियाँ लिख रहे होते. मुझे लगता है कि हमारी मानव जाति की बीमारी है कि अतीत को याद करने की और उसे अच्छा समझने की और वर्तमान को कोसने की. जब इंटरनेट नहीं था तब भी मैं ख़ुश था और मेरे ढेर सारे दोस्त थे, अब मैं और ज्यादा खुश हूँ और मेरे बहुत सारे दोस्त हैं जिनसे मैं इंटरनेट के ज़रिए संपर्क रखता हूँ. इंटरनेट हमारे जीवन का हिस्सा है और यह हमारे जीवन को बेहतर बनाता है.

  • 15. 07:26 IST, 06 सितम्बर 2009 dr parveen chopra:

    आपने तो चंद शब्दों में पूरी तस्वीर ही खींच दी है।
    फ़ेसबुक वाले दोस्तों का हाल जानने के बाद ख़्याल आता है कि पत्नी का हाल तो पूछा ही नहीं, बच्चा स्कूल की किसी कारस्तानी के बारे में बताना चाहता था उसकी बात सुन ही नहीं पाया, अब तो वह सो गया। आपने यह भी सही कहा कि अपने कमरे में बैठ कर सारी दुनिया से तो जुड़ गये लेकिन अपने ही घर से कट कर रह गये।

    आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है----हम सब को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया है।

  • 16. 19:35 IST, 06 सितम्बर 2009 शशि सिंह :

    अपनी जमीन से उखड़े हुये लोग हैं हम, जो इस माध्यम से उसे तलाश रहे हैं। सच यही है कि न तो हम हक़ीकत का सामना कर पा रहे हैं और न विज्ञान की कल्पना की इस उड़ान में खुद को खुला छोड़ रहे हैं। अंतर्मन में कहीं गहरे एक डर भी है अपनी ही बनाई इस दुनिया से... कहीं ये हमसे बड़ा न हो जाय। जाहिर सी बात है दोनों ही ओर हम आधे-अधुरे मन से हैं... साध तो किसी को भी नहीं पायेंगे। कभी-कभी खुद से बातें करता हूं तो ये सच सामने आता है। दुनिया तो ग्लोबल विलेज बन गया, मगर मेरा गांव कहां गया? दोस्त तो मिल गये, मगर मैं कहां गुम हूं? इंटरनेट के तार (अब बेतार भी) दुनिया को जोड़ सकते हैं तो हम अपनी जमीन क्यों छोड़ आये हैं? विज्ञान ने अपने अविष्कारों के रूप में हमें सहूलियतें दीं... हमें सहयोग दिया कि हम अपने भीतर और बाहर की दुनिया को और खूबसूरत बनायें... अपना आध्यात्मिक उन्नयन करें। मगर अफसोस ऐसा नहीं हो पा रहा है। लिहाजा इंटरनेट या किसी भी अविष्कार पर दोष न लगाया जाय... दोष हमारे भीतर है।

  • 17. 21:01 IST, 06 सितम्बर 2009 sunil gogia:

    राजेश जी, नमस्कार. आने वाले समय में आप देखेंगे कि लोगों की भावनाएँ ख़त्म हो जाएँगी और लोगों को रियैलिटी जैसे शब्दों को डिक्शनरी में ढूँढना पड़ेगा.

  • 18. 10:26 IST, 07 सितम्बर 2009 भावेश:

    ये आज की हकीकत की दुनिया का भयावह खौफ है कि आज इंसान को अपने पड़ोसी के हाल चाल पूछने का समय नहीं मिलता लेकिन अनजान चेहरों या दोस्तों के खैर खबर की चिंता ज्यादा रहती है. अधिकतर मामलो में ये नकली दुनिया की दोस्ती और ये नकाब लगाकर नकली दुनिया में असली ख़ुशी को ढूँढना हाथ में पानी को रोक कर रखने के सामान ही होता है

  • 19. 21:16 IST, 07 सितम्बर 2009 mahendra:

    ख़ुद की वास्तविकता को बताने के लिए ये काफ़ी अच्छा विश्लेषण है.

  • 20. 18:51 IST, 08 सितम्बर 2009 Garish Kalia:

    राजेश जी, मैं होशियारपुर,पंजाब का रहनेवाला हूं. आजकल टोरंटो में रह रहा हूं. आपने एक बहुत ही अच्छा विषय उठाया है. यहां कनाडा का हाल भी ऐसा ही है. बच्चों के लिए खेल तक वाई-फ़ाई वाले हैं. मैं तो सोचता हूं कि अब से पांच साल बाद की स्थिति क्या होगी. हो सकता है कि हमारे शौंचालयों मे भी एक कंप्यूटर लग जाए.

  • 21. 12:18 IST, 10 सितम्बर 2009 Chandra Mohan:

    राजेश जी आपने बिलकुल सही लिखा है. मै बीबीसी पर वैसे तो बहुत कम ही आता हूँ. आज सुबह सुबह कुछ ख़बर पढ़ रहा था अचानक मेरी नजर आपके ब्लॉग पर पड़ी और मैं उसे पढने लगा. पढ़ते पढ़ते ऐसा लगा कि मैं पढता ही जाऊँ. और ऐसे करके मैंने आपका पूरा ब्लॉग पढ़ लिया. आपका ब्लॉग पढ़ कर ऐसा महसूस होता है कि कहीं भारतीय भी इस बीमारी का शिकार ना हो जाए . और वास्तव में धीरे धीरे ऐसा हो रहा है. और ऐसा नहीं है कि मैं इससे अछूता हूँ कहीं ना कहीं ये बीमारी मुझे भी है. और आपका ब्लॉग पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि मुझे भी अब संभालना होगा. धन्यवाद. मै दिल से आपका स्वागत करता हूँ. आपके ब्लॉग ने मुझे झकझोर दिया है. मैंने इन्टरनेट कनेक्शन मेरे मोबाइल के ज़रिए ले रखा है. अछी स्पीड नहीं होने के बाद भी मै ज्यादातर टाइम नेट पर ही बिताता हूँ. यहाँ तक की अपना सुबह की चाय भी भूल जाता हूँ.

  • 22. 00:14 IST, 20 सितम्बर 2009 Tej Bahadur Yadav, Village Fattu Pur Nisfi Sidhdhi ka Tara. Po Kilhapur, DISS& Jaunpur UP:

    प्रियदर्शी जी, कितने वर्षों से मन में एक सपना पले हुए हूं कि अपना एक कंप्यूटर हो, इंटरनेट कनेक्शन हो और फिर लोगों से जुड़ जाऊं, बहरहाल अपना कंप्यूटर या लैपटॉप फिरइंटर नेट कनेक्शन लेने में समय लगेगा. इस बीच कल्पनाओं में यह है कि अपने गांव में एक कंप्यूटर रखकर नेट से जोड़ सकूं और फिर गांव के लोगों को सुबह शाम एक घंटे के लिए नेट के जरिए उनके अपनों से मिला सकूं, जों मुंबई या सूरत में रोजगार के लिए गए हुए हैं. इसके लिए मुंबई या सूरत में उन परदेशी बने अपने लोगों को भी कंप्यूटर नेट का प्रयोग करने का व्यावहारिक ज्ञान दे सकूं. ये सपने जिसके मन में पल रहे हैं, वह आफिस के नेट व कंप्यूटर मशीन पर सिर्फ़ आप लोगों से मिल-और पढ़ पाता है. यहीं से हमारा रियल संसार वर्चुअल में बदल जाता है. आपसे मेरा व्यावसायिक रिश्ता हो सकता है, निजता और भावना से जुड़ा या खूनी रिश्ता भला कैसे होगा? बस यही आभासी दुनिया की कमजोरी है, जिसके कारण तकनीक लोगों के अकेलेपन एवं भीड़ में भी तनहा का भाव पैदा कर देता है. विषय प्रासंगिक है, लेकिन इसके दोष इसलिए हैं कि यह अपनों से मिलाने की बजाय ग़ैरों से मिलाने की मृगमरीचिका बना रहा है. तकनीक के उचित उपयोग और उचित लोगों यानी ज़रूरतमंदों तक पहुँचाने की ज़रूरत है, जो नहीं हो रहा है. इसीलिए तकनीक में यह खामी नज़र आती है. तकनीक समाज के लिए होने की जगह व्यक्ति की हो गई है. इसे समष्टि का वस्तु होना चाहिए, पर यह व्यष्टि के कब्ज़े में है. अगर मेरे पास कुछ पैसे अतिरिक्त होते तो अपनी कल्पना को साकार कर इसके असर को देख पाता. देखता हूं कब मेरे में गांव में इंटरनेट और कंप्यूटर पहुँचता है.

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