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आर-पार की लड़ाई

संजीव श्रीवास्तवसंजीव श्रीवास्तव|रविवार, 12 अप्रैल 2009, 13:16 IST

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने एक-दूसरे पर ज़हर बुझे तीरों की बरसात कर रखी है. यह दंगल जैसे चुनाव 2009 से अलग, एक नई ही महाभारत की शक्ल अख़्तियार करता जा रहा है.

2009 चुनावी महाभारत से अलग इस दंगल में मनमोहन सिंह बनाम आडवाणी वाकयुद्ध को इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि क्या वाक़ई यह दोनों अनुभवी नेता -- अगर हम इनकी उम्र जोड़ दें तो आंकड़ा 150 पार कर जाएगा -- यह ख़ुशफ़हमी रखते हैं कि भारत की एक अरब से भी ज़्यादा जनता के समक्ष इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह मनमोहन सिंह और आडवाणी में से किसको चुने ?

यह कई चुनावी मु्द्दों में से एक हो सकता है, पर जितना समय यह दोनों महानुभाव अपने बयानों और भाषणों में एक-दूसरे को देते हैं उससे लगता है कि जहां आमतौर पर लोग स्वयं की शक्ति या महत्व के बारे में ग़लतफ़हमी पालते हैं, इस मामले में यह दो प्रबुद्ध नेता शायद दूसरे को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व दे रहे हैं.

अजब धृतराष्ट्र 'कॉम्पलेक्स' है ये.

अब अगर जनता ने, या यूँ कहिए चुनाव के बाद की गणित ने दोनों को ही नकार दिया तो इनकी एक दूसरे को इतनी 'इंपॉर्टेंस' देने की क्या गत बनेगी ?

क्या कहेंगे ये सबसे ? कि भाई हमने तो पूरी चुनावी मुहिम में बस एकसूत्रीय कार्यक्रम चला रखा था और वह इतना ज़बर्दस्त चला कि हमें तो कुछ नहीं मिला पर हम सामने वाले को ज़रूर ले डूबे.

चलिए चुटकी लेना बंद करता हूँ. संजीदा बात करें तो क्या भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को यह शोभा देता है कि प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष के नेता के संबंध इतने कटु हो जाएं कि दोनों हर स्तर पर जाकर एक-दूसरे को नीचा दिखाएं ?

क्या देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन राजनीतिज्ञ, सार्वजनिक जीवन में बहस के स्तर को इतना व्यक्तिगत बनाकर ग़लत उदाहरण नहीं पेश कर रहे ?

आडवाणी और मनमोहन सिंह की राजनीति से आप समहत या असहमत हो सकते हैं. पर शायद ही कोई कहेगा कि इतना सब हासिल करने के बावजूद मनमोहन सिंह या आडवाणी सार्वजनिक जीवन में शालीनता और विनम्रता नहीं रखते.

तो फिर ऐसा क्या हो गया है कि एक-दूसरे का ज़िक्र आते ही इन अनुभवी, बुज़ुर्ग महारथियों का ख़ून इस क़दर खौलने लगता है कि दोनों ही कुछ व्यक्तिगत स्तर पर उतर कर जैसे 'बिलो दि बेल्ट' प्रहार करते हैं.

आडवाणी ने मनमोहन सिंह को इतनी बार कमज़ोर प्रधानमंत्री कहा कि लोग गिनती भूल गए. हर मौक़े पर उनका कहना था कि सत्ता का असली केंद्र 10 जनपथ यानी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का निवास है.

बात सही है, इससे तो कांग्रेसी भी इंकार नहीं कर सकते, पर शायद बार-बार और लगातार स्वयं को 'कमज़ोर और निकम्मा' सुनते-सुनते मनमोहन सिंह भी राजनीतिक शालीनता को ताक़ में रखते हुए जैसे फट पड़े और कह उठे कि वह तो कमज़ोर सही पर आडवाणी का सार्वजनिक जीवन में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के अतिरिक्त और क्या योगदान है ? तब आडवाणी के जैसे काटो तो ख़ून नहीं.

हिंदुत्व और नो हिंदुत्व. अयोध्या आडवाणी की राजनीतिक महत्वकांक्षा के रास्ते में दुखती रग है और उसी ज़ख़्म को मनमोहन सिंह ने इतनी बेदर्दी से फिर ताज़ा कर दिया.

बाबरी मस्जिद विध्वंस और राम मंदिर आंदोलन में आडवाणी की भूमिका पर इस ब्लॉग में विस्तृत चर्चा की आवश्यकता नहीं है. लेकिन आडवाणी के 60 वर्ष के सार्वजनिक जीवन को जिस तरह एक वाक्य में मनमोहन सिंह ने निपटा दिया है, क्या वह सही और उचित है ?

राय इस प्रश्न पर भी अलग-अलग हो सकती है, पर आडवाणी और उनकी पार्टी बुरी तरह आहत है और 'कमज़ोर' प्रधानमंत्री पर लगातार निशाना बनाए हुए है.

बात सिर्फ़ यह नहीं है कि दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर के हिस्से रोटी जा सकती है. जनता-जनार्दन जो चाहे वही होगा. पर एक पूरे युग का प्रतिनिधित्व करने वाले दो वरिष्ठ दिग्गजों को देश के समक्ष राजनीतिक आचरण का ज़्यादा अनुसरणीय उदाहरण पेश करना चाहिए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:57 IST, 12 अप्रैल 2009 UMESH YADAVA:

    संजीव जी सलाम, आपने इस ब्लॉग में जो कुछ कहा बिल्कुल सही है. मुझे लगता है कि इन दो बिल्लियों के लड़ाई में प्रतीक्षारत बिल्ली ज़्यादा ज़िम्मेदार है. लगता है प्रतीक्षा में बिल्ली अधीर हो गई है. आप के ही साथ इंटरव्यू में दूसरी प्रतीक्षारत बिल्ली ने जल्द ही बोला था आतंकवाद और देश की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होगा; देखिए यही हैं अधीर बिल्ली और उसके सरकार की उपलब्धियाँ, संसद पर हमला, अक्षरधाम पर हमला और करगिल युद्ध. इन कुटिल नेताओं ने उस असफलता को विजय दिवस के रूप में मना कर जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश की. विमान अपहरण हुआ और विमान भारत में उतरा लेकिन वे कुछ नहीं कर सके.
    बांग्ला देश बॉर्डर पर 16 बीएसएफ़ के जवान मार दिए गए और किस तरह उन्हें बांस के डंडे में लटका कर वे ले जा रहे हैं इन्होंने क्या किया.
    अब आप बताएँ कहाँ गया था लोहा इस तथाकथित लौहपुरुष का.

  • 2. 18:25 IST, 12 अप्रैल 2009 Mahendra:

    ये बात बिल्कुल सही है जो संजीव जी ने कही है. वाक़ई में यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि दो अनुभवी नेता इस तरह की बयानबाज़ी कर रही हैं. अच्छा होता अगर दोनों आज राष्ट्र के समक्ष उपस्थित समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित कर उसके निदान के बारे में जनता के समक्ष कुछ कार्यक्रम रखा होता.

  • 3. 20:27 IST, 12 अप्रैल 2009 amit kumar naag:

    एक भारतीय प्रधानमंत्री लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता, वो कितना कमज़ोर है वो इससे ही ज़ाहिर होता है. चुनाव क्या है, जनता क्या चाहती है- कम से कम ये एक प्रधानमंत्री को पता होना चाहिए. मुंबई में हुए हमलों के बाद साबित होता है कि मनमोहन एक कमज़ोर प्रधानमंत्री हैं.

  • 4. 21:32 IST, 12 अप्रैल 2009 Rajiv Bishnoi :

    ये बात आपने बहुत सही की है. दोनों शीर्ष नेताओं को ये बात पहुंचे और इस वाकयुद्ध में थोड़ा ठहराव आए तो नई पीढी के नेताओं के लिए कुछ सीखने को होगा. पर अभी जिस रफ़्तार से ये दोनों नेता शालीनता से गिर रहे हैं, मुझे डर है कि आपस में मिलने पर कहीं जूता फेंक प्रतियोगिता न शुरू कर दें.

  • 5. 23:47 IST, 12 अप्रैल 2009 Krishna Tarway:

    संजीव जी, आपने तो सारी बातें कह दी. हमारी टिप्पणी के लिए कुछ छोड़ा ही नहीं.

  • 6. 04:03 IST, 13 अप्रैल 2009 dhairya jha:

    आप सही हैं संजीव जी. हमें राष्ट्रीय एजेंडा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि निजी मुद्दों पर.

  • 7. 05:57 IST, 13 अप्रैल 2009 nilmani singh:

    यह भारत की असली समस्या से मुँह चुराना है. समस्या यह नहीं है कि कौन कमज़ोर प्रधानमंत्री है और कौन मज़बूत या कौन सांप्रदायिकता बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार है. लेकिन असल समस्या कुछ और ही है. ग़रीबी, बेरोज़ग़ारी, भ्रष्टाचार पर बातें या विवाद होने चाहिए और जनता को बताया जाना चाहिए कि इन मुद्दों से कैसे निपटा जाएगा और अब तक इन्हें दूर करने के उपाय क्यों नहीं किए गए. एक बात और, दूसरों पर आरोप लगाने से कुछ नहीं होता. यह लोग फालतू बातों पर बहस कर रहे हैं, अगर इन मुद्दों पर बहस होती तो भारत की जनता तय कर पाती कि कौन व्यक्ति देश को बेहतर ढंग से संभाल सकता है. भारत की राजनीति पर शर्म आती है.

  • 8. 06:13 IST, 13 अप्रैल 2009 rajesh chandra mishra:

    चुनाव का मौसम है और हर तरफ़ एक आग लगी है. राजनीति के मायने बदल रहे हैं. पता नहीं वे कौन लोग हैं जो लोकतंत्र को अपने आप से जोड़ रहे हैं और उसके सवाल पर वोट मांग रहे हैं लेकिन यह साफ़ हो गया है कि स्वार्थ भारी है. किसी के पास कोई मुद्दा नहीं है, कोई नैतिक बल नही है. दल बदलुओं की भीड़ है और शब्दों की जुगाली. और है ख़ुद की नजरों से भी सामना न कर पाने की बेबसी. पर उम्मीदवार हैं कि उनकी सेहत पर कोई असर नही है. एक से बढ़कर एक. बड़े बड़े वादे और बड़े बड़े दावे. पैसों का भी खूब खेल है. कल तक जिसे गाली देते नहीं थकते थे उसे भगवान कहने में ज़रा भी संकोच नहीं है. शर्म उन्हें भले न आ रही हो लेकिन देखने और सुनने वालों की निगाह झुक जाती है. यह कैसा चुनाव है. कैसा लोकतंत्र है. यह भारत की तकदीर से खिलवाड़ है. यह तो उनके लिए अपमान है जिन्होंने देश के लिए कुर्बानी दी. यह तो उनकी मर्यादा पर हमला है जिन्होंने इस देश की मर्यादा बचाई. भारतीय लोकतंत्र की आत्मा कराह रही है. जिस दल की राजनीति करते हैं उसी के ख़िलाफ़ षडयंत्र में लगे हैं. जिस दल का झंडा उठाये हैं उसी की सूचनाएँ विरोधी दल को दे रहे हैं. यह लोकसभा चुनाव है. कई लोग अपनी तकदीर बना रहे हैं. एक तीर से दो दो निशाने साधे जा रहे हैं. इस चुनाव में तो वे बेशर्म भी है जो अपनी ही पार्टी के ख़िलाफ़ झंडा उठाकर विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों को हराते रहे हैं और फ़िर उसी पार्टी की दुहाई देकर चुनाव में खड़े हैं. ये ऐसे तिकड़मी लोग हैं जो वोट के लिए भावनाओं की तिजारत करते हैं. अपनी ही पार्टी के लोगों को चुनाव हराते हैं और फ़िर अपने पास से विकल्प देते हैं. ऐसे लोगों की कमी नही है. लोग वक्त के साथ अपना चेहरा बदल लेते हैं. व्यवहार बदल जाता है, नज़ाकत बदल जाती है. आख़िर ऐसे लोगों के भुलावे में जनता क्यों आती है. यही वक्त का सबसे बड़ा सवाल है जिसका जवाब जनता को खोजना ही होगा वरना हाथ से रेत की तरह सब कुछ फिसल जायेगा और हम देखते रह जायेंगे.

  • 9. 06:38 IST, 13 अप्रैल 2009 vishnu sharma:

    मनमोहन सिंह लोकसभा के लिए नहीं खड़े हो रहे हैं तो मैं इसे ग़लत नहीं मानता. भारत के संविधान में ऐसी व्यवस्था है. और कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया है तो किसी एक लोकसभा क्षेत्र की बजाय पूरा देश उनकी योग्यता पर निर्णय ले सकता है. वर्तमान प्रधानमंत्री और प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग में कौन ज़्यादा अच्छा वक्ता है, इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि उनकी विचारधारा और देश के प्रति स्वप्न क्या है? आतंकवाद को चुनावी मुद्दा बनाने का किसी भी पार्टी को नैतिक अधिकार नहीं है, दोनों ही इसमें विफल रही हैं.

  • 10. 06:45 IST, 13 अप्रैल 2009 Tajuddin Khan:

    बात इन दोनों शीर्ष नेताओं की नही है, बात है कि आज हमारे नेता किस कदर अपनी पहचान खोते जा रहे हैं, किसी भी नेता को आज देश की चिंता नही है यह सब जगजाहिर है. भाजपा के समय कंधार कांड, संसद में गोलाबारी, कारगिल कांड यह सब हुआ जो कि भारत के इतिहास में सबसे बड़ी घटना थी, जब भी तो वाजपेयी साहब प्रधानमंत्री थे भाजपा के ही नही देश के सबसे शक्तिशाली नेता थे, मगर देश जानता है कि वह सब देश को झेलना पडा़ जो कि इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में नही झेला, तो संजीव जी आप ही बताइये कि इन नेताओं को यह सब बातें करनी चाहिएं, नही, देखना इस बार के चुनाव लालू, अमर, पासवान, आडवाणी या मनमोहन सभी को चौंका देंगे क्योंकि अब युवा मुर्ख नही बन सकता इनके बयानों के आधार पर वह अब जान चुका है.

  • 11. 08:28 IST, 13 अप्रैल 2009 SUMIT KHANNA:

    मनमोहन सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी के बीच चल रहा वाकयुद्द एक ग़लत परंपरा है जो देश में आज़ादी के बाद से चल रहा है. आडवाणी मनमोहन को कमजोर पीएम कहते हैं वहीं अरुण जेटली उन्हें बेहतर पीएम लेकिन कमजोर अर्थशास्त्री मानते हैं. मनमोहन सिंह कहते हैं के वे आडवाणी की तरह मजबूत भाषण तो नहीं दे सकते लेकिन काम कर सकते हैं. लेकिन आवाम इनकी बहस नहीं ज़मीनी स्तर पर काम होते देखना चाहती है.

  • 12. 08:50 IST, 13 अप्रैल 2009 Shreeansh singh (prince):

    मैं आपके विचार से पूरी तरह से सहमत हूँ. इन दोनों का वाकयुद्द मुझे सास-बहू सीरियल से प्रभावित लगता है.

  • 13. 08:54 IST, 13 अप्रैल 2009 Shreeansh singh (prince):

    मैं आपके विचार से पूरी तरह से सहमत हूँ. इन दोनों का वाकयुद्ध करोड़ों भारतीयों पर भारी पड़ रहा है. लगता है कि यह सास बहू का सीरियल है.

  • 14. 09:59 IST, 13 अप्रैल 2009 rashid khan:

    संजीव जी का ब्लॉग हमेशा की तरह बेहतरीन है बेचारे मनमोहन कब तक चुप रहते उन्हें तो कुछ कहना ही था आखिर समय जो चुनाव का है, . वैसे उनका जवाब सो सोनार का और एक लोहार का जैसा था. आडवाणी जी और मनमोहन जी के बीच वाकयुद्ध तो चलता रहेगा परन्तु प्रधानमंत्री की फैसला तो आखिर जनता को ही करना है.

  • 15. 10:01 IST, 13 अप्रैल 2009 सतीश चन्द्र सत्यार्थी :

    बहुत सही कहा आपने. आडवाणी और मनमोहन सिंह के व्यक्तिगत और चरित्र से ज्यादा ज़रूरी मुद्दे भी हैं इस देश में. दोनों ने देश के लिए क्या-क्या किया है यह सबको पता है. बेहतर हो यदि वो एक दूसरे का चरित्र हनन करने के बजाए देश की ज़रूरतों पर एक सार्थक बहस की शुरुआत करें.

  • 16. 10:37 IST, 13 अप्रैल 2009 amit karwasra:

    हम कहते हैं कि मर जाएंगे और वो कहते हैं आमीन. कुछ यही नज़ारा है देश का. सियासतदानों ने पेशा बना रखा है. राजनीति धंधा है. एक विपक्षी नेता को दूसरी पार्टी के नेता को कोसना हो तो घंटों पानी पी पी कर कोस सकता है. पर इनसे जब पूछा जाए कि इनका रिपोर्ट कार्ड कैसा है? इनका देश के विकास में योगदान क्या है? राजनीतिक प्लेटफ़ार्म पर बैठ जाना ही तो अहम नहीं होता. जिस ख्वाब के साथ मुल्क़ आज़ाद हुआ जो जज़्बात हमें हर चेहरे पर नज़र आने चाहिए लेकिन वो किताबों में ही दफ़न क्यों मिलते हैं.

  • 17. 14:04 IST, 13 अप्रैल 2009 chander:

    मैं संजीव जी से सहमत नहीं हूँ, दो बड़े नेता के बीच चुनाव के वक्त वाकयुद्ध होना कोई ग़लत नहीं और मुझे नहीं लगता कि दो नेता ने ऐसा कुछ बोला जो आपत्तिजनक लगे ऐसा तो बिलकुल ही नहीं जिस पर ब्लॉग लिखा जाए.

  • 18. 14:35 IST, 13 अप्रैल 2009 Rakesh Bhatnagar:

    ऐसा नहीं कि दोनों पक्ष धराशाई हो जाएंगे पर इस तरह की राजनीति भारत जैसे उभरते हुए देश को शोभा नहीं देती. पर इनको ठीक तो संजीव जी आप ही कर सकते हैं. वैसे दोनों ही अड़ियल हैं. अगर ये मुद्दे कारग़र करें तो बात सही बनेगी.

  • 19. 14:37 IST, 13 अप्रैल 2009 alekh indian legends:

    प्रिय संजीवजी...यह सही है कि मनमोहन सिंह एक अच्छे अर्थशास्त्री हैं लेकिन साथ ही कमज़ोर प्रधानमंत्री भी हैं यह बात अब पूरी दुनिया जान चुकी है. भाजपा ने 25 पाकिस्तानियों के स्थान पर कुल तीन चरमपंथियों को रिहा किया जबकि एक मंत्री की बेटी के लिए इससे पहले की सरकार पाँच चरमपंथियों को रिहा कर चुकी है. कई बात कोई विकल्प ही नहीं होता लेकिन वाजपेयी ने पोखरण में भी अपनी मज़बूती दिखाई. इससे सिद्ध होता है कि भाजपा का नेतृत्व ज़्यादा मज़बूत होता है.

  • 20. 14:40 IST, 13 अप्रैल 2009 alekh indian legends:

    आजकल राहुल गाँधी गरीबी की बात करते हैं. सभी जानते हैं कि भारत में कांग्रेस ने 50 साल से भी ज़्यादा समय तक शासन किया है. अगर यह इतने की काबिल होते तो भारत की स्थिति इतनी ख़राब नहीं होती. देश की सभी समस्याओं के लिए कांग्रेस ही ज़िम्मेदार है. राहुल ने भी अपनी पार्टी का इतिहास तो पढ़ा ही होगा....भाजपा हमेशा से कांग्रेस से बेहतर रही है. उन्होंने पाँच सालों में अपना काम दिखाया है..लेकिन जाति-संप्रदाय पर आधारित राजनीति की वजह से उन्होंने मौका खो दिया..जो देश के लिए बुरा साबित हुआ है.

  • 21. 15:12 IST, 13 अप्रैल 2009 surya:

    संजीव जी, नमस्कार, मुझे लगता है कि आप कांग्रेस के एजेंट हैं. मैं आपके विचारों से संतुष्ट नहीं हूँ.

  • 22. 15:42 IST, 13 अप्रैल 2009 akhilesh singh:

    संजीव जी आप ने बिल्कुल सही कहा है. अगर मनमोहन सिह जी ने यही दरियादिली अपने उपर लगने वाले बयानों के समय अपने फ़ैसलों में दिखायी होती तो आज भारत की जनता उन्हें सराह रही होती लेकिन दोनों दिग्गजों को आज इस तरह की बयानबाज़ी करते हुए देखकर यही महसुस होता है कि राजनीति का स्तर कितना व्यक्तिगत हो गया है. मनमोहन सिंह का यही रूप मैं उनके समय में देखना चाहता था जब मनमोहन सिंह पीएम बने थे. उस समय मैं बहुत खुश हुआ था कि चलो एक साफ़ छवि का व्यक्ति पीएम है लेकिन उनके कार्यकाल ने मुझे बहुत हताश किया और उन्होंने तब अपनी चुप्पी नही तोडी थी जब उसकी ज़रूरत थी.

  • 23. 17:21 IST, 13 अप्रैल 2009 डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल:

    वैसे तो हमारे देश के हर चुनाव में कीचड़ की बन आती है, लेकिन इस बार कीचड़ भरी बाल्टियां दो शीर्ष नेताओं ने भी उठा रखी हैं, यह दुखद है. ये लोग जिस तरह की बयानबाज़ी कर रहे हैं, वह एक तरह से तो देश की प्रबुद्ध जनता का अपमान ही है. बेहतर होता कि ये व्यक्तिगत प्रहारों की जगह मुद्दों की चर्चा और उन पर बहस करके एक आदर्श सामने रखते. लेकिन कभी कभी मुझे लगता है कि बेचारी जनता तो विकल्पहीन है. उसे जिनमें से चयन करना है वे सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. नीतियों और आचरण के मामले में सभी तो एक जैसे हैं. फिर यह नाटक ही क्यों न चलता रहे? नाटक या नौटंकी. जो भी कहें इसे. यही हमारा दुर्भाग्य है.

  • 24. 21:38 IST, 13 अप्रैल 2009 yousuf:

    संजीव जी, सलाम, मैंने आपके और सबकी पत्रकारिता पढ़ी लेकिन मैं यहाँ कहना चाहता हूँ कि चाहे भाजपा हो या कांग्रेस, सब एक ही तरह के हैं. लेकिन मनमोहन सिंह जी जैसे प्रधानमंत्री बहुत कम ही मिलेंगे. जो काम में विश्वास करते हैं. वहीं आडवाणी बस हिंदू मुद्दा ही लेकर आज तक राग अलाप रहे हैं. उन से अच्छा तो मैं मोदी को समझता हूँ जो कम से कम विकास पर भी तो ध्यान देते हैं. मेरे हिसाब से झूठी राजनीति करने वाले कभी सफल नहीं होंगे और आज आडवाणी जो हिंदुत्व का मुद्दा लिए हैं वो सिर्फ़ चुनाव में ही रहता है.

  • 25. 01:43 IST, 14 अप्रैल 2009 ghanshyam gautam:

    दोनों ही नेता अपने अपने क्षेत्रों में अलग हैं. मनमोहन काफ़ी अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन आडवाणी अपनी क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर सके. अक्षम व्यक्ति हमेशा दूसरों पर आरोप ही मढ़ता रहता है. जबकि सक्षम व्यक्ति अपने काम में ही लगा रहता है. आडवाणी ऐसे नेता हैं जो कुछ करते नहीं, बस बातें ही करते हैं.

  • 26. 02:26 IST, 14 अप्रैल 2009 anurag singh rana:

    हालांकि इस ब्लॉग में विस्तृत चर्चा की आवश्यकता नहीं है. लेकिन आडवाणी के 60 वर्ष के सार्वजनिक जीवन को जिस तरह एक वाक्य में मनमोहन सिंह ने निपटा दिया है, क्या वह सही और उचित है ? राय इस प्रश्न पर भी अलग-अलग हो सकती है, पर आडवाणी और उनकी पार्टी बुरी तरह आहत है और 'कमज़ोर' प्रधानमंत्री को लगातार निशाना बनाए हुए है.

  • 27. 04:40 IST, 14 अप्रैल 2009 KHALID NAJMI JALKAURVI:

    संजीव जी, आदाब, जब ज़िंदगी अतिमहत्वाकांक्षी हो जाती है तो इंसान आगे बढ़ने के लिए हर तरह का ज़ोर आज़माइश करता है. और जब बात राजनेताओं की हो तो कहना ही क्या है, यह तो बात बना बना कर अपनी ज़ुबान की रोटी ही तो खाते हैं. राजनेता अपनी बातों में कोई अभिनेता से कम नहीं होते हैं. यह असली ज़िंदगी को भूलकर खिलाड़ी हैं. पहले के दौरे-हुकूमत में क्या क्या सितम ढाए गए, उसे बस याद कर के ही रूआँ रूआँ सहम जाता है. कौन मज़बूत था और है देशवासी सब देख चुके हैं. कोई बहुत दूर बात नहीं है. तमाम मिसालें होटों पर गिनी जा सकती हैं. बहरहाल, जब दो बड़े राजनेताओं के बीच इस तरह की कटुता होगी तो बेचारी जनता उन बेज़ुबानों से क्या प्रेरणा लेगी. इधर आ सितमग़र हुनर आज़माएं, तू तीर आजमा और हम जिगर आज़माएँ.

  • 28. 05:10 IST, 14 अप्रैल 2009 Prem Verma:

    धन्यवाद संजीव जी, मुझे लगता है कि दोनों ही नेता जनता को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. न मनमोहन सिंह के पास वोटरों को लुभाने के लिए कुछ है और न ही आडवाणी जे के पास कोई करिश्मा है. कभी कभी मुझे लगता है कि यह पूरा ही एपिसोड नूरा कुश्ती के समान है और हम लोग जिनके पास करने को कुछ नहीं है, बिना किसी वजह के इनकी बकवास को सुनते- पढ़ते रहते हैं.

  • 29. 08:34 IST, 14 अप्रैल 2009 Raj:

    इस ब्लॉग का क्या मतलब है? आप भी गंदी राजनीति में खुद को लपेट रहे हैं. मुझे नहीं लगता कि आप मूल मुद्दे को उठा रहे हैं. आडवाणी जी को चुनाव के समय ही मंदिर की याद आती है.

  • 30. 12:31 IST, 14 अप्रैल 2009 Shantanu Srivastava:

    भारतीय राजनीति में जनता पार्टी को चुनती है न कि व्यक्ति विशेष को, लगता है दोनों ही नेता इसे भूल गए हैं. दोनों ही पार्टी की नीतियों पर फोकस करें.

  • 31. 13:10 IST, 14 अप्रैल 2009 Kamlesh Kumar Priyadarshi:

    मुझे आपका लेख पसंद आया.

  • 32. 14:42 IST, 14 अप्रैल 2009 Praful:

    मुझे तो मनमोहन और आडवाणी दोनों ही कमजोर लगते हैं. सिर्फ़ नरेंद्र मोदी में दम है कि वह भारतीयों की इच्छा आकांक्षा को पूरा कर सकें.

  • 33. 15:46 IST, 14 अप्रैल 2009 deepak :

    संजीव जी, वर्तमान पीएम और 'पीएम इन वेटिंग' में जो वाकपटुता जारी है वो अंतिम रूप से इस युवा देश को गुमराह करने की कोशिश ही है. आपको नहीं लगता की पचास करोड़ की आबादी 25 साल से कम उम्र की है फिर भी किसी पार्टी का ऐसा एक भी नेता नहीं जो युवा को आगे बढ़ाए. हमारे मुख्य पुराने नेता बहस को इस तरह मोड़ देते हैं कि लोगों का असली समस्या से ध्यान हट जाए चाहे वो पानी की हो या दो जून की रोटी की, बिजली की या सड़क की या युवाओं के रोज़गार की. मनमोहन और आडवाणी दोनों को अपनी उम्र के इस चौथे पराव में सन्यास ले लेना चाहिए लेकिन क्या उनमें इतनी हिम्मत है. ये तो पूरा भारत ही जनता है की मनमोहन सिंह शैडो परधानमंत्री हैं. ख़ैर हम बेबस लोग तो उनके वाकयुद्ध को निहार रहे हैं. बस.

  • 34. 15:52 IST, 14 अप्रैल 2009 sujeet:

    अगर सोनिया गांधी मनमोहन सिंह का समर्थन न करें तो कॉंग्रेस में ही कोई उनका कोई समर्थन न करे यूपीए तो दूर की बात है. 2004 के चुनाव में किसी को पता भी नहीं था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनने वाले हैं. क्या ये जनता के साथ धोखा नहीं?

  • 35. 16:11 IST, 14 अप्रैल 2009 sujeet:

    ये देश का दुर्भाग्य है कि सोनिया गांधी बिना किसी ज़िम्मेवारी के देश पर शासन कर रही हैं.

  • 36. 17:16 IST, 14 अप्रैल 2009 ajeet kumar jha,beguarai:

    धन्यवाद संजीव जी, आडवाणी का कहना बिल्कुल सही है. पर चुनाव के समय डिबेट करने से क्या. मनमोहन सिंह ज़रूर कम बोलते हैं और सोनिया जी के दबाव में रहते हैं पर भारत को ऐसा अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मिलना मुश्किल है.

  • 37. 17:58 IST, 14 अप्रैल 2009 DAVE BHATTI:

    प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह बेहतरीन व्यक्ति हैं. अगर आडवाणी जी अपनी जीवनी में तारीख़ें याद नहीं रख सकते तो वे बेहतर प्रधानमंत्री कैसे हो सकते हैं.

  • 38. 12:50 IST, 15 अप्रैल 2009 navin:

    ये वोट विभाजित करने का एक तरीक़ा है. और इस चुनाव को एक दूसरे के बीच की लड़ाई बताना है.

  • 39. 19:58 IST, 15 अप्रैल 2009 DEEPAK YADAV:

    आडवाणी जी जो पाकिस्तान से आए हैं और हमें देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं उनके लिए सिर्फ़ इतना ही कहना है...बरसता न पानी है जिन बादलों से, वो धरती की पीड़ा कहाँ तक हरेंगे, नियति है जिनकी बिजलियां गिराना, वो सूखे सरोवर कहाँ तक भरेंगे... नेश्नल पार्टियों की सत्ता बहुत हो गई अब हमें क्षेत्रीय पार्टियों को मौक़ा देना चाहिए.

  • 40. 23:18 IST, 15 अप्रैल 2009 DINKAR KUMAR, DELHI:

    संजीव जी, हम आपकी इस असमय टिप्पणी पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे, बस एक मन्नत के बारे में चुपके से बताना चाहेंगे कि हमने एक मंदिर में मनौती मांगी है कि देश की बाग-डोर कांग्रेस-भाजपा दोनों पार्टी संयुक्त रूप से संभालें (अपनी-अपनी ऐतिहासिक ग़लतियों और उप्लब्धियों को पूरी तरह भुलाकर) इससे हमारे देश में भी दो-दल वाली शासन पद्धति शुरू हो जाएगी जो लोकतंत्र के हित में भी अच्छा होगा. बाक़ी अगर दोनों दल संयुक्त रूप से सिर्फ़ युवा नेताओं को ही कैबिनेट में रखें तो मैं सवा किलो लड्डू और चढ़ाउंगा.

  • 41. 06:50 IST, 16 अप्रैल 2009 sandeep kumar:

    दोनों ही नेता भारतीय जनता को बेवकूफ़ बनाने वाले हैं .आडवाणी का तो काम ही दंगा करवाना है. बाबरी विध्वंस के समय जो घृणा का प्रचार किया गया था उसे भला जनता कैसे भूल सकती है. मोदी-आडवाणी जैसे लोग भी जनता के पास आ जाते हैं उनके हितैषी बनकर जिनके हाथ ख़ून से सने हैं. मनमोहन सिंह की पूरी नीति ही पूंजीपतियों की दलाली वाली है. आडवाणी - मनमोहन दोनों ही भारतीय अस्मिता को अमरीका जैसे देश को बेचने को 'विकास' मानते हैं. दोनों नेताओं में अंतर महज़ सांप और नाग का है.

  • 42. 12:44 IST, 16 अप्रैल 2009 Ashok Kumar:

    देश की दो सबसे बड़ी पार्टी एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगी है. किसी को देश की जनता का भी ख्याल है कि वो क्या चाहती है, क्योंकि ये एक दूसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं. पहले अपने अन्दर तो देखें कौन कितने पानी में है. कब तक ये राजनेता ऐसे ही लगे रहेंगे क्या कभी ये सब एक साथ हो कर देश के बारे में भी सोचेंगे कि देश के युवाओं को क्या चाहिए, क्या है जो हमारे देश को आगे लेकर जा सकता है.

  • 43. 20:03 IST, 20 अप्रैल 2009 Sandeep Bhardwaj:

    धन्यवाद संजीव जी, आडवाणी का कहना बिल्कुल सही है. पर चुनाव के समय डिबेट करने से क्या. मनमोहन सिंह ज़रूर कम बोलते हैं और सोनिया जी के दबाव में रहते हैं. अगर सोनिया गांधी मनमोहन सिंह का समर्थन न करें तो कॉंग्रेस में ही कोई उनका कोई समर्थन न करे यूपीए तो दूर की बात है. 2004 के चुनाव में किसी को पता भी नहीं था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनने वाले हैं. क्या ये जनता के साथ धोखा नहीं?

  • 44. 10:45 IST, 26 अप्रैल 2009 r k sutar:

    वाह खान साहब, वाह.

  • 45. 04:58 IST, 29 अप्रैल 2009 sunil jain:

    जहाँ 50-55 फ़ीसदी मतदान हो, पाँच-सात पार्टियाँ हो और 20-22 प्रत्याशी तो चुनाव का क्या मतलब. संविधानविदों और अवाम को सोचना चाहिए. उन्हें जवाब देना होगा.

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