लोकतंत्र का सामंतवाद

लालू प्रसाद यादव ने वरुण गांधी के संदर्भ में जो 'रोलर चला देता' वाला बयान दिया है, उससे शीर्ष पदों पर बैठे भारतीय नेताओं की मानसिकता का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं.
भारत में पहले राजशाही थी. लोकतंत्र के जामे में सामंतवाद आज भी कायम है और लालू प्रसाद यादव के बयान से उन जैसे नेताओं का ख़ुद को चुने हुए शहंशाह समझने का भ्रम झलकता है.
जो उन्होंने सोच लिया वही सही है, जो उनके मुँह से निकल गया वही क़ानून है. वोट लेने के लिए और तथाकथित वोट बैंकों को लुभाने के लिए वे कुछ भी कह-कर सकते हैं.
वरुण गांधी के मुस्लिम विरोधी भाषण की इस ब्लॉग पर हमने जम कर आलोचना की थी और कहा था कि अपना राजनीतिक भविष्य सँवारने का वरुण इससे ग़लत रास्ता नहीं चुन सकते थे.
पर वरुण के समर्थक फिर भी उनकी अपरिपक्वता, कम तजुर्बे और नौजवान ख़ून की नासमझी की दुहाई देते हुए उनकी हो रही आलोचनाओं में कुछ राहत की बात कह सकते थे, यह अलग बात है कि यह सब बात पुख़्ता दलील कम और पकड़े जाने पर नरमी की दलील का बहाना ज़्यादा लगती है.
पर लालू जी न तो राजनीति और सार्वजनिक जीवन में दूध पीते बच्चे हैं और न ही 'जेपी आंदोलन' के दौरान राजनीति में उभरे लालू जी सियासी अनुभव में किसी भी अन्य नेता के मुक़ाबले उन्नीस पड़ते हैं.
फिर आख़िर क्या सोच लालू जी यह बोले कि अगर वे देश के गृह मंत्री होते तो वरुण की छाती पर रोलर चलवा देते, फिर चाहे नतीजा कुछ भी होता.
क्या लालू जी को वाक़ई इस बात का इल्म नहीं था कि वे क्या बोल रहे हैं और उसका क्या परिणाम हो सकता है. या फिर सत्ता के मद में वे इतना निरंकुश हो गए कि वो जो कहें और सोचें वही सही है.
क्या वोट बैंक की राजनीति में जैसे सब अच्छाई, सभ्यता और सार्वजनिक चर्चा के तौर-तरीक़े भारतीय नेता 'स्वाहा' करने पर आमादा हैं.
वोट बैंक की राजनीति की बात चल ही गई है तो एक बात और....क्या इन नेताओं ने- फिर चाहे वह वरुण हों या लालू जी--हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं को इतना मूर्ख या आसानी से वरगलाया जा सकने वाला समझ लिया है कि यह वर्ग बस इनकी बातों, बयानों और भाषणों के पीछे की असलियत समझे बिना उनके सियासी खेल का मोहरा बने रहेंगे?
अब लालू जी यह कह कर बचने की कोशिश कह रहे हैं कि उनकी बातों का गूढार्थ देखा जाए. वे तो वरुण की राजनीति पर रोलर चलवा देने की बात कह रहे थे.
पर लालू जी, अंग्रेजी की कहावत है जो अंत कुछ इस तर्ज़ पर होती है, '......यू कांट फूल ऑल द पीपल ऑल द टाइम.' यानी, आप सभी लोगों को हर समय मूर्ख नहीं बना सकते.
जितनी जल्दी यह बात भारतीय नेताओं की समझ में आ जाए, उतना ही यह बोध उनके और भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा.

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सबसे पहले इतने अच्छे ब्लॉग के लिए संजीव जी को बधाई. मेरे विचार से भारत और भारतीयों की कोई चिंता नहीं करता है. सारे नेता सिर्फ़ वोटों की राजनीति कर रहे हैं और वे ये नहीं सोच रहे हैं कि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को नष्ट कर रहे हैं. राजनेता चाहते हैं कि लोग अहम मुद्दों की चर्चा न करें क्योंकि उस बारे में कहने के लिए उनके पास कुछ है ही नहीं. इसलिए ऐसे बयानों के ज़रिए वे लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं.
यहाँ सारे नेता कुछ हटकर बोलने के चक्कर में कुछ भी बोले जा रहे हैं. चाहे वो वरुण हों या मेनका या मायावती या फिर लालू.
सवाल ये नहीं है कि वो लोग क्या कह रहे हैं. असली मुद्दा यहाँ ये है कि इन बयानों का नतीजा क्या होगा. संजीव का लालू जी के इस बयान को सामंतवाद कहना बिल्कुल ग़लत है. संजीव जी वैसे वरुण के भाषण की आलोचना में ज़्यादा कटु थे. वैसे मैं मानता हूँ कि दोनों ही भाषणों का नतीजा ये होगा कि इससे मानवता के प्रति असम्मान ही बढ़ता है. यहाँ बौद्धिकता के स्तर का अंतर बहुत ही स्पष्ट है. इस वर्ग के लोगों के ऐसे रवैये से मौजूदा युवा वर्ग काफ़ी निराश है.
आजकल हर राजनेता में बोलने की होड़ लगी है. उनके लिए ये मायने नहीं रखता कि वो अच्छा बोल रहे हैं या बुरा बोल रहे हैं. अब ये तो जनता को तय करना होगा. लालू, मायावती और अमर सिंह जैसे नेताओं के लिए ये शर्म की बात है. भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में नहीं है.
ये लोग वास्तव में जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हैं. मगर उन्हें ये समझना चाहिए कि समय बीतने के साथ ही लोग अब अपने अधिकारों के प्रति ज़्यादा जागरूक हैं और उनमें सही या ग़लत की समझ है.
संजीव जी असल में लालू प्रसाद का बयान इस बात की तरफ़ इशारा हैं कि उनके 15 साल के शासन में बिहार की हालत ख़राब क्यों हुई है? बिहार में लोग क्यों क़ानून अपने हाथ में लेते हैं? क्योंकि एक चोर को लोग पीट पीट कर मार डालते हैं?
लालू का बयान बिल्कुल बकवास है. वे सोचते हैं कि इस तरह के बायन से मुसलमान ख़ुश हो जाएंगे, जोकि उनका भ्रम है. ना वरुण सही हैं और ना ग़लत है. लेकिन लालू वरिष्ठ नेता है इसलिए उनको ऐसा बयान नहीं देना चाहिए.
लालू का बयान विपक्ष को उत्तेजित करेगा और ये मायावती, कांग्रेस और ख़ुद लालू के लिए नुक़सानदह होगा.
दरअसल ये एक तकलीफ़दह मामला है कि राजनीति के केंद्र में रहे लालू जैसे नेता वोट के लिए इस तरह का बयान दें. नतीजतन हम लोग बिहार की हालत देख सकते हैं. यह बहुत ही शर्मनाक बयान है. वरुण और लालू को क़ानून के मुताबिक़ सज़ा होनी चाहिए.
संजीव जी आप का अवलोकन बहुत सही है. हम लोगों ने अपने राजनेताओं से येही सिखा है कि जो मुद्दे सबसे स्तरहीन होते हैं उसकी को वो उछालते हैं. ये नेता उन मुद्दों को उछालना नहीं चाहते जिनका लागू करना चुनौतीपूर्ण है और उसके के लिए बड़े दृष्टि की आवश्यकता है. सांप्रदायिकता, मंदिर-मस्जिद और भाषा के सवाल आसानी से लोग जुड़ जाते हैं. इसलिए ये नेता ऐसे सवाल उठाते हैं.
यह हमारे देश का दुर्भाग्य है की इतने बड़े देश में एक भी ऐसा नेता नहीं जो देश के विकास की बात करे, समस्यों की बात करे , उनके निदान की बात करे, शायद कभी ऐसा नेता मिल जाये लेकिन आशा काफी कमहै
अपना अस्तित्व बचाने के लिए लालू ने ऐसा बयान दिया है. नीतीश के विकास के सामने वो काफ़ी मुश्किल में हैं इसलिए वो मुसलमानों को लुभा रहे हैं. इस समय मुसलमान नीतीश की तरफ़ झुक रहे हैं ऐसे में लालू के लिए परेशानी है.
लालू पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए. राजनीतिक ज़िम्मेदारी लेने से पहले आदमी को ज़िम्मेदार नागरिक होना ज़रूरी है.
संजीव जी का नया अंदाज़ मुझे बहुत अच्छा लगा. आपने बेबाक और निष्पक्ष तरीक़े से मामले को उठाया है. हमे उम्मीद करनी चाहिए कि मतदाता सभी पहलू पर विचार करके ही अपना मत देंगे. कुछ हद तक हमारी भी ज़िम्मेदारी भी है.
मैं समझता हूँ कि पुरान नेता लोकतंत्र को सही ढंग से नहीं समझ रहे हैं इसलिए राजनीति में प्रवेश के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योगता की शर्त होनी चाहिए. हर एक को लोकतंत्र का पाठ पढ़ना चाहिए.
एख सांप्रदायिकता को बढ़ावा है तो दूसरा सांप्रदायिकता की राजनीति है.
भारतीय नताओं को लोगों की और इस देश की समस्याओं, उपलब्धियों पर बयान देना चाहिए.
यह गंदी राजनीति हमें कहा ले जा रही है. वरुण, सोनिया, सुषमा, विजय गोयल के बाद लालू जी की भी ज़बान फिसल गई. आख़िर दूसरों पर हमला करके राजनीति कहां तक करेंगे. देश में सांप्रदायिकता की राजीति को ख़त्म करने की ज़रुरत है.
वरुण ने अपने भाषण में कुछ भी ग़लत नहीं कहा है. हम इस बात को क्यों नहीं समझ रहे हैं कि भारत की मौजूदा राजनीतिक की वजह से इस देश में हिंदू सुरक्षित नहीं है. राजनेता केवल मुसलमानों का ख़्याल रखते हैं. मैं बीबीसी को एक ज़माने से सुन रहा हूँ लेकिन कभी भी कुछ ग़लत नहीं सुना. लेकिन संजीव जी ने अपने इस ब्लॉग में वरुण के बारे में जो विश्लेषण किया है उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता.
लालू ने जो कहा है वो सही नहीं है, लेकिन निश्चिच तौर पर इस तरह की भाषा का प्रयोग करने वाले के ख़िलाफ़ क़ानून होना चाहिए, ताकि देश की एकता को क़ायम रखा जा सके. लालू और वरुण जैसे लोगों को ऐसा कहने के लिए सज़ा होनी चाहिए. ये नेता अभिव्यक्ति के अधिकार का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे नेताओं से वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिए.
लालू प्रसाद पर रासुका लगाया जाना चाहिए.
इस ब्लॉग के लिए संजीव जी को मेरी शुभकामनाएं. मैं समझता हूँ कि ज़बानी जमाख़र्च के माध्यम से ये नेता वोटरों को लुभाने और भटकाने की कोशिश कर रहे हैं. आज कल भड़काऊ भाषण या टिप्पणी राजनीतिक स्टाइल में दिए जा रहे हैं. जो चुनावी मुद्दे को पीछे धकेल रहे हैं. ऐसी भाषा का प्रयोग शर्मनाक है.
संजीव जी बेलाग और जनता व नेता को आईना दिखाने वाले ब्लॉग के लिए हार्दिक बधाई. हक़ीक़त यह है कि इस स्थिति के लिए हम सब ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि हम सब उनके झांसे में आ जाते हैं. सबसे पहले हमे आपने आप को बदलना होगा और वोट डालते समय हमे जाति, रंग और धर्म को नहीं देखना चाहिए.
संजीव जी को पढ़ना और सुनना हमेशा एक आनंददायक अनुभव होता है. नेताओं में नैतिकता और मर्यादा नाम की चीज़ तो रह ही नहीं गयी है. चाहे वो वरुण का बयान हो, लालू यादव का या फिर राबड़ी देवी का बयान यह बात साफ़ होती है कि वोट पाने के लिए हमारे नेता कुछ भी बोल सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं.
लालू का मक़सद साफ़ है, वे चाहते थे कि वे अपना झुकाव मुसलमानों की तरफ़ दिखाएं. जोकि उनका वोट बैंक रहा है, नहीं तो वो ऐसी बात नहीं कहते.
हर कोई में इतना दम नहीं है कि वो नेता बन जाए, लेकिन अच्छा होता कि सब लोग सही रास्ता को चुने और नेता बने.
बीबीसी हिंदी की तरफ़ से ये बहुत अच्छी शुरुआत है. सारे राजनेता अपना-अपना कार्य कर रहे हैं. मैं समझता हूँ कि अब भारत पहले के मुक़ाबले अधिक शिक्षित हो गया है ऐसे में अच्छे नेता को चुनना चाहिए. जाति, रंग और धर्म हमारे ख़ून में है इसलिए हम इससे इनकार नहीं कर सकते. फिर भी हम लोगों को अच्छे लोकतंत्र की शुरुआत करने पड़ेगी और इसके लिए अच्छे लोगों को चुनना पड़ेगा.
बहुत सही, यह बहुत अच्छा ब्लॉग है.
सर्वप्रथम मैं संजीव जी को उनके वास्तविक तर्क के लिए धन्यावद देता हूँ. मुझे तो उन नेताओं पर से विश्वास ही उठ गया है. ये हमारी वजह से नेता बन गए हैं. मैं इन नेताओं से इतना दुखी हूँ कि इन नेताओं जैसी भाषा का प्रयोग करने का दिल चाहता है. मुझे लगता है कि देश के अस्तित्व का ख़्याल बहुत कम नेताओं को है. लालू और वरुण में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.
वाह संजीव जी वाह. ब्लॉग लिखने का अगर कोई विषय आप को मिला तो वह यह है कि हमारे देश के निकृष्ट नेताओं के अर्थहीन बयान. जब तक आप लोग इसी तरह देश के दिशाहीन नेताओं की बात को दर्शाते और प्रर्दशित करते रहेंगे वे इसी तरह निरर्थक बात करते रहेंगे. इसके लिए आप के जैसे मीडिया वाले भी जिम्मेदार हैं.
बहुत अच्छे संजीव जी, मैं इस संदर्भ में बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि लालू जी और वरुण जी को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए. देश में पंगा ये है कि यहां केवल लोकतंत्र का नाम है, क्योंकि जहां लोकतंत्र होता है वहां वरुण और लालू जैसे लोग होते ही नहीं हैं. अगर भूल से हों भी तो इतनी बात करने से पहले हज़ार बार सोचें.
यह दिखाता है कि कैसे देश के अलोकतांत्रिक नेता तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता हैं. संजीव जी वरुण के मामले में सख़्त जबकि लालू के मामले में कुछ नरम दिखे. लालू एक वरिष्ठ नेता के साथ-साथ सरकार में मंत्री भी हैं. कुल मिलाकर घटना इस बात की ओर भी इशारा करता है कि नेता कैसे देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.
मैंने दोनों लेख पढ़े हैं संजीव जी. वरुण और लालू के बयान पर. सच कहूं तो दोनो लेख बीबीसी और आप जैसे व्यक्तित्व के स्तर का नहीं लगा. अनुरोध करता हूँ कि बीबीसी को सबसे खड़ा करें. कटु आलोचना के लिए क्षमा.
इस अवधि के आरोप-प्रत्यारोप केवल चुनाव और वोट के लिए होते हैं. नेता ऐसा करके अल्पसंख्यकों का वोट अपनी झोली में डालना चाहते हैं.
माना कि लालू जी का बयान थोड़ा सख़्त है, लेकिन सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए हमें ऐसे ही नेता की आवश्यकता है. आप को याद होगा कि जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में थी तो मोदी और तोगड़िया ने सोनिया और मुख्य चुनाव आयोग के लिए किस तरह की घटिया भाषा का प्रयोग किया था. लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई. लालू एक राष्ट्रीय नेता हैं और हम सच्चे धर्मनिरपेक्ष हैं. लालू को ग्रामीण भारत अपना आदर्श मानता है.
कहने के लिए तो हमारे देश में लोकतंत्र है मगर सही मायनों में तो यहाँ धनतंत्र, लोभतंत्र और दामतंत्र का बोलबाला है. मेनका गाँधी, मायावती, लालू यादव, सुषमा स्वराज, अमर सिंह और आज़म ख़ान जैसे नेता जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वो नैतिकता पर एक बड़ा सवाल है. अगर ये सभी नेता एक दूसरे पर कीचड़ न उछालकर विचारों की लड़ाई लड़ें तो जनता में अच्छा संदेश जाएगा.
आज के नेताओं को जनता की बिल्कुल चिंता नहीं है. यदि उनकी पार्टी हार जाती है तो ये पार्टियाँ महाधिवेशन बुलाती है कि हम क्यों हार गए, लेकिन जब कहीं पर बुरी घटनाएँ होती हैं तो ये बस कुछ बयान देकर निश्चिंत हो जाते हैं. पता नहीं जनता कब समझेगी इन नेताओं को.
लालू के बयान की जितनी निंदा की जाए कम ही है. उन्हें ये समझना चाहिए कि वे लोगों को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बना सकते. जो व्यक्ति अब तक ट्रेन चला रहा था अब वो रोलर चलाने की बात कर रहा है. ये मुद्दा उठाने के लिए संजीव जी को धन्यवाद.
सारी ग़लती जनता की है जो ऐसे ही बयानों के बहकावे में आकर जल्दी में फ़ैसला कर बैठते हैं कि यही हमारा सच्चा नेता है. चुनाव के समय ऐसे बवाल खड़ा करके जनता की अक़ल पर परदा डालने की क़वायद है ये. अगर ऐसे मसले न छेड़े जाएँ तो हमारी समस्याओं की बातें होंगी जिनके लिए किसी नेता ने कुछ भी नहीं किया और शायद किसी के पास जनता को देने के लिए कोई जवाब भी नहीं.
अब हमारे यानी जनता के पास कहने को बचा ही क्या है. इतने निर्लज्ज नेताओं को हम ही वोट देते हैं जो जीतने के बाद हमें ही अपना दास समझने की भूल कर बैठते हैं. फिर भी उन्हें पता है कि जनता इतनी मूर्ख है कि उन्हें ही बार बार वोट देती है.
२००९ चुनाव में उम्मीदवार जिस तरह से अपनी संपत्ति का विवरण दे रहे हैं क्या ऐसे ही लोकतंत्र की कल्पना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी, आम आदमी का प्रतिनिधि इनमें से कौन है ? आम आदमी महज़ वोटर के रूप में ही हिस्सा लेता दिखाई देता है शायद उसकी जगह संसद के बाहर ही है.
लालू ने जो कहा अच्छा कहा...वरना ये वरुण जैसे लोग बेलगाम हो जाएंगे
लालू पर भी रासुका लगना चाहिए. लालू भारतीय राजनीति के एक जोकर हैं.
ऐसा इसलिए होता है कि क्योंकि देश में कड़ा क़ानून नहीं है. अगर समय पर न्याय होगा तो कोई ऐसी हरकत नहीं कर सकता है. यहां हमें 1984 के दंगे को देखना चाहिए, केस अभी चल रहा है. ऐसा ही मामला भूपाल गैस हादसे, मुंबई दंगे का है. ये सूची बहुत लंबी है.
मैं समझता हूँ कि ये न्याय में देरी का मामला है. जब एक बार त्वरित कार्रवाई हो जाएगी उसके बाद न कोई लालू होगा न किसी वरुण को ऐसा करने की हिम्मत होगी.
जब तक दो पार्टी की व्यवस्था नहीं होगी या बिहार या उत्तर प्रदेश में कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं होगी, तबतक मानसिक रुप से विकालांग लोग चुन कर आते रहेंगे. लालू एक हिटलर हैं और ऐसे लोगों पर रासुका लगा कर जेल में डाल देना चाहिए. ये जोकरी अच्छी तरह जानते हैं. ऐसे नेता को देश में समझदार लोग वोट नहीं करेंगे. अपने को सभी धर्मनिरपेक्ष कहने वाले कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे दल देश को बर्बाद कर रहे हैं.
भारतीय जनता पार्टी की सोच मुस्लिम के ख़िलाफ़ रही है. वो चाहे बाबरी मस्जिद मामला हो या सच्चर कमेटी काय आज भाजपा वरुण का साथ देकर अपना उल्लू सीधा कर रही है.
"अगर मैं देश के गृह मंत्री होते तो वरुण की छाती पर रोलर चलवा देते" वाकई में लालू यादव एक सच्चे देश भक्त नेता हैं / वो सही मायने में अल्पसंख्यक समर्थक और हित रक्षक हैं / मगर मैं इस बात से अचंभित हूँ कि लालू यादव ने ये मजबूरी क्यूँ दिखाई कि वो देश के गृह मंत्री नहीं!! वरना वो वरुण गाँधी के छाती पर रोलर चला देते. लालू जी तो देश के रेल मंत्री हैं ना? हमारे देश के रेल मंत्री के पास रोलर से भी भारी भरकम ट्रेन हैं, और शायद उन्हें अपनी रेलों को इस्तेमाल में लेने के लिए देश का गृहमंत्री बनने की ज़रूरत भी नहीं होगी, ये काम वो रेल मंत्री बने हुए ही कर सकते है. और शायद बाकी लोग भी मेरी इस बात से सहमत होंगे कि ट्रेन रोलर से ज़्यादा असरदार होती है. तो फिर लालू जी से मेरा नम्र निवेदन हैं कि वो अपने गृह मंत्री ना होने का रोना बंद करें और ट्रेन का इस्तेमाल कर के अपने सही देश भक्त होने का परिचय दें.
जनता को मूर्ख बना कर कब तक ये नेता अपनी जेबें गर्म करते रहेंगे!! कब कोई देश के बारे में सोचेगा? कब हमें वापस "नेता जी" जैसे सच्चे देश भक्त मिलेंगे?
बिहार में सत्ता हथियाने से लेकर केंद्र में मंत्री के तौर पर गद्दीनशीन होने के आजतक के लालू जी के सफर पर गौर करें तो एक बात साफ तौर पर उबर कर आती है कि उन्होनें इनसब के लिए मूलतः विभाजनकारी राजनीति को ही अपनाया है. इनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता के क्या कहने..ये पिछला पांच साल से कांग्रेस के गोद में बैठे हैं. लेकिन मौका पाते ही रामविलास के साथ मिलकर बिहार से कांग्रेस को ही अंगूठा दिखाने से कोई गुरेज नहीं है इन्हें. वरूण के छाती पर रोलर चलाने की बात इनके तानाशाही प्रवृति और अपने आपको वास्तविक कद से ऊंचा नापने का भ्रम मात्र है. जनता की पसंद के नाम पर ऐसे नेता लोकतंत्र के नाम पर सबसे बड़ा मजाक हैं. जिनसे बड़ी सोची-समझी रणनीति के तहत अनपढ़ और नासमझी के दायरे में जकड़ी जनता चाहे अनचाहे अपना गार्जियन बनाने के अभिशप्त है.
बिहार में सत्ता हथियाने से लेकर केंद्र में मंत्री के तौर पर गद्दीनशीन होने के आजतक के लालू जी के सफ़र पर ग़ौर करें तो एक बात साफ़ तौर पर उभर कर आती है कि उन्होंने इन सब के लिए मूलतः विभाजनकारी राजनीति को ही अपनाया है. इनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता के क्या कहने. ये पिछले पांच साल से कांग्रेस की गोद में बैठे हैं लेकिन मौका पाते ही इन्हें रामविलास के साथ मिलकर बिहार से कांग्रेस को ही अंगूठा दिखाने से कोई गुरेज नहीं है. वरुण के छाती पर रोलर चलाने की बात इनके तानाशाही प्रवृति और अपने आपको वास्तविक कद से ऊंचा नापने का भ्रम मात्र है. जनता की पसंद के नाम पर ऐसे नेता लोकतंत्र के नाम पर सबसे बड़े मजाक हैं, जिन्हें बड़ी सोची-समझी रणनीति के तहत अनपढ़ और नासमझी के दायरे में जकड़ी जनता चाहे अनचाहे अपना गार्जियन बनाने को अभिशप्त है.
लालू भारत में अशिक्षित और झूठे धर्मनिरपेक्षवाद के उत्पाद हैं जिन्हें गंदी राजनीति ने अपनाया है.
लालू जी से और क्या उम्मीद की जा सकती है. लोग जिसे चुनते हैं, उन्हें वही मिलता है. भारत की जनता ने उन्हें चुना है ना. इस बार देखते हैं क्या होता है ?
मैंने देखा है कि जितने भी लोग या पत्रकार हैं वो लालू जी की आलोचना करने का मौक़ा तलाशते रहते हैं लेकिन ये नहीं देखते हैं कि आलोचना करने में उनकी भाषा क्या रहती है. लालू जी को संबोधित करने के लिए कुछ फ़ारवर्ड क्लास के लोग और पत्रकार लालूआ शब्द का इस्तेमाल करते हैं. उस समय इन्हें अपनी भाषा का ख़याल नहीं रखना चाहिए.