इस विषय के अंतर्गत रखें जुलाई 2009

देर आयद दुरुस्त आयद!

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|गुरुवार, 30 जुलाई 2009, 13:09

टिप्पणियाँ (23)

दिल और दिमाग़ में एक बहस चल रही है.

मन कह रहा है कि मैं भारत सरकार के इस क़दम का स्वागत करूँ कि छह से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य किए जाने के प्रयास हो रहे हैं.

दिमाग़ है कि इन बच्चों के भविष्य को सोच-सोच कर परेशान है.

आठवीं पास 14 साल का बच्चा, चाह कर भी आगे पढ़ाई नहीं कर पाएगा. हो सकता है उसकी आर्थिक परिस्थिति इसकी इजाज़त न दे.

नौकरी वह कर नहीं सकता क्योंकि यह बालमज़दूरी की श्रेणी में आएगा.

मेरे आलोचक ज़रूर सवाल उठाएँगे कि मैं निराशावादी हूँ, अच्छी बात पर ख़ुश होने की जगह उसमें ख़ामियाँ ढूँढ रही हूँ लेकिन क्या करूँ...

आज़ादी के बासठ साल बाद, एक पीढ़ी के बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँचने के बाद और दूसरी पीढ़ी के किसी तरह खींचखांच कर पढ़ाई पूरी करने, या किसी मजबूरी के तहत न पूरी करने के बाद, सरकार को इसकी सुध आई.

क्या करूँ, शाबाशी दूँ या इस बात का रोना रोऊँ कि इस आधे-अधूरे क़दम का नतीजा क्या होगा.

अरे भाई, बच्चे को दसवीं तो पास करा दो. क्या उसके माता-पिता से यह अपेक्षा कर रहे हो कि वे अपना पेट काट कर अभी से पैसा जोड़ना शुरू करदें ताकि अपने बच्चे की दो साल की मंहगी पढ़ाई का ख़र्चा उठा सकें.

फिर, एक सवाल यह भी है कि केवल 25 फ़ीसदी तक इसका फ़ायदा पहुँचने से अन्य 75 प्रतिशत का क्या होगा. या एक चौथाई का शिक्षित होना ही हर समस्या का अंत है.

लेकिन, यह बेहतरी की दिशा में एक क़दम है इसमें दो राय नहीं हैं.

देर आयद दुरुस्त आयद!

पहले अंडा या पहले मुर्गी

भारत में विकास को लेकर ज़्यादातर बहसें इसी तरह ख़त्म होती हैं- पहले अंडा या पहले मुर्गी.

बहुत सारे लोगों को ये बहस बेमानी लगने लगी है क्योंकि हम पहले मर्सिडीज़ फिर सड़क, पहले पेप्सी फिर पानी, पहले आईआईटी फिर प्राइमरी स्कूल वाले ढर्रे के आदी हो चले हैं.

मुझे एक वाक़या याद आता है जब झारखंड में सुदूर इलाक़े के एक गाँव में शौचालय बनाने पहुँचे एक एनजीओ के लोगों को खदेड़ दिया गया, गाँव के लोगों ने कहा कि पहले खाएँगे तभी तो शौचालय जाएँगे.

इतना सहज और प्राकृतिक क्रम विकासवादी घटाटोप में ओझल हो गया दिखता है.

बताया गया है कि नेशनल आइडेंटिटी डेटाबेस बन जाने से देश का विकास हो जाएगा.

नंदन निलीकेनी को काम सौंपा गया है, सवा अरब लोगों के बारे में पुख्ता जानकारी जमा की जाएगी और हर व्यक्ति को एक नंबर दिया जाएगा.

बिल गेट्स योजना को लेकर उत्साहित हैं, पार्टनर बनना चाहते हैं. सैकड़ों अरब रुपए की लागत वाली इस योजना को लेकर कुछ ऐसा माहौल है मानो बड़े-बड़े लोग कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे.

इतनी बड़ी रकम का यही सबसे अच्छा इस्तेमाल है, इस पर कोई सार्थक बहस कहीं नहीं दिख रही है.

देश की जनता को यूनिक नंबर देने से विकास होता तो अफ़्रीका के बीसियों देशों में हर व्यक्ति के पास नेशनल आईडी कार्ड है, अमरीका और ब्रिटेन पिछड़े देश होते क्योंकि वहाँ यह काम नहीं हो पाया है.

सरकार का कहना है कि सबको नंबर दे देने से विकास आसान होगा, देश की बड़ी आबादी यही कहेगी कि नंबर ज़रूर देना लेकिन पहले दाना-पानी तो दे दो. यानी यूनिक आइडेंटिटी की बहस भी पहले मुर्गी या पहले अंडा वाली ही है.

मुर्गी और अंडे वाली बहस का प्रैक्टिकल जवाब है कि नाश्ता करना हो तो अंडा, डिनर करना हो तो मुर्गी.

जिनको दाना-पानी मिल गया है उनको नंबर का आइडिया अच्छा लग रहा है, जिनको नहीं मिला है उनकी बात सुनने का नंबर, नंबर बँटने के बाद आएगा.

हम कब बड़े होंगे?

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|गुरुवार, 23 जुलाई 2009, 14:37

टिप्पणियाँ (46)

टीवी कार्यक्रम 'सच का सामना' को लेकर संसद में हंगामा हुआ. कहा गया कि यह कार्यक्रम अश्लील है, परिवार के साथ देखने लायक़ नहीं है. और यह भी कि इससे कई परिवार टूटेंगे, दोस्तियाँ ख़त्म होंगी.

पहले बात पहली दलील की. यह कार्यक्रम रात साढ़े दस बजे प्रसारित होता है. यह समय बच्चों के सोने का होता है, टीवी देखने का नहीं. इसके अलावा कार्यक्रम पर बार-बार यह संदेश दिखाया जाता है कि इसे अभिभावकों की मर्ज़ी से ही देखा जाए.

पश्चिमी देशों में रात नौ बजे के बाद कई वे कार्यक्रम दिखाए जाते हैं जो केवल वयस्कों के लिए ही होते हैं. हम कई मायनों में पश्चिम का अनुसरण करते हैं. यहाँ तक कि जिस कार्यक्रम की बात हो रही है वह भी अमरीकी टीवी शो मूमेंट ऑफ़ ट्रुथ का हिंदी संस्करण है.

हम अपने बच्चों को और कई बुराइयों से बचाते हैं तो टीवी पर यह तथाकथित अश्लील कार्यक्रम देखने से क्यों नहीं.

कभी यह जानने की कोशिश की जाती है कि बच्चा इंटरनेट पर सर्फ़िग करते करते किस साइट पर पहुँच गया है? और कई जागरूक माता-पिता यह जानते भी हैं. तो वे बच्चो को रोकेंगे या उस वेबसाइट पर पाबंदी लगाने की बात करेंगे?

और अब दूसरी बात-परिवार टूटने की.

इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले सभी लोग वयस्क हैं. वे जब इसमें शामिल होने की हामी भरते हैं तो अपनी आँखें और कान खुले रख कर.

यदि उनके लिए पैसे की इतनी अहमियत है कि उन्हें परिवारजनों के दिल टूटने या उनको चोट लगने की चिंता नहीं है तो हम आप नैतिक पुलिस की ज़िम्मेदारी क्यों उठाए हैं.

यह सब पढ़ कर यह मत सोचिएगा कि मैं इस कार्यक्रम की बड़ी भारी प्रशंसक हूँ. मुझे न तो लोगों के निजी जीवन में झांकने का शौक़ है और न ही मैं ऐसे रियल्टी शोज़ को कोई अहमियत देती हूँ.

मैंने तो कल संसद में हंगामा होने के बाद पहली बार इसे देखा.

लेकिन इस हंगामे ने मुझ जैसे श्रोताओं की बदौलत इसकी टीआरपी में तो जरूर इज़ाफ़ा कर दिया होगा.

'इंडिया ग्रेट है और भारत महान'

फ़ेसबुक की एक बिरादरी में शामिल होने का न्यौता आया है, तक़रीबन एक हज़ार मेंबरों वाली बिरादरी का नाम है- 'इंडिया इज़ नॉट ए थर्ड वर्ल्ड कंट्री यू मैड्स'. इस फ़ेसबुक ग्रुप के मॉडरेटर चाहते हैं कि एक ग्लोबल अभियान चलाकर दुनिया को बताया जाए कि इंडिया एक पिछड़ा देश नहीं है.

इंडिया भला पिछड़ा देश कैसे हो सकता है, उसके उपग्रह अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे हैं, उसके पास परमाणु बम है, उसके सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के दम पर सिलकॉन वैली की चमक है, उसके डॉक्टरों के बिना यूरोप-अमरीका में लोग बेमौत मर जाएँ...

फ़ेसबुक ग्रुप का कहना है कि जो सहमत नहीं हैं वे अपने विचार अपने पास रखें और उन लोगों की ख़ुशी में ख़लल न डालें जो इंडिया की तरक़्क़ी का जश्न मनाना चाहते हैं. इस ग्रुप के मॉडरेटर चाहते हैं कि इंडिया को 'थर्ड वर्ल्ड' की सूची से हटाया जाए, दुनिया आख़िर और कितने सबूत चाहती है इंडिया की कामयाबी को लेकर.

इस ग्रुप के ज़्यादातर मेंबरों की उम्र 20 के साल के क़रीब है और वे 'इंडिया इज़ ग्रेट', 'नेक्स्ट सुपरपावर', 'आइ लव माइ ग्रेट इंडिया', 'अमेज़िंग इंडिया'....जैसे दूसरे ग्रुप्स के भी सदस्य हैं.

जिस तरह के जोश-जुनून और जज़्बे के साथ वे इंडिया को फ़र्स्ट वर्ल्ड में तत्काल कोटे से रिज़र्वेशन दिलाना चाहते हैं वह काफ़ी दिलचस्प है, वे इस बात को लेकर बहुत परेशान हैं कि भारत को यूएन सिक्यूरिटी काउंसिल की स्थायी सदस्यता क्यों नहीं मिल रही है या एच1बी वीज़ा को लेकर अमरीकी इतना भाव क्यों खा रहे हैं.

अपनी तरफ़ से ज़ोरदार रिसर्च करके इन लोगों ने साबित किया है कि इंडिया थर्ड वर्ल्ड कंट्री नहीं है, कई तरह के आंकड़े हैं जैसे इंडिया की ग्रोथ रेट, इंडिया की साइंटिफ़िक एंड एजुकेशनल सक्सेस, इंडिया के लोगों की दुनिया भर में शानदार परफॉर्मेंस, सबीर भाटिया, इंदिया नूई और विक्रम पंडित जैसे नामों की सूची....

मैं काफ़ी देर तक पसोपेश में रहा कि इस ग्रुप की सदस्यता की पेशकश करने वाले अपने मित्र से क्या कहा जाए, ग़रीबी-बेरोज़गारी, भुखमरी, पीने के पानी की कमी, स्कूल-अस्पतालों की बदहाली सब ख़त्म हो गए हैं क्या?

ख़ास वक़्त बर्बाद करने के बाद ख़याल आया कि वे इंडिया की बात कर रहे हैं और मैं भारत के बारे में सोच रहा हूँ. ये तो बिल्कुल ही दूसरी बहस है, इसमें किसे शक है कि इंडिया ग्रेट है और मेरा भारत महान है.

बलात्कार की सियासत

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|शुक्रवार, 17 जुलाई 2009, 14:53

टिप्पणियाँ (42)

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री मायावती और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा के बीच जो घमासान युद्ध हो रहा है क्या वाक़ई उस के पीछे उन गरीब दलित लड़कियों का दर्द् छिपा है जो बलात्कार का शिकार हुईं हैं?

जिन के आँसू पोछने के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार पच्चीस हज़ार रुपये दे रही है? जिनकी फरियाद सुनने के लिए पुलिस के महानिदेशक हेलीकाप्टर से गाँव गाँव जा रहे हैं...

और जिनसे रीता बहुगुणा का कहना है कि उनके बलात्कार के बदले यह रक़म कम है, इसे मायावती के मुँह पर फेंक देना चाहिए...

क्या वाक़ई यह कहानी इन मासूम और बेसहारा दलित लड़कियों के बारे में है? या उन्हें हमेशा की तरह इस राजनीतिक बिसात पर इस्तेमाल किया जा रहा है. और असल जंग दलित वोट के लिए है?

वह दलित वोट जिसने मायावती को उत्तर प्रदेश में बहुमत दिलाया और जिसके बग़ैर कांग्रेस को लगाता है कि वह केंद्र में अपने दम पर कभी सरकार नहीं बना सकती?

जवाब मुझे मालूम नहीं. और न ही यह मालूम है कि बलात्कार की मुनासिब क़ीमत क्या है-
पच्चीस हज़ार, पचास हज़ार, एक करोड़..?

कौमार्य से ज़्यादा भी कुछ ज़रूरी है

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|बुधवार, 15 जुलाई 2009, 12:49

टिप्पणियाँ (70)

एक लड़की का बचपन में ही उसके एक संबंधी ने बलात्कार किया.

मध्यमवर्गीय माता-पिता ने लोकलाज के डर से यह बात ज़ाहिर नहीं होने दी.

वयस्क होने पर मध्यप्रदेश के शहडोल समाज के ज़रिए उसकी शादी तय हुई. कौमार्य परीक्षण के दौरान वे घाव फिर कुरेदे गए जिससे लड़की और उसके माता-पिता बड़ी मुश्किल से उबर पाए थे.

यह एक काल्पनिक स्थिति है. लेकिन वास्तविक भी हो सकती थी.

अब ज़रा दूसरी ओर देखिए.

एक लड़का शादी से पहले अनगिनत औरतों से यौन संबंध बना चुका है.

उसे खुली छूट है कि वह किसी कुवाँरी लड़की को अपनी जीवनसंगिनी बनाए.

परीक्षण हो तो इस बात का हो कि लड़का या लड़की किसी यौन रोग से पीड़ित तो नहीं हैं.

उनके ख़ून की जाँच हो ताकि पता चले कि आने वाली पीढ़ी में किसी संक्रमण का ख़तरा तो नहीं है.

कौमार्य परीक्षण से क्या सिद्ध किए जाने का इरादा है?

क्या किसी विधवा, तलाक़शुदा, परित्यकता या बलात्कार की शिकार लड़की को अपना जीवन दोबारा बसाने का अधिकार नहीं है.

कौमार्य पर इतना ज़ोर क्यों?

समलैंगिकों, तुम्हें सलाम !

सुहैल हलीमसुहैल हलीम|सोमवार, 13 जुलाई 2009, 12:15

टिप्पणियाँ (61)

समलैंगिकता सही है या ग़लत, प्राकृतिक है या अप्राकृतिक, क़ानून के दायरे में है या बाहर,

इन सब सवालों पर तो दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद न जाने कबतक बहस जारी रहेगी.

लेकिन मैं एक बात विश्वास के साथ कह सकता हूं और वो ये है कि समलैंगिकता से प्यार और एकता बढ़ती है.

क्या समलैंगिकों में भी, ये तो मुझे नहीं मालूम, लेकिन उन लोगों में अवश्य जो कमर कस कर इसके विरूद्ध आ खड़े हुए हैं.

इसकी एक मिसाल बृहस्पतिवार को दिल्ली प्रेस क्लब में नज़र आई जब समलैंगिकों के ख़िलाफ़ एक दूसरे के सुर से सुर मिलाने के लिए हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई और जैन धर्मों के नेता एक ही मंच पर जमा हुए.

दुनिया में बड़े बड़े समुद्री तूफ़ान आए, सूनामी में लाखों लोग मारे गए, कितने ही बच्चे आज भी कभी दवा के बगैर तो कभी रोटी के बगैर दम तोड़ रहे हैं, कितनी औरतों की इज्ज़त हर घड़ी नीलाम हो रही है...लेकिन क्या आपको याद है कि हमारे धार्मिक नेता पिछली बार कब एक साथ इस तरह से एक मंच पर आए थे?

यह काम हमारे उन भाई-बहनों ने एक ही झटके में कर दिखाया, यौन संबंधों में जिनकी पसंद हम से ज़रा अलग है.

समलैंगिकों, तुम्हें सलाम !

शराब विरोधी होश न गँवाएँ

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ज़हरीली शराब पीकर मरना भारत में शायद सबसे बुरी मौत है. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि बहुत तकलीफ़ होती है, इसलिए भी कि इसके शिकार वैसी सहानुभूति के हक़दार नहीं जो दूसरी दुर्घटनाओं के होते हैं.

गुजरात में 100 से ज्यादा लोग ऐसी ही मौत मरे हैं, 150 से ज्यादा मौत से लड़ रहे हैं मगर जनता, मीडिया या प्रशासन की प्रतिक्रिया वैसी नहीं है, मिसाल के तौर पर, जैसी एक बड़ी रेल दुर्घटना के वक़्त होती है.

कुछ लोग तो रेल दुर्घटना से तुलना किए जाने पर ही बिफर सकते हैं, कहेंगे- 'और पियो, ठीक ही हुआ', 'गुजरात में तो नशाबंदी थी, किसने कहा था पीने को,' 'अच्छा हुआ, शराब पीने वालों को इससे सबक़ मिलेगा...' 'रेल में मुसाफ़िरों की क्या ग़लती है, शराबी तो अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं'...

ज़्यादातर लोगों का शायद यही मानना है कि ये लोग अकारण नहीं मरे हैं, मरने का कारण है- शराब पीना, जिसके लिए वे ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. अनाथ बच्चों का चेहरा भी दिलों को शायद उतना नहीं दुखा रहा है.

शराब को लेकर भारत के मध्यवर्ग में जितने पूर्वाग्रह और पाखंड हैं उनके ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कारणों की समीक्षा एक दिलचस्प विषय हो सकता है लेकिन इतना तो साफ़ दिखता है कि उच्च वर्ग और निम्न वर्ग दोनों में यह वर्जित तरल नहीं है.

सारी समस्या उस वर्ग की है जिससे मैं ख़ुद आता हूँ. शराब पीकर गँवाने के लिए निम्न वर्ग के लोगों के पास कुछ नहीं होता, अमीर आदमी को शराब पीने के लिए घर-बार बेचना नहीं पड़ता लेकिन मध्य वर्ग शराब को लेकर गहरी चिंता में घुलता जाता है.

मध्यवर्ग की अपनी जायज़ चिंताएँ हो सकती हैं मगर शराब से वह इतना आक्रांत है कि उसका असर उसकी मानवीय संवदेनाओं पर हावी दिखता है. 'शराबी के दो ठिकाने, ठेके जाए या थाने' या 'शराब करे जीवन ख़राब' जैसे स्लोगनों से परे देखने की उसकी क्षमता ख़त्म हो गई है, ठीक एक शराबी की तरह.

गुजरात का मामला बाक़ी देश से ज़रा अलग है क्योंकि वहाँ दशकों से नशाबंदी लागू है, बिल्कुल ईरान की तरह. शराब पीने वाले अमीर दमन-दीव, गोवा, महाराष्ट्र जाते हैं या दोगुने दाम वसूलने वाले एजेंटों से मनचाहे माल की सप्लाई लेते हैं. सिर्फ़ ग़रीब ऐसी मौत मरते हैं.

इन लोगों के परिजनों को मुआवज़ा नहीं मिल सकता क्योंकि वे शराब पीने के गुनहगार हैं, अनैतिक लोग हैं. सरकार कह रही है कि दोषी लोगों को पकड़ा जाएगा, पकड़ना ही होगा क्योंकि उन्होंने राज्य का नशाबंदी क़ानून तोड़ा है.

लोग कह रहे हैं कि गुजरात में 100 से ज्यादा लोगों की मौत 'नशाबंदी के बावजूद' हो गई जो एक गंभीर बात है, लेकिन इस बात पर बहस के लिए तैयार नहीं हैं कि यह घटना गुजरात में ही क्यों हुई, कहीं नशाबंदी ही इसकी एक वजह तो नहीं?

नशाबंदी कई मायनों में एक विवादास्पद पॉलिसी है. इस पर पूरा अमल नामुमकिन है, सरकारों को राजस्व का नुक़सान होता है, माफ़िया और बेईमान पुलिसवालों को कमाई का ज़ोरदार मौक़ा मिलता है और ज़हरीली शराब का कारोबार फैलता है...ज़ाहिर है कि नशाबंदी के पक्ष में भी अनेक तर्क हैं, यानी एक सार्थक बहस की गुंजाइश है.

ये भी मत भूलिए कि शराब पीना कुछ इस्लामी देशों और गुजरात को छोड़कर बाक़ी दुनिया में क़ानूनन अपराध नहीं है.

सिगरेट, गांजा, अफ़ीम, चरस बुरी चीज़ें हैं, जुआ भी, वेश्यावृति भी और न जाने कितनी बुराइयाँ जिनकी सूची अनंत है, शराब भी उन्हीं में से एक है.

शराब अगर एक समस्या है तो उससे निबटने के सार्थक और व्यवाहारिक प्रयास होने चाहिए, कोरे नैतिकतावादी-आदर्शवादी रवैए से सबका नुक़सान होगा, लोग सदियों से शराब पीते रहे हैं, आज भी पी रहे हैं और आगे भी पीते रहेंगे, इस तथ्य को स्वीकार किए बिना कोई कारगर नीति नहीं बन सकती.

ऊपर जो भी लिखा है उसके बारे में अगर आपका ये निष्कर्ष है कि मैं शराब पीने के पक्ष में हूँ तो मुझे ऐसा ही लगेगा कि आप नशे में हैं. जो लोग बहस के बीच में व्यक्तिगत सवाल उठाने के शौक़ीन हैं उनकी जानकारी के लिए सच बताना ज़रूरी है कि ठंडी बियर मुझे सुकून देती है.

अंत में एक सलाह-- गंभीर समस्याओं पर शराब या नैतिकता के नशे में नहीं सोचना चाहिए.

पानी में भी भेदभाव

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|गुरुवार, 09 जुलाई 2009, 09:30

टिप्पणियाँ (16)

हाल में मुंबई में फ्रांस से आये एक पत्रकार से मैंने पूछा कि पेरिस से यहाँ ज़िन्दगी कितनी अलग है? कोई तकलीफ तो नहीं?

उनका जवाब था कि उन्हें कोई ज़्यादा फ़र्क महसूस नहीं हो रहा है. कुछ देर सोचने के बाद उन्होंने कहा कि बिजली और पानी 24 घंटे उपलब्ध है शायद इसलिए. उनका कहना था कि वो भारत में बिजली और पानी की कमी के किस्से सुनकर इस से जूझने के लिए तैयार हो कर आए थे.

पांच साल पहले जब मैं लदंन में कई साल रहने के बाद मुंबई रहने आया था तो मुझे भी इस तरह का अनुभव हुआ था. लेकिन कुछ साल यहाँ रहने के बाद समझ में आया कि हम लोग उन कुछ लाख खुशनसीबों में से हैं जिन्हें पानी और बिजली 24 घंटे उपलब्ध हैं.

अगर आप मुंबई के उपनगरों में जाएँ तो वहां के लोग बताते हैं कि बिजली कई घंटे नहीं रहती और सुबह सवेरे उठकर पानी जमा न करें तो पीने और नहाने के लिए पानी दिन भर नहीं मिलता है.

अब शहर की महानगरपालिका ने पानी की सप्लाई में 30 प्रतिशत कमी कर दी है जिस से इन उपनगरों में पानी की किल्लत और भी बढ़ जाएगी.

लेकिन क्या अब उन प्रगतिशील मोहल्लों में रहने वालों को भी सुबह उठकर पानी जमा करना होगा? क्या उन्हें भी पानी की किल्लत महसूस होगी? मेरे विचार में नहीं.

अभी कल रात ही जब मैं घर लौटा तो हमारी बिल्डिंग सोसाइटी के अध्यक्ष ने कहा एक अच्छी खबर है. मैंने पूछा क्या फ्लैटों में रहने वाले कूड़ा करकट बिल्डिंग के बाहर न फेंकने के लिए तैयार हो गए हैं जिसके खिलाफ मैंने कई महीनों से अभियान छेड़ रखा है?

वो मुस्कुराए और बोले बिल्डिंग के अहाते में एक और मोटर लग गया है जिस से पानी की कमी के संकट से जूझा जा सकता है. मैंने कहा क्या हम पड़ोस वालों का हक नहीं मार रहे हैं, जवाब था पानी पर सब का अधिकार है.

अधिकार तो है लेकिन बराबरी का नहीं. जिन घरों और इमारतों के पास बोरिंग और मोटर के लिए पैसे हैं शायद उनपर पानी के सप्लाई में कटौती का कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा.

पानी में भी अमीरों और ग़रीबों के बीच भेद भाव आम है.

गे ग्लोबलाइजेशन का जश्न

अब से दसेक साल पहले तक लोग आँख मारकर कहते थे, "इनके शौक़ ज़रा अलग हैं." 'नवाबी शौक़', 'पटरी से उतरी गाड़ी', 'राह से भटका मुसाफ़िर' जैसे जुमलों में तंज़ था लेकिन तिरस्कार या घृणा की जगह एक तरह की स्वीकार्यता भी थी.

हमारे स्कूल में बदनाम मास्टर थे, हमारी गली में मटक-मटकर चलने वाले 'आंटी जी' थे, भारत की राजनीति में कई बड़ी हस्तियाँ थीं जिनकी 'अलग तरह की रंगीन-मिजाज़ी' के क़िस्से मशहूर थे लेकिन धारा 377 का नाम अशोक राव कवि के अलावा ज्यादा लोगों को पता नहीं था.

भारत ऐसा देश है जहाँ अर्धानारीश्वर पूजे जाते हैं, किन्नरों का आशीर्वाद शुभ माना जाता है, बड़े-बड़े इज़्ज़तदार नवाब थे जिनकी वजह से 'नवाबी शौक़' जैसे मुहावरे की उत्पत्ति हुई, वहीं छक्के और हिजड़े दुत्कारे भी जाते हैं.

ये सब अलग-अलग दौर की, अलग-अलग तबक़ों की, अलग-अलग सामाजिक संरचनाओं की बातें हैं लेकिन भारतीय चेतना में विवाह के दायरे में संतानोत्त्पति से जुड़े सर्वस्वीकृत विषमलिंगी सेक्स के इतर एक पूरा इंद्रधनुष है जिसमें सेक्स और मानव देह से जुड़े सभी तरह के रंग रहे हैं, उसकी बराबरी किसी और समाज में नहीं दिखती.

लेकिन नए मिलेनियम में ऐसा कैसे हुआ कि क्वीर, ट्रांसवेस्टाइट, ट्रांससेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, थर्ड सेक्स, ट्रैप्ड इन रॉन्ग बॉडी....न जाने कितने नए विशेषण अचानक हमारे बीच चले आए जिनका सही अर्थ ढूँढ पाना विराट यौन बहुलता वाली भारतीय संस्कृति के लिए बड़ी चुनौती बन गया.

नए मिलेनियम में ऐसा क्या था जिसने भारतीय समाज के भीतर चुपचाप बह रही समलैंगिकता की धारा को सड़कों पर ला दिया, गे प्राइड मार्च सिर्फ़ कुछ वर्ष पहले तक भारत में कल्पनातीत बात थी.

मेरी समझ से सिर्फ़ एक चीज़ नई थी वह है ग्लोबलाइज़ेशन.

'गर्व से कहो हम गे हैं' का नारा 1960 के दशक के अंत में अमरीका के स्टोनवाल पब से शुरू हुए दंगों से जन्मा और दो दशक के भीतर पूंजीवादी पश्चिमी समाज में एक मानवाधिकार आंदोलन के रूप में फैल गया, 1990 आते आते यूरोप और अमरीका में लगभग पूरी राजनीतिक स्वीकार्यता मिली लेकिन समाजिक स्वीकार्यता आज भी बेहद मुश्किल है.

दिल्ली हाइकोर्ट ने सहमति से होने वाले समलैंगिक यौनाचार को क़ानूनन अपराध की श्रेणी से हटा दिया तब जिस तरह का जश्न मना उससे यही लगा कि भारत में यही एक बड़ा मुद्दा था जो हल हो गया है, अब भारत दुनिया के अग्रणी देशों की पांत में खड़ा हो गया है.

निस्संदेह आधुनिक पूंजीवादी पाश्चात्य लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरुप यह न्यायसम्मत फ़ैसला है, जो जश्न मना रहे हैं उनमें सिर्फ़ एलजीटीबी (गे, लेस्बियन, ट्रांससेक्सुअल एंड बाइसेक्सुअल) समुदाय के ही लोग नहीं हैं, मेरे पढ़े-लिखे, विवाहित, बाल-बच्चेदार, फेसबुक वाले, मल्टीनेशनल वाले, शिक्षित-सभ्य सुसंकृत शहरी दोस्त भी हैं.

जश्न मनाने वालों से मुझे कोई शिकायत नहीं बल्कि उन्हें ही मुझसे है कि मैं इसे एक महान क्रांतिकारी घटना के तौर पर देखकर उनकी तरह हर्षित क्यों नहीं हो रहा हूँ.

मेरे दोस्तों, मेरा मानना है कि यह उन चंद सौ लोगों का दबाव था जो भारत को पश्चिमी पैमाने पर एक विकसित लोकतंत्र के तौर पर सेलिब्रेट करना चाहते हैं. जल्दी ही आप देखेंगे कि भारत में 'क्रुएलिटी अगेंस्ट एनिमल' को रोकने के लिए आंदोलन चलेगा, एक कड़ा क़ानून बनेगा और आप फिर जश्न मनाएँगे.

जब मैं छत्तीसगढ़ और झारखंड की लड़कियों की तस्करी, किसानों की आत्महत्या, आदिवासियों और दलितों के शोषण, भूखे बेघर बच्चों की पीड़ा का मातम मनाता हूँ, जब मैं उम्मीद की क्षीण किरण 'नरेगा' को लेकर उत्साहित हो जाता हूँ तब आप मेरे सुख-दुख कहाँ शामिल होते हैं.

आपस की बात

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|शनिवार, 04 जुलाई 2009, 12:07

टिप्पणियाँ (184)

वेबसाइट के बड़े फ़ायदे हैं.

मैं उन फ़ायदों की बात नहीं कर रही हूँ कि यह 24 घंटे अपडेट होता है, या आप जब चाहें अपनी सुविधानुसार इस पर ख़बरें पढ़ सकते हैं या तस्वीरें देख सकते हैं.

मैं इस फ़ायदे की बात भी नहीं कर रही हूँ कि सर्च इंजन में कीवर्ड डाल कर आप पुरानी सामग्री ढूँढ सकते हैं. यह भी नहीं कि इंटरनेट पर सर्फ़िंग करके आप एक नई वर्चुअल दुनिया की सैर कर सकते हैं.

मैं उस फ़ायदे की बात कर रही हूँ जो संपादक को मिलता है. यानी त्वरित प्रतिक्रिया, या इंस्टैंट फ़ीडबैक.

अब देखिए, अगर आप अख़बार के संपादक को पत्र लिखेंगे तो वह उसको कब मिलेगा, कब छपेगा या उस तक पहुँचेगा भी या नहीं.

लेकिन वेबसाइट पर आपकी प्रतिक्रिया तुरंत पहुँचेगी और उस पर अमल भी होगा. और आज तो आपकी फ़ीडबैक की बेहद ज़रूरत है.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम का यह अंक आपको समर्पित है. यह आपके सुझावों और परामर्श से ही संभव हो पाया है.

पहला पन्ना पहले की तरह जिस पर देश और दुनिया से जुड़ी महत्वपूर्ण ख़बरों को जगह दी गई है.

यह पन्ना आपको आकर्षित करेगा, यह मेरा दावा है. लेकिन अनुरोध है कि आप पहले पन्ने तक ही न रुकें बल्कि आगे भी बढ़ें.

भारत के पन्ने पर जैसाकि नाम से ज़ाहिर है, भारत पर केंद्रित समाचारों को तरजीह दी गई है. इसी पन्ने पर भारत के पड़ोसी देशों की ख़बरें भी उपलब्ध हैं.

खेल और मनोरंजन के पन्ने पहले की तरह लेकिन नए स्वरूप में आपके सामने हैं.

आपके सुझाव पर अमल करते हुए हमने विज्ञान और कारोबार के पन्ने फिर से शुरू करने का फ़ैसला किया. इन विषयों में रुचि रखने वालों को और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं रहेगी.

एक पन्ना है ब्लॉग और फ़ोरम का. बीबीसी संवादददाता अपने ब्लॉग के ज़रिए आपसे सीधे मुख़ातिब रहेंगे तो फ़ोरम में पाठकों को चुने गए विषयों पर अपनी राय व्यक्त करने का मौक़ा मिलेगा.

इंटरनेट की तेज़ी से विकसित होती हुई दुनिया में मल्टीमीडिया की भूमिका बहुत अहम हो गई है. तो एक नया पन्ना पूरी तरह मल्टीमीडिया को समर्पित है. उसे ज़रूर देखिएगा.

इसमें रेडियो कार्यक्रमों के ऑडियो, वीडियो और पाठको की भेजी तस्वीरों को स्थान दिया गया है.
पॉडकास्ट की सुविधा उपलब्ध कराने पर भी काम चल रहा है लेकिन वह अभी थोड़ा रुक कर.

एक बात और, आपमें से कई लोग कहते रहे कि कुछ पुराने लेकिन विशेष अवसरों से जुड़ी ख़बरें, फीचर्स को नए वेब पर भी शामिल किया जाए. आपकी इस इच्छा को ध्यान में रखते हुए हमने कोशिश की है कि कुछ ऐसी ही विशिष्ट प्रस्तुतियां नए ढंग और कलेवर के साथ आपके सामने दोबारा प्रस्तुत की जाएं.

तो देखिए बीबीसी हिंदी डॉट कॉम का बदला हुआ रूप और तुरंत अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराइए.

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झंडा और डंडा

क्या आपने तिरंगा ग़ौर से देखा है, ज़रूर देखा होगा. लेकिन कभी आप ने ये सोचने की तकलीफ़ उठाई कि कपड़े के तीन विभिन्न पट्टियों को क्यों जोड़ा गया था और फिर बीच में अशोक चक्र क्यों बना दिया गया.

जब पिंगली वेंकैया साहेब ने ये तिरंगा डिज़ाइन किया तो उन्होंने नारंगी पट्टी यह सोचकर ड्राइंग बोर्ड पर बिछाई होगी कि भारत का हर व्यक्ति अपने ज़मीर का जवाबदेह होते हुए बहादुरी के साथ हर तरह की क़ुर्बानी के लिए तैयार होगा.

लेकिन वेंकैया साहेब को क्या मालूम था कि नारंगी रंग का ये मतलब लिया जाएगा कि अपने ज़मीर के ख़ंजर से बहादुरी के साथ दूसरे को क़ुर्बान कर डालो.

फिर वेंकैया साहिब ने नारंगी पट्टी के साथ सफ़ेद पट्टी जोड़ी. उनका ख़्याल था कि सफ़ेद रंग सच्चाई और पवित्रता की निशानी है. पर उन्हें क्या मालूम था कि इस सफ़ेद पट्टी की छाँव में इतना झूठ फैलाया जाएगा कि वो सच लगने लगेगा.

फिर उन्होंने उस सफ़ेद पट्टी में 24 डंडों वाला नीला अशोक चक्र ये समझकर लगाया होगा कि हर व्यक्ति 24 घंटे ईमानदारी के साथ अपना काम निपटाकर खुद को और देश को आगे बढ़ाएगा. पर उन्हें क्या पता था कि उनके बाद के लोग इस अशोक चक्र को घनचक्र के तौर पर चलाएंगे.

फिर वैंकया साहिब ने हरी पट्टी यह सोचकर जोड़ी होगी कि सब इस तिरंगे के साए में फले फूलेंगे. लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस तिरंगे के साए में सिर्फ़ ताक़तवर फलेंगे और कमज़ोर सिर्फ़ फूलेंगे.

इसी तरह सीमा पार अमीरूद्दीन क़िदवई ने जब पाकिस्तान का परचम डिज़ाइन किया होगा तो वेंकैया साहेब की तरह क़िदवई साहिब के भी बड़े पवित्र ख़्यालात रहे होंगे. जैसे ये कि इस झंडे में अस्सी फ़ीसदी रंग हरा होना चाहिए जिससे ये मालूम हो कि इस मुल्क में बहुसंख्या मुसलमानों की है. मगर बेचारे क़िदवई साहिब को अंदाज़ा ही नहीं था कि इस हरे झंडे के तले मुसलमान से ज़्यादा सुन्नी, शिया, वहाबी, देवबंदी, बरेलवी और तालेबान फले फूलेंगे.

क़िदवई साहेब ने इस हरे रंग पर चाँद और तारा भी चढ़ा दिया. ताकि इस झंडे को उठाने वालों का सामूहिक विकास पूरी दुनिया चाँद सितारों की रौशनी की तरह देख सके. मगर क़िदवई साहेब को ख़बर नहीं थी कि जो क़ौम रमज़ान के चाँद पर एकमत न हो सकी वो विकास के चाँद को कैसे देख सकेगी.

क़िदवई साहेब ने हरे झंडे में एक पतली-सी सफ़ेद पट्टी का भी इज़ाफ़ा किया. जिससे शायद उनकी मुराद ये थी कि इस मुल्क में अल्पसंख्यक अमन-सकून के साथ रह सकेंगे. लेकिन क़िदवई साहिब ने जो झंडा डिज़ाइन किया उसमें एक कमी यह रह गई कि ये झंडा सफ़ेद पट्टी में डंडा दिए बग़ैर लहराया नहीं जा सकता. इस कमी का हर सरकार ने बहुत ख़ूब फ़ायदा उठाया.

कहने का मतलब ये है कि भारत और पाकिस्तान को अपने झंडे अब दोबारा डिज़ाइन करने चाहिए ताकि वो असल हक़ीकत और सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर सकें.

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