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मैं हूँ असली और बड़ी माँ!

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|मंगलवार, 07 अप्रैल 2009, 14:49 IST

ऑल-टाइम ग्रेट हिंदी फ़िल्मों की सूची बनेगी तो कम से कम मैं उसमें अमिताभ बच्चन की 'दीवार' अवश्य शामिल करूँगा. 'दीवार' की लोकप्रियता का एक कारण उसके ज़बरदस्त डॉयलाग भी थे. फ़िल्म में यूँ तो कई यादगार डॉयलाग हैं, पर जैसे 'शोले' की याद आते ही "अरे ओ सांभा" ध्यान आता है, वैसे ही 'दीवार' की बात चलते ही मुझे अमिताभ और शशि कपूर के बीच पुल के नीचे हुई उस डायलॉगबाज़ी का सिलसिला स्मरण आता है, जिसमें शशि कपूर अमिताभ को यह कह जैसे निरुत्तर कर देते हैं कि " मेरे पास माँ है."

महानायक अमिताभ बच्चन की कई कामयाब फ़िल्मों में एक मज़बूत माँ का किरदार काफ़ी 'सेंट्रल' होता था (त्रिशूल, शक्ति इत्यादी) और इस सिलसिले का आरंभ भी शायद 'दीवार' फ़िल्म के साथ हुआ था.

कोई कनेक्शन नहीं है 'दीवार' फ़िल्म का और इस डायलॉग का, पिछले सप्ताहांत जो मेनका गांधी और मायावती में वाकयुद्ध चला उससे. पर न जाने क्यूँ जितनी बार इन दोनों ने " मैं हूँ असली और बड़ी माँ " का दाँव चला, मुझे 'दीवार' की याद आ गई.

लेकिन 'दीवार' में आनंद आया था. लगा था एक क्लासिक देख रहे हैं. मुँह से अनायास ही जैसे कई बार वाह-वाह की तर्ज़ पर दाद निकल जाती थी.

मेनका-मायावती प्रकरण उसके मुक़ाबले किसी बी-ग्रेड फ़िल्म का सीन लगा. मेनका गांधी का यह कहना कि मायावती किसी माँ की पीड़ा क्या समझेंगी, कोई बहुत अच्छे अंदाज़ में की गई टिप्पणी नहीं लगी. अंग्रेज़ी जुमले का इस्तेमाल करें तो कुछ ' बिलो दी बैल्ट' बात लगी.

मायावती की पहली प्रतिक्रिया तो जैसे, नहले पर दहला थी.

उनका कहना था कि वह केवल एक बच्चे की नहीं स्वयं को वरुण जैसे सैकड़ों-हज़ारों युवाओं की माँ समझती हैं. उनका आगे दिया गया बयान भी कि अगर मेनका वरुण को सही संस्कार देतीं तो वह शायद जेल में नहीं होते, कुछ हल्का तो लगा लेकिन चुनावी गर्मी और मेनका ने जो उनके 'माँ' नहीं होने को मुद्दा बनाया था, उसमें शायद उसे नजरअंदाज़ किया जा सकता था.

पर हद तो तब हो गई जब मायावती ने स्वयं की मदर टरेसा से तुलना करने की कोशिश और कहा कि मदर भी तो माँ नहीं थीं लेकिन कितने लाखों लोगों की पीड़ा न सिर्फ़ समझती थीं उसे दूर भी करने की कोशिश करती थीं.

फिर मेनका का जवाब आया कि मदर अपनी वर्षगांठ पर जबरन चंदा वसूली नहीं करती थीं और इंजीनियर्स का ख़ून नहीं करवाती थीं.

अबतक मेनका बनाम मायावती यह एपिसोड बी-ग्रेड भी नहीं किसी सी-ग्रेड फ़िल्म में से उठाया हुआ सीन लगने लगा था.

सच भारतीय नेता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी पर्व पर किस तरह का उदाहरण पेश करना चाहते हैं. क्या इस स्तर के वाकयुद्ध में उलझ वह सोच सकते हैं कि अच्छे लोग राजनीति में आएँगे और नेताओं की इज्जत करेंगे.

अच्छा हो कि इन नेताओं के भाषण और बयानों का ज़िम्मा किसी फ़िल्म लेखक को ही दे दिया जाए. मनोरंजन कुछ ज़्यादा स्वस्थ होगा और स्तर भी कुछ बेहतर. क्योंकि इन फ़िल्म लेखकों को तो सेंसर की कैची का कुछ लिहाज़ और डर होगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 18:30 IST, 07 अप्रैल 2009 Mohammad Ali Bahuwa:

    सभी राजनेता इन टिप्पणियों के ज़रिए लोगों का ध्यान बाँटना चाह रहे हैं. ये लोग हमारे देश के विकास के बारे में नहीं सोच रहे हैं. ऐसे आर्थिक संकट के मौक़े पर जब हममें से बहुत से लोग अपनी नौकरियाँ बचाने की कोशिश कर रहे हैं हमारे महान नेता छोटी छोटी बातों पर लड़ रहे हैं और कमेंट कर रहे हैं. ये वास्तव में बहुत शर्मनाक है.

  • 2. 04:01 IST, 08 अप्रैल 2009 Dr Durgaprasad Agrawal:

    संजीव जी ने मायावती-मेनका वाक-युद्ध का बड़ा बढिया विश्लेषण किया है. जिन्होंने इस वाक युद्ध को पूरे मनोयोग से नहीं सुना है उन्हें भी पूरी जानकारी मिल जाती है. लेकिन जिस निषकर्ष पर वे पहुंचे हैं, उससे कम से कम मैं तो सहमत नहीं हूं. असल में हमारे नेताओं का ऐसा व्यवहार ही साबित करता है कि राजनीति में अच्छे लोग नहीं हैं, और इसलिए यह ज़रूरी हो जाता है कि अच्छे लोग राजनीति में आएं. हमारे लोकतंत्र का एक बड़ा दुर्भाग्य यही है कि लोगों ने मान लिया है कि राजनीति अच्छे लोगों के लिए नहीं है और उन्होंने सारा मैदान दूसरी किस्म के लोगों के लिए खुला छोड़ दिया है. यह स्थिति बदलनी चाहिए.

  • 3. 05:20 IST, 08 अप्रैल 2009 Shailesh Sharma:

    संजीव जी,
    आपको लालू प्रसाद का डायलॉग कैसा लगा? क्या ये किसी बी ग्रेड ऐक्शन फ़िल्म का डायलॉग नहीं लगता.

  • 4. 06:16 IST, 08 अप्रैल 2009 sachin gupta:

    बीबीसी हिंदी पर पहला ब्लॉग देखकर अच्छा लगा और उम्मीद है कि आगे भी ब्लॉग्स के द्वारा अच्छे विचार सामने आएँगे.

  • 5. 06:28 IST, 08 अप्रैल 2009 lalit singh thathola:

    जी हाँ मेरे ख़्याल से आपकी बात सही है. निश्चय ही वो थर्ड ग्रेड फ़िल्म के सीन जैसा है.

  • 6. 08:45 IST, 08 अप्रैल 2009 Gaurav Agarwal:

    मेरा मानना है कि मीडिया अगर अपनी भूमिका एक ज़िम्मेदार माध्यम की तरह निभाए तो इस तरह की सी ग्रेड भाषा को प्रचार नहीं मिलेगा. मीडिया आजकल सनसनी में विश्वास करता है और राजनेता ये अच्छी तरह समझते हैं. किसको संस्कार और भाषा सीखने चाहिए और किसको सिखाने चाहिए ये सबको पता है...

  • 7. 13:27 IST, 08 अप्रैल 2009 Vinit Kumar Upadhyay:

    संजीव जी के इस ब्लॉग के बाद मैंने समझा कि इस मामले में केवल राजनीति है. फिर भी ब्लॉग के लिए ये एक बेकार का विषय है.

  • 8. 18:59 IST, 08 अप्रैल 2009 Madhav Mishra:

    अभी इलेक्शन का टाइम आ गया है और सब नेता जोश मे होश खो रहे हैं. लालू को अभी तक बोलना नहीं आता है कि कहाँ पर कैसे बोलें तो वरुण गाँधी तो नया उम्र का है.

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