अपने हीरे को संभाल कर रखिए
बुज़ुर्गों के साथ ज़्यादती या उनकी हत्या की ख़बरें मुझे जितना उद्वेलित करती हैं, उतनी ही, या उससे भी अधिक तकलीफ़ मुझे किसी मासूम बच्चे पर अत्याचार या बलात्कार की ख़बरों से पहुँचती है.
विश्वास कीजिए, मेरी कई रातों की नींद उड़ जाती है. बलात्कार और फिर हत्या की शिकार हुई बच्ची की पीड़ा और उसकी माँ की व्यथा का अंदाज़ा कर मैं सिहर जाती हूँ.
ऐसी ही एक ख़बर अभी दो दिन पहले पढ़ने में आई. तब से ही मन दुखी है.
कई साल पहले जब इस तरह के समाचार इतने आम नहीं थे जितने आज हो गए हैं, मैंने नौ साल की एक बच्ची के साथ ऐसे ही कुकर्म की ख़बर पढ़ी.
संयोग से उस समय मेरी बेटी की उम्र भी उतनी ही थी. मैं इतनी व्याकुल हुई कि अपनी व्यथा को मैंने एक कविता की शक्ल दे दी.
उस काग़ज़ पर किसी की नज़र नहीं पड़ी लेकिन पता नहीं क्यों आज बरसों बाद, मेज़ की दराज़ में रखे हुए उस काग़ज़ की पंक्तियाँ आपके साथ बांटने का मन हो रहा है.
मेरी नौ वर्षीया बेटी अपनी घुटनों से ऊँची फूलदार फ़्रॉक में उछलती फिर रही है,
सामने की झुग्गी में रहने वाली नौ वर्षीया रधिया अपनी फूलदार कमीज़ को खींच-खींच कर
अपने पैर तक ढंकने का प्रयास कर रही है,
मेरी बेटी के होठों पर मुस्कराहट है और आँखों में हैं आने वाले कल के सपने,
रधिया के होंठ पपड़ियाएँ हैं, आँखें सूनी हैं और बीते हुए कल के भय से आक्रांत हैं,
मेरी बेटी खेल-खेल में दुल्हन बनती है, साड़ी पहनती है, लिप्स्टिक लगाती है,
रधिया दुल्हन बनने के विचार मात्र से कांप-कांप जाती है,
मेरी बेटी भोली है, संसार के मायाजाल से अंजान है,
रधिया संसार को बहुत निकट से देख चुकी है,
उसका बलात्कार हो चुका है.
आज भी सुबह दफ़्तर जाते समय रास्ते में पड़ने वाली झुग्गिी-झोंपड़ियों के बाहर छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों को बेसहारा घूमते या खेलते देखती हूँ तो उनके माता-पिता से एक ही सवाल करने का मन होता है.
आपके पास यदि कोई बेशक़ीमती जवाहरात हों तो आप उनकी सुरक्षा में रात-दिन एक कर देते हैं. आपका मासूम बच्चा तो ऐसा अनमोल हीरा है जिसकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती.
तो उसे संभाल कर रखिए. कहीं ऐसा न हो कोई भेड़िया उसे अपनी हवस का शिकार बना ले और कल को हाथ मलने के अलावा और कोई चारा न रहे.

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सही कहा आपने | पर क्या करे वो माँ बाप जिन से आपका पूछने का मन हुआ| आखिर अपने हीरे जवाहरात के पेट को भरने के लिए उनको अकेला छोड़ना ही पड़ेगा ना | वैसे आपके लिए यह समझना थोडा मुश्किल होगा|
सलमा जी, आपने राय तो दे दी कि अपने बेशक़ीमती हीरे को संभाल कर रखिए लेकिन यह नहीं बताया कि कैसे? आज ही निठारी कांड में देख लिया कि किस तरह बेईमान नेताओं और अधिकारियों के कारण एक अभियुक्त साफ़ बरी हो गया. क्या गुज़र रही होगी उन माँ-बाप पर जिन्होंने अपनी बच्चियों को खोया है. अब यह महसूस होता जा रहा है कि भारत में फूलन देवी जैसी औरत की ज़रूरत है न कि सोनिया गांधी, मायावती, सुषमा स्वराज या मायावती की. आज अगर यह सब हो रहा है तो बेईमान नेताओं और अधिकारियों के कारण हो रहा है. कैसा अंधा क़ानून है कि एक जज सज़ाए मौत सुनाता है तो ऊपरी अदालत बरी कर देती है. आपने मुद्दा अच्छा उठाया है लेकिन कोई हल भी बता देतीं. किस तरह माँ-बाप अपने इन फूलों को संभाल कर रखें. स्कूल भेजें तो मास्टर बलात्कार करते हैं, घर के बाहर ऐसे दरिंदे घूमते हैं.
सच कहा सलमा जी, सारी ख़बरों के बीच जब बलात्कार की खबरें दिखाई देती हैं तो मन कुछ ज़्यादा ही विचलित हो जाता है, कुछ दिनों पहले बच्चों को सुरक्षित यौन संबंधों के बारे मे जानकारी देने पर बहस हो रही थी, पर ये ख़बरें देख कर एहसास होता है कि उससे ज़्यादा बच्चों को खुद की सुरक्षा करने की जानकारी देने की ज़रूरत है. ये मुद्दा हद से ज़्यादा पेचीदा है सलमा जी, आपने हीरों की सुरक्षा की सलाह दी जो बिल्कुल सही है, लेकिन उन हीरों की सुरक्षा का क्या किया जाए जिन पर उनकी सुरक्षा करने वाले की ही नीयत ख़राब हो जाए. कॉलेज के दिनों में एक मेगज़ीन द्वारा किशोरवय लड़कियों पर किए गए एक सर्वे के बारे मे पढ़ा था, जिसमे उनसे ये सवाल किया गया कि क्या कभी उनके किसी रिश्तेदार ने या उनके पापा के किसी दोस्त ने उनपर बुरी नज़र डाली है, उनका शोषण करने की कोशिश की है, और सर्वे के परिणाम चोंकाने वाले थे अधिकतर बच्चियों का जवाब हां मे था.
यक़ीन नहीं हो रहा था इसलिए ख़ुद अपना एक मिनी सर्वे करने की ठानी और अपनी एक क़रीबी दोस्त से बुरा न मानने की शर्त के साथ मेगज़ीन का हवाला देकर ये सवाल किया, उसने बताया कि हां जब वो 14 साल की थी तब उसके सगे मामा ने उसके साथ ऐसी हरकत करने की कोशिश की थी पर वो खुद को बचा कर भागने मे कामयाब हो गई, अगले दिन हिम्मत करके उसने इस बात की शिकायत अपनी मम्मी से की तो मम्मी ने उसकी बात सुनने की बजाए उसे डांट कर चुप करा दी. ज़िंदगी चलती रही पर उसके बाद कभी उसने ऐसा मौक़ा नही आने दिया जब उसका मामा उसे घर पर अकेला पा सकता.
दूसरी दोस्त ने अपने पापा के बहुत क़रीबी दोस्त के बारे मे बताया कि पापा के सामने तो अंकल बहुत सज्जन बन कर रहते थे पर जब पापा करीब नही होते थे तो अंकल पूरी तरह बदल जाते थे. और एक दिन अकेले मे उन्होने उससे कोई एसा सवाल पूछ लिया जो कोई शरीफ़ आदमी अपने दोस्त की बेटी से पूछने की जुर्र्त नहीं कर सकता, इस लड़की ने भी इस बात की शिकायत अपने मम्मी पापा से की, और उसके पापा ने सख़्त रवैया अपनाते हुए अपने दोस्त को हिदायत दी के आज के बाद हमारे घर के आसपास तुम्हारी मनहूस शक्ल दिखाई न दे तो ही बेहतर है.
दोस्तों के जवाब सुनने के बाद एक बात समझ मे आई की बहन बेटियों के आसपास रहने वालों के चरित्र की पूरी जानकरी रखना हर ज़िम्मेदार माता-पिता और भाई का फ़र्ज़ है, और लोक लाज के डर से या बचकाना बातें समझ कर अपने बच्चों की शिकायतों को नज़र अंदाज़ करना बहुत बड़ी भूल है जिसकी बहुत बड़ी क़ीमत उन मासूमो को चुकानी पड़ सकती है. बच्चे अमीरों के हों या ग़रीबों के उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए की वो हर छोटी बड़ी बात अपने मां-बाप से शेयर करें कि क्या टीचर ने बिना वजह छूने की कोशिश की, क्या घर के किसी नौकर ने या ड्राइवर ने कोई अजीब बात कही, क्या किसी ने कोई गिफ़्ट देकर किसी को न बताने की हिदायत दी वगैरह वगैरह. अगर अभिभावक अपने आंख कान खुले रखें और अपने कॉमन सेंस का सही इस्तेमाल करें तो ऐसी दुखद घटनाओं को टाला जा सकता है.
बिल्कुल सही कहा आपने, इंसान में संस्कार उसे उसके माता-पिता से मिलते हैं..माता-पिता को सोचना चाहिए कि आज वो जैसा बो रहे हैं कल वैसा ही फल उन्हें मिलने वाला है. माताओं को अपनी शॉपिंग, करियर और ज्वेलरी से थोड़ा सा ध्यान हटाकर अपने बच्चों पर देना होगा वहीं पिताओं को अपनी रात की पार्टियों से..लेकिन आज के ज़माने में ये बात इन्हें कौन समझाए.
सलमा जी बीते कल बीबीसी पर एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि ज़्यादातर ग़रीब महिलाएं नौकरानी के तौर काम करती हैं और उनके छोटे और बड़े बच्चे घरेलू नौकर के तौर पर काम करते हैं. ये सब चीज़ें दमन और बलात्कार से भी जुड़ी हुई हैं. एक बात और ये कि मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग और उच्च वर्ग 'केवल ग़रीबों की व्यथा महसूस नहीं कर सकते, हाँ उस पर लिख सकते हैं. '
सलमा जी! सिर्फ़ झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों के साथ ऐसा नहीं होता, बल्कि किसी भी घर में ऐसा हो सकता है. कई बार शोषण करने वाले बेहद क़रीबी होते हैं और मासूम बच्चों को मालूम भी नहीं होता कि उनके साथ क्या हुआ. आपने सही कहा है बच्चे क़ीमती हैं इनकी हिफ़ाज़त ज़रूरी है.
हमारे नैतिक मूल्यों का कितना पतन हो चुका है. हम क्या कर रहे हैं? एक समय था जब हमने नारियों की आज़ादी छीन रखी थी लेकिन तब उन पर अत्याचार नहीं होता था, उन्हें पूजा जाता था. हम भारतीय अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अजनबियों को भी भैया, दादा, माता जी, बहन जैसे संबोधन देते हैं लेकिन यही हमारा संस्कार है. फिर यह क्या हो रहा है? कहीं यह आंटी, अंकल कल्चर का प्रभाव तो नहीं है. या हमारी शिक्षा नीति के वैश्वीकरण का असर है. आज हमारे दिलों में अपने शिक्षकों के लिए वह आदर नहीं है जो हमारे माता-पिता के मन में अपने गुरुओं के लिए होता था. समाज में आज कोई आदर्शवादी व्यक्ति नहीं मिलता. कैसे करें अपने नैतिक मूल्यों का पुनर्जन्म...शायद शिक्षा नीति में बदलाव ही एकमात्र विकल्प है.
अपने हीरे को संभालने के लिए
ऊंची चारदीवारी है आपके पास,
मज़बूत हैं घर की चौखटें.
भेड़ियों को पता है -
चारदीवारी के भीतर झाँकने की सज़ा.
अपने हीरे को संभालने के लिए
दो जून रोटी की जुगाड़ वाला कोयला भी,
नहीं छुपा पाता - ''रधिया का वजूद''.
तीलियों से बचाने में, झोपडी की घास -
बीत जाता है माँ का दिन.
कपडों में सीवन नहीं कराती
पिता की मजदूरी.
मजबूरी........
हल्की फुहार भी नहीं संभाल पाती -
रधिया की झोपडी.
माता-पिता को ही चौकन्ना रहना होगा... सिर्फ बाहरी नहीं कई बार रिश्तेदार भी हद पार कर जाते हैं... अभी हिंदुस्तान में कुछ दिनों पहले एक ऐसे ही मुद्दे पर लेख आया था जिसमें कई लड़कियों से रिश्तेदार द्वारा किये गए कुकृत्य को स्वीकारा... इसमें एक बात और निकल कर सामने आई ऐसे में या तो लड़कियां समाज से, लोग से कट जाती हैं... आत्मविश्वास ख़त्म जो जाता है या फिर वो सेक्स की लत में आ जाते... (अगर रिश्तेदार लगातार फायदे उठाते रहे तो) यह उसी अखबार के बुनियाद पर कह रहा हूँ... जहाँ एक लड़की के कहा उसके मामा ने उसके साथ कई बार सम्बन्ध बनाए और आगे चल कर खुद उसने आदतवश कम से कम 40 लोगों से सम्बन्ध बनाये इसमें से 5-6 लोगों के साथ तो एक ही समय में...
मैं दिल्ली में रहता हूँ... सबके घरों में लड़कियां हैं... पर सोच कर सहम जाता हूँ...... आपकी तरह..............
सलमा जी, झकझोर दिया आपने. पर इस मामले का सबसे बड़ा सच यही है इस मामले में अपनों से बेहतर ग़ैर ही है.
बहुत अच्छा लिखा है सलमा जी. ऐसी बात जो सब को जगाने वाली है. इस बात को सबके सामने रखने पर आपकी हिम्मत का स्वागत करता हूँ.
बहुत मार्मिक कविता है सलमा जी. मन उदास हो गया.
सलमा जी सिक्के के दो पहलू हैं. एक तरफ दो जून की रोटी का सवाल है तो दूसरी तरफ रोटी है तो खाने का वक्त नहीं या खा नहीं सकते. एक तरफ पारिवारिक मूल्यों की ऊँची दीवार है दूसरी तरफ परिवारों में रहने वालों को अपने ही परिवार को जानने का वक़्त नहीं है. बात घूम फिर के वहीँ आ जाती है कि हमारे सभ्य समाज का एक हिस्सा स्याह परत की आड़ में लिपटा है कबूतर आँख बंद करके बैठेगा तो बिल्ली तो आँखें खोल के बैठी है. मेरे विचार में हमारे देश में ज्यादातर समस्याओं का मूल कारण शिक्षा का आभाव ही है. हमारे यहाँ प्राथमिक शिक्षा की बहुत हालत खराब है. हम बात करते हैं बड़ी-बड़ी तकनीकी संस्थाओं ,मैनेजमेंट संस्थाओं ,आसमान को छूने की. जड़ , धरातल ,नींव को ही भूलकर चोटी पर पहुँचने की कवायद करतें हैं. झुग्गी-झोपडी देन किसकी है? अवयस्क बच्चों के भविष्य के साथ कौन खिलवाड़ कर रहा है? अवयस्क बच्चे आम घरों में किसकी बदौलत नौकरों की शक्ल पहुँच रहे हैं? झुग्गी-झोपाडीयों को खत्म में कष्ट किसे है? प्राथमिक शिक्षा को जड़ से मज़बूत करने अनभिग्यता क्यों इतने समय से? यह बच्चे पाठशाला में जाने की बजाय घरों में क्यों पहुँच रहे हैं? हमेशा से कमजोर ही प्राणी शिकार बनता है. कमजोरी का तात्पर्य शारिरीक ही नहीं बल्कि मानसिक और बौधिक से है. कमजोरी निवारण का प्रयास होना चाहिए. दूसरा पहलू यह भी है कि केवल गरीबों के बच्चे ही बलात्कार, बाल अपराध का शिकार नहीं बन रहे बल्कि पैसे वाले ,रुतबे वाले लोगों के बच्चे भी पीड़ित हैं. यह वे अबोध बच्चे है जिनके अभिभावकों के पास परिवार को जानने का, बच्चों को समझने का वक़्त नहीं है. खाली ढोल पीटने से कुछ न होगा. इसमें मीडिया भी बहुत मददगार साबित हो सकता है. शहरों, कस्बों में नौकरियाँ दिलाने वाली प्राईवेट संस्थाओं पर कड़ी नजर रखी जाये. यह घोर कलयुग है यहाँ रिश्तों- नातों की डोर टूटते देर नहीं लगती है. हमारे आस-पास अनगिनित नरपिशाच, भेड़िये मौजूद हैं. अत: स्वयं को शिक्षित बनाकर बच्चों को मान मर्यादाओं का पाठ पढाना होगा. मीडिया को स्वयंसेवी संस्थायों के साथ मिलकर झुग्गी-झोपडी हटाओ अभियान चलाकर पुनर्वास योजनायें चलाकर, प्राथमिक शिक्षा अभियान चलाकर आगे आना चाहिए.| सरकार तो यह पहल नहीं कर सकती क्योंकि वोट बैंक हाथों से खिसकता है. सरकार शुरुआत करती भी है तो कोरी कागजी कार्यवाही होगी. कोई फायदा न होगा. कोई भी बेटी रधिया न बनने पाए इसके लिए आस-पास अपनो परायों की जड़ों को खंगाला जाना जरूरी है. अपनों पर भी विशवास करके आँखें मूँद कर बैठे रहने से काम नहीं चलेगा. बच्चों के मन की बात सुननी होगी उनसे समय -समय पर दुख-सुख में प्रतिक्रिया लेना जरूरी है. बच्चों को यौन-शिक्षा माता-पिता ही दें. आखिर स्वयं को जानना - पहचानना कोई बुराई तो नहीं है.
सलमा जी, निश्चित रूप से यह पुलिस की ज़िम्मेदारी नहीं तय की जा सकती क्योंकि यह कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे वह फिर से बरामद कर पाएँ. बचपन को बहुत संभाल और संजो कर रखने की ज़रूरत होती है. पर झोंपड़पट्टियों में रहने वाले माँ-बाप तो बन जाते हैं पर रोज़ी-रोटी के चक्कर में सुरक्षा नहीं दे पाते हैं. ऐसा नहीं है कि वे ख़तरे से अंजान हैं. बस वे एक-एक दिन भगवान भरोसे ही काटते हैं कि आज वह मनहूस दिन नहीं होगा. और ख़तरा सिर्फ़ बेटियों को हीं नहीं है, भेड़िये बेटों को भी नहीं बख़्शते हैं.
सलमा जी, नमस्कार. आपके चिंतन का प्रवाह आपकी कविता में परिलक्षित हुआ. समाज को चेतावनी आपने ब्लॉग में लिख कर दे दी. आज की यह समस्या समाजशास्त्रियों के लिए समस्या बन चुकी है. विमर्श की ज़रूरत है.
अमरेन्द्र की टिप्पणी पढ़ी
थोडा अफ़सोस हुआ...
जब हम किसी जुर्म को अमीरी और गरीबी के बीच बाँट देते हैं...
जब किसी के बच्चे के साथ घिनौना अपराध होता है, तो वो बच्चे को सारी उम्र के लिए उस ज़ुल्म के साथ जीने के लिए छोड़ देते हैं....
क्या गरीब का बच्चा या अमीर का बच्चा इस के लिए अलग है...
जुर्म जुर्म ही है,
तकलीफ तब है, जब लगता है की न्याय अमीर की बपौती बन गया है....
सलमा जी, सारी समस्या ग़रीबी और अशिक्षा है. ग़रीबी ऐसा रोग है, जिसके कारण कई अन्य रोग व्यक्ति को घेर लेते हैं. अशिक्षित व्यक्ति हीरों के मोल को समझ ही नहीं पाता है. उसे पता ही नहीं कि उसने अपने हीरे को गली-कूचे में पता नहीं किन-किन कैसे शैतानों का शिकार बनने के लिए छोड़ दिया है. बच्चों को ख़ुद की सुरक्षा करने की जानकारी देने की नाना-नानी और दादा-दादी की हिदायतें किनारे कर दी गई हैं, अब ये सदस्य परिवार की ज़रूरत से बाहर हो चुके हैं, इससे भी बच्चों की असुरक्षा बढ़ी है. आख़िर रोजी-रोटी के लिए बाहर तो जाना होगा और ऐसे वक्त में बच्चे असुरक्षित अकेले घर या गली में छूट जाते हैं, जहाँ शैतानों के लिए आसान शिकार मिल जाते हैं. बच्चों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए की वे हर छोटी-बड़ी बात अपने माँ-बाप से ज़रूर बताएँ. माता-पिता और अभिभावक को भी बच्चों की गतिविधियों पर साए की तरह नज़र रखनी चाहिए और उनके इर्दगिर्द के परिवेश की समय-समय पर निगरानी रखनी चाहिए.