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वीडियोगेम बना स्वात

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|बुधवार, 24 जून 2009, 11:06 IST

अब्बू देखें, मैं अभी जॉएस्टिक चला रही हूँ. ये देखें... ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम---- ये तीसरा निन्जा भी गया--- और ये चौथा--- ढिशुम, ढिशुम, अरे ये तो बच गया--- कोई बात नहीं नेक्स्ट टाइम मार डालूंगी....

...और फिर मेरी बेटी ने मुझे बातों में लगा-लगाकर और लगा-लगाकर वीडियो गेम्स की लत डाल दी.

सुपरमैन, ब्लैक निन्जा, अफ़्रीक़न गुरिल्ला, मरीन हंटर्स....और न जाने क्या क्या---- मुझे नहीं याद के मैंने कितने निन्जाज़, कितने गुरिल्लों और मरीन हंटर्स की मदद से कितने फ़ंटूस मारे. कभी मेरा स्कोर 200 होता तो कभी 500 तो कभी 1500--- जैसा मूड, उतना स्कोर---.

वीडियो गेम की लत बहुत बुरी होती है. मगर अच्छी बात यह है कि जॉएस्टिक वीडियो गेम के हीरो और विलेन को अपने कंट्रोल में रखती है---- जबतक जी चाहे दुश्मनों को मारते रहें. जब बोर हो जाएं तो गेम शट् ऑफ. फिर शुरू हो जाएं. ढिशुम,...ढिशुम,.... ढिशुम....

एक और मज़ेदार बात ये है कि गेम में आप चाहे जितने भी किरदार मार डालें, उनकी तादाद कम नहीं होती. मगर आपका स्कोर बढ़ता चला जाता है और जीत का असली जैसा सुरूर महसूस होता रहता है.

मुझे तो लगता है कि जैसे पाकिस्तान के स्वात और फ़ाटा वीडियो गेम हैं.---- ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम 15 तालेबान मर गए, ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम, 40----- ढिशुम, ढिशुम, ढिशुम. -----

मारते जाएं, खेलते जाएं, मारते जाएं, खेलते जाएं, मारते जाएं, खेलते जाएं------

ख़ुदा क़यामत तक ग़ालिब का नाम रखे जिसने वर्चुअल रियल्टी पर आधारित वीडियो गेम की परिकल्पना को यह कहकर परिचय कराया था.

था ख़्वाब में ख़्याल को दिल से मुआमला
जब आँख खुल गई, न ज़ियाँ था, न सूद था.

(ज़्याँ- नुक़सान, सूद- फायदा)

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:35 IST, 24 जून 2009 Santosh Kumar:

    वुसतुल्लाह जी हम आप के मौलिक सोच के मुरीद पहले भी थे, एक आम सी बात को गंभीर पत्रकारिता से कैसे जोड़ते हैं वो आपने बता दिया है. शुक्रिया

  • 2. 12:53 IST, 24 जून 2009 भूपेश गुप्ता:

    वुसत जी, वर्चुअल दुनिया और स्वात की दुनिया एक जैसी हैं यहाँ तक तो आप एकदम सही हैं, लेकिन आप इन दोनों के भीतर का अच्छा पहलू भी देखिए. वर्चुअल गेम को ऑफ़ कीजिए और उस दुनिया से बाहर आ जाइए, इसी तरह तालिबान के बारे में सोचना बंद कर दीजिए और अच्छे कामों में जुट जाइएं, अपने आप सच्चाई जीतकर सामने आ जाएगी. वैसे भी वुसत जी, पूरी दुनिया सिर्फ़ अच्छे और सकारात्मक सोच वालों के कारण ही वजूद में है. तारीख़ गवाह है कि बुराई कभी भी लम्बे समय तक हावी नहीं रह पाई है और हाँ अगर तालिबान सचमुच एक सच्चाई है तो इसे भी कोई रोक नहीं पाएगा. वैसे हालत बताते हैं कि ये कुछ दिनों तक चलने वाला सिर्फ़ एक खूंखार तमाशा है, जो ख़त्म होकर ही रहेगा.

  • 3. 14:30 IST, 24 जून 2009 SHABBIR KHANNA:

    ख़ान साहब कितना सच लिखा है आपने एक वीडियो गेम को बीच में लाकर हक़ीकत को उजागर किया है. पढ़कर ऐसा लगता है कि जो तालेबान मरता है दूसरे दिन जिंदा होता है. वीडियो गेम के ज़रिए हम को बहुत सी चीज़ें समझने का मौक़ा दिया है.

  • 4. 14:50 IST, 24 जून 2009 J:

    क्या बात है. हमेशा की तरह कमाल. खास बात तो यह भी है कि ग़ालिब को आपने इस फ़साने में शामिल कर लिया. फिर से शाबास.

  • 5. 15:02 IST, 24 जून 2009 Mohammad Ali Bahuwa:

    ख़ान साहब तबीयत ख़ुश हो गई. ये तो हक़ीक़त है कि तालेबान एक तरह की 'विचारधारा' है. इससे गोली से ख़त्म करने के बजाए ज़ेहन से मिटाना ज़रूरी होगा. ज़रूरत है कि आजकल मुसलमान ऐसी विचारधारा के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाए क्योंकि ये विचारधारा हमारी क़ौम को बहुत बदनाम कर रहा है.

  • 6. 15:11 IST, 24 जून 2009 Amit Madhur:

    आपका वीडियो गेम से स्वात और फ़ाटा के तालेबान की तुलना करना क़ाबिले तारीफ़ है. पाकिस्तान की सरकार आजकल काफ़ी स्कोर प्राप्त कर रही है और इसके बदले में अच्छा इनाम भी मिल रहा है. लेकिन जो जॉएस्टिक को चला रहे हैं शायद वो इस बात को समझ नहीं पा रहे हैं.

  • 7. 16:06 IST, 24 जून 2009 aseem singh:

    बहुत ख़ूब ख़ान साहब. आपकी तुलना ज़बर्दस्त है.

  • 8. 17:18 IST, 24 जून 2009 Deepak Tiwari:

    ख़ान साहब लिखने और गोली चलाने में बड़ा अंतर है. जंग का मैदान सादा कागज़ नहीं हैं. जंग के मैदान में बंदूक़ पकड़ कर देखें तब जाकर आपको गोली के खेल और वीडियो के खेल में अंतर पता चलेगा.

  • 9. 17:42 IST, 24 जून 2009 N.K.Tiwari:

    पाकिस्तान की जनता को इसके बारे में सोचना चाहिए. क्योंकि कोरी लफ़्फ़ाज़ी से कुछ नहीं होगा.

  • 10. 18:09 IST, 24 जून 2009 Gulmohammad Khan:

    तालेबान, अलक़ायदा या लश्कर. चाहे इसे जो भी नाम दिया जाए. एक समाप्त होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है. इनके समर्थक भी हम ही लोगों में से हैं. लगता तो यह ही है कि ये निकट भविष्य में ख़त्म होने वाले नहीं हैं. फिर ये ला-इलाज़ बीमारी का क्या करें? एक उपाय है क्यों न इसके कारणों का पता लगाकर इसको समाप्त करने की कोशिश करें. 'बचाव इलाज से हमेशा बेहतर होता है' वैसे आपने मुद्दा अच्छा उठाया है. प्रतिक्रिया तो बहुत आएंगी पर सुझाव कम ही होंगे. कोई आपको गाली देगा, कोई मुबारकबाद देगा तो कोई कुछ.--- मुझे लगता है कि लोगों में सकारात्मक सोच चाहिए पर तब फिर इन संगठनों का क्या होगा.--- और हम लोगों को बहस का मुद्दा कौन देगा? ख़ुदा हाफ़िज़

  • 11. 20:33 IST, 24 जून 2009 ghazi:

    ख़ान साहिब आप अच्छा लिखते हैं, यह भी अच्छा लिखा.

  • 12. 21:00 IST, 24 जून 2009 Rohit Gupta:

    आप महान हैं. बात को कैसे कहा जाता है या यूं कहें कि समझाया जाता है कोई आप से सीखे. ख़ुदा ग़ालिब के साथ साथ आपके भी नाम को क़यामत तक महफ़ूज़ रखे. ख़ुदा हाफ़िज़.

  • 13. 22:29 IST, 24 जून 2009 M.S.Bohra:

    ख़ान साहब आपने बिल्कुल सच को उजागर कर दिया है. पाकिस्तान सेना या अमरीका का खेल है जो आने वाले वक़्त में पाकिस्तान की जनता को बहुत भारी पड़ेगा. जीवन और ज्यादा दुश्वार हो जाएंगा अगर ये स्वात के आतंकी पाकिस्तान में फैले तो. आप ऐसे ही जनता को जागरूक करते रहे हैं.

  • 14. 06:41 IST, 25 जून 2009 Raghib Husain Abidi:

    ख़ान साहब आप लिखले तो बहुत अच्छा है पर आपकी इस ढिशुम-ढिशुम में वो बात नहीं. आपने न तो ये बताया कि असली हीरो कौन है और न ही ये बताया कि विलेन कौन है. तालेबान के अब्बा अमरीका या अब पाकिस्तान के दादा अमरीका के ज़िक्र के बग़ैर आपका ब्लॉग आधा अधूरा लगा.

  • 15. 07:25 IST, 25 जून 2009 Sandeep Sharma:

    इस खेल को लंबा चलना ही है क्योंकि इसके सारे किरदार पाकिस्तान और उसके मालिक अमरीका के बनाए हुए हैं. लेकिन ये हक़ीकत है. एक ऐसी हक़ीक़त जो एक दिन इन किरदारों( तालेबान) के जन्मदाता (पाकिस्तान) को ही खा जाएगा. अभी तो पाकिस्तान, अमरीका की दी हुई घुट्टी पर जी रहा है. अमरीका से मिले पैसे और साज़-व-सामान से पाकिस्तान को गुज़र-बसर चल रहा है. जिस दिन अमरीका का मक़सद पूरा हो जाएगा वो वहाँ से निकल जाएगा,

  • 16. 07:27 IST, 25 जून 2009 Ashendra Singh :

    बहुत खूब, वीडियो गेम की दुनिया आज के बच्चों को भविष्य की पेचीदिगियाँ सिखा रही है और हमें अपने जाल में फँसा रही है.

  • 17. 08:46 IST, 25 जून 2009 arun kumar :

    एक शाम मैं शहर में निकला, दिल में कुछ अरमान थे. एक तरफ़ थी झोपडी, एक तरफ़ श्मशान थे. पावं तले एक हड्डी आई, उसके यही बयां थे . चलने वाले संभल के चल, हम भी कभी इन्सान थे...

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