झंडा और डंडा
क्या आपने तिरंगा ग़ौर से देखा है, ज़रूर देखा होगा. लेकिन कभी आप ने ये सोचने की तकलीफ़ उठाई कि कपड़े के तीन विभिन्न पट्टियों को क्यों जोड़ा गया था और फिर बीच में अशोक चक्र क्यों बना दिया गया.
जब पिंगली वेंकैया साहेब ने ये तिरंगा डिज़ाइन किया तो उन्होंने नारंगी पट्टी यह सोचकर ड्राइंग बोर्ड पर बिछाई होगी कि भारत का हर व्यक्ति अपने ज़मीर का जवाबदेह होते हुए बहादुरी के साथ हर तरह की क़ुर्बानी के लिए तैयार होगा.
लेकिन वेंकैया साहेब को क्या मालूम था कि नारंगी रंग का ये मतलब लिया जाएगा कि अपने ज़मीर के ख़ंजर से बहादुरी के साथ दूसरे को क़ुर्बान कर डालो.
फिर वेंकैया साहिब ने नारंगी पट्टी के साथ सफ़ेद पट्टी जोड़ी. उनका ख़्याल था कि सफ़ेद रंग सच्चाई और पवित्रता की निशानी है. पर उन्हें क्या मालूम था कि इस सफ़ेद पट्टी की छाँव में इतना झूठ फैलाया जाएगा कि वो सच लगने लगेगा.
फिर उन्होंने उस सफ़ेद पट्टी में 24 डंडों वाला नीला अशोक चक्र ये समझकर लगाया होगा कि हर व्यक्ति 24 घंटे ईमानदारी के साथ अपना काम निपटाकर खुद को और देश को आगे बढ़ाएगा. पर उन्हें क्या पता था कि उनके बाद के लोग इस अशोक चक्र को घनचक्र के तौर पर चलाएंगे.
फिर वैंकया साहिब ने हरी पट्टी यह सोचकर जोड़ी होगी कि सब इस तिरंगे के साए में फले फूलेंगे. लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस तिरंगे के साए में सिर्फ़ ताक़तवर फलेंगे और कमज़ोर सिर्फ़ फूलेंगे.
इसी तरह सीमा पार अमीरूद्दीन क़िदवई ने जब पाकिस्तान का परचम डिज़ाइन किया होगा तो वेंकैया साहेब की तरह क़िदवई साहिब के भी बड़े पवित्र ख़्यालात रहे होंगे. जैसे ये कि इस झंडे में अस्सी फ़ीसदी रंग हरा होना चाहिए जिससे ये मालूम हो कि इस मुल्क में बहुसंख्या मुसलमानों की है. मगर बेचारे क़िदवई साहिब को अंदाज़ा ही नहीं था कि इस हरे झंडे के तले मुसलमान से ज़्यादा सुन्नी, शिया, वहाबी, देवबंदी, बरेलवी और तालेबान फले फूलेंगे.
क़िदवई साहेब ने इस हरे रंग पर चाँद और तारा भी चढ़ा दिया. ताकि इस झंडे को उठाने वालों का सामूहिक विकास पूरी दुनिया चाँद सितारों की रौशनी की तरह देख सके. मगर क़िदवई साहेब को ख़बर नहीं थी कि जो क़ौम रमज़ान के चाँद पर एकमत न हो सकी वो विकास के चाँद को कैसे देख सकेगी.
क़िदवई साहेब ने हरे झंडे में एक पतली-सी सफ़ेद पट्टी का भी इज़ाफ़ा किया. जिससे शायद उनकी मुराद ये थी कि इस मुल्क में अल्पसंख्यक अमन-सकून के साथ रह सकेंगे. लेकिन क़िदवई साहिब ने जो झंडा डिज़ाइन किया उसमें एक कमी यह रह गई कि ये झंडा सफ़ेद पट्टी में डंडा दिए बग़ैर लहराया नहीं जा सकता. इस कमी का हर सरकार ने बहुत ख़ूब फ़ायदा उठाया.
कहने का मतलब ये है कि भारत और पाकिस्तान को अपने झंडे अब दोबारा डिज़ाइन करने चाहिए ताकि वो असल हक़ीकत और सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर सकें.

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वुसतुल्लाह साहब, भारत और पाकिस्तान आपका डिजाइन किया हुआ झंडा अपना लेंगे; झंडे के बहाने आपने जो अनुत्तरित सवाल उठाए हैं, बस उनका जवाब भी अगले पोस्ट में दे दीजिए. क्यों की मर्ज़ तो किसी से छुपा नहीं, बस दवा की ज़रूरत है. सवाल तो कोई भी उठा सकता है, जवाब की ज़िम्मेदरी भी आप जैसे "थिंकटैंक" को लेनी चाहिए.
ख़ान साहब आप हमेशा समस्याओं का ही ज़िक्र करते हैं और कभी भी किसी समस्या के हल का कोई बेहतर तरीक़ा नहीं पेश करते. पत्रकारिता केवल समस्याओं को उजागर या उठाने का नाम नहीं है. समस्याओं पर भी कभी बात करें.
मेहरबानी करके भारत और पाकिस्तान का मुक़ाबला नहीं करें. पाकिस्तान के सिलसिले आपकी टिप्पणी सही हो सकती है लेकिन भारत के लिए नहीं. कृपया करके इन बातों का आप ख़्याल रखें.
अब आप साबित करने में लगे हैं कि आप भी अन्य बहुतेरे पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की तरह विषय ज्ञान से कोसों दूर हैं. इसमें आपका ज्यादा दोष नहीं है, क्या करें चीजों को पढने, परखने, व्याख्या करने का आपके पास अवकाश जो नहीं है. ज्ञान का विस्तार कीजिये तब चीज़ों पर टिपण्णी करें. उँगलियों को कीबोर्ड पर थिकराने से कुछ ना कुछ तो लिख ही जाएगा.
वुसत जी को हकीक़त का पता नहीं है ख़ासकर वो इंडिया के झंडे के बारे में. ये हमारे झंडे का डंडा बाहर निकालने की ग़लत कोशिश कर रहे हैं.
वाह खान साहब वाह !!
मैं तो आप की लेखनी का कायल हूँ. मैंने आप का ब्लॉग पढ़ा और कुछ "आतिराष्ट्रवादी" लोगों की प्रतिक्रियाएं भी. ब्लॉग तो हमेशा की तरह लाजवाब है इसलिए उस पर कुछ नहीं कहूँगा, लेकिन हाँ, अतिराष्ट्रवादी लोगों को जवाब जरूर दूंगा. लोग पूछ रहे हैं आप समस्याओं का जिक्र करते हैं कभी सुधारों की भी बात किया करें; तो मैं पूछता हूँ क्या इन लोगों को यह नहीं पता है की सुधार क्या होना चाहिए? मिसाल के तौर पर "घोटाले में फंसे नेता को वोट नहीं देना चाहिए, ट्रेन में बिना टिकट नहीं चलना चाहिए, जति और धर्म के नाम पर वोट मँगाने वाले को नकार देना चाहिए, पुलिस की गुंडा-गर्दी बंद होनी चाहिए, परीक्षाओं के पेपर लीक नहीं होने चाहिए, गुंडों को टिकेट नहीं मिलना चाहिए और जो पार्टी गुंडों को टिकेट दे उसका सामूहिक वहिष्कार होना चाहिए, कराची के मेयर को पानी के लिए आवाज उठा रहे लोगों से बदसलूकी नहीं करनी चाहिए, आदि आदि ".
वुसतुल्लाह साहब ! सवाल तो बहुत हैं लेकिन हमारे और आप के देश में भोली जनता किसी के उकसाने पर अपने तथाकथित अधिकारों के लिए हड़ताल करती है और अपनी ही 10-20बसें फूंक डालती है; लेकिन क्या उसे अपने कर्तब्य का जरा भी ध्यान नहीं होता है ?. तो मेरे "आतिराष्ट्रवादी" भाई !! अधिकारों की बात करने से पहले अपने कर्तव्य ठीक कर लो बहुत कुछ ठीक हो जायेगा.
भाई साहब आप हद से थोड़ा आगे जा रहे हो. इस देश में बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है. अपना ज्ञान पाकिस्तान में बांटें तो बेहतर होगा. मेरे ख्याल से अगर आज मुसलमान कहीं सबसे सुखी हैं तो वो हिंदुस्तान में है. लेकिन क्या पाकिस्तान में हिंदू सुरक्षित हैं. क्या उनके ऊपर जज़िया नहीं लगाया जा रहा. हिंदुस्तान में दो बार मुस्लिम राष्ट्रपति हुए और पाकिस्तान तालिबान की फैक्ट्री पर अमरीका का दुमछल्ला बना हुआ है. कृपया राजनीतिक और सांप्रदायिक बातों से अपनी लेखनी को तकलीफ़ न दें.
मैं किसी तरह भारत और पाकिस्तान की तुलना को मुनासिब नहीं समझता.
बहुत अच्छा.. शुक्रिया.
मेरे प्यारे राष्ट्रवादी भाई, आप हमेशा ही किसी न किसी समस्या को दूसरी तरह से उठाते हैं और इसके सिवाय कुछ नहीं करते. उदाहरण के लिए ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए. लेकिन ऐसा कैसे होगा, इस बारे में कुछ नहीं. एक ब्लॉग भर लिख देने से या एक समस्या उठा देने से ही हल नहीं निकलता. इसके लिए हमें हल के बारे में भी बात करनी होगी. दूसरी बात यह कि हम जानते हैं कि खानसाहब महान पत्रकार हैं लेकिन हम इन मुद्दों और समस्याओं के हल के बारे में भी उनकी राय जानना चाहते हैं. किसी भी विषय के बारे में खान साहब और दूसरे लोगों के विचारों, दृष्टिकोण और बात करने के तरीक़े में बहुत अन्तर है. कृपया खान साहब के प्रवक्ता बनने की कोई कोशिश न करे, धन्यवाद.
ये क्या है ....आप ये झंडे का प्रॉब्लम कहा से ले आये ...इतनी ही सोचने वाली बात है तो फिर हर देश के झंडे के बारे में विश्लेषण की किताब क्यों नहीं लिखते और अगर झंडे से ही किसी देश की प्रॉब्लम सोल्व हो रही होती तो आप ही डिज़ाइन कर दीजिये. वसुत जी, चाहे आप झंडा डिज़ाइन कर लीजिये या किसी भी डिज़ाइनर से डिज़ाइन करवा लीजिये. आप जैसे ही जर्नलिस्ट्स उस झंडे की हालत ख़राब कर देंगे. और अगर ये व्यंग्य है तो प्लीज़ झंडे पर तो मत कीजिये. धन्यवाद्
मैंने वुसतुल्लाह ख़ान साहब के ख्यालात पढ़े. बहुत अच्छा लगा. उनका नज़रिया है, चूंकि सृजनशील हैं, रचनात्मक हैं, इसलिए उनके पास एक सोच है. अच्छी बात है. और, उन्होंने जो कुछ लिखा है, उसमें कोई गलत बात तो नहीं है. हकीकत ही है. लेकिन, जब मैंने कमेंट पढ़ा, तो लगा कि भारतीयों का वैचारिक क्षय अनुमान से कहीं ज्यादा हो चुका है. 90 फीसद टिप्पणीकारों ने मानसिक रूप से धर्मान्ध या कहें कि अतिराष्ट्रवाद की धारा में बहकर बक-बक कर दी है. मुझे लगता है कि जिसने पूरा पढ़ा भी नहीं होगा वुसतुल्लाह ख़ान साहब के विचार, उसने में भर-भर घड़े उन्हें कोसा है. असल में किसी की हठधर्मिता और मानसिक दीवालियेपन को इन दिनों काफी अच्छा फोरम मिल रहा है. विभिन्न साइटों-ब्लॉगों में टिप्पणी बाक्स के रूप में, जीवन में कभी कुछ न कर पाए लोग, पूरी तरह से हताश, निराश और कुंठित लोगों की जमात ही खुद को राष्ट्रवाद की प्रचंड लहर में तैरता दिखाने की कोशिश में जुटी हैं. भई, राष्ट्रवादी रहिए, कौन मना किया है, लेकिन मानसिक और वैचारिक खोखलेपन को सामने लाकर राष्ट्र का ही अपमान क्यों कर रहे हैं. मेरा दावा है कि नब्बे फीसद भारतीयों से अगर चलते-फिरते पूछ दिया जाये कि बताइये तो-भारत का राष्ट्रध्वज किसने बनाया था, तो वे बगले झांकने लगेंगे. टिप्पणीकारों को अगर यकीन न हो, तो वे यही सवाल अपने घर में पूछ कर देख लें, और फ्रस्ट्रेशन में आ जाएंगे.
साहब बड़े बे आबरू हो कर तेरे कूंचे से हम निकले. आप से ऐसी उम्मीद न थी. भला झंडे से ऐसी दुश्मनी. पर मैं क्या कहूँ, रंग के मायने तो कोई आपसे सीखे. माना कि हमारे देश में बड़ी ख़ामियाँ हैं पर इन ख़ामियों से बहुत सारे देश जूझ रहे हैं. आप किसी और विषय पर ध्यान दें तो अच्छा रेहगा.
नदीम अख्तर जी. रचनात्मकता अच्छी बात है लेकिन जो यहाँ लोगों ने लिखा है वो कोई ग़लत भी नहीं है. आपने ये सही कहा कि लोगों ने फ़्रस्ट्रेशन में लिखा है, ये बिल्कुल सही है क्योंकि बीबीसी हिंदी पर आम उपन्यास की तरह शब्दजाल वाले लेख लोगों को अच्छे नहीं लगे.. लेकिन अगर आपको पाठकों की प्रतिक्रिया से कुछ तड़प हो रही है तो मुझे आपका फ़्रस्ट्रेशन किसी और कारण से लग रहा है...और रही बात झंडा की जानकारी की, तो मेरे भाई, क्या आपको ये पता है कि झंडे का पहला रूप कहाँ लहराया गया था और किस किस जगह मान्य था? बताओं भाई अब कहाँ चले गए अगर इस बात पर आप बंगलें झाँक रहे होगे. भाई ये समय शब्दों में उलझने का नहीं है बात सीधी होगी तो सर्वमान्य होगी. ऐसी जनरल नॉलेज का बचकाना उदाहरण देकर आप अपने ही मानसिक स्तर को गिरा रहे हैं. और दिवालियापन आपकी तड़प में दिख रहा है जो एक झंडे के जनरल नॉलेज को ढाल बनाकर सीधी बात कहने वालों को ग़लत साबित करने में लगे हैं. लोगों ने ये शब्दजाल बहुत जगह देखा है अब लोग सीधी बात पढ़ने और सुनने में यकीं रखते हैं. खासकर राजनीति और देश के बारे में. ये ऐसी चीज़ है जिससे आप और हम जैसे लोगों के भविष्य पर सीधा असर पड़ता है और मुझे ख़ुशी है कि भारत में अभी भी ऐसे लोग है जो इन चीजों में आर्ट को नहीं देखना चाहते और सीधी बात कहना और सुनना पसंद करते हैं इसीलिए शायद भारत अपने पड़ोसी देश से कही बेहतर है.
खान साहब, आपके कॉलम के दीवानों की कोई कमी नहीं है मानना पड़ेगा. आपके खिलाफ़ कोई बोले उसकी ये हिम्मत? कोई मानसिक दिवालियेपन का सर्टिफ़िकेट दे रहा है. कोई भारी भरकम शब्दों का प्रयोग करके लिखने वालों के जीवन स्तर की बात कर रहा है. मतलब यही कि जो हमारी सी सोच नहीं रखतो वो काफ़िर है. बदमिजाज़ है. सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है फिर ये अतिवादी सोच क्यों? पर सालो की जमी जमाई सोच है, जाने में वक्त लगेगा. पर एक बात तो है खान साहब आप संकेतों का बहुत बेहतर इस्तेमाल करते हैं. आपके नए ब्लॉग का इंतज़ार रहेगा.
अभी जी, आपने तो एक्सट्रीम फ्रस्ट्रेशन का परिचय दे दिया, शायद आपको मालूम नहीं कि मेरा सवाल सिर्फ जनरल नॉलेज नहीं था, बल्कि मैंने केवल मानसिक स्तर के आकलन का एक ज़रिया बताया था. वैसे आपको पता हो या नहीं, मैं बता दूं कि भारत के लिए पृथक झंडे की प्रस्तावना सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद की एक अनुयायी सिस्टर निवेदिता ने किया था. वह वर्ष 1904 था. वुसतुल्लाह ख़ान जी को हिदायत देने से बेहतर है कि हम लोग अपने भीतर झांकें. मुंह में राम-राम, बगल में छुरी..ऐसा कब तक चलेगा. अरे हिम्मतवर लोगों को शब्दबाण की जरूरत नहीं होती. आपको भले ही दूसरों को गाली देने में मज़ा आता होगा, लेकिन यकीन मानिये बुद्धिजीवियों को गाली देने से भारत या पाकिस्तान में खुशहाली नहीं आयेगी. मैं मानसिकता बता दूं. विभिन्न साइटों-ब्लॉगों में असंख्य विषयों में से हाल में सबसे गर्म विषय रहा लिब्रहान आयोग. इस पर आप जैसे ही अतिउत्साही लोगों ने रिपोर्ट आने के समय पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया है. अब बताइये, कोई सकारात्मक काम हो, तो आप लोग को तकलीफ़ है. नकारात्मक हो, तो आपलोग रोयेंगे. आप जैसे कुंठित लोग आखिर किस दिन चैन पायेंगे. कोई काल सुनिश्चित है कि नहीं?
वाह खान साहब, आपने बिलकुल सही फ़रमाया है. क्योंकि जो सच है वो सच है और इस चीज़ पर आरोप प्रत्यारोप लगाने से कुछ नहीं होगा. सच को स्वीकार करना ही होगा.
वाह साहब वाह, लगे रहिए और हक़ीक़त दिखाते रहिए. ये तो हक़ीक़त ही है न और इसमें ग़लत क्या है.....देश चूल्हे में जा रहा है और फिर भी हम हक़ीक़त को पढ़ना और देखना नहीं चाहते. तो उसका समाधान क्या ख़ाक करेंगे.....शाबाश साहब, चिंगारी आज नहीं तो कल भड़केगी.
आपमें से ज़्यादातर लोग आलोचना की आलोचना कर रहे हैं. मैं खान साहब की हाईलाइट्स से काफ़ी प्रभावित हूँ. मैं पाठकों से अनुरोध करता हूँ कि जब चाय पी रहे हों तो कॉफ़ी की गंध की उम्मीद न करें.
नदीम जी, वैसे मेरा प्रश्न "भी" जनरल नॉलेज का नहीं मानसिक स्तर के आंकलन का एक उदाहरण था, जिसका जवाब देकर आपने अपनी सोच का परिचय दे दिया. नदीम जी आप घूम फिर कर लिब्रहान और बाबरी मस्जिद को बीच में ले आये. मैंने इसकी तो कोई बात भी नहीं की. अगर आप सच में अच्छे मन से सोचना चाहते हैं तो उदाहरण और बातें भी ऐसी करें जिससे लगे कि आप भी भला ही चाहते हैं भारत का, न कि किसी एक पक्ष के लिए धर्मांध हो कर. हो सकता है कि आप मन से अच्छे हों लेकिन यदि आज किसी गुट में ऐसी धर्मान्धता है जो देश को भी नहीं समझते तो शायद आप उन लोगों को जागरूक कर सकते हैं. मैं नहीं कहता कि दूसरा पक्ष पूरी तरह से दूध से धुला है लेकिन सारे विश्व के स्थिति और प्रमाण देखें तो जो इमेज (हो सकता है ग़लत इमेज) बन गयी है उसको आप जैसे पढ़े लिखे लोग, जिन्होंने जीवन में कुछ पा लिया है, ही ठीक कर सकते हैं.
और जहाँ तक सवाल है शब्दजाल का.. तो उसका सहारा आपने लिया, मैंने नहीं. इस ब्लॉग में भी शब्दों का ही हेर फेर है. और मुह में राम और बगल में छुरी की कहावत कहाँ सटीक बैठती है और किसको इसका समाधान निकलना चाहिए ये सभी जानते हैं. मैं इस पर तर्क देकर किसी का दिल नहीं दुखाना चाहता. जिनको लग रहा है कि लोग हकीकत से आँखे बंद कर लेते हैं ऐसा नहीं है आँखे खुल रही हैं, धीरे ही सही लेकिन चल रहे हैं. पाकिस्तान की तरह ख़ुद को गर्त में तो नहीं धकेल रहे हैं. विकसित देश बनना चाहते हैं और अभी तक जो किया है वो इतना ज्यादा निराशाजनक भी नहीं है. आशा करता हूँ कि मेरी बात बुरी नहीं लगी होगी. मैं समस्याओं से मुह मोड़ने के पक्ष में नहीं हूँ, ब्लॉग में सीधी बात को घुमा फिरा कर पेश किया है और झंडा परिवर्तन की जो बात है मेरा विरोध उसी से है. ब्लॉग में झंडे का उदाहरण देकर जो समस्याएँ गिनाई गयी हैं वो आज देश का हर आदमीं भुगत भी रहा है और समझ भी रहा है. तो इसमें मुह मोड़ने वाली कोई बात नहीं है.
अभि और नदीम बाबू,
ये जो तुम बहसिया रहे हो,
क्या ग़म है जिसको छिपा रहे हो.
कहो ना खुल कर वो बात दिल की
जो तुम न कह कर, न कह पा रहे हो.
अब्दुस सलाम बाबु,,
कही जो है बात वही, नया इसमें कुछ भी नहीं
उनको झंडा बदलना है, आखिर क्यों, ये समझना है,
मुझे दोष दिए जा रहे हो, ये बात आप क्यों नहीं समझ पा रहे हो?
बात झंडे की चल रही थी, वो कुछ और कह गए
फिर विषय से वो भटक गए, क्या अब आप समझ गए?
वुसत साहिब आपका ब्लॉग भी पढ़ा और पाठकों की प्रतिक्रिया भी. आपने जो झंडे को दोबारा डिज़ाइन करने की बात कही है मैं उससे सहमत नहीं हूँ. ये प्रतीक है अखंड भारत का. ये प्रतीक है उन करोड़ों मेहनतकश मज़दूरों, किसानों और दबे कुचले लोगों का जो ऐसी झंडे तले अपने ग़ुलामी के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए थे, उन्होंने ऐसा अपनी एकजुटता का प्रतीक बनाया. लेकिन इस समय लोग शारिरीक रुप से आज़ाद हैं लेकिन मानसिक रुप से ग़ुलाम है. इसलिए हमें आजकल इस झंडे की ज़रूरत नहीं है. इसे बदलने की नहीं ख़ुद को रीडिज़ाइन करने की ज़रूरत है.
मेरे दोस्तों !!
नदीम भाई, अब्दुल, अर्चना और अभय सिंह जी जो कह रहे हैं बिल्कुल सही कह रहे हैं. अरे भाई !! ख़ान साहेब ने क्या किया, बस झंडे का प्रतीक लेकर आपको अपने देश की समस्या समझा दिया. अब आप उसे सुधारें या ना सुधारें यह आपके ऊपर निर्भर करता है. जहाँ तक झंडा बदलने की बात है तो ख़ान साहब का इशारा "झंडा बदलने" का बिलकुल नहीं है, मेरे ख्याल से उनका मतलब यह है की आप अपनी कमियों को दूर करें ताकि आप के झंडे में दिए प्रतीकों का मतलब बना रह सके.
और हाँ, अब्दुल सलाम भाई आप ने तो "गागर में सागर" भर दिया, बस चार लाइन और सब कुछ कह दिया, सुभान अल्लाह.
कुछ लोग होते हैं जो सामाजिक कुरीतियों पर बनने वाली फ़िल्मों पर भी प्रदर्शन और हंगामा शुरू कर देते हैं, मैं देख रहा हूँ यहाँ भी कुछ लोग ऐसे हैं. बस मैं कहूँगा हाथ से हाथ और कन्धा से कन्धा मिलाकर देश और समाज के लिए काम करो और झंडे के मतलब को चरितार्थ करते रहो.
मेरे दोस्तों !! ऐसी बहस में बढ़-चढ़ हिस्सा लो, और लिखते रहो "सटीक और बेबाक".
अवी मैं आपकी बात से सहमत हूँ.
जो लोग अतीत और बाबरी मस्जिद की बात कर रहे हैं वे लोग वास्तव में निराश लोग हैं या गंदे राजनीतिज्ञ हैं. पिछले 61 साल में भारत ने राष्ट्र के रुप में जो हासिल किया है वो क़ाबिले तारीफ़ है. और हम सब इस बात से सहमत हैं कि भारत सभी धनी मुस्लिम देशों से अधिक विकसित देश है. हम जानते हैं कि हम अभी हम सौ प्रतिशत विकसित नहीं हैं लेकिन हम सब उससे बहुत दूर नहीं हैं.
वुसत साहिब. मैं आपकी लेखनी को पसंद करता हूँ और आपका ये ब्लॉग पाकिस्तान के लिए ज़्यादा सटिक है. क्योंकि इस समय भारत और पाकिस्तान की तुलना अर्थहीन है. आपके लिए अच्छा हो कि आप पाकिस्तान की तुलना बांगलादेश से करें या तीसरी दुनिया के अन्य देशों से.
आप हमारे झंडे की बेइज़्ज़ती कर रहे हैं. आप जो भारत और भारत के झंडे के बारे में कह रहे हैं वो ग़लत है. आपको झंडे का अर्थ मालूम नहीं है. मैं अपने देश और मातृ भूमि के लिए जान दे सकता हूँ.
उमेश जी, सुझाव के लिए धन्यवाद, ब्लॉग के मुख्य लिंक पर लिखा है.
"भारत-पाकिस्तान के झंडे जिस नज़रिए से बने थे, कहां है वो बात. क्यों न बदले दें ये झंडे."
और ब्लॉग के अंत में भी लिखा है.
"कहने का मतलब ये है कि भारत और पाकिस्तान को अपने झंडे अब दोबारा डिज़ाइन करने चाहिए ताकि वो असल हक़ीकत और सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर सकें."
यदि ब्लॉग में सिर्फ़ ये लिखा होता की "भारत और पाकिस्तान को अपने झंडे अब दोबारा डिज़ाइन करने चाहिए" तो मैं आपकी बात से जरूर सहमत होता लेकिन "ताकि वो असल हक़ीकत और सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर सकें." ये अतिरिक्त वाक्य आपकी बात को ग़लत कर रहा है और किसी से भी पूछिये इस वाक्य का वो मतलब नहीं निकल रहा है जिसे आप समझ रहे हैं. हर बात को एडजस्ट और हज़म कर लगे तो कुछ नहीं हो सकता भाई. कहने का मतलब ये की ग़लत लगा तो ग़लत बोलो..."होता है..चलता है...ये सोचा होगा..वो सोचा होगा" ये सबसे आज तक कुछ नहीं हुआ. ख़ान साब से कोई प्रॉब्लम नहीं है लेकिन जो स्पष्ट लिखा है उसमें अपने मन से कुछ भी मतलब नहीं निकल सकते न भाई. मतलब तो इसका कुछ भी लगाया जा सकता है आप पक्ष में मतलब लगा रहे हैं और कुछ लोग विपक्ष में.
लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें सब हज़म करने की आदत पड़ जाती है, वो भी मैं देख रहा हूँ.
और वैसे भी मैंने अपनी राय इसी विषय पर दी थी लेकिन लोग इसमें भी अति राष्ट्रवादिता, कुंठा, लिब्राहन, और न जाने बात को किस विषय पर ले के चले गए इसीलिए मैंने आगे बोलने की हिमाकत की. ये मैं भी जनता हूँ की इस ब्लॉग की वजह से झंडा नहीं बदल जाएगा.
वुसत साहब, आप हमारे झंडे की बेइज़्ज़ती कर रहे हैं. आप जो भारत और भारत के झंडे के बारे में कह रहे हैं वह ग़लत है. आपको झंडे का अर्थ मालूम नहीं है. मैं अपने देश और मातृ भूमि के लिए जान दे सकता हूँ. भाई साहब, आप हद से थोड़ा आगे जा रहे हैं. इस देश में बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है. अपना ज्ञान पाकिस्तान में बांटें तो बेहतर होगा. मेरे ख़्याल से अगर आज मुसलमान कहीं सबसे सुखी हैं तो वे हिंदुस्तान में हैं लेकिन क्या पाकिस्तान में हिंदू सुरक्षित हैं? क्या उनके ऊपर जज़िया नहीं लगाया जा रहा है. हिंदुस्तान में दो बार मुस्लिम राष्ट्रपति हुए और पाकिस्तान में ?
मैंने जितना पढ़ा है, उनमें से यह एक बेहतरीन लेख है. हर वाक्य अपने आप में बहुत गूढ़ अर्थ लिए हुए है. बीबीसी किसी पत्रकार की राष्ट्रीयता नहीं बताता है. पाकिस्तान के गेंदबाज़ वासिम अकरम भारतीय गेंदबाज़ों को प्रशिक्षित कर रहे हैं लेकिन उनके बारे में कभी नहीं लिखा जाता है. मैं पाकिस्तान के स्याह पक्ष को कभी नहीं देखना चाहूँगा क्योंकि एक भारतीय होने के नाते अपने स्याह पक्ष को दूर करना मेरी पहली ज़िम्मेदारी है.
नदीन जी, मुझे लगता है कि आप भारत को बहुत अधिक नहीं जानता है, कृपया पहले आप अपनी जानकारी बढाएँ और तबतक चुप रहें, वुसत साहब आप से भी अनुरोध है कि जिस विषय पर आप नहीं जानते हैं कृपया उस विषय पर न लिखें.
ख़ान साहब, देख रहें हैं आप कि भरत के कितने चाहने वालें है आपके. शायद इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा आपको, आपने सोचा होगा कि इस देश के लोग जहाँ 'निंदक नियरे राखिए' जैसे वाक्य बडे ही गर्व से बच्चों को सिखाते हैं, अमल भी करते होंगे. हम अमल करते हैं लेकिन देश और धर्म के बारे में कोई कुछ बोले और ख़ासकर के एक मुसलमान जो कि पाकिसतान का रहने वाला है तब तो भाई कहर ढा देते हैं हम, हम भारतीय हैं, खान साहब! इस देश का हर नागरिक अपनी भारत माता से इतना प्यार करता है जितना वो अपनी सगी माँ से भी नही करता.
वुसत भाई, हमारी समस्याओं को झंडे के माध्यम से दिखाने के लिए धन्यवाद. समय की ज़रूरत यह है कि हम सब अपनी ग़ल्तियों को देखें, केवल नेताओं को दोष देने से क्या होगा. हम जहाँ भी हैं और जो कुछ काम कर रहे हैं, उसे अगर पूरी ईमानदारी से करें तो शायद वुसत भाई यह नहीं लिख पाएँगे. जो कुछ भी हो रहा है, उसमें हम बराबर के भागीदार हैं. हम तभी लड़ते हैं जब हमपर अत्याचार होता है. पड़ोसी के मामले में हम चुप ही रहते हैं. ऐसी ख़ामोशी से देश नहीं बनता है. देश के लिए जाने दे देंगे, केवल यह लिख भर देने से कुछ नहीं होगा. क्या जब आपके पड़ोसी सरकारी दफ़्तरों में अपनी पेंशन के लिए घूस दे रहे थे तो आपने उनके लिए कुछ किया, जब कर्मचारी काम पर नहीं आया, तो आपने क्या किया. अगर हमने कुछ नहीं किया तो हम किसी और से ईमानदारी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. वुसत भाई को उनके विचारोत्तेजक लेखों के लिए शुक्रिया. मुझे लगा था कि वे चुनाव के बाद चले जाएँगे, यह सोचकर मैं निराश हो गया था लेकिन उनका लिखा पढ़कर ख़ुशी हो रही है.
दोस्तों, हमारा तिरंगा अच्छी सोच और हिसाब से बनाया गया है और हम लोग अपने देश को अच्छा बनाने में लगे ह्ए हैं. इसके लिए हमें पहले भारतीय बनना होगा और धर्म-जाति स ऊपर उठाना होगा. देश के बारे में सोचना हमारा आंतरिक मामला है यह अधिकार किसी और को नहीं है.
क्षमा करें पर, ख़ान साहब का यह विश्लेषण बेतुका लगा.
क्या हम केवल इसलिए ख़ान साहब को ज़लील कर रहे हैं कि वे पाकिस्तान से हैं. बुद्धिजीवी या पत्रकार का कोई राष्ट्र और धर्म नहीं होता है. सच दिखाया तो गुस्सा मत किजीए. झंडों को केवल प्रतीक बनाकर ख़ान साहब ने सारी गाथा लिख डाली है, यह भी तो देखिए.
दोस्तों, वुसत भाई में अकेले पाकिस्तान की कमियाँ गिनाने का दम नहीं है. इसलिए बार-बार वे अपने ब्लॉग में भारत को हाईलाइट कर पाकिस्तान के बारे में लिखते हैं. थोड़ा सा ही सही अगर वे सिर्फ़ पाकिस्तान के बारे में लिखते तो शायद हमलोग हमेशा के लिए उनके लेख पढ़ने को नहीं मिलते या उनकी पत्रकारिता की दुकान कब की बंद हो चुकी होती. मेरा मानना यह है कि पहले ही भारत में बहुत सी कमियाँ हैं पर इसकी तुलना पाकिस्तान से करना केवल पाकिस्तान के लोगों को अच्छी लगेगी. जबकि सच्चाई यह है कि दोनों देशों की तुलना अब बेमानी है. उम्मीद है कि अब आप केवल पाकिस्तान के बारे में ही लिखेंगे.
आदरणीय अभी जी, या तो आप समझना नहीं चाहते, या फिर समझ कर भी नामसझ बने रहना चाहते हैं. अगर आपको लेखक से खुन्नस है, तो मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहूँगा, लेकिन अगर आपको लेख के कंटेंट पर कोई ऐतराज़ है, तो ज़रा बुद्धिजीवियों की तरह समझने की कोशिश कीजिए. लेखक ने अपने लेख में झंडे को बदलने की जो प्रतीकात्मकता प्रस्तुत की है, वह वास्तविक मुद्दों को बदलने की ओर इंगित करने की एक लेखन कला है. क्या आप ऐसा समझ सकते हैं कि किसी संप्रभु राष्ट्र के ध्वज को कोई मानिंद लेखक उस राष्ट्र की कथित बदकारियों पर आधारित होकर पुनः डिजाइन करने की सलाह देगा. आखिर कहाँ गया है मेरे देश के लोगों का मानसिक स्तर. अरे भई वुसतुल्लाह ख़ान साहब ने तो झंडे के बहाने अपने देश में और पड़ोसी देश में बरपाए जा रहे क़हर को रेखांकित किया है. क्या आप इस बात से इत्तेफाक़ नहीं रखते कि हमारे देश में विभिन्न वर्गों के साथ अन्याय हुआ है और आज भी सामंती प्रताप कहीं से भी सर्वहारा को टिकने नहीं देना चाहता. क्या क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर राष्ट्र के साथ अपराध के अनगिनत मामले आप हर रोज़ नहीं देख-सुन-पढ़ रहे हैं? क्या आप इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि समाज में एक वर्ग ऐसा है, जो दूसरे की रोटी अपनी अलमारी में बंद कर रहा है? क्या इन्ही मूल्यों के साथ तिरंगे को डिजाइन किया गया था? नहीं, ऐसे घृणित कृत्यों की तो सोच भी नहीं होगी, उस वक्त. प्रतीक थे खुशहाली के, न कि आंसुओं के. अगर कोई लेखक कहता है कि प्रतीक बदल डालो, झंडे को रिडिजाइन करो, तो कम से पढ़े-लिखे लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि लेखक व्यथित मन से ऐसे उदगार उवाच रहा है. उसकी सहानुभूति राष्ट्र और मानव कल्याण में निहित है, लोभ में नहीं. यही वजह है कि राष्ट्र के प्रतिक को बदनाम कर रहे कृत्यों को सुधारने की सलाह दी गई है न कि झेंडे को ही. झंडा प्रतीक है अभी जी, झंडा सिर्फ़ प्रतीक है.
झंडे के ऊपर टिप्पणी करने से पहले उस पर ठीक-ठीक जानकारी हासिल कर लिया करें. भारत के झंडे में सबसे ऊपर का रंग नारंगी नहीं केसरिया है. अगर इतनी सी शोध करने की ज़हमत नहीं उठा पाते हैं तो कृपया न लिखा करें.
ख़ान साहब, मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ कि क्या पाकिस्तान जैसे हालात ही भारत के हैं. आप अपने ब्लॉग में हमेशा समस्याओं की ही बात क्यों करते हैं. कभी समाधान क्यों नहीं बताते हैं. आप भारत की तुलना पाकिस्तान से न करें तो बेहतर होगा.
ख़ान साहब आपका ब्लॉग हमेशा की तरह शानदार है. अब समय आ गया है कि हम सच्चाई से मुँह छिपाना और एक-दूसरे पर आरोप लगाना छोड़ दें. देश और समाज की प्रगति के लिए सोचें. हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने बच्चों को किसी तरह का देश विरासत में देना चाहते हैं.
हम लोगों में यही परेशानी है कि हम ग़ैर ज़रूरी बहस में उलझ जाते हैं. यह वह वर्ग है जो चाय के प्याले में तूफ़ान खड़ा कर सकता है लेकिन यथार्थ के धरातल पर वह कभी वोट देने नहीं जाता है.
प्रिय नदीम जी, अच्छा लगा की आपने इस बार विषय पर ही बात की.
एक उदाहरण देना चाहता हूँ. अगर साम्प्रदायिकता के उपर कोई लेख लिखे और उसमे आखिरी वाक्य ये हो
"कहने का मतलब ये है कि भारत और पाकिस्तान को अपने धार्मिक किताबे अब दोबारा लिखनी चाहिए ताकि वो असल हक़ीकत और सच्चाई का प्रतिनिधित्व कर सकें"
आप भी इस बात के विरोध में उतर आएंगे. और फिर मैं तर्क दूं कि "भावनाओ को समझो. लेखक व्यथित मन से ऐसे उदगार उवाच रहा है. " तो क्या आप सहमत हो पाएंगे... नहीं हो पाएंगे, पूछिये क्यों
वजह ये है कि ये आपकी आस्था विश्वास और स्वाभिमान का प्रश्न है. उसी प्रकार से देश भी, उसके लोग भी अपने प्रतीक और झंडे के बारे में आस्था रखते हैं. और कुछ बातों को "कला" कि चाशनी में लपेट कर नहीं प्रस्तुत नहीं किया जा सकता. कही न कही एक लाइन ज़रूर होनी चाहिए. अगर ये सब स्वीकार्य होगा तो बात दूर तक जाएगी.
कला की आड़ में व्यंग्य भी किए जाएंगे. और ऐसा हुआ भी है, तब लोगों ने क्यों आसमान सर पे उठा लिया था, कहते हुए कि हमारी भावनाओ को ठेस पहुच रही है.
वरिष्ठ और ज़िम्मेदार पत्रकार से में ये उम्मीद तो नहीं करता. आशा है कि समझे होंगे कहने का मतलब.
मेरे दोस्तों !!
मैं देख रहा हूँ ख़ान साहब के लेख की सच्चाई से कहीं ना कहीं सभी सहमत हैं, बस थोड़ा सा दुःख लोगों को इस लिए हो रहा कि "बात झंडे तक" पहुँच गई. मैं फिर कहूँगा सरांश झंडा बदलने का नहीं बल्कि समाज की और अपने देश की बुराईयों को मिटाके का है.
"अवी" भाई !! क्या आप लेख का मूल भाव समझ नहीं पा रहे हैं? लगता आप लेख के शब्दार्थ से परेशान हैं, भावार्थ समझिए सब कुछ ठीक हो जाएगा. चलिए मैं आप को एक उदाहरण देता हूँ, बचपन में हम हिंदी में पढ़ते थे -
"सूर दास तब विहसी यशोदा लय उर कंठ लगायो" अगर आप के अनुसार इसका अर्थ निकला जाए तो होगा "सूर दास ने हँस कर खुसी से यशोदा को गले से लगा लिया" लेकिन आप जानते हैं इसका अर्थ है "सूर दास जी कहते हैं तब यशोदा ने हंस कर ख़ुशी से कान्हा को गले से लगा लिया ". मैं आशा करता हूँ अब आप समझ गए होंगे और हाँ यह एक उदाहरण है, कहीं फिर आप व्यर्थ का अर्थ ना निकालें.
अंततः "अवी" भाई और नदीम भाई!! सार्थक और स्वछन्द ब्लॉगिंग के लिए धनयवाद!! लिखते रहिए "सटीक और बेबाक".
वुसत साहिब आपका ब्लॉग और पाठकों की प्रतिक्रिया भी पढ़ा. आपने जो झंडे को दोबारा डिज़ाइन करने की बात कही है मैं उससे सहमत नहीं हूँ. हमे ज़रूरत है ख़ुद को रीडिज़ाइन करने की ज़रूरत है. ज़रूरत यह है कि हर भारतीय नागरिक अपनी अपनी ग़ल्तियों को देखें और ख़ुद को रीडिज़ाइन करे!
पता नहीं क्यूँ बहुत से लोग ख़ान साहब को समझ नहीं पाते. ख़ान साहब आप यूं ही लिखते रहिए. बीबीसी हिंदी ब्लॉग में आपकी उपस्थिति अनिवार्य बन गई है. बहुत दिनों के बाद कोई ऐसा लिखने वाला मिला है, जिसके लेख के जवाब में आई प्रतिक्रियाएं पढ़कर, मन ज्यादा उद्वेलित होता है और उँगलियाँ एक प्रतिकिया और टाइप करने के लिए बेकरार हो जाती है.
हमारी समस्या यह है कि हम अपनी ग़लतियों को मानने के लिए तैयार नहीं होते, उसकी जगह इसे छिपाने का प्रयास शुरू करते हैं यहाँ भी हमारे कुछ मित्र यही कर रहे हैं. हालाँकि समस्या बिल्कुल सही है लेकिन हम अपनी आदत के अनुसार समस्या नहीं, समस्या की बात करने वाले की जाती, धर्म और नागिरकता की बात उठाते हैं. मेरे भाईयों समस्या का वजूद समस्या उठाना वाले की नागिरकता का प्रश्न उठाकर ख़त्म नहीं कर सकते. समस्या का हल हमें ही खोजना होगा.
भाई वुसतुल्लाह ख़ान साहब, कहाँ से ले आए यहाँ झंडा बदलने का विषय. झंडे के रंग रूप में क्या क्या अर्थ छिपा है, झंडा बनाने वाले ने बनाते समय क्या सोचा होगा आदि आदि ...आप और गंजे हो जाओगे उसका अर्थ या भाव आज के समय में कुरदने की कोशिश में, कुछ हासिल नहीं होगा. बस दो चार नदीम, अभी या उमेश बीच बहस में शामिल हो जाएंगे. मगर अपराधी, डकैत, स्मगलर, राष्ट्रवादी चोला पहने तत्त्व ही चुनाव में जीतकर आएंगे और अपना और अपने परिवार की झोली भरेंगे. अपनी मूर्तियाँ स्थापित करेंगे. सड़कों और स्टेडियम का नामकरण उनके बाप दादाओं के नाम से होगा और बीच बीच में बॉलीवुड और क्रिकेट प्लेयेर्स के साथ रंगीन चश्मा चढाए दांत भींचे उनकी तस्वीर दिखाई दे जाएगी. उनको उस चश्मे से झंडे में नारंगी दिखाई देता है या केसरिया. क्या फ़र्क़ पड़ता है?
फ़ख्र करें कि हमारे यहाँ के कुश्तीबाज़ दंगल में लंगोट प्रयोग में अथवा फैशन परेड में अर्धनग्न युवतियों का कवच हमारा राष्ट्रीय ध्वज नहीं होता.
उमेश जी धन्यवाद्,
यहाँ पर एक बात बता दूं की भाव तो ब्लॉग का मुझे भी पता है जो की ग़लत नहीं है.
समस्या है तो सिर्फ़ प्रस्तुतीकरण से. ब्लॉग का भाव और सार तो ब्लॉग लिखने से पहले ही सभी लोग जानते हैं. मेरे विरोध का कारण प्रस्तुतीकरण है जिसमे झंडे को बदलने की बात कही है. चलिए आप को भी एक उदाहरण से समझाता हूँ.
एक प्रतिष्ठित चित्रकार ने भारत माता के नग्न चित्र बना कर भी यही कहा था की चित्र बनाने में वो भाव नहीं है और बहुत ही पवित्र भाव हैं आप समझिए, लेकिन न तो मैं और न शायद आप इसको समर्थन दे सकते हैं, मोहम्मद साहिब के कार्टून बनाकर अख़बार में छापे गए थे और कहा था की ग़लत भाव नहीं है. ये सारा झमेला प्रस्तुतीकरण का ही तो है. भाव और सार तो सब लोगो को पता है.
इस ब्लॉग के लिखे जाने से पहले ही. मैंने भी अपनी पिछली पोस्ट में यही कहा है कि कही न कही एक लाइन तो होनी चाहिए. अगर हम इस तरह के लेखन को स्वीकार करते रहेंगे तो और भी ख़राब लिखने की छूट देते रहेंगे. और देश के प्रतीक को लोग अपने धर्म की तरह ही सम्मान और महत्व देते हैं इसीलिए यहाँ पर झंडा का लेख एक विवाद बन गया है. आशा है आप समझे होंगे की मुझे भी समझ है भावार्थ को समझने की. और मेरा मतलब भी समझे होंगे.
वैसे मैं वुसतुल्लाह साहिब से पूरी तरह से सहमत हूं. प्रिय भारतीय भाईयों अपना आपा खोने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि अगर आप ब्लॉग को ग़ौर से पढ़ेंगे तो उन्होंने पाकिस्तान की नंगी सोच और भारत की धर्मनिरपेक्ष सोच को बख़ूबी लिखा है. ब्लॉग में उन्होंने साफ़ तौर पर जहाँ झंडा डिजा़इन करते वक़्त पिंगाली वैंकया साहिब की सोच को रखा है वहीं अमीरुद्दीन क़िदवई की सोच को भी रखते हुए लिखा है. जैसे झंडे में 80 फ़ीसदी रंग हरा होना चाहिए जिसे मालूम है कि इस मुल्क में बहुसंख्यक मुसलमान की है. साफ़ है कि पाकिस्तान के मुल्लाओं की सोच केवल धर्म तक ही हो सकती है. और उससे पार कभी सोच ही नहीं सकते. धन्यवाद सच दिखाने के लिए ख़ान साहिब.
अभी जी, लगता है कि मेरे और उमेश जी के काफी समझाने के बावजूद आप समझने को तैयार नहीं हैं. आप बातों का घालमेल कर रहे हैं. भारत माता का चित्र बनाना और मोहम्मद साहब का कार्टून पेश करना अलग बात है और (अ)व्यवस्था से व्यथित होकर लेख लिखना अलग बात है. और आप इस बात से खुद सहमत हैं क्या कि किसी देश का झंडा ग़लत बातों को आधारित करके रि-डाजाइन किया भी जा सकता है? सवाल यह है कि आपने विरोध करने के लिए विरोध तो कर दिया, लेकिन अपने एक ग़लत स्टैंड को सही साबित करने के लिए हठधर्मिता का परिचय दिए जा रहे हैं. अरे, कोई तिरंगे को बदलने की कोशिश भी कर सकता है क्या भारत में? आप शब्दार्थ और भावार्थ में फ़र्क ही महसूस नहीं कर रहे हैं, तो आपको समझाने की दवाई किस दुकान से ख़रीद कर दी जाए. होता है, किसी-किसी को ऐसा लगता है कि मैं अगर मान जाऊंगा, तो छोटा हो जाऊंगा. अगर आप इस तरह की मानसिकता से ग्रस्त हैं, तो वक्त आपको खुद समझायेगा, क्योंकि अगर आप समझना ही नहीं चाह रहे हैं, तो सिर्फ़ वक्त का इंतजार कीजिए. अभी देश में जैसी स्थिति है, उससे मुंह मोड़ कर बैठे रहिए और बुद्धिजीवियों के भाव को कूड़ेदान में डालते रहिए. लगता है आप ऐसी ही विचारधारा के साथ देश का उद्धार करना चाहते हैं. वैसे मैं फिर कहूंगा कि वुस्तुल्लाह ख़ान साहब ने झंडे को फिर से डिजाइन करने की बात नहीं की है, बल्कि देश की आत्मा जागृत करने की कोशिश की है. उनका कहना है कि कहां हैं हमलोग, क्यों नहीं झांक रहे हैं अपने भीतर. क्यों इंसान, इंसान को देखना पसंद नहीं कर रहा है. क्या इन्ही तथ्यों को ध्यान में रखकर देश का झंडा बनाया गया था. कतापि नहीं. ऐसी स्थिति में लेखक व्यथित होकर कहता है कि बदल दो झंडा-अर्थात इस निज़ाम को बदलिए. झंडे को नहीं. आशा है कि आप अभी भी नहीं समझे होंगे. फिर भी धन्यवाद.
खान साहब सलाम
मैंने आपको इसलिए प्रतिक्रिया नहीं भेजी कि आपको बुरी लग जाती होगी और आप उसे पोस्ट नहीं करते. झंडे वाली बात बिल्कुल हकीकत है. आपने प्रतिक्रियाएं पढ़ी हैं. आपको एहसास हो गया होगा कि कितने सेकुलर लोग भारत में बसते हैं. यहां के लोग सच्चाई कबूल करने को तैयार नहीं हैं. इसे भी हिंदू- मुसलमान का रंग दे रहे हैं. अब आप समझ सकते हैं कितने मुर्दा ज़हन के लोगों के साथ हम जी रहे हैं. आप इन पर कुछ लिखकर समय बरबाद न करो. भारत का पानी केवल ताकत की बात समझता है. जो ताकतवर होगा भारत में उसकी पूजा ज़रूर की जाएगी और सदा की गई है.
नदीम जी, शायद आपको अब समझ आया होगा की मैंने झंडे प्रतीक को धार्मिक प्रतीक से अधिक महत्व दे रहा हूँ इसीलिए आपको समझ नहीं आ रहा है. में तो हर बात स्पष्ट ही कह रहा हूँ. और आपको बातों का घाल मेल लग रहा है. और अगर आप कहते हैं की झंडे को धर्म प्रतिक के जितना महत्व मत दो, तो में सहमत नहीं हूँ. फिर में अपनी जगह सही हूँ. अब व्यथित होकर कोई झंडे को उल्टा लगा दे या जमीन पर बिछा देने का सुझाव दे तो वो भी तो सही नहीं होगा न. भावार्थ सही है कोई समस्या नहीं है. प्रस्तुतीकरण घटिया है. आप ये बात मान ही नहीं रहे हैं. और जहाँ तक बात है वक़्त के समझाने की, तो अभी तक वक़्त ने ही समझाया है, उसी वजह से झंडे को इतना महत्व भी दिया जा रहा है. समझ में आपको इस बार तो आना चाहिए.