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.....लेकिन जरनैल हीरो हैं

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संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|गुरुवार, 09 अप्रैल 2009, 13:44 IST

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दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह. क्या उन्होंने कभी सोचा था कि वह स्वयं ख़बर बनेंगे. और वह भी इस तरह कि अपने कलम से नहीं अपने जूते से पहचाने जाएँगे. देश-विदेश के मीडिया में उनके नाम की चर्चा होगी.

एक 25 वर्ष पुराने मुद्दे को जरनैल सिंह ने एक ऐसी चिंगारी दी है कि न सिर्फ़ पूरे मुल्क में आज एक बार फिर सिख विरोधी दंगे सुर्ख़ियों में हैं बल्कि ज़मीन पर कांग्रेसियों के लिए कुछ भगवान जैसे सर्वशक्तिमान और सर्वगुण संपन्न आलाकमान ने भी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के लोकसभा चुनाव के टिकट काट दिए.

मैं न एक पत्रकार की तरह यह लेख लिख रहा हूँ, न ही पत्रकारिता की कसौटी पर जरनैल सिंह को परख रहा हूँ.

एक पत्रकार की तरह जरनैल सिंह ने जो किया वह ग़लत किया. पर यह तो वह स्वयं मानते हैं. उन्होंने जो किया वह एक आम भारतीय की तरह किया जो न्याय के इंतज़ार में हताश हो चुका है और जब उसके सब्र का प्याला भर गया तो उसने एक निहायत अहिंसक अंदाज़ में गृहमंत्री चिदंबरम पर जूता फेंक दिया.

अहिंसक इसलिए कि जिस तरह ग़रीब जरनैल ने चिदंबरम साहब पर जूता फेंका उससे मुझे बचपन के वह दिन याद आ गए जब क्रिकेट खेलते वक़्त कुछ बच्चे तो जैसे एंडी राबर्ट्स, मार्शल और इमरान ख़ान के अंदाज़ में गेंद फेंकने दौड़ते थे तो गेंद उनके हाथ से निकलने से पहले ही मन बैठने लगता था. जरनैल के तेवर वैसे नहीं थे. उनका जूता फेंकने का अंदाज़ कुछ उन बच्चों जैसा था जो अंडरआर्म गेंद फेंकते थे जिनकी गेंद पर अगर आप चंद्रशेखर जैसे निखट्टू बल्लेबाज़ भी हों तो क्रीज के बाहर निकल छक्का मारने के बारे में सोच सकते थे. मतलब यह कि जरनैल का इरादा किसी को चोट पहुँचाने का था ही नहीं. न ही वह शायद घर से यह सोचकर निकला था कि बस आज मेरा दिन है. उधर मेरा जूता चला इधर मैं हीरो बना.

उससे तो बस जूता चल गया और चला तो ऐसा चला कि पहले दिन कई चैनल तो बहुत-बहुत देर तक उस जूते का ही क्लोज़ अप दिखाते रहे. जैसे सारा कमाल तो जूते का ही हो. मानो वह किसी सुदर्शन चक्र की तरह अपने आप ही चल गया हो.

खैर असली बात पर लौटें. जरनैल के जूते का जोर देखिए. बरसों का दबा-कुचला मुद्दा वापस जैसे ज्वालामुखी बन गया. कांग्रेसियों को फिर न्याय-अन्याय की बात ध्यान आने लगी. यहाँ तक की सरकार ने सीबीआई तक से जवाब तलब कर डाला कि आख़िर टाइटलर को क्लीन चिट देने की सूचना गृह मंत्रालय को क्यों नहीं दी गई. पंजाब में सिख, सड़कों से रेल पटरियों तक जो मिला उसे रोक खड़े हो गए.

कुल मिलाकर जरनैल के जूते ने वह कर दिखाया जो 25 साल तक कई विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन नहीं कर सके.

इधर इस छोटी-मोटी क्रांति के जनक जरनैल सिंह अपनी जीविका के बारे में चिंतित हैं. बड़े-बड़े पत्रकारों ने जो उनकी कड़ी भर्त्सना की है उसके बाद मालूम नहीं दैनिक जागरण उनकी नैकरी जारी रखेगा या नहीं. स्वयं जनरैल को जो मिलता है उससे ही वह यह कहना शुरू कर देते हैं कि उनसे बड़ी भूल हो गई. एक पत्रकार की तरह उन्हें यह नहीं करना चाहिए था. इस पूरे किस्से में वह अपनी शादी की सालगिरह तक पर घर नहीं जा सके. और बेचारे घरवाले भी, उन्हें जो मिलता है उससे कहते हैं कि अपना जरनैल तो यूपीए सरकार को पसंद करता है. जरनैल ख़ुद किसी को भी वह करने की सलाह नहीं देते जो उन्होंने किया. कुल मिलाकर जरनैल समेत उनका पूरा परिवार हैरान-परेशान और कुछ प्रायश्चित बोध में है.

कोई कुछ भी कहे मैं तो जनरैल को एक नायक की तरह देख रहा हूँ. उसमें एक शराफ़त, ईमानदारी और विनम्रता झलकती है. साथ ही वह अपने समाज के लिए न्याय भी चाहता है. अब इसमें क्या ग़लत है. जरनैल एक रिलक्टेंट ही सही लेकिन एक कामयाब हीरो है.

कुछ नायक होने की बधाई चिदंबरम साहब के हिस्से में भी जानी चाहिए जिन्होंने बड़प्पन दिखाते हुए जरनैल पर कोई पुलिस कार्रवाई नहीं होने दी.

कुछ लोग कह सकते हैं कि आप इस तरह जरनैल की तारीफ़ कर दूसरे लोगों को उकसा रहे हैं. आगे और भी और बात-बात पर, जूते चलेंगे तो फिर क्या होगा.

हो तो कुछ भी सकता है. और भारत में जूते चलने से भी ज़्यादा ख़राब काफ़ी कुछ हो रहा है. पर एक बात मैं बता दूँ- बिना मौक़े या दस्तूर के कोई एक जूता क्या पूरी बाटा की दुकान भी फेंक देगा तो उस पर कोई ध्यान नहीं देगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:20 IST, 09 अप्रैल 2009 Vinit Kumar Upadhyay:

    संजीव जी बिल्कुल सही हैं. जरनैल सिंह का काम आम आदमी के विचार और भावनाओं का ही प्रतिनिधित्व करता है. 'अ वेन्सडे' फ़िल्म में भी कुछ ऐसा ही ख़ूबसूरती से दिखाया गया है. सत्ता में बैठे लोग सोचते हैं कि वे जो भी कहते हैं वो ही सही है वे जो भी करते हैं वो ही सही है और वे जो भी करेंगे वो भी सही ही होगा. वे नियम-क़ानून और जाँचों को अपने हिसाब तोड़ते मरोड़ते हैं और फिर उसे सही साबित करने की कोशिश करते हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ता भी कोई संत नहीं हैं. वे वही बातें उठाते हैं जो उनके राजनीतिक आकाओं को पसंद हो. हमें समझना होगा कि इन मानवाधिकार संगठनों के भी कुछ निजी हित हैं.

  • 2. 14:22 IST, 09 अप्रैल 2009 sujeet:

    फिर भी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कॉन्ग्रेस को सेक्युलर कहता है.

  • 3. 14:33 IST, 09 अप्रैल 2009 sanjay singh:

    संजीव जी, वाक़ई आपने जरनैल के जूता प्रकरण पर लाजवाब और मन को छूने वाली प्रतिक्रिया लिखी है. इस घटना पर जितने भी आलेख या प्रतिक्रियाएँ अब तक आई हैं उनसे बिल्कुल अलग और निष्पक्ष. मैं भी आपके इस भाव और विचार से सहमति रखता हूँ.

  • 4. 14:36 IST, 09 अप्रैल 2009 sanjay mishra:

    बिल्कुल सही लिखा है आपने। परिस्थितियों ने जरनैल सिंह को नायक बना दिया है लेकिन चिदंबरम ने जिस बड़ी सोच का प्रदशॆन किया है वह भी कम काबिले तारीफ नहीं है। चिदंबरम के बड़प्पन पर मीडिया की चुप्पी अखरती है। आपने भी चिदंबरम को बधाई देने में कंजूसी बरती है।

  • 5. 14:47 IST, 09 अप्रैल 2009 Ronny Yadav:

    काश ये किसी हिंदू ने किया होता...तब आपके लेख का रंग रूप ही कुछ और होता. यह आपके लिए चेतावनी है. ऐसे ही चलता रहा तो पत्रकारों का हाल वही होगा जो भारत में पुलिस और नेता का है.

  • 6. 15:08 IST, 09 अप्रैल 2009 Sandeep Mahato:

    बिलकुल सही, मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर सरकार को जगाने के लिए इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है. लेकिन मैं इस देश के भविष्य के बारे में सोच रहा हूँ. क्या लोगों का विश्वास पुलिस, कानून और न्यायालयों से उठ जाएगा और इसके बाद वे कानून अपने हाथ में ले लेंगे?

  • 7. 15:08 IST, 09 अप्रैल 2009 Dayashankar Mishra :

    बधाई हो, आपने असली बात को पकड़ा है. जरनैल सिंह हमारा हीरो है. उसने उन दंगाइयों के टिकट कटवा दिए जो हमारा लोकतंत्र 25 सालों में नहीं कर सका. काश मोदी के साथ भी कोई ऐसा करता. मैं जरनैल सिंह के साथ हूँ. उसने जो किया सही किया क्योंकि दूसरा रास्ता ही नहीं था.

  • 8. 15:17 IST, 09 अप्रैल 2009 Alok kumar:

    बात तो ठीक ठाक है. लेकिन क्या ये ज़रूरी था? इस पूरे कांड में चिदंबरम जी की क्या ग़लती थी. अगर निशाना ही बनाना था तो इस देश में उन लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्हें हर क़दम पर जूता मिलना चाहिए. लेकिन ये किसी समस्या का हल नहीं है. और भारत जैसे महान देश की क्या हालत है बामुश्किल कुछ लोग ही जानते हैं. हाँ इसे किस तरह से लूटा जाए, यह सभी जानते हैं.

  • 9. 15:30 IST, 09 अप्रैल 2009 bhupender bath:

    जरनैल का जूता पूरे राजनेताओं पर एक तमाचा है. जो सिर्फ़ वोट की राजनीति करते हैं. यह कैसा लोकतंत्र है कि सारे फ़ैसले वोटों के इर्द ग़िर्द घूमते हैं. भोले भाले लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर सत्ता हासिल करना कोई लोकतंत्र नहीं है. जैसा कि गुजरात में भी हुआ लोग जब पूरी तरह जागरूक हो जाएंगे तब देश में असली लोकतंत्र स्थापित होगा. तब नरेंद्र मोदी या जगदीश टाइटलर जैसे लोग लोगों की भावनाएं भड़का कर नहीं जीत पाएंगे और ना ही कुछ और नेता पैसे के ज़ोर पर जीत पाएंगे. मैं ऐसे समृद्ध भारत की कामना करता हूँ.

  • 10. 15:39 IST, 09 अप्रैल 2009 atul:

    आप सही हैं. जरनैल वाकई हीरो हो गए

  • 11. 15:42 IST, 09 अप्रैल 2009 Gurpreet Singh:

    जरनैल सिंह ने वही किया जो उस समय उसे सही लगा. हम सबको पता है कि ये जनाबूझ कर नहीं किया गया और हम सब जो झेलते हैं ये उसी की एक प्रतिक्रिया थी. वो वास्त में हीरो हैं और उन्हें इस बारे में दुखी होने की ज़रुरत नहीं है. उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया.

  • 12. 15:43 IST, 09 अप्रैल 2009 Parvinder Singh Panesar:

    संजीव जी, आप जो भी लिख रहे हैं सौ फ़ीसदी सही है. सच हमेशा कड़वा होता है.जो जरनैल सिंह ने किया वो 25 साल से ना लोगों का विरोध और ना ही अदालतें कर सकीं.

  • 13. 15:44 IST, 09 अप्रैल 2009 Gaurav:

    आज आप जरनैल सिंह को हीरो बता रहे हैं क्योंकि रिपोर्टर-रिपोर्टर भाई-भाई हुआ. लेकिन पिछले ब्लॉग में आपने वरुण गांधी के भाषण पर दार्शनिक विचार रखे थे. अगर जरनैल सिंह की प्रतिक्रिया को आम आदमी का गुस्सा मानते हैं तो उसी तरह वरुण का भाषण भी एक आम हिंदू से संबंध रखता है.

  • 14. 15:44 IST, 09 अप्रैल 2009 Uttam Kumar:

    आप वाकई में भटक रहे हैं. पहले ब्लॉग में तो आप नैतिकता की दुहाई दे रहे थे. अब आप हिंसा या उस सांकेतिक विरोध को सही ठहरा रहे हैं. अगर आप जरनैल सिंह को सही बता रहे हैं तो नरेंद्र मोदी, वरुण, राज ठाकरे और तालेबान ग़लत क्यों हैं. पत्रकार होने के नाते आपकी ज़िम्मेदारी समाज को नई दिशा देने की है. आप मेरी प्रतिक्रिया पसंद नहीं करेंगे लेकिन विश्वास कीजिए मेरी आपसे कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है. आपके पास जो ताकत है उससे क्रांति शुरु हो सकती है. आप किसी को इस तरह की हरकत के लिए उत्साहित नहीं कीजिए नहीं तो लोग हर ज़िम्मेदार आदमी पर जूता फेंकना शुरु कर देगा और आपको भी बिना जूता पहने प्रेस कॉंफ़्रेंस में जाना पड़ सकता है. ये नेता.देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और इन पर जूता फेंकना देश पर जूता फेंकने के बराबर होगा.

  • 15. 15:47 IST, 09 अप्रैल 2009 Rakesh Singh:

    आज के समय में जब आम आदमी को सरकार, मंत्री और सरकारी संस्था से कोई ईमानदारी की उम्मीद ही नहीं है. एक हताश आम आदमी करे तो करे क्या? जरनैल ने वही किया जो एक हताश आम आदमी 25 साल तक न्याय नहीं मिलने पर करेगा. तरीक़ा अलग हो सकता है. मैं तो सच में जरनैल की तारीफ़ करता हूँ. पर यहाँ पर चिदंबरम साहत तारीफ़ के काबिल नहीं हैं. उन्होंने यदि पुलिस में शिकायत की होती तो आंदोलन और उग्र हो जाता. जरनैल रातोंरात और भी बड़ा हीरो बनता. हाँ मैं इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि संजीव जी आपका ये लेख वाकई अच्छा है.

  • 16. 16:04 IST, 09 अप्रैल 2009 Kishore:

    यह सही नहीं है. देश में कानून जैसी भी कोई चीज़ है. केस तो होना ज़रूरी है, बाद में उन्हें निर्दोष मानकर छोड़ा जा सकता है.

  • 17. 16:16 IST, 09 अप्रैल 2009 Abhay:

    ....संजीव जी, हमें हताशा है कि ये ब्लॉग विश्लेषण न होकर, किसी का व्यक्तिगत ब्लॉग हो गया है... जो ग़लत है ..हम इससे सहमत नहीं हैं इसे किसी भी तरह से सही नहीं कह सकते.

  • 18. 16:19 IST, 09 अप्रैल 2009 santosh kumar:

    संजीव जी आप जरनैल सिंह को हीरो बता रहे हैं. यह आपकी निजी सोच हो सकती है. लेकिन एक पत्रकार को अपने जूते से ज़्यादा कलम पर भरोसा होना चाहिए. जरनैल सिंह यहीं पर मात खा गए. इस बहाने अखबार को माध्यम बनाकर जरनैल ने अपना हित साधा है जो पत्रकारिता के लिहाज़ से बिलकुल सही नहीं है. आने वाले समय में पत्रकार इसका बेजा फ़ायदा अपने हित में उठाएंगे.

  • 19. 16:25 IST, 09 अप्रैल 2009 Praveen:

    प्रिय संजीवजी, आपका ब्लॉग पढकर अच्छा लगा और आपसे संवाद का मन हो गया. जरनैल सिंह ने जिस अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई वो बिलकुल सही थी. आज उन दंगों को 25 साल हो चुके हैं और न्याय के नाम सिख समुदाय को धेला भी नहीं मिला है. और तो और उन दंगों के सारे आरोपी आज भी संसद में देश के वर्तमान और भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. अन्याय की भी हद होती है. सोई हुई व्यवस्था को जगाने के लिए ऐसा कुछ तो होना ही था. आपने सही कहा कि जरनैल के जूते ने वह कर दिखाया जो 25 साल तक कई विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन नहीं कर सके. मुझे यदि किसी बात से शिकायत है तो जरनैल सिंह के उस तरीके से जो उन्होंने अपनी बात उठाने के लिए चुना. किसी नेता या राजनयिक को जूता फेकना कम से कम एक बुद्धिजीवी से तो अपेक्षित नहीं है. जहाँ तक बात उसके ऐसा करके देश में क्रांति लाने की है तो मेरा मानना है कि आज भारत में सिर्फ़ मीडिया की क्रांति है. मीडिया किसी को भी नायक और खलनायक बना सकता है. यदि आज कोई शाहरुख़ खान पर भी बिना बात जूता फेंक दे तब भी चैनल बहुत देर तक उस जूते का क्लोज़ अप दिखाते रहेंगे. इन लोगों को देश के मुद्दों से कोई वास्ता नहीं है. चैनल सिर्फ वही दिखाते हैं जो चलता है. इनको सच झूठ या ख़बर की वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है. अगर जरनैल को एक आम आदमी भी माने तब भी ये एक सही तरीका नहीं होगा. जूता फेंक कर एक आम आदमी क्या कर सकता है, ये तो बस एक ढंग है अपना गुस्सा व्यक्त करने का. ये हल नहीं है. उन्होंने ऐसा तरीका अपनाया जो पहले ही किसी देश में एक पत्रकार कर चुका है. वहां भी इसके बात कुछ नहीं बदला और यहाँ भी इसके बाद कुछ नहीं बदलेगा. कुछ ही दिनों में कोई नई ब्रेकिंग न्यूज़ आ जाएगी और देश की जनता ये सब भूल कर उसका मज़ा लेने लगेगी. बात ख़त्म करने के पहले यही कहूँगा कि आपने सही कहा कि वो एक नायक है. पर वो नायक इसलिए नहीं कि उसने अपनी बात उठाने के लिए जूते का सहारा लिया बल्कि वो नायक इसलिए है कि उसके हाथ में कलम है. हर एक पत्रकार एक नायक है जब तक वो अपनी कलम के साथ ईमानदार है.

  • 20. 16:48 IST, 09 अप्रैल 2009 सतीश चन्द्र सत्यार्थी :

    संजीव जी, इस बार मैं आपकी बात से बिलकुल सहमत नहीं हूँ. न तो जरनैल सिंह ने जूता फेंककर किसी नायकत्व का परिचय दिया है और न ही गृहमंत्री ने उनपर कार्रवाई न होने देकर. दोनों के अपने निहित स्वार्थ हैं. जरनैल सिंह के कृत्य में तो मुझे मुन्तज़िर ज़ैदी की नक़ल कर सस्ती लोकप्रियता पाने का लालच ज्यादा नज़र आता है. रही चिदंबरम साहब की "दयालुता" और "बड़प्पन" की बात तो इस चुनावी राजनीति को एक बच्चा भी आसानी से समझ सकता है. मुद्दा कितना भी सही हो पर जूता-चप्पल फेंकने को जायज़ तो नहीं ठहराया जा सकता न! आखिर पत्रकारिता की भी अपनी कुछ मर्यादाएं होती हैं.

  • 21. 17:19 IST, 09 अप्रैल 2009 shyam:

    जरनैल के जूते ने वह कर दिखाया जो 25 साल तक कई विपक्षी दल और मानवाधिकार संगठन नहीं कर सके. आपके विचारों के लिए धन्यवाद.

  • 22. 17:28 IST, 09 अप्रैल 2009 dilbag rajian:

    संजीव जी ने इस मुद्दे पर जो लिखा है वह काफ़ी कुछ सही है. भारत में राजनीतिक व्यवस्था ठीक प्रकार से काम नहीं कर रही है. एक मेहनत करने वाले आम आदमी के लिए न्याय नहीं है. अस्सी फ़ीसदी से ज़्यादा राजनेताओं को जनता की कोई फ़िक्र नहीं है. उन्हें अपने काम और देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों के बारे में पता तक नहीं है. मैं गृहमंत्री पी चिदंबरम को उनकी महानता के लिए सलाम करता हूँ.

  • 23. 17:40 IST, 09 अप्रैल 2009 joginde:

    मेरा मानना है कि जरनैल सिंह वाकई एक हीरो हैं.

  • 24. 17:44 IST, 09 अप्रैल 2009 saurabh kumar:

    मुझे लगता है कि यह बहुत सही लेख है.

  • 25. 17:53 IST, 09 अप्रैल 2009 Nadim Akhter:

    संजीव जी, आप बहुत वरिष्ठ पत्रकार हैं और मैं आप की बहुत इज़्ज़त करता हूँ. आप से मिल भी चुका हूँ, लेकिन विचारों से असहमत तो हुआ है ही जा सकता हूँ. मुझे आप की सोच थोड़ी ख़तरनाक लगती है, ख़तरनाक इसलिए कि जरनैल सिंह ने जो किया, परिस्थितियाँ और मानव भावना का हवाला देकर आप उससे जायज़ ठहरा रहे हैं. लेकिन यहां हमें यह बात ध्यान रखनी होगी कि उस समय जरनैल सिंह एक पत्रकार का दायित्व निभा रहा था. भावना में बह कर थोड़ी देर के लिए ही सही, वो यह भूल गया कि वो चिदंबरम के नज़दीक इसलिए बैठे थे कि वो एक पत्रकार थे. इसलिए अगर वो चिदंबरम के बयान से असहमत थे तो बाद में इसका विरोद्ध जता सकते थे. निश्चित तौर पर तरीक़ा अलग होता.
    जरनैल सिंह की हरकत इसलिए हमें ख़तरनाक लगती है क्योंकि इससे आम लोगों में पत्रकारों की ग़लत छवि गई है. अगर जरनैल सिंह की हरकत सही है तो कल कोई मुस्लिम पत्रकार गुजरात दंगों के नाम पर नरेंद्र मोदी पे जूता चला सकता है या फिर ईसाई पत्रकार कंधमाल का हवाला देकर नवीन पटनायक का ख़ैरमक़दम संवाददाता सम्मेलन में जूतों से कर सकता है.
    फिर तो पत्रकारों से निष्पक्ष रिपोर्टिंग की उम्मीद भी छोड़ देनी चाहिए. जाति-धर्म के चादर में वे भी लिपटे रहेंगे. और इस तर हमलोगों को हिंदू, मुस्लिम, सिख, और ईसाई के साथ न जाने कितने तरह की रिपोर्टिंग देखने को मिलेगी. फिर अगर कहीं दंगा हो जाए तो हिंदू रिपोर्टर हिंदू हित की बात करके रिपोर्ट भेजेगा और मुस्लिम, सिख और ना जाने ये सिलसिला कहां रुकेगा.
    जब कभी अपनी मांगों को लेकर डॉक्टर हड़ताल करते हैं हम लोग और मीडिया में यह कहकर आलोचना करते हैं कि मरीज़ो की जान जा रही है और ये डॉक्टर अपना फ़र्ज़ नहीं निभा रहे हैं. मतलब ये कि डॉक्टर से जिस तरह हम उम्मीद करते हैं वैसा ही पत्रकार से उम्मीद करते हैं.
    मुझे लगता है कि जरनैल सिंह को वहां एक सिख की तरह नहीं बल्कि एक पत्रकार की तरह आचरण करना चाहिए.

  • 26. 19:00 IST, 09 अप्रैल 2009 vinay kumar rao:

    क्या चुनाव नहीं होता तो भी चिदंबरम इतना बड़प्पन दिखाते? गुजरात पर इतना बवाल मचाने वाले लोग सिखों के मुद्दे पर इतने ख़ामोश क्यों हैं?

  • 27. 20:00 IST, 09 अप्रैल 2009 Sanjay Sharma:

    संजीव जी,
    आपने भी खूब कही. लेकिन क्या आपको लगता है कि इससे कुछ बदलेगा. जरनैल तो अभी के लिए हीरो बन गए लेकिन क्या हर गम भुला देने की आदी ये भारतीय जनता इस बात को कुछ दिनों या हफ्तों के बाद याद रख पाएगी? आज जो कांग्रेस आलाकमान ने झटपट निर्णय सुना दिया, क्या वो ऐसा ही करते अगर चुनाव सर पर नहीं होते? खैर, मैं भी तो उसी भारतीय जनता का हिस्सा हूँ, अभी लगा की प्रतिक्रिया दे दूं तो दे दी, कल मुझे भी नहीं याद रहने वाला कि किसने किसी पर जूता भी फेंका था.

  • 28. 21:14 IST, 09 अप्रैल 2009 varender warraich:

    संजीव जी ने जरनैल सिंह के बारे में जो कहा ठीक कहा. कांग्रेस ने बिना सोचे टाइटलर को कैसे टिकट देने का निर्णय ले लिया. कांग्रेस ने फिर से सिखों की भावनाओं को हवा दी है. हमारे ख़याल से जो सरकार सत्ता में हो उसे हर निर्णय काफ़ी सोच समझ कर लेना चाहिए.

  • 29. 21:24 IST, 09 अप्रैल 2009 Mukesh:

    यह घटना देश के लिए शर्मनाक है. यह देश के लिए बहुत ख़राब है.

  • 30. 21:46 IST, 09 अप्रैल 2009 Rahul Sharma:

    संजीव जी, मैं आपके ब्लॉग का दैनिक पाठक हूँ. मैं पिछले चार सालों से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम का पाठक रहा हूँ. आपका यह ब्लॉग दिल को छू गया. इसलिए नहीं कि आपने एक पत्रकार का पक्ष लिया है बल्कि इसलिए कि आपने एक आम आदमी के मन की आवाज़ और उसके मन के गुबार की सही प्रस्तुति दी है. यहाँ बात जरनैल सिंह को हीरो बनाने या फिर देश के गृह मंत्री को अपमानित करने की नहीं है. बात है तो एक आम आदमी की उस खीझ की है जो न्यायपालिका और कार्यपालिका के उदासीन और अपरिपक्व काम करने के तरीके को लेकर है. अगर ये चुनाव का समय नहीं होता तो भी चिदंबरम साहब ऐसे ही प्रतिक्रिया देते?

  • 31. 22:57 IST, 09 अप्रैल 2009 navin:

    प्रिय उत्तम कुमार 'जरनैल सिंह और नरेंद्र मोदी, वरुण गांधी, राज ठाकरे के बीच बहुत अंतर है. उनकी तुलना राज ठाकरे और मोदी जैसे लोगों से नहीं होनी चाहिए. ये गंभीर मुद्दा है. यदि कल को अभियुक्त भारत में चुनाव लड़ना चाहें तो क्या भारत का क़ानून इसकी इजाज़त देगा. मुझे लगता है कि यदि सिख भी बहुमत में हों तो वे भी अभियुक्तों के लिए वोट नहीं करेंगे. हमें मानव भावनाओं के समझना चाहिए.

  • 32. 23:41 IST, 09 अप्रैल 2009 Krishna Tarway:

    मैं सिंह जी की राय से बिलकुल ही सहमत नहीं हूँ. यह जूता फैंकने की घटना कहीं भारत में परंपरा न बन जाए इस बात का डर है. भले ही यह कारगर क्यों न साबित हुवा हो. किसी नेता द्वारा बुलाए गए पत्रकार सम्मलेन में अपनी बात कहने के लिए या किसी मुद्दे पर अपनी असहमति जताने के लिए यह तरीका ठीक नहीं है. यह मौके का नाजायज़ फ़ायदा उठाने जैसा है. क्या इस तरह का आचरण स्वयं पत्रकारों के सम्मान पर बट्टा नहीं लगता. बुद्धिजीवियों को अपनी बात कहने के लिए कलम की ताक़त का इस्तमाल करना चाहिए न कि जूते का. इस तरह की हरक़त हमारे देश की संस्कृति के विरुद्ध है.

  • 33. 00:02 IST, 10 अप्रैल 2009 Umesh Yadava:

    कोई कुछ भी कहे लेकिन "आप जरनैल सिंह को एक नायक की तरह देख रहे हैं." कमाल की बात है पर लगता है निकट भविष्य में आप भी किसी कांग्रेसी नेता के ख़िलाफ़ ऐसा तो नहीं करने जा रहे? मैं बीबीसी बहुत दिन से सुन रहा हूँ लेकिन आप जब भी कभी भारत में राजनीति पर बात करते हैं तो मुझे उसमें आप बीजेपी की तरफ़दारी करते नजर आते हैं. ज्यादा नहीं एक वाकया बताता हूँ - जब दिल्ली मैं चुनाव थे और बॉम्बे मैं बम फटे उसके बाद बीजेपी के प्रचार जो पेपर छपा उस पर आपने कहा था - "बीजेपी विपक्ष की पार्टी है इसका फायदा तो लेगी ही" पर उनके आचरण पर आपने सवाल नहीं उठाया.

    ब्लॉग अच्छा है लेकिन विचार एक पत्रकार के नहीं आप के हैं और मैं इससे सहमत नहीं हूँ. चिदंबरम की सहनशीलता और सूझ-बूझ को सलाम करता हूँ.

  • 34. 03:25 IST, 10 अप्रैल 2009 vivek kumar pandey:

    संजीव जी, जरनैल सिंह पत्रकार के साथ साथ एक अच्छे भारतीय हैं. मैं उन शरीफ़ पत्रकारों से सहमत नहीं हूँ जो यह कह रहे हैं कि यह पत्रकारिता की गरिमा के विरुद्ध है. जरनैल सिंह ने जो संदेश दिया है वो कई पत्रकार अपनी ज़िंदगी भर के कैरियर में भी नहीं दे पाते. अगर सभी लोग उनकी तरह हो जाएं तो इस देश की किस्मत संवर जाएगी. और हमारे नेता भी किसी भी गंभीर मुद्दे पर लीपापोती करने के पहले दल बार सोचेंगे. संजीव जी ने वास्तव में एक अच्छे इंसान और पत्रकार की तरह इस गंभीर मुद्दे की समीक्षा की है.

  • 35. 04:20 IST, 10 अप्रैल 2009 jessie parmar:

    प्रिय संजीव जी, आपके संतुलित ख़यालों के लिए शुक्रिया. मुझे लगता है कि अब वह समय आ गया है जब हमें लोगों की भावनाओं से खेलने वाले लोगों के ख़िलाफ़ एक हो जाना चाहिए. यह भारत के लोगों और नेताओं के लिए जागने की घड़ी है. जरनैल भारत के छिपे हुए रत्न हैं और हमें उन पर गर्व होना चाहिए. ईश्वर उनकी और उनके परिवार की रक्षा करे.

  • 36. 05:10 IST, 10 अप्रैल 2009 Amal:

    कहते हैं एक घटना आनेवाले कल में परंपरा बन जाती है. पर यह जूता वहीं फेंका जा रहा है जहाँ अन्याय हुआ है. हो सकता है यह पहले भी होता रहा हो पर हमने देखा न हो. रही बात क़लम की ताक़त की तो कलम बहुत दिनों से चल रही है और पेन, स्याही बदलती है पर हुक़्मरान के दस्तूर नहीं बदलते. बाकी जरनैल सिंह ने जो किया वह शायद बड़े बड़े अकाली नेता या जो आज दंगा पीड़ित सिखों की एसोसिएशन में बैठे हैं या जो सिख कांग्रेस में रहकर भी नहीं करवा सके वो शायद अब हो जाए. बस इतना और कह सकता हूँ कि जरनैल का जूता सही था पर उसने आदमी ग़लत चुना. यह जूता टाइटलर या सज्जन कुमार की प्रेस कांफ़्रेंस में चलना चाहिए था जैसे इराक़ में बुश पर जूता चला था. मैं यह बात ऐसे ही नहीं लिख रहा हूँ. मैंने दोनों मंज़र अपनी आँखों से देखे हैं. सिखों का हाल भी और इराक़ भी. और आनेवाले वक्त में प्रेस काँफ़्रेंस किसी मंदिर या मस्जिद या गुरुद्वारे से कम नहीं होगी जहाँ पत्रकारों को नंगे पैरों जाना पड़ेगा.

  • 37. 06:02 IST, 10 अप्रैल 2009 rashid khan :

    जरनैल सिंह के विषय मैं लिखे आपके ब्लॉग से मैं सहमत नहीं हूँ. विरोध के दूसरे भी तरीके होते हैं. आपका ये लिखना कि जूता जानबूझकर धीरे से फेंका गया और गृह मंत्री जी को चोट पहुचने के उद्देश्य से भी नहीं .परन्तु देश के ज़िम्मेदार मीडिया और उससे जुड़े लोग ऎसी चीजों को भुनाकर अपना चैनल और अख़बार बेचते रहे हैं और जरनैल सिंह ने जो किया, उससे शर्मिंदा न होकर उसके सकारात्मक पहलू और आम आदमी के गुस्से का बाहर निकलना बता रहे हैं. अगर हर त्रस्त आदमी जूते फेंकने लगा तो इस देश में पानी नहीं जूतों की बरसात होने लगेगी.

  • 38. 08:00 IST, 10 अप्रैल 2009 nalini ranjan singh:

    संजीवजी, आपने जो कुछ भी लिखा है वह क़ाबिले तारीफ़ है. मैं इसके लिए आपको बधाई देना चाहता हूँ.

  • 39. 08:02 IST, 10 अप्रैल 2009 dr. sanjay verma, navbharat times:

    संजीव जी, एक पत्रकार होने के नाते आप के विचारों से सहमत हो पाना मुश्किल है. लेकिन एक व्यक्ति के तौर पर आप की टिप्पणी में दम है. मुश्किल ये है कि आगे चल कर जूते ही देश और समाज के निर्धारक तत्व बन जाऐंगे. आप को मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी का शेर तो याद होगा ही.
    बूट अहमद ने बनाया, मैंने मज़मून लिखा
    मेरा मज़मून रह गया, हर तरफ़ जूता चल गया.
    कहीं सचमुच हमारे देश में हर तरफ़ जूते ही ना चलने लगे. अगर ऐसा ही होता है तो सच में बड़े अफ़सोस की बात होगी.

  • 40. 08:15 IST, 10 अप्रैल 2009 Dilip Kumar Gour:

    बिलकुल सटीक विश्लेषण हैं आपका! वर्षो तक हमने इस देश को नेताओं के भरोसे चलने दिया लेकिन जरनैल सिंह ने जो कुछ भी किया वह जागरूक भारत के जागरूक नागरिकों का प्रतीक हैं अर्थात हमने अहिंसा का दामन तो 62 सालों से थामे रखा ही था लेकिन अब एक बार इस क्रांतिकारी रास्ते पर चल कर तो देखें क्या पता क्रांति आ जाये....और लगता भी यही हैं कि राजनीतिक परिदृष्य बदल रहा है एवं जागरूक भारत के जागरूक नागरिकों की चंद कोशिशों से ही कुछ काम तो बनने लगे हैं और दोषियों के टिकट तो कट ही गए हैं...

  • 41. 08:24 IST, 10 अप्रैल 2009 Awadhesh Singh:

    चिदंबरम् ने बड़प्पन तो दिखाया है. मगर मेरे ख़्याल से जरनैल सिंह काफ़ी भाग्यशाली भी हैं कि वो इससे बच गए. वह चुनाव की वजह से ही बच सके.

  • 42. 10:32 IST, 10 अप्रैल 2009 vivek kumar pandey:

    संजीव जी मैंने जागरुक मित्रों की प्रतिक्रिया पढ़ी और मुझे ख़ुशी है कि सबकी एक ही राय है. जो कुछ लोग असहमत हैं उनको शायद याद नहीं कि आज़ादी कैसे मिली है. क्या ये उन्हीं शहीदों के सपने का भारत है जिसकी उन्होंने कल्पना की थी. जब 25 साल में इंसाफ़ नहीं मिलेगा तो ऐसा होगा ही.

  • 43. 10:38 IST, 10 अप्रैल 2009 Abhisheka anand:

    संजीव जी मुझे लगता है कि आप इस मामले में कुछ अच्छा नहीं लिख रहे हैं. वैसे तो मैं आपका बड़ा भक्त हूँ, लेकिन इस मामले में जरनैल सिंह ने जो कुछ किया है वो सही नहीं है, क्योंकि चिदंबरम साहब हमारे गृह मंत्री थे.

  • 44. 11:09 IST, 10 अप्रैल 2009 deepak yadav:

    सिख एक बहादुर कौम है. वे इस देश में ऑपरेशन ब्लूस्टार को भूल जाए लेकिन 1984 के दंगों को नहीं भूल सकते. जब तक हम मोदी और आडवाणी जैसे लोगों को हीरो बनाते रहेंगे. सांप्रदायिकता जैसी चीज़ यूं ही बनी रहेगी और जरनैल सिंह जैसे लोगों को क़ानून अपने हाथ में लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

  • 45. 11:43 IST, 10 अप्रैल 2009 pradeep:

    रिपोर्टेर के तौर पर उसने जो किया है उसकी तारिफ़ नहीं की जा सकती. जिस अख़बार के रिपोर्टर थे, अख़बार को चाहिए कि मामले पर कार्रवाई करे. उन्होंने एक पत्रकार के तौर पर पत्रकारिता के मूल्यों के ख़िलाफ़ काम किया है. और आप उसकी निंदा करने के बजाए हीरो क़रार दे रहे हैं. सही नहीं है.

  • 46. 12:40 IST, 10 अप्रैल 2009 ajay mehta:

    जरनैल सिंह ने जो किया है उसको उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

  • 47. 13:42 IST, 10 अप्रैल 2009 ashish:

    निश्चित तौर पर ये एक अच्छा लेख है.

  • 48. 13:49 IST, 10 अप्रैल 2009 h.mohan:

    बहुत अच्छा.

  • 49. 13:55 IST, 10 अप्रैल 2009 Maneesh Kumar:

    संजीव जी का ब्लॉग बहुत अच्छा है लेकिन जूते की तुलना सुदर्शन चक्र से करना अच्छा नहीं लगा.

  • 50. 14:03 IST, 10 अप्रैल 2009 Rajiv Bishnoi:

    वाह वाह. देश में हीरो बनने की होड़ सी लग गई है. आज एक और हीरो ने नवीन जिंदल पर जूता फेंका. ज़िन्दगी में कभी कुछ कर नहीं पाए और आज सारे मीडिया में छाए हुए हैं. लगे रहो. चुनाव का वक्त है, माफी तो मिल ही जायेगी. ज़रूरत अमेरिका से सीख लेने की है. उस इराकी पत्रकार को मार मार के अधमरा कर दिया और 3 साल की सज़ा भी हुई. भई जूता चलाकर वाह वाही लूटनी है तो इतनी सी क़ीमत तो देनी ही चाहिए ना? नहीं तो मुझे भी टीवी पर आने का शौक़ लग जाएगा, और मैं चला कुछ पुराने सड़े हुए जूते खरीदने.

  • 51. 18:50 IST, 10 अप्रैल 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    संजीव जी, आपने तो एक झटके में सिक्के का दूसरा पहलू दिखा दिया. आपकी इस टिप्पणी के पढने से पहले मैं जरनैल सिंह की हरकत को ग़लत मान रहा था, अब आपकी नज़र से देखता हूं तो पाता हूं कि भले ही उसकी हरकत अनुचित हो, उसकी परिणति तो सही हुई है. बात गांधी जी तक पहुंचती है, कि साधन का महत्व है या साध्य का! साध्य के लिहाज़ से देखें तो आप से सहमत होना पड़ता है, लेकिन साधन को भी विस्मृत तो नहीं किया जा सकता. करेंगे तो अमिताभ बच्चन की सारी फ़िल्मों में जो होता रहा है वह सही नज़र आने लगेगा. मुझे लगता है कि आप कुछ अधिक ही सरलीकरण कर बैठे हैं.

  • 52. 19:33 IST, 10 अप्रैल 2009 Yusuf Kirmani:

    आपके लेख से ज़रा भी सहमत नहीं हुआ जा सकता. अगर यही सब होने लगेगा तो फिर हर कोई जाति, समुदाय और मज़हब के आधार पर हर चीज़ को तय करेगा. नदीम अख़्तर ने बिल्कुल सही बात उठाई है. अब भी तमाम पत्रकारों पर ये आरोप तो लगते ही हैं कि फ़लां बीजेपी ख़ेमे का है तो फ़लां कम्युनिस्ट ख़ेमे का. फ़लां अख़बार या चैनल फ़लां पार्टी का है. मुझे लगता है कि चौथे स्तंभ में विश्वसनीयता का जो संकट पैदा हुआ है, इस घटना के बाद और बढ़ेगा. मुझे सिखों से भी सहानुभूति है और 1984 के दंगों में एक समुदाय के लोगों ने सिखों के साथ जो कुछ किया, उसकी निंदा जितनी की जाए कम है. लेकिन बतौर पत्रकार जरनैल सिंह को यह क़दम नहीं उठाना चाहिए था. संजीव श्रीवास्तव जी कृपया ऐसे विचारों का प्रोत्साहन न करें.

  • 53. 21:18 IST, 10 अप्रैल 2009 Param Dhanoa, Melbourne, australia:

    आप मोदी और आडवाणी की तुलना जरनैल सिंह से नहीं कर सकते, आडवाणी और मोदी 25 साल से इंसाफ़ का इंतज़ार नहीं कर रहे थे और न ही जरनैल सिंह को सिख के रूप में देखें. उसने जो किया एक पत्रकार के रूप में किया. उसने 25 साल से इंसाफ़ की उम्मीद में बैठे लोगों की आवाज़ उठाई है. उसने 25 साल पहले जो निर्दोष लोग गले में टायर डाल कर मार दिए गए थे उनके मां-बाप, भाई बहन, बीवी बच्चों की आवाज़ को सुना. मरने वाले भी इस देश के नागरिक थे. निर्दोष लोगों को मारने वाले एक बार फिर देश की सबसे बड़ी पंचायत में शरीक होने जा रहे हैं और कांग्रेस फिर क़ातिलों को टिकट देने जा रही है. ये देश के मुंह जूता नहीं कांग्रेस के मुंह पर जूता है. इस बात को कहने वालो फिर एक बार सोच लें ये बेइंसाफ़ी कल आपके साथ हो सकती है. ग़लत को ग़लत और सही को सही कहें चाहे ग़लत किसी भी धर्म या आदमी के साथ हो,

  • 54. 21:39 IST, 10 अप्रैल 2009 jasbir chawla:

    पत्रकार का आचरण मर्यादा के अनुकूल नहीं था. प्रेस कॉंफ़्रेंस में बहस भी ऊँची नहीं थी फिर भी जूता सही निशाने पर लगा. नतीजा सामने है. इस पाठ से क्या सबक़ मिलता है?

  • 55. 01:57 IST, 11 अप्रैल 2009 neetu budhiraja:

    सर, मुझे लगता है कि जरनैल ने जो किया वो तरीका थोड़ा सही नहीं था लेकिन वो बहुत दिलेर निकले औऱ शायद जरनैल को भी नहीं पता था कि उनका ये कदम कांग्रेस को इतने बड़े बैकफ़ुट पर ला देगा. जगदीश टाइटलर औऱ सज्जन कुमार ने सपने भी नहीं सोचा होगा कि उनकी टिकट कट जाएगी...आखिरकार ग़लत काम का ग़लत नतीजा ही तो मिलता है....

  • 56. 03:56 IST, 11 अप्रैल 2009 manpreet gill manila:

    संजीवजी, आपने जो कुछ भी लिखा, वह बिलकुल सही है.

  • 57. 05:17 IST, 11 अप्रैल 2009 Santokh Singh (from Canada):

    जरनैल पूरे सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. यह मत भूलिए कि पी चिदंबरम भी एक सिख प्रधानमंत्री की सरकार में मंत्री हैं. भारतीय सेना में भी सिख सर्वोच्च पदों पर हैं, सिख खुफ़िया विभाग में भी हैं और कुछ राज्यों में सिख गवर्नर भी हैं. सिख दुनिया के हर हिस्से में हैं. संजीवजी, अब आप इस बारे में कुछ कहेंगे? अगर पी चिदंबरम की जगह हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह होते तो? क्या आप गोधरा अग्निकांड के पीड़ितो के बारे में कुछ कहेंगे?

  • 58. 05:24 IST, 11 अप्रैल 2009 Bawa Bedi:

    संजीवजी, इस मुद्दे पर आपकी बेहतरीन कवरेज और स्पष्ट दृष्टिकोण है. मैं मानता हूँ कि सच को स्वीकार करना हमेशा मुश्किल होता है.

  • 59. 07:11 IST, 11 अप्रैल 2009 balwant:

    हाँ, भारतीय राजनीति की स्थिति जूता फेंकने से और भी ख़राब हो गई लेकिन यह अच्छा हुआ कि कम से कम इन राजनेताओं को इससे कुछ सबक तो मिला. इसी तरह का नैराश्य जरनैल ने महसूस किया होगा जब पी चिदंबरम ने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया था और भारत का हर नागरिक झेलता है जब सरकारी एजेंसियाँ भ्रष्टाचार के चलते सिर्फ़ ऊँची पहुँच वाले लोगों के काम करती हैं.

  • 60. 07:41 IST, 11 अप्रैल 2009 javed sheikh jhansvi:

    यह एक ऐसा मामला है जिसकी जितनी निंदा की जाए उतना ही कम है. क्योंकि अगर यह चलन चलेगा तो भारत में कोई नेता जूता खाए बग़ैर नहीं रह सकेगा. हमारे सुप्रीम कोर्ट को सौ कॉल नोटिस लेते हुए जरनैल सिंह को कम से कम एक साल की सज़ा देनी चाहिए ताकि आगे कोई ऐसा न करे और जो लोग इसकी तरफ़दारी करते हैं वो भी मुजरिम हैं. जुर्म करना या जुर्म के लिए उकसाना भी एक ही तरह के जुर्म हैं.

  • 61. 08:42 IST, 11 अप्रैल 2009 DHIRAJ RAI:

    प्रिय संजीवजी, आपका ब्लॉग पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. जहाँ तक जरनैल सिंह की बात है तो वाकई जरनैल एक हीरो हैं. जरनैल ने यह साबित कर दिया कि वह एक पत्रकार से पहले इस देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक भी हैं. जितने लोग उनके इस साहसिक काम की पत्रकारिता के नाम पर आलोचना कर रहे है वो शायद भूल गए हैं कि जरनैल एक आम नागरिक पहले हैं और पत्रकार बाद में. जरनैल को तो नमन करना चाहिए कि उन्होंने कम से कम विरोध का साहस तो जुटाया हाँलांकि ये निदान नहीं है लेकिन और पत्रकारों की तरह नेताओं के तलवे चाटना और उनका पिछलग्गू बनना कहाँ का निदान है और कौन सी पत्रकारिता है. क्या यही वह पत्रकारिता जगत है जहाँ गणेश शंकर विद्यार्थी पैदा हुए थे. मानता हुँ कि वो युग नहीं रहा लेकिन युग इतना भी ख़राब नहीं हुआ है जितना कि कहा जाता है. मुझे तो शर्म आती है उन लोगों पर जिन्होंने जरनैल की सराहना करने की बजाय आलोचना की और पत्रकारिता के उसूलों का हवाला दिया. क्या यही कहता है पत्रकारिता का उसूल कि जो दूसरा कहे बस लिखते जाओ. उस पर सवाल मत करो, कोई प्रतिक्रिया मत व्यक्त करो. ऐसी पत्रकारिता से गुलामी करना ज़्यादा अच्छा रहेगा. और तो और ख़ुद को आम जनता का अख़बार कहने वाला दैनिक जागरण तो और भी गया गुज़रा निकला जिसने जरनैल पर गर्व करने की बजाय खेद व्यक्त किया. यदि यही कोई आम नागरिक करता तो यही जागरण उस पर सम्पादकीय तक लिखता लेकिन जरनैल को तो उसने दफ़्तर तक वापस नहीं बुलाया. जरनैल ने एक साहसिक काम किया है और निःस्वार्थ किया है उन्हें कोई लालच भी नहीं है और न ही उन्हें इस घटना को भुनाना था. नहीं तो कई राजनीतिक दल उनके संपर्क में थे और वो चले भी जाते लेकिन यहाँ उन्होंने दिखा दिया कि वे एक पत्रकार हैं और उसके उसूलों को मानते भी हैं. जरनैल के इस कदम से एक आम आदमी भी खुश है.

  • 62. 08:56 IST, 11 अप्रैल 2009 suresh mahapatra:

    देश को सुधारने के लिए और कितने जूते चलवाएं. जरनैल ने अच्छा किया या बुरा पर यह सही है. जरनैल के जूते ने 125 साल पुरानी कांग्रेस को नैतिकता का पाठ पढ़ा दिया है.

  • 63. 13:30 IST, 11 अप्रैल 2009 Manish kumar:

    यही समय है जब भारतीय राजनीति को आम आदमी के गुस्से से सबक लेना चाहिए. मुझे लगता है कि यह सारा जूता प्रकरण भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल देगा. जनता में बहुत निराशा है और यह प्रकरण जनता के गुस्से का एक उदाहरण है. हालाँकि मैं यह भी कहूँगा कि इस तरह के कामों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए.

  • 64. 13:38 IST, 11 अप्रैल 2009 Manish Kumar:

    मुझे लगता है कि जरनैल सिंह का जूता हमारी भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाला है. आज इस व्यवस्था से सबका विश्वास उठता जा रहा है. सभी लोग कांग्रेस को एक ग़ैर सांप्रदायिक पार्टी मानते हैं लेकिन 1984 में वह क्या कर रही थी और आज वो क्या कर रही है. यह भारतीय राजनीतिक व्यवस्था के लिए अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए एक बड़ी चुनौती है.

  • 65. 13:51 IST, 11 अप्रैल 2009 Bawa Bedi:

    मुझे लगता है कि सब लोग इस मुद्दे को गंभीरता से इसलिए ले रहे हैं क्यों कि यह गृहमंत्री से संबंधित है. हमें इस वक्त दूसरे गंभीर मुद्दों पर विचार करना चाहिए जैसे राजनीति में आ रहे विवादास्पद व्यक्तित्व.

  • 66. 15:48 IST, 11 अप्रैल 2009 nira:

    संजीव जी, जरनैल के जूते ने जो काम किया उसके राजनीतिक नफ़ा-नुकसान को छोड़ दें, तो तस्वीर के और भी कई पहलू हैं. लोगों ने कहा जो जरनैल ने किया वह जर्नलिज़्म है. क्या आप इससे सहमत हैं? कलम की ताकत जूते में उतर आई. नाइंसाफी केवल सिखों के साथ ही नहीं हुई है. तब जरनैल कहां थे, जब गोधरा कांड के जनक नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे. तब जरनैल कहां थे जब अयोध्या में मस्जिद टूट रही थी.

  • 67. 09:10 IST, 12 अप्रैल 2009 Anil Kumar:

    नैतिकता को आधार बनाया जाए तो यह आचरण कतई सही नहीं था. परंतु मीडिया से जुड़े हुए व्यक्ति को अपना विचार व्यक्त करने का उचित माध्यम मौजूद था. मैं यह कहूँगा कि विरोध तो उचित था परंतु विरोध का तरीका ग़लत था.

  • 68. 10:07 IST, 12 अप्रैल 2009 Jashanpreet Singh:

    आपका ब्लॉग दिल को छूने वाला और असलियत को दिखाने वाला है. जरनैल वाकई एक हीरो हैं. हम सभी जानते हैं कि सिख विरोधी दंगों के ज़िम्मेदार कौन लोग थे लेकिन हमारे भ्रष्ट राजनीतिक और न्याय व्यवस्था के चलते सभी भ्रष्ट लोग 25 सालों से खुले घूम रहे हैं. यह उस देश के लिए वाकई शर्मनाक है जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र बताता है. जरनैल का कदम सराहनीय है.

  • 69. 13:19 IST, 12 अप्रैल 2009 ibrastogi:

    आपकी इस बात से मैं सहमत नहीं हूँ कि सारे मीडिया वाले चोर नहीं होते. उनमें से भी कुछ लोग देश और समाज के बारे में सोचते हैं. जरनैल ने यही साबित किया है. काश सारा मीडिया जरनैल जैसा ही होता तो देश और समाज बदल चुका होता.
    भारत में मीडिया किस के हाथों में है? पिछले गुजरात चुनावों में अरब देशों से आया पैसा मीडिया को देकर मोदी और हिंदुत्ववादियों की छवि को धूमिल कराया गया. और मीडिया ने पूरी वफ़ादारी से ऐसा करने की कोशिश की जो सफल नहीं हो सकी. सभी मीडिया हाउस और अख़बारों के मालिकों की जानकारी के बाद पता लगाया जा सकता है कि हमारा मीडिया अब विदेशी ताकतों के हाथों का खिलौना बन गया है जिसका परिणाम समझा जा सकता है.

  • 70. 17:17 IST, 12 अप्रैल 2009 vibhavasu tiwari:

    जरनैल के कदम का स्वागत होना चाहिए. पत्रकार समाज का ही अंग होता है. उसके भी दिल होता है. तमाम आदर्शों का चोगा ओढ़कर यदि नेता संसद में जूता चला सकता है तो पत्रकार क्यों नहीं?

  • 71. 05:19 IST, 13 अप्रैल 2009 swatantra:

    इतने बड़े प्लेटफ़ार्म से किसी को इस तरह बोलते और सोचते समझते देख कर अच्छा लगा. प्रश्न किसी जरनैल सिंह के हीरो या विलेन होने का नहीं है. प्रश्न है भारत में प्रजातंत्र के हालात का. एक आम आदमी जिसके पास जनबल नहीं है, धनबल नहीं है, सिर्फ़ एक वोट का बल है वो विरोध कैसे दर्ज करे. आप कह सकते हैं कि जरनैल सिंह तो पत्रकार था. उसके पास तो आवाज का बल था. पर जरनैल सिंह तो इतने दिनों से आवाज़ उठा ही रहा था. वो भी बड़े अखबार के माध्यम से? क्या हुआ? आरोपी दिन पर दिन ताकतवर हो रहे थे. कोर्ट, सीबीआई सबसे बरी होते जा रहे थे. न्याय की आखिरी उम्मीद ख़त्म हो रही थी. 25 साल हो गए थे. हज़ारों लोग सरेआम मार दिए जाते हैं. पर ये कैसी पुलिस और कैसा कानून जिसके आगे आज तक कोई दोषी नहीं. क्या यह सवाल काफ़ी नहीं है किसी को ज़ोर से बहस करने के लिए? आज उसी जरनैल ने जब अपनी आवाज़ कुछ ज़्यादा तेज़ कर दी तो उसी आवाज़ ना मान कर जूता माना जा रहा है. भारत में समस्या यह नहीं कि लोग ज़्यादा बोलते हैं बल्कि यह है कि डरते ज़्यादा है, बोलते कम हैं. सवाल यह है कि क्या जरनैल के पास और कोई रास्ता था. जब सरकार ही आम आदमी की सरकार की तरह काम न करके कांग्रेस की सरकार की तरह काम करे तो आप पत्रकार से कब तक यह उम्मीद करेंगे कि वो पत्रकार ही बना रहे. अपनी बात कहने के लिए आवाज़ ऊँची करनी ही पड़ती है. जैसा कि संजीव ने कहा है- बिना मौक़े या दस्तूर के कोई एक जूता क्या पूरी बाटा की दुकान भी फेंक देगा तो उस पर कोई ध्यान नहीं देगा.

  • 72. 09:34 IST, 25 अप्रैल 2009 arvind mohan:

    मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ. आपकी बात एकतरफ़ा है. दूसरी ओर वरुण गाँधी ने जो कहा, वह ठीक नहीं है. दरअसल भविष्य में सिर्फ़ मुसलमान ही आप जैसे लोगों, हिंदुओं और सप, कांग्रेस और राजद जैसे दलों को सबक सिखाएंगे.

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