« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

प्याले में तूफ़ान या...

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|बुधवार, 09 सितम्बर 2009, 14:46 IST

दो केंद्रीय मंत्रियों के पांच सितारा होटल मे रहने और फिर बेदख़ल होने के मामले ने जिस तरह से सुर्खियों, मध्यमवर्गीय और इंटलेक्चुअल चर्चाओं मे अपनी जगह बनाई है, वो अपने आप मे एक दिलचस्प वाकया है.

न सिर्फ़ किस्सा मज़ेदार है बल्कि यह हमारे लिए, हमारी स्वंय की मानसिकता के लिए कुछ चिंतन और मंथन का विषय भी हो सकता है.

पहले कहानी के दोनों पक्ष जान लेते हैं.

सरलता, सादगी और कमख़र्च का दंभ भरनेवाली सरकार के दो मंत्रियों के क़रीब तीन माह तक दिल्ली के सबसे महंगे पांच सितारा होटल में रहने की कहानी जब एक अख़बार ने छापी तो सरकार ने आनन-फ़ानन में डैमेज कंट्रोल की कार्रवाई की और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने दोनों मंत्रियों को होटल खाली करने के आदेश दे दिए.

मंत्रियों का रुख, आहत और नाराज़गी (कि हम अपनी जेब से पैसा दे रहे हैं, किसी को क्या मतलब) से पूरा मामला चाय के प्याले में तूफ़ान से अधिक कुछ नहीं... कहकर डिसमिस करने का था.

कुछ इस हद तक मैं मंत्रियों कि बात से सहमत भी हूं. आख़िर दोनों मंत्रियों की घोषित आय करोड़ों की है. कुछ लाख होटल बिल के भुगतान में लग भी गए तो क्या हुआ. जैसा मेरे एक साथी का कहना था कि ऐसा तो नहीं था कि अगर ये मंत्री होटल में नहीं रहते तो यह राशि वो दान कर देते.

मतलब यह कि हमें क्या ज़रुरत है आवश्यकता से अधिक तांक-झांक करने की. उनका पैसा, जैसे चाहें, ख़र्च करें.

लेकिन बात इतनी सरल और सीधी सादी नहीं है. दोनों मंत्री उस सरकार का हिस्सा हैं जो आम आदमी और ग़रीब के नाम की हर मौक़े और बे-मौक़े कसम खाने से नहीं हिचकती. तो कहीं न कहीं अपने भी पैसे खर्च करते वक़्त उन्हें ज़्यादा संवेदनशीलता, सादगी और सरलता बरतनी चाहिए.

मंत्रियों ने निजी अधिकारों और प्राइवेसी की भी दुहाई दी. वे भूल गए कि सार्वजनिक पद और उसके तमाम फ़ायदों के साथ यह प्राइवेसी वाला तर्क गले नहीं उतरता. जब तक वे मंत्री हैं, उनका हर कदम, फ़ैसला और आचरण सार्वजनिकता के कटघरे मे तौला, परखा और जांचा जाएगा.

एक बड़ा मुद्दा और भी है जिसपर अब तक किसी ने चुप्पी नहीं तोड़ी है. न मंत्रियों ने, न उन होटल के प्रबंधनों ने, जहां वे ठहरे थे. भई, कोई वो बिल और भुगतान की रसीद तो पेश करे जो इन मंत्रियों ने बड़ी खु़दगर्ज़ी से अपनी जेब से चुकाया है.

उसके बाद ही हमें इस बात की जानकारी मिलेगी कि जिन होटलों को विदेश मंत्रालय हर साल दसियों करोड़ का बिजनेस देता है, उन होटलों ने उनके कुबेर समान विभाग के मंत्रियों से बिल स्वरुप कितनी राशि वसूल की है.

क्या सोचते हैं आप? पूरा किस्सा चाय के प्याले में तूफ़ान है या फिर दाल में कुछ काले का एक और नमूना है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:30 IST, 09 सितम्बर 2009 Saagar:

    गोया पूरी दाल ही काली हैं संजीव जी, यह वही शशि थुरूर हैं, सादगी वाले, मेरा अपना पर्सनल अनुभव है जो भी यूएन में काम करता है या काम कर के लौटता है सब महंगी शौकों के ग़ुलाम होते हैं... यह सब गाँधी जी पर माला चढा कर एसी लगे भवनों में सादगी पर चर्चा करते हैं... फिर लाख रुपये के कमरे में सोने चले जाते हैं... इन मंत्रियों को लत लग जाती है दोतरफे व्यवहार की... यह क्या प्रदूषण कम करने पर बैठक करेंगे जो खुद ही प्रदुषण हों... कोई अमीर नहीं होता खासकर भारत में; सब मंत्री पद के दौरान अमीर बनते हैं... वो काले पैसे को उजले में बदलना सीख चुके होते है... इनकी साथ-गांठ तो देखिये... कभी अकेले नहीं होते... थाली में दो समोसे ही मिलेंगे आपको... इनको मंहगी कारें दीजिए, बंगले दीजिए, गिफ्ट दीजिये दो बोल बोलेंगे सहेब्जादे... देश सेवा कर रहे हैं, कुछ बुड्ढों को गोल्फ और बिलियेर्ड्स भी खेलना आता है...

  • 2. 17:11 IST, 09 सितम्बर 2009 Arvind yadav:

    संजीव जी सीधी बात है. मंत्रियों की गलती तो है. अगर आवास नहीं भी है तो भी ये लोग किसी सस्ते होटल में या अन्य कम ख़र्चीली जगह पर रहकर मिसाल पेश कर सकते थे.
    थरूर जैसे आदमी को शायद ये पता न हो कि सार्वजनिक पद पर रहकर निजी जीवन का तर्क देना केवल कुतर्क है. ग़लती हमारी भी है जो हम इन्हें भगवान मानने लगते हैं. अभी देखिए आँध्रप्रदेश में 122 लोग मर गए. जब हमारी ग़ुलामी जैसी सोच होगी तो ये लोग ऐसा ही करेंगे. भला हो मीडिया का कि कम से कम ख़बर बनाने के लिए ही सही वो ऐसी बातों पर रोशनी तो डालते हैं.

  • 3. 17:19 IST, 09 सितम्बर 2009 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    वाह संजीव जी. आपने पहली बार मौजूदा सरकार की सही हक़ीकत बयान की है. मैं बीबीसी के माध्यम से आपसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ. मैने आपको कांग्रेस पार्टी का पक्का समर्थन करने वाले व्यक्ति का इल्ज़ाम लगाया था. लेकिन आपके इस लेख ने मेरे इल्ज़ाम को ग़लत साबित कर दिया. मैं आपसे माफ़ी माँगना चाहता हूँ. अगर मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी में थोड़ी सी भी शर्म है तो इन दो मंत्रियों को लेकर कुछ नहीं कर सकते तो अपने आप को राजनीति से विदा कर लें. किस मुँह से ये सरकार कहती है कि ये गरीबों की सरकरा है. जो बेईमान नेता एक पैसा अपनी जेब से ख़र्च नहीं करते वो लाखों रुपए सरकारी ख़र्चे पर चला रहे हैं. लेकिन बदकिस्मती जनता की है कि जनता के पैसे को अपना बताकर पांच सितारा होटल में मंत्री मौज कर रहे हैं.
    .

  • 4. 18:05 IST, 09 सितम्बर 2009 shardul:

    थरूर या कृष्णा आम लोगों के सेवक नहीं है. ये उन्होंने साबित कर दिया. जब देश गरीबी या सूखे से जूझ रहा हो वहाँ ऐसा होना दुखद है.

  • 5. 19:49 IST, 09 सितम्बर 2009 shahzad:

    नेता, पुलिस और दलाल पर भरोसा कारना बेकार है.

  • 6. 20:43 IST, 09 सितम्बर 2009 नीरज दीवान :

    बड़े दिनों बाद लगा कि इंडियन एक्सप्रेस में सत्ताविरोधी तेवर भी शेष हैं. यूँ तो इन दिनों बीजेपी और यूपीए के कुछ सहयोगियों पर ही छींटा-कशी कर पत्रकारिता की ज़िम्मेदारियाँ निभाई जा रही हैं.

  • 7. 20:51 IST, 09 सितम्बर 2009 Dr. Harikrishan Takhar:

    हाँ, ये तो हो ही रहा है इस देश में. कोई संजीदा क़दम उठाता ही नहीं है. आम आदमी रोटी रोज़ी के जुगाड़ में लगा हुआ है. मीडिया देश में कुछ सुधार करे तो हो सकता है. लेकिन मीडिया भी इन लोगों के साथ कुछ ऐडजस्ट कर चुका है. इस देश का भगवान ही मालिक है.

  • 8. 21:35 IST, 09 सितम्बर 2009 AMIT KUMAR :

    इनको मिले पद ही ये दर्शाते है कि ये पाँच सितारा होटल के बिना रह ही नहीं सकते. विदेशी लबादे में लिपटी चमड़ी भारतीयता की गंध को समझ नहीं सकती. यही कारण था कि इन मंत्रियो ने अपने पैसे की ताक़त दिखाई.

  • 9. 22:18 IST, 09 सितम्बर 2009 himmat singh bhati:

    सही में मीडिया की गाड़ी सरकारी विज्ञापनों के रास्ते से होकर गुज़रती है, यही कारण है कि भारत का मीडिया सरकारी और नेताओं की कारगुज़ारियों को उजागर नहीं करता, यही कारण है कि सरकारी अधिकारी और नेतागण अपनी मन मर्ज़ी करने से नहीं चूकते. देखा यही जा सकता है कि भारत जैसे ग़रीब और कृषि प्रधान देश के लोगों के कल्याण की योजनाएं एसी कमरों में बैठकर बनाई जाती हैं. आम ग़रीब से टैक्स में लिए पैसे को अपनी सुविधा के लिए जितना ख़र्च करते हैं उतना तो जनता पर ख़र्च ही नहीं होता है. सही में यह मंत्री जिन होटलों में ठहरे हुए हैं वहीं पर विदेशों से आने वाले मेहमानों को भी ठहराया जाता है, जिसकी क़ीमत भारत सरकार को अदा करनी होती है. दाल ही काली है, दाल में काला इनका ही किया धरा है. जब ही दाल ग़रीबों से छीनी जा रही है.

  • 10. 00:11 IST, 10 सितम्बर 2009 Krishna Kanhaiya:

    आप बिल्कुल सही हैं सर, श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि विख्यात मनुष्य का हर क़दम दूसरों के लिए उदाहरण बन जाता है. इसलिए मैं सोचता हूँ कि जो जितने ऊँचे उहदे पर है उसकी ज़िम्मेदारियाँ भी उतनी ही ऊँची हैं.

  • 11. 01:19 IST, 10 सितम्बर 2009 vibhu:

    एक तो चोरी ऊपर से सीना ज़ोरी. ये लोग उस देश के मंत्री हैं जिसमें अभी भी बहुत सारे ग़रीब लोग हैं जिनको दो वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं होती, कितने ही सड़कों पर भीख मांगते फिरते हैं, हर साल कितने किसान आत्महत्या करते हैं. पर ये लोग सिर्फ़ इतना कह कर कि दोनों अपना पैसा ख़र्च करके पाँच सितारा होटलों में रह रहे हैं बड़ा ही फ़न्नी लगता है. शायद शशि थरूर को पता नहीं कि इस देश के लोग जानते हैं कि नेता लोगों के पास पैसे ज़्यादातर कहाँ से आते हैं. एसएम कृष्णा एक विदेश मंत्री के तौर पर काफ़ी अलोकप्रिय होते जा रहे हैं. उनकी विदेश नीति भी काफ़ी बेकार है. इस प्रकार के मंत्री इस देश का कभी भी विकास नहीं कर सकते, सिर्फ़ इस देश के लोगों में एक उदासी ला सकते हैं. वो उदासी जो ये समझती है की आगे आने वाले पाँच साल में इस देश का और कितना बेड़ा ग़र्क़ होने वाला है. यह घटना काफ़ी शर्मनाक है यूपीए सरकार के लिए और इस देश के लिए. ये घटना बताती है किस प्रकार देश के पैसे अपने ऐशो-आराम में ये मंत्री ख़र्च कर रहे हैं. क्या कभी किसी बिल को इन लोगों चुकाया भी है, कभी ऐसा सुनने में नहीं आया है.

  • 12. 01:35 IST, 10 सितम्बर 2009 BALWANT SINGH,HOSHIARPUR ,PUNJAB:

    संजीव जी, इस मुद्दे को चुनने के लिए आपको बधाई. यह बहुत ही अहम स्वाल है जिसका जवाब स्वयंम कांग्रेस पार्टी को ईमानदारी से देना होगा. पहली बात यह कि पैसा मंत्रियों ने अपना ख़र्च किया है. ठीक है. तो यह पैसा माननीय मंत्री जी किसी सरकारी पॉँच - सितारा होटल में रूककर भी तो ख़र्च कर सकते थे. सरकारी अतिथी गृह कब काम आयेंगे. पार्टी ने इतने संवेदनशील मुद्दे को तीन माह तक क्या समझ कर दबाये रखा? क्यों कोई कार्यवाही करने हेतु अखवारों की सुर्खीयाँ बनने का इंतज़ार किया? कांग्रेस पार्टी हमेशा से ही ग़रीबों, किसानो, मज़लूमों की हिमायती होने का दावा करती रही है. कांग्रेस पार्टी आज जिस मक़ाम पर है उस कांग्रेस के एक हाथ के पीछे इन्हीं गरीबों, किसानों के कई लाख हाथ हैं. अगर जनता जनार्दन द्वारा चुने गए प्रतिनिधी ही इस तरह से आचरण करेंगें तो बेचारे सूखे और बाढ़ से पीड़ित किसानों के दिलों पर क्या गुज़रेगी. एक तरफ़ कांग्रेस के युवराज व कांग्रेस की अध्यक्षा ग़रीबों की कुटिया में रातें गुज़ारते है ,उनके द्वारा बनाया गया रूखा सूखा भोजन ग्रहण करते हैं दूसरी ओर पार्टी के मंत्री पॉँच सितारा होटलों में विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं. यह तो ग़रीबों के साथ छलावा है. कथनी ओर करनी में फर्क क्यों? गांधी जी ने कहा है कि अगर आपके पास ज़्यादा धन है तो उसे अपने भोग- विलास पर ख़र्च न करके ग़रीबों ,ज़रूरतमंदों की सहायता में लगाया जाए. आज ज़माना बदल रहा है तो राजनीति भी बदल रही है. बदलाव समय के साथ ज़रूरी है. लेकिन राजनैतिक पार्टियों को महान विभूतियों की विचार धारा की दुहाई देने के साथ - साथ विचार धारा पर अमल करना चाहिए. ओर यह जाँच का विषय होना चाहिय कि वास्तव में पॉँच सितारा होटल का ख़र्चा माननीय मंत्रियों द्वारा वहन किया गया है कि नहीं. ताक - झांक का तो स्वाल ही नहीं उठता है. यह जनता जनार्दन द्वारा चुने गए प्रतिनिधी हैं ,आम जनता को इनके विभागीय कार्यकलापों, अचारों -विचारों, राजनैतिक गतिविधियों को जानने का पूरा- पूरा हक़ है. नेता जनता द्वारा होते हैं ,जनता नेताओं से नहीं होती है. ओर लोकतंत्र की भी तो यही कसौटी है. एक ग़रीब आदमी पचास- सौ रुपए की दिहाड़ी को तरसता है इधर जनप्रतिनिधी विलासिता से जीवन यापन कर रहे हों तो गरीबी कैसे ख़त्म होगी ,नरेगा जैसी योजनायें कैसे सफल होंगीं.

  • 13. 01:43 IST, 10 सितम्बर 2009 Rajat Abhinav:

    संजीव जी, मुझे पूरी दाल ही काली लगती है. जहाँ तक अख़बारों मे पढने और चैनलो में देखने को आया है उससे यही लगता है कि जब प्रेसेडेंशियल सुइट, जिसमें कृष्णा जी ठहरे हुए हैं उसका रोज. का किराया 175 रुपये है, वहीं ताज होटल जिसमें शशि थरूर रुकें है, उसका रोज़ाना का खर्च 75 हज़ार रुपये है. अब कोई हिसाब लगा ले की इन तीन महीनो का ख़र्च कितना आया होगा.
    साफ़ है, ये लोग विलासिता के आदि है. इनसे गाँधी जी या शास्त्री जी जैसे लोगो के वर्ग में रख कर नहीं तौल सकते है. हाँ, मगर जब ये बात मीडिया में आई है तो इसकी जाँच होनी चाहिए ताकि सच का पता चल सके, कहीं ये सिर्फ़ मीडिया के लिए ख़बर और दूसरो के लिए चर्चा का विषय मात्र बन कर न रह जाए.

  • 14. 03:17 IST, 10 सितम्बर 2009 Jaswinder Minhas:

    भारती हमेशा दोहरा मापदंड रखते हैं. हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और.

  • 15. 05:21 IST, 10 सितम्बर 2009 Pragati Singh, Kanpur:

    संजीव जी, चलिए इसी नज़रिये से देखें तो क्या सोनिया जी कम ऐशो-आराम में रहती है, या फिर बात करें प्रणब मुखर्जी जी की जिन्होंने थरूर और कृष्णा जी को होटल छोड़ने का आदेश दिया, क्या इनके ठाट-बाट कम होंगे. ख़ैर मैं किसी का पक्ष नहीं ले रही, मैं तो बस इतना कहना चाह रही हूँ की लगभग हम सभी जानते है कि कितनी दाल काली है और तूफ़ान कहाँ आया है. अब पाँच सितारा होटल में तो वही लोग जांएगे जो धन से सम्रद्ध होंगे, अब उनके पास पैसा है तो जा रहे है, आपके दोस्त ने भी सही ही कहा अगर वहाँ नहीं व्यय करेंगे धन तो दान कर दें इसकी भी क्या गारंटी है. बात तो बस अपने-अपने विचारों की होती है, जो जितना महान सोचता है, उतना ही ज़्यादा समाज के लिए करता है.

  • 16. 09:06 IST, 10 सितम्बर 2009 Iqbal Fazli, Asansol:

    इतने पैसे हैं मंत्रियों के पास कि एक लाख रोज़ का होटल बिल भर सकते हैं. कौन कहता है कि भारत ग़रीब है? जब एक जहाज़ भरके मंत्री लोग विदेश यात्रा पर जाते हैं तो करोड़ों ख़र्च करते हैं. यहां तक कि करोड़ो रूपए सुरक्षा के नाम पर ख़र्च किए जाते हैं? गांधी तो कब के मर गए (वह तो जीते जी कह गए थे कि “अब मेरी कौन सुनेगा. कोई काम करने से पहले सबसे ग़रीब आदमी के बारे में सोचो “समय आ गया है कि अब गांधी के चित्र को उठा कर डस्टबिन में फेंक दें और 2 अक्तूबर की छुट्टी भी ख़त्म करदें ताकि छुट्टी के कारण होने वाले नुक़सान बचा जा सके और उन पैसों को होटल बिल देने में इस्तेमाल किया जाए.

  • 17. 09:36 IST, 10 सितम्बर 2009 JG:

    संजीव जी, दो बातों के बहाने आगे की बात कहता हूँ. कृष्णा जब विदेश मंत्रालय में गद्दीनशीन हुए थे, तो कहा गया कि दलित वर्ग के व्यक्ति होने के नाते यह महान उपलब्धि है. शशि का तो साक्षात्कार आपने स्वयं लिया था, कितना किलक-किलक कर कह रहे थे कि मैं जनता की सेवा करने के लिए राजनीति में आना चाहता हूँ. इससे दो बातें साबित होती है. पहली यह कि दलित होना किसी बदलाव की प्रथम व विश्वास योग्य शर्त नहीं है (मायावती शामिल हैं इसमें). दूसरे, राजनीति में हमेशा वही व्यक्ति जाना चाहते हैं जो सब कुछ तो होना चाहते हैं लेकिन जनता के प्रतिनिधि नहीं होना चाहते हैं.
    कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में सूखा, अकाल, और नरभक्षी सरकारों का दौर है, और ये मंत्री अय्याशी में तल्लीन है. आपकों तो याद होगा कि लोकतंत्र तो यूनान में भी था, लेकिन अभिजात्यवर्गीय. यहाँ भी लोकतंत्र की यही परिभाषा है. चाहे दलित हो, या कोई महा बौद्धिक लेखक- अभिजात्य वर्ग में शामिल होकर उससे फ़ायदा ही उठाना चाहते हैं.
    आपने शशि की बात का जिक्र किया. क्या शशि यह कहना चाहते हैं कि मेरे पास मेरा व्यक्तिगत पैसा है, और मैं इससे जो चाहे सो करूँ? शाबास शशि! आप जैसे जनता के लेखक और अब मंत्री से यही तो उम्मीद है! मैं अपना माथा पीटकर रोऊँ या चिल्लाऊँ कि सूचना का अधिकार कहाँ है. सच्चाई यही देख लीजिए. मंत्रियों के बिलों तक का पता नहीं लग पा रहा है, तो जो मोटी फ़ाइलों में दफ़न है वह क्या बाहर आएगा---बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर.

  • 18. 10:05 IST, 10 सितम्बर 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    यह प्याले में तूफ़ान नहीं था, बल्कि एक तूफ़ान था जिसे हमारी पत्रकारिता के निकम्मेपन ने प्याले तक सीमित कर डाला. इसे निकम्मेपन के सिवा और क्या कहा जा सकता है कि एक भी पत्रकार ने यह ज़हमत नहीं उठाई कि इस बात की पड़ताल करते कि दोनों होटलों का बिल कितना हुआ और उसे किसने चुकाया. सारी बात साफ़ हो जाती. वैसे मुझे लगता है कि या तो इन मंत्रियों ने अपनी जेब से किराया चुकाने की बात सिर्फ़ कही है, किराया चुकाया नहीं है, और या फिर इन होटलों पर दबाव डाल कर किराया इतना कम करा लिया (और फिर जमा करा दिया) कि इनकी जेब पर कोई असर पड़ा ही नहीं. हम आम लोगों को तो असली ख़ुशी तब होती जब हमारी सरकार ऐसी मज़बूत इच्छा शक्ति दिखाती कि होटलों का पूरा बिल इन मंत्रियों से वसूल करती. लेकिन यह एक ऐसी उम्मीद है जो कभी पूरी होने वाली नहीं.

  • 19. 10:07 IST, 10 सितम्बर 2009 Amit Prabhakar:

    क्या सादगी के साथ 110 करोड़ लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई जा सकती है. ये अजीब लगेगा लेकिन 110 करोड़ लोग महत्व रखते हैं. यह वास्तव में समाज में हमारे बरताव को दिखाता है. मेरे विचार से अपने पैसे पर ऐश करने को सख़ती के साथ लेना चाहिए. अगर वह ऐसे ही अपने पैसे पर ऐश करना चाहते हैं तो उन्हें सरकार में नहीं आना चाहिए.

  • 20. 11:02 IST, 10 सितम्बर 2009 braj mohan:

    अगर अख़बारों में ख़बर नहीं आती तो इन्हें क्या फ़र्क़ पड़ता? बेहद मोटी चमड़ी है आप नेताओं की. अब कह रहे हैं होटल का बिल अपने पॉकेट से दे देंगे. भाई साहिब तीन महीने फ़ाइव स्टार होटल में रहने का कोई तुक नहीं है. आप कोई ओबामा या ऋतिक रोशन तो हैं नहीं!
    देश की माली हालत कितनी ख़स्ता है उसका थोड़ा ख्याल रख लिया होता? अब तो किरकिरी होनी थी, हो ली. जाइए राज्य भवनों में मज़े कीजिए.

  • 21. 13:07 IST, 10 सितम्बर 2009 manju:

    कितने दुख की बात है, रोज़ हमारे किसान मर रहे हैं और हमारे नेता मर रहे किसानों की लाशों पर चल कर बड़े बड़े होटलों में रह रहे हैं. लोग हमारे देश में ऐसे ही लोगों को क्यों चुनती है.

  • 22. 16:02 IST, 10 सितम्बर 2009 भावेश :

    विदेशमंत्री एसएम कृष्णा और विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर के पाँच सितारा होटलों में सौ दिन तक लगातार ठहरने में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की भूमिका का हल्ला दो चार दिन का तमाशा बनेगा और फिर जल्द ही सब हर बार की तरह सामान्य हो जायेगा । कहने को तो खुफिया एजेंसियाँ एक लाख रुपए प्रति दिन की दर से कृष्णा और 40 हजार रुपए प्रतिदिन की दर से थरूर के बिलों के भुगतान का ब्योरा भी जुटा रही है लेकिन अन्तोगत्वा क्या होगा ये अभी से सब को पता है।
    सुना है कि कृष्णा के बिलों का भुगतान पूरे देश में कॉफी रेस्तराँ की श्रृंखला चलाने वाली एक मशहूर कंपनी ने किया, जिसका स्वामित्व उनके करीबी रिश्तेदार के पास है, जबकि थरूर के बिलों का भुगतान उनकी एक नजदीकी कंपनी के द्वारा किया गया। दरअसल हर साल कई सौ विदेशी प्रतिनिधिमंडल और विशिष्ट राजनयिक अतिथि दिल्ली आते हैं। उनके ठहरने, लंच, डिनर, पार्टियों के इंतजाम पर विदेश मंत्रालय करोड़ों रुपए सालाना खर्च करता है। जिन दोनों होटलों में ये मंत्री ठहरे थे, उन्हें विदेश मंत्रालय द्वारा ऐसे आयोजनों का काम सबसे ज्यादा दिया जाता है। इन होटलों में करीब 14 कमरे तो स्थायी रूप से ही बुक रहते हैं। ऐसे में सब हरामखोर मंत्रियो की जमात में से कुछ ने यहाँ फायदा ले लिया तो क्या बड़ी बात है.
    धन्य है भारत देश, जहाँ ऐसे दलित और सेवा करने वाले नेता रहते है जो डेढ़ करोड़ रूपये सौ दिन में अपने रहने पर खर्च कर सके. और इनसे भी धन्य धृतराष्ट्र के समान वो अंधी जनता है जो ऐसे नेताओ को जीता कर केवल संसद भेजती है. ये देश एक बेआबरू अबला की तरह है जिस पर सांसद, पुलिस, न्यायालय, सरकारी बाबु और अफसर सब जोर अजमाइश करते रहते है.

  • 23. 16:20 IST, 10 सितम्बर 2009 rajendra soni (fci Ujjain):

    दोनों को गांधी जी से सीखना चाहिए कि कैसे सादगी से रहा जाता है.

  • 24. 17:21 IST, 10 सितम्बर 2009 KT:

    क्या आपको नहीं लगता कि इसमें सबसे बड़े दोषी वो लोग हैं...जिन्होंने एसएम कृष्णा और शशि थरूर पांच सितारा होटेल से जाने का आदेश देने की खबर बड़ी सफाई से मीडिया में पेश करके वाहवाही लूट ली है...कि कांग्रेस हाइ कमान नाराज है. तीन महीने से ये लोग वहां रह रहे थे...क्या सरकार में किसी को पता नहीं था...उच्च राजनेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों के हजारों आंख, कान होते हैं...सूचना देने वालों और कान भरने वालों का पूरा एक तंत्र होता है...जिसमें पत्रकार से लेकर खुफिया एजेंसी तक के लोग शामिल होते हैं...उन्हें सब पता होता है...लेकिन दु:ख की बात है कि फिर भी लोग ऐसे किसी मौके को नहीं छोड़ते...जिसे मीडिया में भुनाया जा सके. राहुल गांधी का गरीब की झोपड़ी में रुकना, खाना खाना...या किसी भी नेता का गरीबों के बच्चों को गोद में उठाकर फोटो खिंचाना सब प्रचार के लिये ही तो है.

    किसी एक दल या नेता का दोष नहीं है...समाज में गंभीर व्यक्तित्व ही नहीं है जिनकी छाया में समाज राहत की सांस ले सके. रहीम दास बहुत पहले कह गये थे..."रहिमन वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर. बागन बिच-बिच देखियत...सेहड़, कुटज, करीर". यहां अभिप्राय छोटे वृक्षों से नहीं है छोटे व्यक्तित्वों से है. एक्सप्रेस के जिस पत्रकार ने ये खबर छापी है उसे भी विरोधी गुट ने ही खबर दी होगी...और शायद उसी खेमे के किसी आदमी ने 'मैडम' के कान में डाल दिया होगा कि 'नाराज़गी प्रदर्शित कर दीजिये या डांट दीजिये'.

    मुरली देवड़ा किसके रहमोकरम पर पेट्रोलियम मंत्री बने हैं. मुलायम और अमर कैसे अनिल अंबानी की खुले आम पैरवी करते हैं. परिमल नाथवानी राज्यसभा सदस्य बनकर क्यों खुलेआम धीरूभाई अंबानी के हितों की रक्षा का दम भरते हैं. ये राज्यसभा-लोकसभा के सदस्य, विपक्षी दल और सत्ताधारी सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं...दु:ख की बात है मीडिया के बड़े नाम भी इस भ्रष्टाचार की वैतरणी में खुलकर नहा रहे हैं.

  • 25. 21:02 IST, 10 सितम्बर 2009 परम दुबे:

    मुझे भारत छोडे लगभग २० वर्ष हो गए; पर भारत दिल दिमाग में सदैव रहता है. हिंदी में पढने को ज्यादा कुछ नहीं है; और वह भी बौद्धिक लेख तो हिंदी में देखने को नहीं मिलते. हिंदी पत्रकारिता पर मुझे तरस आती है. ऐसा भी नहीं कि संजीव श्रीवास्तव को intellectual की हिंदी नहीं पता है. पर वे आमादा हैं अपना आंग्ल-ज्ञान दर्शाने के लिए! आप जैसे पत्रकारों को समाज का द्रष्टा ही नहीं स्रष्टा भी होना चाहिए. हिंदी भाषा कि दुर्गति का यह प्रधान कारण है. फिर मुझे आश्चर्य नहीं होता कि क्यों धर्मयुग, दिनमान जैसी पत्रिकाएं बंद हो गयीं!

    अब बात आपके लेख की: हमारा सारा तंत्र भ्रष्टाचार का प्रतिबिम्बन करता है. इसमे कोई अचरज नहीं है. एक समाज जिसने सादगी और पर-सेवा को इतना महत्व दिया, वहां स्वार्थ का तांडव हो रहा है जिसमे आम आदमी पिसा जा रहा है. जहाँ कोई नेतृत्व नहीं है, वहां आम आदमी को कौन देखेगा? आप जैसे पत्रकारों को अपने गिरेबान में झांक कर देखना होगा कि आप वस्तुस्थिति को कैसे सुधार रहें हैं. आपको निर्ममता से भ्रष्टाचारियों और आतताइयों कि पड़ताल करनी होगी. और तभी आपकी लेखनी सफल होगी. आप का काम अत्यंत महत्वपूर्ण है ऐसे समाज में जहाँ सर्वहारों को कोई आवाज नहीं देता.

  • 26. 08:01 IST, 11 सितम्बर 2009 Khushdeep Sehgal, Noida:

    भारत में 20 करोड़ लोगों का रोज़ शहरों के फुटपाथ पर बसेरा होता है, इंडिया में सवा करोड़ लोग ऐसे हैं जिनका ज़्यादातर होटल में डेरा रहता है...(अपने विदेश मंत्री एस एम कृष्णा और विदेश राज्य मंत्री शशी थरूर भी ऐसी ही हस्तियां हैं जो भारत की नहीं इंडिया की नुमाइंदगी करती हैं). भारत में 62 करोड़ लोगों के पास खुद का घर नहीं है. इंडिया में 7 करोड़ ऐसे हैं, जिनके पास एक से ज़्यादा आशियाने है,
    फिर भी उनमें से कई पांच सितारा होटलों में शाहखर्ची के साथ ऐशो-आराम में राजे-महाराजों को भी मात दे देना चाहते हैं...साथ ही ये राहुल गांधी के उस दावे की हकीकत भी बयान करता है कि हमारे मंत्री एक देश में दो देश के फर्क को मिटाने के लिए कितने गंभीर हैं.

  • 27. 13:18 IST, 11 सितम्बर 2009 govind goyal,sriganganagar[rajasthan]:

    महंगे
    होटल में
    रहते हैं
    एस एम कृष्णा
    शशि थरूर,
    इसे ही तो
    कहते हैं
    सत्ता का गरूर।

  • 28. 16:45 IST, 11 सितम्बर 2009 Idrees A. Khan, Riyadh, Saudi Arabia.:

    कुछ कहने से पेहले मैं ये बात साफ़ कर दूं कि न तो मै शशि थरूर क फ़ैन हूं और न कृष्णा साहब का, मै ये राय सिर्फ़ ये मान कर लिख रहा हूं कि इन लोगों ने बिल अपनी जेब से चुकाया था.

    अव्वल ये कि इस बात मे कोई दो राय नही है कि इन लोगों की इस लेविश लाइफ़ स्टाइल कि निंदा की जानी चाहिये क्यूंकि ये उस देश के जन प्रतिनिधी हैं जहां आज भी करोड़ों लोग भूखे सोने को मजबूर हैं और इन लोगों के होटल का एक दिन का बिल किसी एक बड़े ग़रीब परिवार को पूरा साल पेट भर खाना खिलाने को काफ़ी है, पर क्या ये सोच ऐसे देश मे व्यवहारिक हो सकती है जहां मुकेश अंबानी जैसे धनकुबेर भी रेह्ते हैं जिनके घर की क़ीमत 100 अरब रुपये है जहां सिर्फ़ 4 लोगों के परिवार की सेवा के लिये 600 नौकरों की एक फ़ौज लगी हुई है चलिये अंबानी को छोड़ दीजिये वो कोई राजनेता नहीं हैं.

    क्या सादा जीवन उच्चविचार की ये सोच उस देश की राजनीति मे व्यवहारिक हो सकती है जहां राजनेता अपना जन्मदिन मनाने के लिये जनता को पीट पीट कर चंदा वसूल करते हैं, जहां नेताओ को अपनी मूर्तियां स्थापित करने के लिये 5 अरब रुपयों का बजट पेश करते हुए रत्ती भर शर्म नही आती.

    ऐसे मे अगर कोई नेता अपनी खुद की कमाई से 5 स्टार होटल मे रहे या अपना महल बना कर रहे किसी को समस्या तब होनी चाहिये जबकी मंत्री बनने से पेहले नेता जी की हैसियत साइकिल वाली रही हो और मंत्री बनने के कुछ दिनो बाद 100 गाड़ियों का काफ़िला तैयार कर लिया जाए.

    ये एक बहस का मुद्दा हो सकता है कि इस देश को सूट बूट वाले और खुलेआम राजसी जीवन जीने वाले नेता चाहिये या वो जो अपनी धोती और पजामे की सादगी को पर्दा बना कर अपनी भूमीगत राजसी ज़िंदगी को छुपाने की कोशिश करते हैं खुद के पास मिलकियत के नाम पर सिर्फ़ एक पीतल का लोटा दिखाया जाता है लेकिन बीवी और बच्चों के नाम स्विस खातों मे अगली सात पीढ़ियों के ठाठ बाट का इंतेज़ाम कर चुके होते हैं नेता जी.

    या फ़िर इन दोनो तरह के नेताओं को जनता की उस लात की सख़्त ज़रूरत है जो इन्हें राजनीती से हमेशा के लिये बाहर कर दे.

    अंत मे एक सविनय टिप्प्णीं आपके उस वाक्य पर जो शायद आप ग़लत लिख गए या फ़िर मैं ग़लत समझ रहा हूं कि व्यंग मे ही सही अपनी जेब से बिल अदा करने को ख़ुदग़र्ज़ी कहा जाए या ख़ुद्दारी?.

  • 29. 17:38 IST, 12 सितम्बर 2009 mukesh:

    नेता लोगों को भगवान का दर्जा मत दो. इतना ज़ुल्म क्यों करते हो इन लोगों पर.

  • 30. 23:23 IST, 15 सितम्बर 2009 Tej Bahadur Yadav:

    देश समृद्ध हुआ है. धनिकों में वृद्धि हुई है. दुनिया बदली है. दुनियावी रंग के साथ भारत का रंग-रूप भी बदला है. अब अपना देश वैसा भिखारी नहीं है जैसा कि 70 के दशक तक था. समस्या यह है कि धन का केन्द्रीकरण वैसे ही हुआ है, जैसे कि लोकतंत्र का पारिवारीकरण या भाई-बंधुकरण हुआ है. राजनीति में आपराधिक तालमेल से नया घालमेल पैदा हुआ है, जिसे जनसेवा या देशसेवा नाम देकर ढंका जाता है. एक चादर मैली सी स्थिति है. इसमें शशि थरूर या एसएम कृष्णा का कोई दोष नहीं है. सब समय का फेरा है. अब गरीब की सुनता कौन है और गरीब के लिए काम कौन करता है. थरूर जी राजनीति में देशसेवा या जनसेवा के लिए नहीं आए हैं. लम्बे अरसे तक ऐय्याशी का जीवन जीने के बाद कोई दलित कैसे रह सकता है. एसएम कृष्णा के साथ यही बात है. देश में आजादी के 60 साल से अधिक गुजर जाने के बावजूद अगर करीब 60 करोड़ लोगों के पास अपना मकान नहीं है. मुम्बई के धारावी में एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती कायम है और ऐसे न जाने कितनी झुग्गी बस्तियां आबाद हैं, तो इसके लिए कहीं न कहीं हमारी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व नौकरशाही की व्यवस्था जिम्मेदार है.
    हम सब सिर्फ कुढ़ने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकते हैं. सब कुछ एक साजिश के तहत हो रहा है. होता रहेगा. इसमें कोई बदलाव होगा, फ़िलहाल ऐसी कोई किरण नजर नहीं आती है.

  • 31. 23:38 IST, 19 सितम्बर 2009 Virendra Tiwari:

    कुछ लोगों के लिए भारत बहुत धनवान हो चुका है, तेज भाई आप यही सोच रहे हैं, जबकि ऐसा है नहीं. आज भी करीब 13 फ़ीसदी लोगों की प्रतिदिन की आमदनी सिर्फ 50 रुपए या इसके आसपास है. इतने में गुजारा भला कैसे हो सकता है, जबकि एक किलो दाल की कीमत 85 रुपए के आसपास है. चीनी का दाम 15 से बढ़कर 30-35 रुपए किलो हो चुका है. भाई ग़रीबों के लिए मरने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.