इस विषय के अंतर्गत रखें अप्रैल 2009

ट्रेन ब्लॉग - मुंबई और महाराष्ट्र

पोस्ट के विषय:

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 29 अप्रैल 2009, 20:37

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मुंबई महाराष्ट्र का आईना न तो है और न कभी हो सकता है. एक शहर एक राज्य पर कितना हावी हो सकता है ये मुंबई में आकर पता चलता है.

कितने लोग यह जानते होंगे कि महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश के बाद लोकसभा की सबसे अधिक 48 सीटें हैं यानी दूसरा सबसे महत्वपूर्ण राज्य. लेकिन कोई ये नहीं कहता कि दिल्ली का रास्ता महाराष्ट्र से होकर भी गुज़रता है.

मुंबई से चुनाव लड़ रहे मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त,संजय निरुपम और किरीट सोमाया का नाम लोग जानते होंगे लेकिन कम लोग जानते होंगे कि शरद पवार के अलावा कौन सा बड़ा नेता महाराष्ट्र से चुनाव लड़ रहा है.
ऐसा क्यों है.
अगर लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर की मानें तो ये टेलीविज़न और अंग्रेज़ी अख़बारों की देन है. वो कहते हैं, ''जितने भी अंग्रेज़ीदां पत्रकार टेलीविज़न पर विश्लेषण करते हैं या अख़बारों में लिखते हैं उन्हें विदर्भ और मराठवाड़ा का अंतर भी नहीं पता है.वो बात रखते हैं सिर्फ़ और सिर्फ़ मुंबई शहर की. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उत्तर भारतीयों के बीच झगड़े को सबसे प्रमुखता दी जाती है लेकिन इसमें मरने वालों की संख्या एक होती है जबकि विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या सैकड़ों में होती है.''

मुझे केतकर की बातें कई स्तर पर सही लगीं. पिछले चुनावों में मैं मुंबई को छोड़कर महाराष्ट्र के कई ग्रामीण इलाक़ों में गया था और पूरे राज्य की तस्वीर पेश करने में सफल रहा था. इस बार मुंबई में हूं लेकिन यह बताने में सच में सक्षम नहीं हूँ कि महाराष्ट्र में कैसे परिणाम होंगे.

लेकिन ये बात यहीं ख़त्म नहीं होती. केतकर महाराष्ट्र की राजनीति के कई मिथकों पर से भी पर्दा उठाते हैं.

वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आतंकवाद मुंबई में कोई मुद्दा नहीं है.मैंने जब आम लोगों से बातचीत की तो मैंने भी यही महसूस किया.

तो फिर 26/11 का क्या महत्व है मुंबई के जनमानस के लिए.

केतकर के अनुसार 26/11 ने मुंबई के मध्य वर्ग और ख़ास कर उच्च मध्य वर्ग को झिंझोड़ा है और हो सकता है कि ये मध्य वर्ग मतदान में ज़्यादा हिस्सा ले लेकिन किसी रिकार्ड मतदान की उम्मीद करना सही नहीं होगा.

यही हाल उत्तर भारतीयों के मुद्दे का भी है. केतकर कहते हैं कि राज ठाकरे के लिए वैसा माहौल नहीं है जैसा बाल ठाकरे के लिए था. बाल ठाकरे ने मराठियों में 'एक समुदाय' की भावना जगाई थी जबकि राज ठाकरे 'मराठी अस्मिता' पर ज़ोर देते हैं.

हां राज ठाकरे की पार्टी शिव सेना के वोट काट कर उनका खेल ख़राब कर सकती है.

पूरी बातचीत में मुझे यही लगा कि अब तक मैं महाराष्ट्र को मुंबई के आईने से ही देखता रहा था और अब मेरी आंखें खुली हैं. दिमाग पर ज़ोर दिया तो पाया कि कुछ ऐसा ही हाल कर्नाटक का है जिसे हम बंगलौर के आईने से देखते हैं.

ट्रेन ब्लॉग- वो रात भूलती नहीं

पोस्ट के विषय:

सुशील झासुशील झा|बुधवार, 29 अप्रैल 2009, 13:33

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26 नवंबर के हमले झेलने वाला मुंबई का छत्रपति शिवाजी टर्मिनल अब फिर से सामान्य दिखता है.
कमाल की बात ये है कि यह टर्मिनल चरमपंथी हमले झेलने के चार घंटे बाद भी सामान्य हो गया था. रात के करीब दस बजे स्टेशन पर गोलियां चली थीं लेकिन सुबह चार बजे पहली लोकल ट्रेन अपने नियत समय पर चली थी.

स्टेशन मैनेजर अशोक कुमार तिवारी उस रात को याद करते हुए संज़ीदा हो जाते हैं. वो कहते हैं, ''मैं डिनर करने बैठा ही था कि मुझे फ़ोन आया कि स्टेशन पर गोलाबारी हो रही है. मैं तुरंत चल दिया लेकिन सुरक्षा कारणों से मुझे स्टेशन पर आने में देरी हुई. पुलिसवाले मुझे भी स्टेशन पर आने नहीं दे रहे थे.''

जब वो स्टेशन पहुंचे तो क्या चल रहा था उनके दिमाग में, तिवारी कहते हैं, ''मेरे मन में बस एक ही बात थी कि जितनी जल्दी हो सके मुझे स्थिति सामान्य करनी है ताकि ट्रेनें ठीक समय पर चल सकें.''

तो किया क्या उन्होंने, तिवारी कहते हैं, ''मेरे स्टाफ कोई भी व्यक्ति स्टेशन छोड़कर नहीं गया था. हम काम कर रहे थे. घायलों को अस्पताल भेजना था और मृतकों को भी.''

क्या वो क्षण याद हैं उन्हें, तिवारी कहते हैं कि वो रात भूलती नहीं उनसे. वो कहते हैं, ''चारों तरफ खून ही खून फैला हुआ था. मानो खून का तालाब बन गया हो. मैं उसी के बीच खड़ा था और उसे साफ करवाने की कोशिश कर रहा था. घायल लोग फैले हुए थे. कई लोग मारे गए. मेरे ऑफिस में गोलियों के निशान आज भी हैं.''

तो क्या उन्हें इसके दुस्वप्न भी आते थे, तिवारी कहते हैं, ''बिल्कुल आते थे. मेरे सपनों में मुझे खून का तालाब दिखता था. मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया था. मैं दो तीन घंटे से अधिक सो नहीं पाता था. फिर मैं डाक्टर के पास गया. दवाइयां ली तब आराम हुआ. क़रीब दस पंद्रह दिन मैं बहुत परेशान रहा.''

तिवारी धार्मिक व्यक्ति हैं, कृष्ण के उपासक. वो कहते हैं, ''मैं इस्कॉन का सदस्य हूं. हमें मंत्रोच्चार करना होता है 16 बार लेकिन जब मैं परेशान हुआ तो मैं और अधिक मंत्रोच्चार करता था.''

तिवारी के लिए मुंबई के हमले बड़ी घटना थी लेकिन छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर उनके चार साल के कार्यकाल में कई बड़ी घटनाएं हुई हैं.

वो बताते हैं, '' 2005 में जब बाढ़ आई थी तब भी मैं यहीं था. कई दिनों तक यहां से ट्रेनें नहीं चलीं. स्टेशन के चारों ओर का हिस्सा डूब गया था. स्टेशन को मैनेज करना बहुत मुश्किल था उन दिनों. इसके अलावा 2006 के ट्रेन बम विस्फ़ोटों के दौरान भी मैं यहीं था. उस समय भी अफ़रा तफरी थी लेकिन 26/11 की तुलना किसी से नहीं हो सकती है.''

इस हादसे में मारे गए रेलवेकर्मियों को याद करते हुए तिवारी की आंखे नम हो जाती हैं. वो कहते हैं, ''इंस्पेक्टर शिंदे को मैं अच्छे से जानता था. वो शहीद हुए लेकिन आज भी मेरे मोबाइल में उनका नंबर है. मैंने वो नंबर अब भी नहीं मिटाया है. वो मुझे बहुत याद आते हैं. यहां की सफाई करने वाली भी मुझे याद आती है जो अब नहीं रही.''

अब स्टेशन सामान्य है. कुछ गोलियों के निशान और सुरक्षाकर्मियों की संख्या छोड़ दें तो सबकुछ पुराना सा है बस एक स्मारिका जुड़ गई है जिस पर उन 58 लोगों के नाम है जिनकी मौत स्टेशन पर हुई थी.

इनमें से छह रेलवेकर्मी हैं जबकि बाकी आम लोग हैं. इन 58 लोगों की सूची में 20 नाम मुसलमानों के भी हैं.

ट्रेन ब्लॉग- गुजरात, गांधी और मोदी

पोस्ट के विषय:

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 27 अप्रैल 2009, 09:05

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ये आपकी ग़लती है कि आप गुजरात में गांधी को खोजते हैं.

साबरमती आश्रम के बाहर ऐसा सुनकर अचरज हुआ और वो भी तब जब ये बात बल्कि आश्रम के प्रमुख अमृत मोदी कह रहे हों.

वो कहते हैं, 'ये आपकी ग़लती है कि आप गुजरात में गांधी को खोजते हैं. बुद्ध जिस इलाक़े में पैदा हुए वहाँ कितने बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं. जापान, चीन, श्रीलंका में आपको बौद्ध धर्म के लोग मिलेंगे लेकिन, नेपाल, बिहार और उसके आसपास कम ही मिलेंगे. गांधी को भी ऐसे ही समझिए. वो अर्जेंटीना और दक्षिण अफ्रीका में मिलेंगे जहां उनके मूल्यों की कद्र है.'

और नरेंद्र मोदी के बारे में क्या राय है अमृत जी की, 'कोई राय नहीं है नरेंद्र मोदी के बारे में. वो अपना काम करते हैं मैं अपना काम करता हूं.'

गुजरात का जवाब नहीं है. यह गांधी की भी भूमि है और नरेंद्र मोदी की भी. दोनों की नीतियां एक दूसरे के विपरीत लेकिन दोनों हीरो हैं जनमानस के.

जैसे अहमदाबाद साबरमती आश्रम के बिना पूरा नहीं होता वैसे ही यहां चुनाव से जुड़ी कोई भी बात मोदी के बिना पूरी नहीं होती है. मोदी के साथ ज़िक्र होता है हिंदू मुसलमानों के संबंधों का. हिंदू ये बात गर्व से करते हैं मुसलमान दबी ज़बान में.

हिंदू कहते हैं, 'गोधरा से पहले भी दंगे हुए थे लेकिन उसमें हिंदू मारे गए थे. गोधरा में दो दिन की छूट मिली. हिसाब बराबर हुआ. मोदी ने हमें आत्मसम्मान दिया है और अब विकास दे रहे हैं.हम बीजेपी को नहीं मोदी को वोट देते हैं.

मुसलमान कहते हैं, 'अब सबकुछ ठीक है. यहां दंगे नहीं होंगे. जब तक मोदी साहब हैं यहां शांति ही रहेगी.कुछ नहीं होगा.' ये कहते कहते वो तंज भरे लहज़े में मुस्कुराते हैं आपको बता जाते हैं कि वो असल में क्या कहना चाहते हैं.

लेकिन बच्चों को इतनी नफ़ासत कहां. जुम्मा मस्ज़िद में कुछ मुस्लिम बच्चे बीबीसी का माइक देखकर आ गए.

इन छोटे बच्चों को न तो गांधीजी से कोई लेना देना है और न ही मोदी से

वो कहते हैं, 'हम लोग जिस स्कूल में थे वहां हमें मारा जाता था क्योंकि हम मुसलमान हैं. टीचर धमकी देते थे फेल कर देंगे. पिटाई तो होती ही थी. हमारी क्लास में हिंदू बच्चे हमसे बात नहीं करते थे. हमें परेशान होकर स्कूल छोड़ना पड़ा. अब हम मोहम्मडन स्कूल में पढ़ते हैं और खुश हैं. कोई मारता पीटता नहीं है.'

नया शहर है नया ज़माना है और गुजरात में नया नेता है जिसकी पुराने से तुलना कहने पर अंग्रेज़ी की एक कहावत याद आती है each thesis has an antithesis and then synthesis...

रैना कुमारी के सदक़े

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وسعت اللہ خان|रविवार, 26 अप्रैल 2009, 06:21

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वुसतउल्लाह ख़ान से-
जो बात मुझे चालबाज़, शतरंज के खिलाड़ी, आँकड़े फ़िट करने वाले, फेर बदल के बाँस पर कर्तब दिखाने वाले क़लाबाज़, दो भाषा, दो दिमाग़, दोहरा दिल रखने वाले, दीदा घुमाने वाले, आप के हाथ की दो अंगुलियाँ ग़ायब करने वाले, मुस्कुरा कर हाथ मिलाने वाले, वफ़ा के कपड़े से सिली हुई शेरवानी पहनने वाले बेवफ़ा, दो पल्ली टोपी को उल्टा कर के सत्ता की नाव बनाने वाले नेता प्रकार के लोग और शब्दों के सौदागर और बुद्धिजीवी नहीं समझा सके वो बात आंध्र प्रदेश के एक गाँव की 90 वर्षीया रैना कुमारी ने बिना कुछ कहे समझा दिया.

आप रैना कुमारी को नहीं जानते, दो दिन पहले तक मैं भी नहीं जानता अगर मैं करनौल के क़रीब एक स्कूल में स्थित पोलिंग बूथ पर उसे बाहर निकलते हुए न देख लेता.

इंच भर मोटे शीशों वाला चश्मा दो मैले तार की मदद से उसके दोनों कानों से जुड़ा हुआ था, एक हाथ से लाठी टेकती, बग़ल में दो किलो चावल का थैला दबाए नंगे पांव तप्ती ज़मीन पर आहिस्ता आहिस्ता चलने वाली रैना कुमारी.

उसने मेरा बाज़ू पकड़ लिया, बेटा ये मुझे वोट क्यों नहीं डालने दे रहे हैं?

मैंने कहा कौन?

कहने लगी ये इलेक्शन वाले बाबू.

मैंने कहा क्यों?

रैना कुमारी ज़मीन पर बैठ गई, चावलों की थैली खोली, इसमें भारतीय चुनाव आयोग का मुड़ा-तुड़ा वोटर रजिस्ट्रेशन कार्ड निकाला और मुझे थमा दिया.

बाबू कहता है कि ये नहीं चलेगा. उसके साथ कोई राशन कार्ड वग़ैरह भी लाओ.

मैंने कहा, अम्मा मैं तो ख़ुद यहां अजनबी हूं, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ?

कहने लगी रिक्शे वाले ने यहाँ दस रूपए लेकर पहुँचाया. तू मुझे रिक्शा दिलावा दे ताकि जिनके यहाँ मैंने राशन कार्ड रखवाया है वहाँ से लाकर वोट डालूँ.

मैंने कहा अम्मां तू इस गर्मी में दोबारा क्यों आएगी? मैं रिक्शा दिलवा देता हूं, घर जाकर आराम से बैठ.

कहने लगी आउंगी तो ज़रूर, फिर जाने कब वोट पड़े, मैं रहूँ या न रहूँ.

मैंने कहा अम्मा तुझे उन्होंने क्या दिया, तू अपना हाल तो देख.

कहने लगी उनकी वो जानें, मेरी मैं जानूँ. अब मुझे रिक्शा दिलवा.

अम्मा रैना कुमारी रिक्शे में बैठ कर चली गई और मैं अगले पोलिंग स्टेशन पर जाने के लिए अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गया.

प्रजातंत्र रैना कुमारी के अंदर सुरक्षित है या दिल्ली के उस गोल भवन में जहां रैना कुमारी के वोट के सदक़े इकठ्ठा होने वाले रैना कुमारी को जानते तक नहीं, पहचानना तो दूर की बात है.

ख़ुदा जानता है कि मुझे रैना कुमारी वो गाय लगी जिसने इस देश के लोकतंत्र का बोझ अपने सींगों पर उठा रखा है.

बीबीसी की ट्रेन और चुनाव

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सुशील झासुशील झा|शनिवार, 25 अप्रैल 2009, 07:18

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क्या भारत के आम चुनाव और ट्रेन के बीच कोई संबंध है? मेरे हिसाब से है... अगर आप चुनाव की कवरेज करने का कोई अलग अंदाज़ सोच रहे हैं तो....

सस्ती उड़ानों और बसों के बावजूद आज भी भारत के आम लोगों की एक बड़ी संख्या ट्रेनों से सफ़र करती है और भारतीय रेल पूरे देश को जोड़ती तो है ही.

तो फिर चलिए मेरे साथ बीबीसी के चुनावी सफ़र पर जो ट्रेन के ज़रिए तय किया जाएगा.

25 अप्रैल से बीबीसी चुनाव एक्सप्रेस ट्रेन चल रही है दिल्ली से और 13 मई तक भारत के विभिन्न राज्यों का सफ़र तय करेगी -- अहमदाबाद, मुंबई, हैदराबाद, भुवनेश्वर, कोलकाता, पटना और इलाहाबाद होते हुए .....

मैं इसी ट्रेन पर अगले 20 दिन रहूँगा. खाना-पीना-सोना-जगना सबकुछ होगा ट्रेन पर और कोशिश होगी आपके लिए चुनावों और भारतीय जनमानस की एक छवि पेश करने की.

अब कुछ इस यात्रा और अपने बारे में बताता चलूं. यात्रा ज़ाहिर है लंबी होगी और मुलाक़ातें होंगी न केवल आम लोगों से बल्कि नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों से भी.....और होंगे अनेक सवाल...

रेल से मुझे प्यार है और मेरे पत्रकार बनने की कहानी में रेल से जुड़ा एक हादसा भी है. क़रीब 11 साल पहले जब मैं भारतीय जनसंचार संस्थान के साक्षात्कार के लिए जमशेदपुर से ट्रेन में चढ़ा तो मेरे पास टिकट था लेकिन बर्थ नहीं थी. भीड़ तो थी, लेकिन ये तो आम बात है.

एक सीट पर हम तीन दोस्त थे. एक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में पढ़ता था और दूसरा एक अन्य साक्षात्कार देने दिल्ली जा रहा था. मुगलसराय स्टेशन के पास जब टीटी साहब चढ़े तो हमने बड़ी मिन्नतें की कि एक सीट दे दी जाए.....

अनुनय विनय के बाद उन्होंने तीन सौ रुपए लिए और हमें पांच डिब्बों के बाद छठे में जाने को कहा.टिकट पर एक सीट नंबर भी लिख दिया गया. जब हम वहां पहुँचे तो पता चला कि उस पर पहले से कोई सोया था और उसकी टिकट पर भी नंबर लिखा हुआ था.

हम दोनों के बीच अभी सीट को लेकर लड़ाई शुरु हुई थी कि अगला स्टेशन आया और तीसरे सज्जन आए जिन्होंने कहा कि सीट उनकी है. इसी स्टेशन पर नए टीटी साहब आए और पूरा माजरा जानने के बाद स्पष्ट किया कि हमें उनकी बिरादरी के दूसरे टीटी साहब ने ठग लिया है.

खैर मूर्ख हम बने और एक सीट पर तीन लोग सोते हुए आए और आख़िरकार पत्रकार बन गए.

लेकिन इस यात्रा में सीट का झंझट नहीं है..... हाँ कुछ तनाव और उत्सुकता ज़रुर है कि आपके लिए रोचक और चुनावी तस्वीर स्पष्ट करने वाली क्या-क्या कहानियां लाएँ.....

मुसलमानों को क्या चाहिए?

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सुहैल हलीमसुहैल हलीम|शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009, 06:12

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भारत के लोकसभा चुनाव में आजकल इस बात पर बहुत बहस है कि मुसलमान किसका साथ देंगे. जब कोई संप्रदाय, धर्म या बिरादरी चुनावों में किसी का साथ देती है, तो उसकी कुछ उम्मीदें और तमन्नाएं होती हैं.

तो मुसलमान को क्या चाहिए? वो किस बुनियाद पर ये फ़ैसला करते हैं कि किसका साथ दें?

सालों पहले मेरे एक बुज़ुर्ग कहा करते थे कि, "मैंने भारतीय मुसलमान को कभी कोई युनिवर्सिटी, स्कूल या कॉलेज माँगते हुए नहीं देखा, कभी न ही वो अपने इलाक़े में अस्पताल के लिए आंदोलन चलाते हैं और न ही बिजली पानी के लिए, वो जानवरों तक का अस्पताल नहीं माँगते. उन्हें चाहिए तो बस एक चीज़. लाउडस्पीकर पर मस्जिद से अज़ान देने की इजाज़त, जिसपर पर अक्सर सांप्रदायिक रुप से संवेदनशील शहरों में पाबंदी लगा दी जाती थी."

मेरे ख़्याल में बुनियादी तौर पर यह बात अब भी सच है. चाहे लाउडस्पीकर अब मुद्दा न हो, लेकिन मुसलमान अब भी अतीत में ही उलझे हुए हैं. भारत में तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों को वोट देते हैं, सुरक्षा के नाम पर उनके हाथों ब्लैकमेल होते हैं, पाकिस्तान में शरीयत को लागू करने के लिए जान देते हैं, ऐसा क्यों है कि इसके सिवा हमें और कुछ नहीं चाहिए?

दुश्मनी फिर कभी निकालिएगा

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वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|रविवार, 19 अप्रैल 2009, 13:37

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पिछले एक हफ़्ते से भारत में हूँ और शाम को कामकाज से फ़ारिग़ होने के बाद सिर्फ़ स्थानीय टेलीविज़न न्यूज़ चैनल देखता हूँ. मुंबई हमलों के पाँच महीने गुज़र जाने के बाद भी शायद ही कोई ऐसा चैनल हो जिस पर कम से कम दो घंटे पाकिस्तान का ज़िक्र नहीं होता हो.

मगर ये ज़िक्र तालेबान और दहशतगर्दी से शुरू होता है और उसी पर ख़त्म हो जाता है और ख़ुलासा ये होता है कि तालेबान, पाकिस्तान और दहशतगर्दी दरअसल एक ही सिक्के के तीन रुख़ हैं.

बहुत ही कम लोग ये स्वीकार करने को तैयार हैं कि आज का पाकिस्तान दहशतगर्दी के ख़ंजर से उस बुरी तरह निढाल है कि उसका राष्ट्रीय ढ़ांचा तेज़ी से ख़ून बहने के सबब ख़तरनाक रफ़्तार से (ग़शी) बेहोशी की हालत में जा रहा है. भारतीय मीडिया और उसके हवाले से ज़्यादातर स्थानीय लोगों का यही रवैया है कि पाकिस्तान की ही लगाई हुई आग है. ---अब वो भुगते--- हमें क्या----.

ये बिल्कुल वही ज़हनी रवैया है जिसका पाकिस्तान अस्सी और नब्बे के दशक में शिकार हुआ था. --- .यानी ये अफ़ग़ानिस्तान की आग है.--- हमें क्या.--- मुजाहिदीन जानें, रूसी जाने या ख़ुदा जाने.--- हमें तो अफ़ग़ानिस्तान ने हमेशा दुश्मनी का ही तोहफ़ा दिया है--- अब भुगते----

ये कश्मीर की आग है--- भारत जाने --- कश्मीरी जानें--- वहां घुसने और लड़ने वाले जानें.. हमें क्या--- वैसे भी साठ बरस में भारत ने हमें क्या दिया है सिवाए नुक़सान और दुश्मनी के--- अब भुगते कश्मीर को----

उस ज़माने में बहुत ही कम पाकिस्तानियों को एहसास था कि " यह तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है." इसलिए हम सब ने अपनी ज़िदगियों में ही देख लिया कि अफ़ग़ान मुजाहिदीन कैसे अफ़ग़ान तालेबान बने और फिर कैसे पाकिस्तानी तालेबान में तबदील हो गए. और कश्मीर में लड़कर लौटने वाले कैसे हाथों से निकल गए.

अब हालत यह है कि दो तिहाई पाकिस्तान किसी न किसी क़िस्म के फ़िरक़वाराना, क़ौम परस्ताना या मज़हबी शिद्दत पसंदाना ख़तरे में मुबतला है. और पहली बार कई सरों वाला ये ख़तरा किसी पाकिस्तानी हुकूमत को नहीं बल्कि राष्ट्र के वजूद और संप्रभुता को है.

ये बात अगर दिल्ली में किसी से की जाए तो आमतौर पर जवाब मिलता है कि हमें पाकिस्तान के हालात पर चिंता है और हमदर्दी है मगर मुंबई--- मगर कश्मीर--- कोई ये समझने को तैयार नहीं है कि इस वक़्त पाकिस्तानी राष्ट्र को जो ख़तरा है उसने मुल्क को ऐटमी धातु से बने हुए एक ऐसे जार में बदल दिया है कि अगर ये जार टूटा तो तेज़ाब दूर-दूर तक फैलेगा.

बहुत कम लोग ये समझ पा रहे हैं कि अफ़गा़निस्तान से लगने वाला जो वायरस इस वक़्त पाकिस्तान को बेदम कर रहा है वो एक छूत वाला वायरस है जिसके आगे सरहदें बेमानी हैं. मुँह पर हिफ़ाज़ती नक़ाब डालने, ख़ुद को अपने-अपने फ़ायदे के क्वारंटीन में बंद करने या मरीज़ को उसके हाल पर छोड़ने भागने से वायरस पीछा नहीं छोड़ेगा. इसलिए पाकिस्तानी राष्ट्र के वजूद को अब पाकिस्तान से ज़्यादा आलमी बिरादरी की ज़रूरत है.

ये वक़्त मरीज़ को उसकी संगीन ग़लतियाँ याद दिलाने या धमकियों और डांटडपट का नहीं है बल्कि मदद की ठंढ़ी पट्टियां रखने और अपने पर यक़ीन बहाल करने वाले ताक़तवर कैपसूल खिलाने का वक़्त है----

इस छूत के मर्ज़ से निपटना किसी एक के बस की बात नहीं. या तो अपना पड़ोसी बदल लें अगर नहीं तो फिर बचपना छोड़िए और बड़े हो जाइए. पुराने बदले चुकाने के लिए ज़िंदगी पड़ी है मियाँ-----

सुरमा लगाके...

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009, 08:48

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हर सुबह मैं ताज़ा भारतीय अख़बारात में यहां के चुनावी उम्मीदवारों की बेचारगी की दास्ताने पढ़ता हूँ और शुक्र अदा करता हूँ कि मैं इस मुल्क में नहीं रहता.

जैसे इसी ख़बर को लीजिए कि प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट से मनमोहन सिंह की तस्वीर हटा दी गई है, क्योंकि चुनाव आयोग के ख़्याल में अब जब के चुनाव हो रहे हैं, मनमोहन सिंह का वेबसाइट पर टिके रहना ठीक नहीं है.

पाकिस्तान में चाहे फ़ौजी राष्ट्रपति हो या ग़ैर फ़ौजी, प्रधानमंत्री कितना ही कमज़ोर क्यों न हो, वो भारत के प्रधानमंत्री की तरह बेचारा नहीं होता. वहां तो चुनाव के बहुत दिन बाद तक आधिकारिक वेबसाइट पर पुरानी तस्वीरें लगी रहती हैं.

लालू प्रसाद यादव के कान चुनाव आयोग ने सिर्फ़ इतनी सी बात पर खींच लिए कि उनका हेलीकॉप्टर किसी स्कूल के मैदान में बग़ैर इजाज़त कैसे उतरा और मध्य प्रदेश में कांग्रेसी उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया से चुनाव आयोग यह पूछ रहा है कि उनका हेलीकॉप्टर जब एक खेत में उतरा तो क्या खेत के मालिक से इजाज़त ली थी?

पाकिस्तान में अगर चुनाव के दौरान नवाज़ शरीफ़ या आसिफ़ अली ज़रदारी का हेलीकॉप्टर किसी के सर पर भी उतर जाए तो वो ख़ुशी से दीवाना हो जाता है. चुनाव आयोग अपने काम से काम रखता है और यह मामला मतदाता और राजनेताओं पर छोड़ देता है.

भारतीय प्रेस वरुण गांधी के हाथ काट देने और लालू के रोड रोलर के नीचे दे देने के बयान को इतना उछाल रहा है जैसे कोई क़यामत आ गई हो. इससे अच्छा तो पाकिस्तान है जहां हर राजनेता दूसरे को जब चाहे काफ़िर, ग़ैर मुल्की और सिक्यूरिटी रिस्क कह सकता है. जलसे-जुलूस में खुलेआम एक-दूसरे का मुँह तोड़ने और फाँसी चढ़ाने की बातें होती हैं, लेकिन चुनाव आयोग को अच्छी तरह पता है कि राजनेताओं की इस तरह की बातों का कोई मतलब नहीं होता, यह सब सामान्य सियासी कलचर का हिस्सा है इसीलिए चुनाव आयोग ऐसी बातों का नोटिस लेकर अपना और क़ौम का वक़्त बर्बाद नहीं करता.

देखिए जम्हूरियत का मतलब है आज़ादी, मगर यह बात आपकी समझ में क्यों आएगी, इसलिए कि आप चुनाव आयोग से डरते हैं. अगर चुनाव आयोग का सब्र और राजनेताओं की आज़ादी देखना चाहते हैं तो मेरी जान कभी आओं ना पाकिस्तान सुरमा लगाके.

ख़बर पैदा करने का सही तरीक़ा

पोस्ट के विषय:

وسعت اللہ خان|बुधवार, 15 अप्रैल 2009, 14:40

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आज सीएनएन-आईबीएन, एनडीटीवी जैसे ज़िम्मेदार चैनलों समेत बहुत से भारतीय चैनलों पर यह ख़बर चल रही थी- " नई दिल्ली के इंडियन इटरनेशनल सेंटर में पाकिस्तान के पत्रकारों पर राम सेना के नौजवानों का हमला, हालात पर क़ाबू करने के लिए पुलिस तलब."

मैं भी इस सेमिनार में भाग ले रहे ढाई सौ लोगों में मौजूद था, जो भारत-पाकिस्तान में अंधराष्ट्रभक्ति की सोच बढ़ाने में मीडिया की भूमिका के मौजू पर जानी-मानी लेखिका अरुंधति राय, हिंदुस्तान टाइम्स के अमित बरुआ, मेल टुडे के भारत भूषण और पाकिस्तान के रहीमुल्ला युसुफ़जई और वीना सरवर समेत कई वक्ताओं को सुनने आए थे.

जो वाक़या राई के दाने से पहाड़ बना वह बस इतना था कि रहीमुल्ला युसुफ़जई पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी मीडिया के ग़ैर ज़िम्मेदराना रवैए का तुलनात्मक जायज़ा पेश कर रहे थे तो तीन नौजवानों ने पाकिस्तान के बारे में नारा लगाया.

प्रबंधकों ने उनको हाल से बाहर निकाल दिया. बस फिर क्या था जो कैमरे सेमिनार की कार्रवाई फ़िल्मा रहे थे वे सब के सब बाहर आ गए और उन नौजवानों की प्रबंधकों से हल्की-फुल्की हाथापाई को फ़िल्माया और साउंड बाइट के तौर पर उन नौजवानों के इंटरव्यू लिए.

प्रबंधकों ने एहतियात के तौर पर पुलिस के पाँच-छह सिपाहियों को हाल के बाहर खड़ा कर दिया.
सेमिनार की कार्रवाई इसके बाद डेढ़ घंटे तक जारी रही. सवाल-जवाब का लंबा सेशन हुआ.

ढाई सौ लोगों का लंच हुआ लेकिन चैनलों को मिर्च-मसाला मिल चुका था. इसलिए उनकी नज़र में सेमिनार तो गया भाड़ में, ख़बर यह बनी कि पाकिस्तानी पत्रकारों पर नौजवानों का हमला.

फिर यह ख़बर सरहद पार पाकिस्तानी चैनलों ने भी उठा ली और पेशावर में मेरी बीवी तक भी पहुँच गई. उसने फ़ोन करके कहा, आप ख़ैरियत से तो हैं. कोई चोट तो नहीं लगी.

जब मैंने कहा इस वाकए का कोई वजूद ही नहीं है तो कहने लगी आप मेरा दिल रखने के लिए झूठ बोल रहे हैं.

अब मैं यह बात किससे कहूँ कि जिसे कल तक पत्रकारिता कहा जाता था. आज वह बंदर के हाथ का उस्तरा बन चुकी है और ऐसे माहौल में भारत-पाकिस्तान में जिंगोइज़्म यानी कि अंधराष्ट्रभक्ति बढ़ाने में मीडिया की भूमिका की बात करना ऐसा ही है कि अंधे के आगे रोए, अपने नैन खोए.

आर-पार की लड़ाई

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|रविवार, 12 अप्रैल 2009, 13:16

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने एक-दूसरे पर ज़हर बुझे तीरों की बरसात कर रखी है. यह दंगल जैसे चुनाव 2009 से अलग, एक नई ही महाभारत की शक्ल अख़्तियार करता जा रहा है.

2009 चुनावी महाभारत से अलग इस दंगल में मनमोहन सिंह बनाम आडवाणी वाकयुद्ध को इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि क्या वाक़ई यह दोनों अनुभवी नेता -- अगर हम इनकी उम्र जोड़ दें तो आंकड़ा 150 पार कर जाएगा -- यह ख़ुशफ़हमी रखते हैं कि भारत की एक अरब से भी ज़्यादा जनता के समक्ष इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह मनमोहन सिंह और आडवाणी में से किसको चुने ?

यह कई चुनावी मु्द्दों में से एक हो सकता है, पर जितना समय यह दोनों महानुभाव अपने बयानों और भाषणों में एक-दूसरे को देते हैं उससे लगता है कि जहां आमतौर पर लोग स्वयं की शक्ति या महत्व के बारे में ग़लतफ़हमी पालते हैं, इस मामले में यह दो प्रबुद्ध नेता शायद दूसरे को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व दे रहे हैं.

अजब धृतराष्ट्र 'कॉम्पलेक्स' है ये.

अब अगर जनता ने, या यूँ कहिए चुनाव के बाद की गणित ने दोनों को ही नकार दिया तो इनकी एक दूसरे को इतनी 'इंपॉर्टेंस' देने की क्या गत बनेगी ?

क्या कहेंगे ये सबसे ? कि भाई हमने तो पूरी चुनावी मुहिम में बस एकसूत्रीय कार्यक्रम चला रखा था और वह इतना ज़बर्दस्त चला कि हमें तो कुछ नहीं मिला पर हम सामने वाले को ज़रूर ले डूबे.

चलिए चुटकी लेना बंद करता हूँ. संजीदा बात करें तो क्या भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को यह शोभा देता है कि प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष के नेता के संबंध इतने कटु हो जाएं कि दोनों हर स्तर पर जाकर एक-दूसरे को नीचा दिखाएं ?

क्या देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन राजनीतिज्ञ, सार्वजनिक जीवन में बहस के स्तर को इतना व्यक्तिगत बनाकर ग़लत उदाहरण नहीं पेश कर रहे ?

आडवाणी और मनमोहन सिंह की राजनीति से आप समहत या असहमत हो सकते हैं. पर शायद ही कोई कहेगा कि इतना सब हासिल करने के बावजूद मनमोहन सिंह या आडवाणी सार्वजनिक जीवन में शालीनता और विनम्रता नहीं रखते.

तो फिर ऐसा क्या हो गया है कि एक-दूसरे का ज़िक्र आते ही इन अनुभवी, बुज़ुर्ग महारथियों का ख़ून इस क़दर खौलने लगता है कि दोनों ही कुछ व्यक्तिगत स्तर पर उतर कर जैसे 'बिलो दि बेल्ट' प्रहार करते हैं.

आडवाणी ने मनमोहन सिंह को इतनी बार कमज़ोर प्रधानमंत्री कहा कि लोग गिनती भूल गए. हर मौक़े पर उनका कहना था कि सत्ता का असली केंद्र 10 जनपथ यानी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का निवास है.

बात सही है, इससे तो कांग्रेसी भी इंकार नहीं कर सकते, पर शायद बार-बार और लगातार स्वयं को 'कमज़ोर और निकम्मा' सुनते-सुनते मनमोहन सिंह भी राजनीतिक शालीनता को ताक़ में रखते हुए जैसे फट पड़े और कह उठे कि वह तो कमज़ोर सही पर आडवाणी का सार्वजनिक जीवन में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के अतिरिक्त और क्या योगदान है ? तब आडवाणी के जैसे काटो तो ख़ून नहीं.

हिंदुत्व और नो हिंदुत्व. अयोध्या आडवाणी की राजनीतिक महत्वकांक्षा के रास्ते में दुखती रग है और उसी ज़ख़्म को मनमोहन सिंह ने इतनी बेदर्दी से फिर ताज़ा कर दिया.

बाबरी मस्जिद विध्वंस और राम मंदिर आंदोलन में आडवाणी की भूमिका पर इस ब्लॉग में विस्तृत चर्चा की आवश्यकता नहीं है. लेकिन आडवाणी के 60 वर्ष के सार्वजनिक जीवन को जिस तरह एक वाक्य में मनमोहन सिंह ने निपटा दिया है, क्या वह सही और उचित है ?

राय इस प्रश्न पर भी अलग-अलग हो सकती है, पर आडवाणी और उनकी पार्टी बुरी तरह आहत है और 'कमज़ोर' प्रधानमंत्री पर लगातार निशाना बनाए हुए है.

बात सिर्फ़ यह नहीं है कि दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर के हिस्से रोटी जा सकती है. जनता-जनार्दन जो चाहे वही होगा. पर एक पूरे युग का प्रतिनिधित्व करने वाले दो वरिष्ठ दिग्गजों को देश के समक्ष राजनीतिक आचरण का ज़्यादा अनुसरणीय उदाहरण पेश करना चाहिए.

.....लेकिन जरनैल हीरो हैं

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|गुरुवार, 09 अप्रैल 2009, 13:44

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दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह. क्या उन्होंने कभी सोचा था कि वह स्वयं ख़बर बनेंगे. और वह भी इस तरह कि अपने कलम से नहीं अपने जूते से पहचाने जाएँगे. देश-विदेश के मीडिया में उनके नाम की चर्चा होगी.

एक 25 वर्ष पुराने मुद्दे को जरनैल सिंह ने एक ऐसी चिंगारी दी है कि न सिर्फ़ पूरे मुल्क में आज एक बार फिर सिख विरोधी दंगे सुर्ख़ियों में हैं बल्कि ज़मीन पर कांग्रेसियों के लिए कुछ भगवान जैसे सर्वशक्तिमान और सर्वगुण संपन्न आलाकमान ने भी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के लोकसभा चुनाव के टिकट काट दिए.

मैं न एक पत्रकार की तरह यह लेख लिख रहा हूँ, न ही पत्रकारिता की कसौटी पर जरनैल सिंह को परख रहा हूँ.

एक पत्रकार की तरह जरनैल सिंह ने जो किया वह ग़लत किया. पर यह तो वह स्वयं मानते हैं. उन्होंने जो किया वह एक आम भारतीय की तरह किया जो न्याय के इंतज़ार में हताश हो चुका है और जब उसके सब्र का प्याला भर गया तो उसने एक निहायत अहिंसक अंदाज़ में गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंक दिया.

अहिंसक इसलिए कि जिस तरह ग़रीब जरनैल ने चिदंबरम साहब पर जूता फेंका उससे मुझे बचपन के वह दिन याद आ गए जब क्रिकेट खेलते वक़्त कुछ बच्चे तो जैसे एंडी राबर्ट्स, मार्शल और इमरान ख़ान के अंदाज़ में गेंद फेंकने दौड़ते थे तो गेंद उनके हाथ से निकलने से पहले ही मन बैठने लगता था. जरनैल के तेवर वैसे नहीं थे. उनका जूता फेंकने का अंदाज़ कुछ उन बच्चों जैसा था जो अंडरआर्म गेंद फेंकते थे जिनकी गेंद पर अगर आप चंद्रशेखर जैसे निखट्टू बल्लेबाज़ भी हों तो क्रीज के बाहर निकल छक्का मारने के बारे में सोच सकते थे. मतलब यह कि जरनैल का इरादा किसी को चोट पहुँचाने का था ही नहीं. न ही वह शायद घर से यह सोचकर निकला था कि बस आज मेरा दिन है. उधर मेरा जूता चला इधर मैं हीरो बना.

उससे तो बस जूता चल गया और चला तो ऐसा चला कि पहले दिन कई चैनल तो बहुत-बहुत देर तक उस जूते का ही क्लोज़ अप दिखाते रहे. जैसे सारा कमाल तो जूते का ही हो. मानो वह किसी सुदर्शन चक्र की तरह अपने आप ही चल गया हो.

खैर असली बात पर लौटें. जरनैल के जूते का जोर देखिए. बरसों का दबा-कुचला मुद्दा वापस जैसे ज्वालामुखी बन गया. कांग्रेसियों को फिर न्याय-अन्याय की बात ध्यान आने लगी. यहाँ तक की सरकार ने सीबीआई तक से जवाब तलब कर डाला कि आख़िर टाइटलर को क्लीन चिट देने की सूचना गृह मंत्रालय को क्यों नहीं दी गई. पंजाब में सिख, सड़कों से रेल पटरियों तक जो मिला उसे रोक खड़े हो गए.

कुल मिलाकर जरनैल के जूते ने वह कर दिखाया जो 25 साल तक कई विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन नहीं कर सके.

इधर इस छोटी-मोटी क्रांति के जनक जरनैल सिंह अपनी जीविका के बारे में चिंतित हैं. बड़े-बड़े पत्रकारों ने जो उनकी कड़ी भर्त्सना की है उसके बाद मालूम नहीं दैनिक जागरण उनकी नैकरी जारी रखेगा या नहीं. स्वयं जनरैल को जो मिलता है उससे ही वह यह कहना शुरू कर देते हैं कि उनसे बड़ी भूल हो गई. एक पत्रकार की तरह उन्हें यह नहीं करना चाहिए था. इस पूरे किस्से में वह अपनी शादी की सालगिरह तक पर घर नहीं जा सके. और बेचारे घरवाले भी, उन्हें जो मिलता है उससे कहते हैं कि अपना जरनैल तो यूपीए सरकार को पसंद करता है. जरनैल ख़ुद किसी को भी वह करने की सलाह नहीं देते जो उन्होंने किया. कुल मिलाकर जरनैल समेत उनका पूरा परिवार हैरान-परेशान और कुछ प्रायश्चित बोध में है.

कोई कुछ भी कहे मैं तो जनरैल को एक नायक की तरह देख रहा हूँ. उसमें एक शराफ़त, ईमानदारी और विनम्रता झलकती है. साथ ही वह अपने समाज के लिए न्याय भी चाहता है. अब इसमें क्या ग़लत है. जरनैल एक रिलक्टेंट ही सही लेकिन एक कामयाब हीरो है.

कुछ नायक होने की बधाई चिदंबरम साहब के हिस्से में भी जानी चाहिए जिन्होंने बड़प्पन दिखाते हुए जरनैल पर कोई पुलिस कार्रवाई नहीं होने दी.

कुछ लोग कह सकते हैं कि आप इस तरह जरनैल की तारीफ़ कर दूसरे लोगों को उकसा रहे हैं. आगे और भी और बात-बात पर, जूते चलेंगे तो फिर क्या होगा.

हो तो कुछ भी सकता है. और भारत में जूते चलने से भी ज़्यादा ख़राब काफ़ी कुछ हो रहा है. पर एक बात मैं बता दूँ- बिना मौक़े या दस्तूर के कोई एक जूता क्या पूरी बाटा की दुकान भी फेंक देगा तो उस पर कोई ध्यान नहीं देगा.

लोकतंत्र का सामंतवाद

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|बुधवार, 08 अप्रैल 2009, 11:11

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लालू प्रसाद यादव ने वरुण गांधी के संदर्भ में जो 'रोलर चला देता' वाला बयान दिया है, उससे शीर्ष पदों पर बैठे भारतीय नेताओं की मानसिकता का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं.

भारत में पहले राजशाही थी. लोकतंत्र के जामे में सामंतवाद आज भी कायम है और लालू प्रसाद यादव के बयान से उन जैसे नेताओं का ख़ुद को चुने हुए शहंशाह समझने का भ्रम झलकता है.

जो उन्होंने सोच लिया वही सही है, जो उनके मुँह से निकल गया वही क़ानून है. वोट लेने के लिए और तथाकथित वोट बैंकों को लुभाने के लिए वे कुछ भी कह-कर सकते हैं.

वरुण गांधी के मुस्लिम विरोधी भाषण की इस ब्लॉग पर हमने जम कर आलोचना की थी और कहा था कि अपना राजनीतिक भविष्य सँवारने का वरुण इससे ग़लत रास्ता नहीं चुन सकते थे.

पर वरुण के समर्थक फिर भी उनकी अपरिपक्वता, कम तजुर्बे और नौजवान ख़ून की नासमझी की दुहाई देते हुए उनकी हो रही आलोचनाओं में कुछ राहत की बात कह सकते थे, यह अलग बात है कि यह सब बात पुख़्ता दलील कम और पकड़े जाने पर नरमी की दलील का बहाना ज़्यादा लगती है.

पर लालू जी न तो राजनीति और सार्वजनिक जीवन में दूध पीते बच्चे हैं और न ही 'जेपी आंदोलन' के दौरान राजनीति में उभरे लालू जी सियासी अनुभव में किसी भी अन्य नेता के मुक़ाबले उन्नीस पड़ते हैं.

फिर आख़िर क्या सोच लालू जी यह बोले कि अगर वे देश के गृह मंत्री होते तो वरुण की छाती पर रोलर चलवा देते, फिर चाहे नतीजा कुछ भी होता.

क्या लालू जी को वाक़ई इस बात का इल्म नहीं था कि वे क्या बोल रहे हैं और उसका क्या परिणाम हो सकता है. या फिर सत्ता के मद में वे इतना निरंकुश हो गए कि वो जो कहें और सोचें वही सही है.

क्या वोट बैंक की राजनीति में जैसे सब अच्छाई, सभ्यता और सार्वजनिक चर्चा के तौर-तरीक़े भारतीय नेता 'स्वाहा' करने पर आमादा हैं.

वोट बैंक की राजनीति की बात चल ही गई है तो एक बात और....क्या इन नेताओं ने- फिर चाहे वह वरुण हों या लालू जी--हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं को इतना मूर्ख या आसानी से वरगलाया जा सकने वाला समझ लिया है कि यह वर्ग बस इनकी बातों, बयानों और भाषणों के पीछे की असलियत समझे बिना उनके सियासी खेल का मोहरा बने रहेंगे?

अब लालू जी यह कह कर बचने की कोशिश कह रहे हैं कि उनकी बातों का गूढार्थ देखा जाए. वे तो वरुण की राजनीति पर रोलर चलवा देने की बात कह रहे थे.

पर लालू जी, अंग्रेजी की कहावत है जो अंत कुछ इस तर्ज़ पर होती है, '......यू कांट फूल ऑल द पीपल ऑल द टाइम.' यानी, आप सभी लोगों को हर समय मूर्ख नहीं बना सकते.

जितनी जल्दी यह बात भारतीय नेताओं की समझ में आ जाए, उतना ही यह बोध उनके और भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा.

मैं हूँ असली और बड़ी माँ!

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|मंगलवार, 07 अप्रैल 2009, 14:49

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ऑल-टाइम ग्रेट हिंदी फ़िल्मों की सूची बनेगी तो कम से कम मैं उसमें अमिताभ बच्चन की 'दीवार' अवश्य शामिल करूँगा. 'दीवार' की लोकप्रियता का एक कारण उसके ज़बरदस्त डॉयलाग भी थे. फ़िल्म में यूँ तो कई यादगार डॉयलाग हैं, पर जैसे 'शोले' की याद आते ही "अरे ओ सांभा" ध्यान आता है, वैसे ही 'दीवार' की बात चलते ही मुझे अमिताभ और शशि कपूर के बीच पुल के नीचे हुई उस डायलॉगबाज़ी का सिलसिला स्मरण आता है, जिसमें शशि कपूर अमिताभ को यह कह जैसे निरुत्तर कर देते हैं कि " मेरे पास माँ है."

महानायक अमिताभ बच्चन की कई कामयाब फ़िल्मों में एक मज़बूत माँ का किरदार काफ़ी 'सेंट्रल' होता था (त्रिशूल, शक्ति इत्यादी) और इस सिलसिले का आरंभ भी शायद 'दीवार' फ़िल्म के साथ हुआ था.

कोई कनेक्शन नहीं है 'दीवार' फ़िल्म का और इस डायलॉग का, पिछले सप्ताहांत जो मेनका गांधी और मायावती में वाकयुद्ध चला उससे. पर न जाने क्यूँ जितनी बार इन दोनों ने " मैं हूँ असली और बड़ी माँ " का दाँव चला, मुझे 'दीवार' की याद आ गई.

लेकिन 'दीवार' में आनंद आया था. लगा था एक क्लासिक देख रहे हैं. मुँह से अनायास ही जैसे कई बार वाह-वाह की तर्ज़ पर दाद निकल जाती थी.

मेनका-मायावती प्रकरण उसके मुक़ाबले किसी बी-ग्रेड फ़िल्म का सीन लगा. मेनका गांधी का यह कहना कि मायावती किसी माँ की पीड़ा क्या समझेंगी, कोई बहुत अच्छे अंदाज़ में की गई टिप्पणी नहीं लगी. अंग्रेज़ी जुमले का इस्तेमाल करें तो कुछ ' बिलो दी बैल्ट' बात लगी.

मायावती की पहली प्रतिक्रिया तो जैसे, नहले पर दहला थी.

उनका कहना था कि वह केवल एक बच्चे की नहीं स्वयं को वरुण जैसे सैकड़ों-हज़ारों युवाओं की माँ समझती हैं. उनका आगे दिया गया बयान भी कि अगर मेनका वरुण को सही संस्कार देतीं तो वह शायद जेल में नहीं होते, कुछ हल्का तो लगा लेकिन चुनावी गर्मी और मेनका ने जो उनके 'माँ' नहीं होने को मुद्दा बनाया था, उसमें शायद उसे नजरअंदाज़ किया जा सकता था.

पर हद तो तब हो गई जब मायावती ने स्वयं की मदर टरेसा से तुलना करने की कोशिश और कहा कि मदर भी तो माँ नहीं थीं लेकिन कितने लाखों लोगों की पीड़ा न सिर्फ़ समझती थीं उसे दूर भी करने की कोशिश करती थीं.

फिर मेनका का जवाब आया कि मदर अपनी वर्षगांठ पर जबरन चंदा वसूली नहीं करती थीं और इंजीनियर्स का ख़ून नहीं करवाती थीं.

अबतक मेनका बनाम मायावती यह एपिसोड बी-ग्रेड भी नहीं किसी सी-ग्रेड फ़िल्म में से उठाया हुआ सीन लगने लगा था.

सच भारतीय नेता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी पर्व पर किस तरह का उदाहरण पेश करना चाहते हैं. क्या इस स्तर के वाकयुद्ध में उलझ वह सोच सकते हैं कि अच्छे लोग राजनीति में आएँगे और नेताओं की इज्जत करेंगे.

अच्छा हो कि इन नेताओं के भाषण और बयानों का ज़िम्मा किसी फ़िल्म लेखक को ही दे दिया जाए. मनोरंजन कुछ ज़्यादा स्वस्थ होगा और स्तर भी कुछ बेहतर. क्योंकि इन फ़िल्म लेखकों को तो सेंसर की कैची का कुछ लिहाज़ और डर होगा.

चरम पर है राजनीतिक अवसरवाद

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|शनिवार, 04 अप्रैल 2009, 12:20

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पच्चीस साल की अपनी पत्रकारिता में मैंने कई चुनाव देखे और रिपोर्ट किए हैं.

भारतीय चुनाव किसी जलसे या पर्व से कम नहीं होते और अगर आप किसी भी राजनीतिक रिपोर्टर से पूछिए तो वह बता देगा कि राजनीतिक ख़ासकर चुनावी रिपोर्टिंग का भी एक अनूठा, जैसे सिर चढ़कर बोलने वाला नशा और आनंद है.

पर यह चुनाव कुछ अलग है. शायद अभी चुनावी बुखार अपने परवान पर नहीं है. या फिर मैं ही चुनावी रिपोर्टिंग कर-करके कुछ सिनिकल या कम उत्साहित हो गया हूं.

पर अपने को जल्दी बोर हो जाने वाले आदमी की तरह मैं अभी कतई नहीं देखता.

जिन चीज़ों में मज़ा है, जिनका शौक है, और मैं ऐसा मानना चाहूंगा कि राजनीतिक रिपोर्टिंग और गपशप उन चीज़ों में शामिल हैं, उनमें मेरा अभी भी जैसे बालपन का उत्साह मौजूद है.

फिर ऐसा क्या है कि इन चुनावों में न सिर्फ दिलचस्पी ही कुछ कम पैदा हो रही है बल्कि एक अजब सी नकारात्मक अनुभूति भी इस चुनावी प्रक्रिया के सिलसिले में हो रही है.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ मज़ा ही नहीं आ रहा है... कुछ अच्छा भी नहीं लग रहा है.

कारण कल उस समय बिजली की तरह जैसे स्पष्ट हुआ जब एक जानी मानी महिला सांसद ने बातों बातों में कहा कि "दीज़ इलेक्शंस सिगनल दि डैथ ऑफ़ आइडियोलॉजी" या इन चुनावों ने सिद्धांतों को जैसे दफ़्न किए जाने का संदेश दिया है.

बिल्कुल सही. चुनाव सत्ता पाने की कवायद है यह तो हम सब आरंभ से ही जानते थे पर इस कवायद को कुछ अच्छे लोगों ने और ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने सत्ता पाने का नंगा और सिद्धांतहीन खेल बनने से रोका हुआ था.

या कम से कम वह सिद्धांतों का एक ऐसा आवरण तो अपनी महात्वाकांक्षाओं पर डालने में कामयाब होते थे कि उनकी सत्तालोलुपता छुप जाती थी. जैसे यशपाल की कहानी 'पर्दा' में चौधरी पीरबख़्श अपने घर की ग़रीबी और आबरू को पर्दे से छिपाकर रखता है.

पर अब तो खुला खेल फ़र्रुखाबादी है. हर दूसरा राजनीतिज्ञ और संयोजक आपको बिना पलक झपकाए यह कहता मिल जाएगा कि जनाब असली खेल तो 16 मई को चुनावों के बाद शुरू होगा. तब देखिएगा कि कौन किसके हाथ जाएगा. अभी हो रही घोषणाओं और गठबंधनों का कोई मतलब नहीं है.

मतलब यह कि इस समय हर राजनीतिक दल की कोशिश बस एक है कि वह ज़्यादा सांसदों के साथ 16 मई को नज़र आए और फिर जहाँ उसे 'बेस्ट डील' मिले, वहीं अपने तामझाम के साथ डेरा डाल दे. यानी सिद्धांत, पहले से तय गठबंधन, पुरानी दोस्ती इत्यादि सब बातें गईं तेल लेने.

कल लोग कह सकते हैं कि पत्रकारों को तो सिर्फ़ राजनेताओं की खिंचाई करने में मज़ा आता है. तो उन्हें बानगी स्वरूप पेश कीजिए इन चुनावों के दौरान जानी मानी पार्टियों और उनके नेताओं के पाला बदलने की फ़ेहरिस्त.

किस अंदाज़ में लालू-पासवान की जोड़ी ने बिहार में कांग्रेस को धता बताया. मंत्रिमंडल में फिर भी बरक़रार रहे और जिस दिन चौथा मोर्चा बनाने लखनऊ पहुँचे, उस दिन चौथे मोर्चे को तो छोड़िए, तीसरे मोर्चे को भी धता बता डाला.

आपने देखा होगा कि किस प्रकार लालू और पासवान ने शुक्रवार को लखनऊ में यूपीए और मनमोहन ही अगले प्रधानमंत्री होंगे के नारे का लगातार जाप किया. कल यही नेता फिर कोई नया राग अलाप सकते हैं.

कांग्रेस भी कुछ कम नहीं है. उन्होंने लालू जी को उनका सही स्थान दिखाने के लिए उनके साले साधु यादव को अपनी पार्टी से टिकट दे दिया. झारखंड में एकतरफा घोषणा कर दी अपने उम्मीदवारों की.

समाजवादी पार्टी की पहले जिस तरह उन्होंने अपनी सरकार बचाने के लिए समर्थन लिया और फिर धता बताया, ऐसे भी उदाहरण कम ही मिलेंगे.

शरद पवार को ही देखिए, खुद भी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, मनमोहन सिंह के नाम की दुहाई देते भी नहीं थकते. महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन करते हैं. तीसरे मोर्चे के साथ फ़्लर्ट करना भी बंद नहीं करते.

सबको मालूम है कि वो चुनाव के बाद कहीं भी हो सकते हैं और कोई प्रधानमंत्री बना दे तो फिर तो सचमुच कहीं भी जा सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं.

लेकिन मैं पवार साहब पर ही इतना मेहरबान क्यों हो रहा हूं. क्योंकि वो अपनी इच्छाओं और महात्वाकांक्षाओं के मामले में कई अन्य नेताओं से ज़्यादा पारदर्शी हैं. इस बात पर तो उनका अभिनंदन होना चाहिए, न कि इतनी आलोचना.

आखिर मुलायम, लालू, देवेगौड़ा, मायावती, जयललिता, नायडु और अब तो मार्क्सवादी भी शायद वही चाहते हैं. फिर पवार साहब को ही क्यों सिंगल आउट किया जाए.

गठबंधन जोड़ीदारों की बात करें तो लोगों ने रिश्ते और पार्टियाँ ऐसे बदली हैं कि हम और आप कपड़े भी क्या बदलते होंगे.

नवीन पटनायक के बीजू जनतादल ने भाजपा का 11 बरसों का साथ छोड़ने पर कोई सैद्धांतिक सफ़ाई देने की भी ज़रूरत नहीं समझी.

उनके एक नेता ने तो यहाँ तक कह डाला कि पार्टी ने यह फैसला अपनी जीत की संभावनाओं या 'विनेबिलिटी फ़ैक्टर' को ध्यान में रखते हुए लिया.

अभी भी कोई माई का लाल यह बात दावे के साथ नहीं कह सकता कि चुनाव बाद बीजू जनतादल किधर जाएगा. आवश्यकता पड़ने पर वह वापस एनडीए में भी जा सकते हैं.

उधर पीएमके और रामदॉस को ही देखिए. आखिरी दिन तक सत्ता का सुख लिया. केंद्र में मंत्री रहे, फिर एक मौके पर पाला बदल दूसरी तरफ हो गए.

चलिए यह भी सही पर जाते जाते यह भी कह गए कि आवश्यकता पड़ी यानी कि इस थाली में ज़्यादा घी नज़र आया तो चुनाव बाद फिर यूपीए में आ सकते हैं. अब इसे भी मौकापरस्ती नहीं कहेंगे तो फिर किसे कहेंगे.

इन चुनावों के बाद कुछ भी हो सकता है. शिवसेना शरद पवार का समर्थन कर सकती है, नितीश कुमार कांग्रेस के साथ जा सकते हैं और आडवाणी जी की कुंडली पर जैसे पीएचडी कर चुके लालू प्रसाद भी हर स्थिति में उनका विरोध करेंगे, इसकी संभावना तो है पर हालात देश के ऐसे हैं कि इसकी भी गारंटी कोई नहीं ले सकता है.

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