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मुसलमानों को क्या चाहिए?

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सुहैल हलीमसुहैल हलीम|शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009, 06:12 IST

भारत के लोकसभा चुनाव में आजकल इस बात पर बहुत बहस है कि मुसलमान किसका साथ देंगे. जब कोई संप्रदाय, धर्म या बिरादरी चुनावों में किसी का साथ देती है, तो उसकी कुछ उम्मीदें और तमन्नाएं होती हैं.

तो मुसलमान को क्या चाहिए? वो किस बुनियाद पर ये फ़ैसला करते हैं कि किसका साथ दें?

सालों पहले मेरे एक बुज़ुर्ग कहा करते थे कि, "मैंने भारतीय मुसलमान को कभी कोई युनिवर्सिटी, स्कूल या कॉलेज माँगते हुए नहीं देखा, कभी न ही वो अपने इलाक़े में अस्पताल के लिए आंदोलन चलाते हैं और न ही बिजली पानी के लिए, वो जानवरों तक का अस्पताल नहीं माँगते. उन्हें चाहिए तो बस एक चीज़. लाउडस्पीकर पर मस्जिद से अज़ान देने की इजाज़त, जिसपर पर अक्सर सांप्रदायिक रुप से संवेदनशील शहरों में पाबंदी लगा दी जाती थी."

मेरे ख़्याल में बुनियादी तौर पर यह बात अब भी सच है. चाहे लाउडस्पीकर अब मुद्दा न हो, लेकिन मुसलमान अब भी अतीत में ही उलझे हुए हैं. भारत में तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों को वोट देते हैं, सुरक्षा के नाम पर उनके हाथों ब्लैकमेल होते हैं, पाकिस्तान में शरीयत को लागू करने के लिए जान देते हैं, ऐसा क्यों है कि इसके सिवा हमें और कुछ नहीं चाहिए?

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  • 1. 07:09 IST, 24 अप्रैल 2009 Arun:

    इसकी वजह साफ़ है, क्योंकि ज़्यादातर मुस्लिम धर्म से आगे कुछ सोचते ही नहीं है. और यही उनकी गरीबी और पिछड़ेपन का वास्तविक कारण है.

  • 2. 07:13 IST, 24 अप्रैल 2009 शैलेश भारतवासी Shailesh Bharatwasi:

    कल ही राजकिशोर का आलेख पढ़ रहा था, कुछ-कुछ आपसे मिलती-जुलती बात थी. यह सच है कि भारतीय मुसलमान पिछले 20-25 वर्षों से केवल बेवकूफ ही बन रहे हैं.

  • 3. 07:24 IST, 24 अप्रैल 2009 DINESH KUMAR :

    क्या मुसलमानों को किसी समाज, धर्म, देश से मतलब नहीं - कि और लोग कितनी तरक्की कर रहे हैं, उनके बच्चे कितने अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं या नौकरियाँ कर रहे हैं. ऐसा लगता है मुसलमानों को अपने धर्म की पढ़ाई करनी है और उसमें डूबे रहना है और शायद इसीलिए मुसलमान पिछड़ रहे हैं.

  • 4. 07:39 IST, 24 अप्रैल 2009 Sanjeev:

    मुसलमानों को कुछ भी 'एक्सट्रा स्पेशल' नहीं चाहिए. बल्कि ये सवाल ही नहीं होना चाहिए. मेरा सवाल यह है कि आजादी के 60 साल बाल भी ऐसे सवाल क्यों पूछे जा रहे हैं. मुसलमान हो या हिंदू सबको वो चाहिए जो एक भारतीय को चाहिए - शिक्षा, रोज़गार, सड़क, पानी, बिजली, सुरक्षा. लेकिन मेरे इस सवाल उठाने से कुछ हासिल नहीं क्योंकि जिनके हाथ मे सत्ता है वो तो विभाजित करो और राज करो की नीति को नहीं छोड़ने वाले.

  • 5. 07:40 IST, 24 अप्रैल 2009 alok :

    मैं आपकी बात से सहमत हूँ. ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि मुसलमान शायद ही कभी भारत को अपना देश समझ पाए है और इस समुदाय में शिक्षा का अभाव भी है.

  • 6. 07:42 IST, 24 अप्रैल 2009 उमेश कुमार यादव:

    आपके बुज़ुर्ग ने जो कहा था वह सोलह आना सही है. मैं अगर कुछ कहूंगा तो लोग कह सकते हैं कि मैं काफ़िर हूँ...भारतीय मुसलमान आज भी अपनी संकीर्ण मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. काश! वे तुर्की के अपने सहधर्मियों से कुछ सीख पाते!!!!!!!

  • 7. 07:52 IST, 24 अप्रैल 2009 dilip kumar:

    मैं सोहैल से सहमत हूँ. मुसलमान समुदाय कांग्रेस के हाथ की कठपुतली बन गया है . मुसलमान भी भारत का हिस्सा हैं और ये उनकी भी मातृभूमि है.

  • 8. 08:01 IST, 24 अप्रैल 2009 Tajuddin Khan:

    यह विडंम्बना ही कहिए कि आज मुस्लमान की पहचान या तो तालेबान के नाम से होती है या आतकंवाद के नाम से, और यह सब जान के सच में बहुत बुरा लगता है कि आज इस क़ौम को राजनीति ने जितना नुकसान किया है उससे ज्यादा नुकसान उन लोगों ने भी किया है जो इस क़ौम के नेता कहलाते थे. ऐसा नही है कि मुसमलमान को अज़ान के लिए ही आवाज़ बुलंद करनी होती है, उसे भी वही सभी जरूरत की चीज़ें चाहिएं जो उसके जीवन यापन के लिए जरूरी हैं. वह भी अच्छी नौकरी चाहता है, वह भी अच्छे स्कूलों में पढ़ना चाहता है वह भी देश के लिए नौछावर होना चाहता है. मगर मुस्लमानों का एक हो कर यह जानने की सख़्त ज़रूरत है कि उनका शोषण क्यों होता है और कौन हैं जो उनको सिर्फ़ वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं.

  • 9. 08:12 IST, 24 अप्रैल 2009 Amrit:

    हमारे मुसलमान भाइयों को भी भारत के हित प्यारा है चाहे कुछ राजनीतिक नेता सोचते हैं कि वे पाकिस्तान के ज़्यादा क़रीब है. ये नेता पाकिस्तान के हक़ में बोल कर उनको मूर्ख बनाना चाहते हैं. मुसलमानों को उनसे सतर्क रहना चाहिए और सबक सिखाना चाहिए. पाकिस्तान पूरे भारत का पड़ोसी है केवल मुसलमानों का नहीं...

  • 10. 08:18 IST, 24 अप्रैल 2009 शशि सिंह :

    सुहैल साहब आपने हथौड़े वाली चोट की है. यकीनन जिस दिन मुसलमान भाई लाउडस्पीकर की ज़िद छोड़ देंगे उनकी आधी तकलीफें ख़ुद ब ख़ुद गायब हो जाएँगी. फिर उन्हें न तो किसी मुलायम को मौलाना और न किसी लालू या किसी कांग्रेसी को अपना रहनुमा बनाना होगा... वो खुदमुख़्तार हो जायेंगे.

  • 11. 08:22 IST, 24 अप्रैल 2009 vishal singh thakur(jbp):

    स्वतंत्रता की लड़ाई के बाद मुसलमानों को धरती का अलग टुकड़ा पाकिस्तान मिला तो फिर उनको भारत में रहने का अधिकार कैसे हैं. उन्हें कुछ माँगने का हक़ नहीं, जो मिलता है उसे स्वीकार करना चाहिए और शिकायतें करना बंद करना चाहिए.

  • 12. 08:23 IST, 24 अप्रैल 2009 Averroes:

    वो यूं सुहैल कि भारतीय मुसलमानों को कभी काबिल नेतृत्व ही नहीं मिला. दूसरा ये कि किसी मुसलमान की ज़िंदगी में धर्म एक सशक्त मौजूदगी रखता है और जब किसी समुदाय की पहचान उसकी भाषा, साहित्य,संस्कृति और खान-पान ना होकर धर्म हो, तो आधुनिक परिवेश में दिक्कतें तो पेश आएँगीं ही. अहम ये भी है कि ना जाने क्यूं बीस करोड़ भारतीय मुसलमान ख़ुद को अल्पसंख्यक कहलवाने में जुटे हैं ? और इसका जवाब कि मुसलमानों को क्या चाहिए- उन्हें चाहिए तालीम - धर्म के साथ-साथ अर्थशास्त्र, विज्ञान, गणित, भूगोल की. यही सारे विषय हैं जिनमें इस्लाम का योगदान कालजयी है.

  • 13. 08:30 IST, 24 अप्रैल 2009 Abdul Wahid:

    काफ़ी हद तक यह बात सही है कि मुसलमान अतीत के झरोके मे सिमटा हुआ है. लेकिन इसके कई ठोस कारण हैं. भारत में सांप्रदायिक दंगों का भयावह इतिहास रहा है और आज भी मुसलमान इससे त्रस्त हैं. इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में वास्तविक सेक्युलर पार्टी का कोई वजूद नहीं है. आज़ादी के 60 साल बाद भी धार्मिक कट्टरता कम होने की जगह बढ़ती जा रही है. देश में हर आतंकवादी घटना को एक समुदाय विशेष से जोड़कर पूरी क़ौम को अछूत बनाया जा रहा है. और ऐसा लग रहा है कि सारा देश भी पूरा दोष एक समुदाय विशेष के मत्थे जड़ रहा है. सबसे अफ़सोसनाक यह है कि ऐसा प्रतीत होता है कि देश का पढ़ा-लिखा तब्का सामाजिक समस्याओं पर जैसे नकारात्मक नज़रिए से ही सोच रहा है.

  • 14. 08:33 IST, 24 अप्रैल 2009 zafar ali khan:

    सोहैल भाई आपने ठीक लिखा है और एक बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस सब के लिए ज़िम्मेदार हम ख़ुद हैं इस्लाम नहीं... इस्लाम ने तो सारी दुनिया को जीने का सही और क़ामयाब रास्ता दिखाया है ...ये दो हमारे अपने कर्म है जो हम न दीन को छोड़ते हैं ना दिनिया को.

  • 15. 08:40 IST, 24 अप्रैल 2009 Sajid:

    मैं एवरोज़ से 100 फ़ीसदी समहत हूँ

  • 16. 08:45 IST, 24 अप्रैल 2009 sangeeta manral:

    हमने भारत में कई लोगो को यहाँ तक कहते सुना है कि पाकिस्तान में तालेबानी सिख समुदाय के लोगों को मार रहे हैं और वहाँ से वो भगा रहे हैं, तो वरुण गाँधी या आडवाणी जी जो (मुसलमान के खिलाफ़) बोलते है वो क़ाबिले तारीफ है, और समर्थन पूर्ण है. बताईये ऐसी मानसिकता का क्या कर सकते है??

  • 17. 08:47 IST, 24 अप्रैल 2009 Praveen kumar jha:

    मैं भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तानी मुसलमानों से बेहतर स्थिति में देख कर काफ़ी बहुत ख़ुश हूँ. मैं मानता हूँ कि हमारे देश में कुछ सामान्य समास्याएं हैं जिनका संबंध सिर्फ़ मुसलमानों से नहीं है, बल्कि समाज के हर निचले तबक़े से है, और इसका अकेला हल शिक्षा है.

  • 18. 09:03 IST, 24 अप्रैल 2009 Kaushik Pandya, Dubai:

    देश के बाहर रहने वाले हमारे मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपनी पहचान हिंदोस्तानी के रुप में अधिक बनाई है. यूएई एक मुस्लिम देश है लेकिन यदि आप भारतीय हैं तो आप को अधिक इज़्ज़त मिलती है और यहाँ एक मुसलमान भारतीय होने के आधार पर अधिक रोज़गार पाता है. सच्चाई तो यही है कि लालू यादव, मुलायम सिंह और कांग्रेस के नेताओं ने ज़बर्दस्ती विशेष समुदाय का अग़वा कर लिया है.
    मेरी तो अपील है सभी मुस्लिम भाईयों से कि हम पहले भारतवासी हैं बाद में अपने धर्म के. आप उन्हीं से दोस्ती कीजिए जो देश की बात करे नहीं की आपकी चापलूसी करे. यूएई में भारतीयों को बैंक से क्रेडिट कार्ड लेने में आसानी होती है जबकि पडो़सी देश के लोगों की अधिक आमदनी होने के बावजूज परेशानी उठानी पड़ती है. मुझे इस बात पर गर्व है कि किसी भी अन्य देश के आंतकवाद में किसी भारतीय मुसलमान का हाथ नहीं होता है.

  • 19. 09:13 IST, 24 अप्रैल 2009 Ajay Pal Singh:

    मेरी व्यक्तिगत राय है कि मुसलमानों में अधिकतर लोगों ने अपने पिता और पूर्वजों से सिर्फ़ चरमपंथ की तालिम ली है और वो किसी दूसरे मज़हब के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते और दुनिया में मिलना नहीं चाहते. मेरे बहुत से मुस्लिम दोस्त हैं और उन में एक समानता है कि वो एक साथ रहना चाहते हैं.

  • 20. 09:22 IST, 24 अप्रैल 2009 Anwar Haider:

    यह बात सही है कि आज भी मुसलमान बहुत पीछे हैं, इसके लिए जहाँ मुसलमान ख़ुद ज़िम्मेदार है, वहीं सरकार भी. उसने कभी भी मुसलमानों को मुख्याधारा में लाने की कोशिश नहीं की. चुनाव के बाद सब भूल जाते हैं कि मुसलमान भी इस देश में रहते हैं. अगर मुसलमान पीछ रहता है तो देश का एक बड़ा वर्ग पीछड़ जाएगा.

  • 21. 09:30 IST, 24 अप्रैल 2009 Umesh:

    जब तक मुसलमान शिक्षा के दामन को नहीं थामतेगा यूं ही परेशान रहेगा.

  • 22. 09:43 IST, 24 अप्रैल 2009 [email protected]:

    सुहैल साहब! हर व्यक्ति की अपनी विशेषता होती है. मुसलमान इस्लाम है और अल्लाह में विश्वास रखते हैं.
    आप को एक बड़ी तस्वीर देखनी चाहिए बल्कि ना कि मस्जिद में लाउडस्पीकर पर अड़ जाना चाहुए. मुसलमान इंसाफ़ के लिए लड़ रहे हैं. आपको पुलिस और न्यायिक व्यवस्था में सीधे तौर पर पूर्वाग्रह की अनदेखी नहीं करनी चाहिए. देश में होने वाले दंगों और सज़ाओं पर नज़र डालें तो तस्वीर साफ़ हो जाएगी. हमें सच्चर रिपोर्ट पर भी नज़र डालने की कोशिश करनी चाहिए. और इन सब से बढ़कर मैं दावे से कह सकता हूँ कि असल परेशानी लाउडस्पीकर नहीं बल्की लाउडस्पीकर से भी समस्याओं को नहीं सुन पाना है और लाउडस्पीकर पर अटक जाना है.

  • 23. 09:46 IST, 24 अप्रैल 2009 Dilbag Singh:

    सबसे पहले मुसलमानों को दूसरों में विश्वास पैदा करना होगा और ये सोचना बंद करना होगा कि वो अल्पसंख्यक हैं. आप इतिहास को देखें तो पाएंगे कि अधितर मुस्लिम शासकों ने गद्दी के लिए भाई तक को मार दिया है. दूसरी तरफ़ मुसलमानों में हीनता का भाव है क्योंकि दूसरा समुदाय मुसलमानों पर विश्वास नहीं करता. सभी ये सोचते हैं कि मुसलमान चरमपंथी या तालेबानी हैं. सबको एक होकर सोचना चाहिए कि बुनियादी ज़रूरतें क्या हैं और उसके लिए लड़ना चाहिए और थोड़ा ऊपर उठ कर भारत के बारे में सोचना चाहिए.

  • 24. 10:46 IST, 24 अप्रैल 2009 Amit Prabhakar:

    मुझे आज तक ये बात समझ में नहीं आई कि अमीर खुसरो के मरने के छह सौ साल वाद भी मुसलमानों को अलग रूप से क्यों देखा जाता है. मैं यहाँ ये नहीं कहूंगा कि उन्हें लोग अलग देखते हैं या वे ख़ुद को अलग देखते हैं, पर मुसलमानों के लिए अलग से राजनीति क्यों हो रही है और इसका औचित्य ही क्या है? आज तो हम सबों के सामने एक ही चुनौती है और इस मामले में हम सब का एक ही लक्ष्य. क्या ये लक्ष्य इतना आकर्षक और सुन्दर नहीं कि हम इसके लिए जात-धरम से ऊपर उठें? भगवान के लिए ही सही?

  • 25. 12:07 IST, 24 अप्रैल 2009 AJIt Tambe:

    बहुत ही सच बात है सुहैल जी, ये बात सच है कि बहुत से मुसलमान नेता अपने लोगों को भारत, हिन्दुओं और साइंस के खिलाफ़ भड़काते हैं ,पर इन्हीं मुसलमान नेताओं के बच्चे विदेश मे शिक्षा ले रहे हैं. भारतीय मुसलमानों को अपने अतीत पर बार-बार रोना धोना छोड़ कर आने वाले समय के बारे मे सोचना चहिये. कल तक जो पकिस्तान यहाँ के मुसलमानों को भारत के खिलाफ़ धरम के नारे देकर भड़का रहा था आज वही पाकिस्तान धार्मिक आतंकवादियों से अपने आप को बचाने की गुहार लगा रहा है.

  • 26. 13:15 IST, 24 अप्रैल 2009 krishna chauhan:

    मैं आपकी बात से सहमत हूँ. आपने सटीक और करारा जवाब दिया है.

  • 27. 13:48 IST, 24 अप्रैल 2009 Amit Sharma:

    आपने सही कहा है कि मुसलमान यदि अपनी धर्मान्धता को छोड़ अपने को आधुनिकता में लाये. जहाँ पर सबका सब एक हो जाता है तो निःसंदेह उनकी भी प्रगति होगी| आये दिन कभी दाढ़ी के लिए कभी कुछ के लिए कभी कुछ के लिए खड़े हो जाना वैसे ही है जैसे एक बच्चा झुनझुने की ज़िद करने लगता है. आज 20 करोड़ आबादी है आप लोगों की कितने आदमी सही से पढ़े लिखे हैं. (मैं आपने एरिया की बात कर रहा हूँ)? कितने आदमी अच्छे से जिंदगी जीते हैं? धर्म को मानना गुनाह नहीं है वैसे भी मैंने भी कुरान पढ़ी है, बहुत सारी सीखें उसमें लिखी हुई हैं लेकिन खुद मुस्लिम लोग अपने प्राचीन विचारधारा में लगे रहते हैं जो की नहीं होना चाहिए. क्या हम लोग गीता , रामायण, महाभारत नहीं पढ़ते हैं. और हम ज़िद भी नहीं करते कि मुझे गीता, रामायण ही पढाओ या उसमें जो लिखा है वही करो (वैसे करना वही चाहिए जो धर्मग्रन्थ में लिखा है क्योंकि धर्मग्रन्थ लिखना एक साधारण मनुष्य की बात नहीं हैं और जिसने लिखा है या तो वह भगवान है या भगवान का दूत है)
    आजकल अफ़गानिस्तान में नया नियम निकला है कि जो औरत (संप्रदाय विशेष के लिए) आपने पति की कामेक्षा को पूरी नहीं करेगी उसे कुछ अधिकारों से अलग कर दिया जायेगा. आखिर ये क्या है यार? इसपर आप लोग क्यों नहीं सोचते? क्यों नहीं कुछ क़दम उठाते कि यह सब बर्बरता है और कुछ भी नहीं. इस प्रकार के विचारधारा से आने के बाद ही आपलोग सुदृढ़ हो पाएंगे ऐसा मेरा विचार है.

  • 28. 14:07 IST, 24 अप्रैल 2009 Om Singh:

    पता नहीं भारत में हर कोई अपने आपको असुरक्षित क्यों मांनता है? कोई धार्मिक अल्पसंख्यक होने के कारण डर महसूस करता है, कोई भाषाई अल्पसंख्यक होने कारण. कोई उत्तरभारतीय होने के कारण भयभीत है, कोई दक्षिण भारतीय होने के कारण तो पूर्वोत्तर के लोग भी डरे हुए हैं. ऊंची जाति को पिछड़ों से डर लगता है तो पिछड़े तो सताए हुए हैं ही. देश का एक बड़ा वर्ग पाकिस्तान से डरा हुआ है तो अमरीका से भी डरने वालों की कमी नहीं है. वास्तव में हर भारतीय किसी-न-किसी जाने या अनजाने डर में जी रहा है. आज़ादी से पहले इस डर को पैदा किया था विदेशी लुटेरों और राजाओं ने फिर अंग्रेजों ने. और आज़ादी के बाद इस भय को हमारे नेताओं ने खूब बढ़ाया और भुनाया है. अनजाना खौफ़ उस भूत की तरह है जो न जाने कितने सौ सालों से हमें डरा रहा है और इस डर को किस्सगो, लेखक और फिल्मकार अपनी रचनाओं में बेचते रहे हैं. लेकिन भूत होता है या नहीं ये किसी को नहीं पता और अब यही अनजाने डर को नेता हम पर राज करने के लिए हथियार बना चुके हैं. सच्चाई यह है कि हम क्यों खौफ़ज़दा हैं हमें नहीं मालूम. सच्चाई तो यह है कि न सिर्फ मुसलमान बल्कि हिंदू भी अनजाने खौफ़ से डराए जाते हैं. और क्या आपने कभी डरे हुए हुए व्यक्ति को खाना मांगते, पढाई करते या खुश देखा है?......नहीं ना ?....इसलिए डर भगाना और विश्वास जगाना होगा....क्योंकि डर के आगे ही जीत है.........

  • 29. 14:22 IST, 24 अप्रैल 2009 Suhel:

    शिक्षा, रोज़गार तथा सुरक्षा चाहिए जो सबकी मूलभूत आवश्‍यकता है लेकिन सबने अपने आप यह सोच लिया कि हमें पिछड़ा रहना पसंद हैं. किसी के एक बुजुर्ग ने ऐसा कहा तो क्‍या सभी ऐसा ही चाहते हैं. ऐसा नहीं है. ज़बरदस्‍ती किसी के प्रति चंद लोगों की बातें सुनकर राय बना लेना गलत है, एक तो मुसलमानों का शोषण होता है और आप लोग कहते हैं कि मुसलमान अपना शोषण करवाकर खुश हैं, ऐसा नहीं है. आप लोग इस कौम का साथ दें और इन पर ​विश्‍वास करें. मेरे भी एक बुजुर्ग हैं जो कहते हैं कि पहले हिन्‍दू मुसलमानों के ईमान की क़सम खाया करते थे. आज भी मुसलमान वही है ईमान वाला. लेकिन चंद लोगों की वजह से पूरी कौम को बदनाम किया जा रहा है.

  • 30. 14:42 IST, 24 अप्रैल 2009 mohd tariq:

    मुसलमान रसूल के बताए रास्ते से दूर हैं, इसीलिए सब परेशानी है.

  • 31. 15:14 IST, 24 अप्रैल 2009 ANKIT DUBEY:

    आपका विचार एकदम सही है. मुसलमान कभी अपने या अपने देश के विकास के बारे में नहीं सोचता.

  • 32. 15:31 IST, 24 अप्रैल 2009 vikas kumar:

    मै आपकी बात से सहमत हूँ. मुसलमानों को अपने हक़ के लिए खूद लडना होगा क्योंकि इस देश का हर एक आदमी अपने लिए लड रहा है. जब मुस्लमान समाज “शाहबानो केस” पर कोर्ट के फैसले को पलट्ने के लिए लामबंद हो सकता है और सरकार को एक विशेष कानून बनाने पर विवश कर सकता है तो इन मुद्दो के लिए भी इस समुदाय को खूद आगे आना पडेगा. इसके अलावा किसी के पास कोई रास्ता नही है.

  • 33. 15:38 IST, 24 अप्रैल 2009 Prashant :

    60 साल के बाद भी यदि आज मुस्लिम समय की दोड़ मे पीछे है तो ये उन के नेताओ और धर्मनिरपेक्ष दलों की वजह से है . यदि आधुनिक शिक्षा की जगह आज भी मदरसे मे वो तालीम लेना पसंद करते है , तीन शादियाँ आज भी उनकी स्वतंत्रता का हिस्सा हैं , प्लस पोलियो की दवा से ख़तरा महसूस करते हैं ,डॉ. कलाम आज भी उनके आदर्श नहीं हैं ,आज भी देश से पहले धर्म स्थान रखता है ,और वन्दे मातरम साम्प्रदायिक है तो कितनी भी सच्चर रिपोर्ट आ जायें .उनकी स्थिति नहीं सुधर पायेगी . ज़रुरत है कि मुस्लिम भाई शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिये अपनी आवाज़ बुलंद करे. उपने उदारवादी नेतृत्व को आगे लाकर अपनी लीडरशिप सोंपे. राजनैतिक दलों की वोट बैंक की नीति को पहचाने.

  • 34. 16:06 IST, 24 अप्रैल 2009 suresh pandey:

    भारत के मुस्लिम समाज के साथ अन्य समाजों का रिश्ता क्या रहा है, इस पर भी विचार होना चाहिए. ईसाई भी तो यहाँ अल्पसंख्यक हैं, पर उनके साथ यह बात क्यों नहीं लागू होगी. चाहे किसी की सरकार रही हो, मुस्लिम समाज उनके लिए वोट बैंक से ज़्यादा कुछ नहीं रहा है. कथित रूप से धर्मनिरपेक्ष पार्टियों पर भी यही बात लागू होती है.

  • 35. 17:49 IST, 24 अप्रैल 2009 Bala S.:

    आपके विचार पढ़कर कुछ अजीब सा लगा. कई लोगों की प्रतिक्रिया बहुत तुच्छ है और क्यों न हो, यह सवाल ही ऐसा है. इस विषय पर कोई सार्थक बहस नहीं हो सकती क्योंकि सभी पक्ष पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. राष्ट्रवाद को किसी समुदाय विशेष से नहीं जोड़ा जा सकता. हिंदू होगा तो राष्ट्रभक्त होगा या मुसलमान होगा तो देशद्रोही ही होगा. आज सभी पक्ष असुरक्षित महसूस करते हैं. कारण क्या हो सकता है. अशिक्षा, गरीबी इत्यादि. आज व्यक्ति अकेला और निशब्द हो गया है. अधकचरी व्यवस्था केवल पन्नों में सिमटकर रह गई है. पशुबल लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी का पर्याय बन गया है. लोगों को आरक्षण के लिए अल्पसंख्यक घोषित होना और अपने फ़ायदे के लिए पीढ़ी दर पीढ़ी बेशर्मी से वही बने रहने का चस्का लग गया है. ऐसे में ज़रूरतमंदों को रोटी, कपड़ा और मकान कहाँ से नसीब होगा. और जबतक मुसलमान फ़रीदगंज में, हिंदू हनुमानगंज में और ईसाई जॉर्ज टाउन में रहेगा तब तक इस समस्या का हल नहीं हो सकता.

  • 36. 18:37 IST, 24 अप्रैल 2009 kishor kumar kushawaha:

    मेरी राय में सारी समस्या धर्म की है. धर्म बनाने वाले ने ज़िंदगी को आसान और व्यवस्थित करनी चाही थी. मगर हम उसे शत-प्रतिशत मानने में बहादुरी और शान समझते हैं. भले ज़िंदगी बदतर हो रही है. ये सिर्फ़ मुसलमानों की ही नहीं कमोबेश सबकी समस्या है. जितनी जल्दी हम ये समझ लेंगे हम सब के लिए अच्छा होगा.

  • 37. 18:48 IST, 24 अप्रैल 2009 Sanjay Shah:

    मुसलमान आज जिस स्थिति में हैं, उसका ज़िम्मेदार वो खुद हैं. आज सारे विश्व में मुसलमानों को एक ही नज़र से देखा जा रहा है. इसकी वजह भी वो खुद ही हैं. मुसलमानों की सोच ये है कि बस इस्लाम ही एक मजहब है और मुसलमान ही ईश्वर की संतान हैं. और बाकी कुछ भी नहीं हैं. यही वो वजह है जिसके कारण आज इस्लाम में इतनी दंडहीनता बढ़ रही है. कुछ सिखिए मेरे मुसलमान भाई, इराक़, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से. आज एक इस्लाम ही इस्लाम को क्या अंजाम दे रहा है. ये आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. ये बर्बादी की लड़ाई लड़ रहे हैं. जिसका एक ही मुद्दा है और वो है इस्लाम. इस मजहब के ही लोग मानव जाति का विनाश करने में लगे हैं जो कभी कामयाब नहीं होंगे. इसलिए लाउडस्पीकर से अजान नहीं, बल्कि बिन सुनाए ही मुसलमानों का दर्द समझने और संकीर्ण विचारों से ऊपर आने की ज़रूरत है. फिर देखिए कि आप क्या बनते हैं और आपका स्थान क्या होता है.

  • 38. 18:56 IST, 24 अप्रैल 2009 vaibhav:

    शायद यह अजीब लगे पर मुझे लगता है कि भारतीय मुसलमान या भारतीय दलित या भारतीय ईसाई को अगर कुछ चाहिए तो वो है बेहतर शिक्षा जो आधुनिक हो और जिसमें अपने मजहब के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी मानवता के लिए भी मुस्तैद रहना सिखाया जाए.

  • 39. 19:02 IST, 24 अप्रैल 2009 shiva:

    चुनाव के बाद नेता किसी भी बात को गंभीरता से नहीं लेते और यह सभी संप्रदायों के लिए सही है. यह सिर्फ़ भारत या किसी एक देश की बात नहीं है, सारी दुनिया में ऐसा ही है कि अगर कहीं आतंकवादी हमला होता है तो पहला शक किसी इस्लामिक गुट पर ही जाता है. लेकिन हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि ऐसा क्यों है. कुछ लोग कहते हैं कि मुसलमानों के साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जाता इसलिए वे चरमपंथी बन जाते हैं. यह ठीक उसी तरह से है, कि अगर किसी घर में एक बच्चे को ठीक से नहीं देखा जाता तो वह गुंडा बन जाता है. लेकिन इसे मुसलमानों पर कैसे ठीक समझा जा सकता है क्योंकि यह एक बड़ी कौम है और जबकि दुनिया के अनेक देशों में वे राज भी कर रहे हैं. कुछ भी हो लेकिन हर किसी की ज़िंदगी अपनी होती है और उसे वह नष्ट करना चाहता है या सफल बनाना चाहता है, यह उस पर ही निर्भर है. ऐसा भी नहीं है कि जिस किसी को भी समस्या हो वह गुंडा बन जाए और दूसरों को मारना या लूटना शुरू कर दे. जब ऐसे हालात में हर कोई चरमपंथी बन जाएगा तो कौन किसे मारेगा और कौन किसे लूटेगा. इस समस्या के बारे में गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है नहीं तो कोई भी नहीं बचेगा.

  • 40. 19:20 IST, 24 अप्रैल 2009 samir azad:

    शायद आप कहना चाहते हैं कि सारी समस्याओं की जड़ मुसलमान ही हैं जबकि ये ग़लत है.

  • 41. 19:20 IST, 24 अप्रैल 2009 RAJEEV:

    भारतीय मुसलमान अपने धर्म से ऊपर उठने की बात सोच नहीं पा रहे हैं इसलिए पीछड़ते जा रहे हैं.

  • 42. 19:41 IST, 24 अप्रैल 2009 Aaryan:

    मुसलमान एक समस्या है, न सिर्फ़ अपने आपके लिए बल्कि सारे विश्व के लिए. मुसलमामनों को हठधर्मी छोड़नी चाहिए या फिर आत्महत्या कर लेनी चाहिए, ताकि विश्व में शांति हो सके. वैसे भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान चला जा चाहिए, क्योंकि हमलोगों ने उन्हें पाकिस्तान दे दिया है. वे वहाँ क्यों नहीं जाते?

  • 43. 19:52 IST, 24 अप्रैल 2009 Mudassir Husain Ashiq Al Salah:

    आलोक, विशाल सिंह और संगीता जी आपने अपने दिल की बात तो कह दी है, लेकिन क्या कभी ये भी सोचा है कि आपकी ऐसी मानसिकता का मुसलमानों पर क्या असर पड़ता है. भारतीय मुसलमान भारत में संयोगवश से नहीं बल्की अपनी पसंद से रहते हैं. आज मुसलमानों की छोटी से छोटी बात को उनके धर्म और आतकंवाद से जोड़कर देखा जाता है, जबतक आप लोग ये सोच नहीं बदलेंगे तबतक कुछ नहीं हो सकता.

  • 44. 19:54 IST, 24 अप्रैल 2009 Krishna Tarway:

    मौलवियों और मुल्लाओं के क़ब्ज़े में रहने वाले समुदाय को लाउडस्पीकर की चिंता अधिक रहती है. इस से आगे यह कुछ और सोच ही नहीं सकते. ये पहले अपने आपको मुसलमान समझते हैं फिर भारतीय. इनका कुछ नहीं हो सकता. ऐसी सोच रखने वालों की संख्या दुर्भाग्यवश ज़्यादा है.

  • 45. 20:12 IST, 24 अप्रैल 2009 vinder:

    जनाब!
    आप जानते हैं कि हमलोग अभी भी तीसरी दुनिया के वासी है, क्योंकि हमलोग मुसलमान हिंदू, ईसाई और सिख होकर सोचते हैं. जबकि हक़ीक़त में हमसब मानव हैं. मेरे प्यारे जाग जाइए.

  • 46. 00:09 IST, 25 अप्रैल 2009 Sharad:

    मैं नहीं जानता कि वास्तव में लेखक क्या कहना चाहते हैं. वो भी अन्य मुसलमानों की तरह भ्रमित दिखे. मैं उनको और अन्य मुसलमानों को कहना चाहूँगा कि वो अपने को अल्पसंख्यक सोचना बंद करें. 20 करोड़ आबादी दुनिया में कहीं भी अल्पसंख्यक नहीं हो सकती. इसलिए अच्छा है कि खोल से बाहर निकले और पहले भारत के कल्याण की बात करें, फिर मस्जिद से अज़ान की बात करें. जिस दिन मुसलमान भारत को अपना देश समझने लगेंगे उसी दिन देशवासी उनकी सारी परेशानियों को समाप्त कर देंगे. सबसे पड़ी परेशानी उनकी मानसिकता को लेकर है, जबतक वो अपनी मानसिकता नहीं बदलेंगे तबतक कोई उनका भला नहीं कर सकता और वो तथाकथित सक्युलर राजनीतिक पार्टियों के ज़रिए बेवकूफ़ बनाए जाते रहेंगे.

  • 47. 02:18 IST, 25 अप्रैल 2009 uday (from Canada):

    मेरा मानना है कि भारत, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के मुसलमान ही ख़तरनाक हैं. मैंने दुनिया के अनेक इस्लामिक देशों में भ्रमण किया है जहाँ के मुसलमान बेहद अच्छे होते हैं. क्या आपको पता है कि अरब देशों में जिन लोगों को मौत की सज़ा मिलती है, उनमें पाकिस्तान के लोग सर्वाधिक हैं. भारत में बहुत से ग़ैर राजनीतिक मुसलमान पढ़े लिखे हैं. उन्हें सामने आकर अच्छा नागरिक बनना चाहिए. उन्हें भारत में धार्मिक स्वतंत्रता मिल रही है. वे क्यों नहीं पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं और ईसाइयों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं. वे औरंगज़ेब के ज़माने की तरह वहाँ बहुत मुश्किल जीवन गुज़ार रहे हैं. सुहैल आपकी बात एकदम सही है.

  • 48. 02:43 IST, 25 अप्रैल 2009 deep narayan pandey:

    इन सभी का मूल कारण है कि मुसलमान समुदाय की महिलाएँ आज भी 15वीं सदी में रह रही हैं. उन्हें उच्च शिक्षा से वंचित रखा जाता है और बंदिशों में जीवन जीती हैं. एक ही पीढ़ी के एक हिंदू और एक मुस्लिम महिला को देखा जाए तो पूर्णतया स्पष्ट हो जाएगा . क्योंकि एक महिला ही प्रगति का माध्यम हो सकती है.

  • 49. 04:46 IST, 25 अप्रैल 2009 harsh kumar:

    1. भारत में आज अधिकतर मुसलमान पारंपारिक काम ही करना पसंद करते हैं जैसाकि उनके पूर्वज करते आएं हैं.
    2. इस्लाम को धर्म गुरूओं ने अपने मतलब के लिए ग़लत ढंग से पेश किया जिससे मुस्लिम जगत कट्टर हो गया.
    3. यदि मुसलमानों को एक सेक्युलर पार्टी की तलाश है तो वो क्यों नहीं एक सेक्युलर पार्टी बना लेते हैं. हम सब उनका साथ देंगे. आम मुसलमान तो पाक साफ़ है मगर धर्म गुरू नहीं.
    4. जिस तरह मुसलमान कभी अपने धर्म के लिए लड़ मरता है क्या कभी देश के लिए लड़ेंगे?
    मैं आशावादी हूँ इसलिए कहता हूँ. हम एक होंगे एक दिन इंशाअल्लाह.

  • 50. 04:55 IST, 25 अप्रैल 2009 Vivek sharma:

    यदि कांग्रेस या लालू या मुलायम ने मुसलमानों को बहका दिया है या अग़वा कर लिया है. जैसा कि मेरे दोस्तों ने लिखा है तो मुझे कोई इस बात का भी जवाब दे कि आख़िर जो दूसरा दल है जो हिदुओ का समर्थन करता आया है उसने मुसलमानों के लिए क्या किया है. काम पड़ा तो राष्ट्रपति तक बना दिया अब उनको क्या कह रहा है वो सबने वरुण के भाषण में सुना ही होगा. जैसे हिन्दू आँख मूंद कर भाजपा के साथ है मेरी तो ये ही अर्जी है कि आप भी किसी का दामन कस के पकड़ के रखिये जो आप को तरक्की के रास्ते पर ले जाये.

  • 51. 05:00 IST, 25 अप्रैल 2009 md.wasim akram:

    सुहैल साहब, आपने जो लिखा वो व्यक्तिगत सोच है. आज के युवा ये नहीं चाहते . ऐसे इस्लाम में नहीं लिखा है कि लाउडस्पीकर पर ही अजान दो और कुर्ता पाजामा ही पहनो. मुसलमान आगे बढ़ना चाहते हैं. कुछ करना चाहते है लेकिन मौका नहीं मिलता या सहारा नहीं मिलता. नेता सिर्फ़ चुनाव के वक्त कहते हैं लेकिन करते कुछ नहीं हैं. भारतीय मुसलमानों में गरीबी है और वह सोच कर भी आगे नहीं बढ़ पाते हैं. और जो बढ़ने की कोशिश करते हैं उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है. मुसलमान अपनी सुरक्षा चाहते हैं.

  • 52. 05:02 IST, 25 अप्रैल 2009 Ziaul Haque:

    केवल सरकार ही इस मुद्दे को हल कर सकती है. जहाँ तक लाउडस्पीकर को मिसाल के तौर पर इस्तेमाल किया गया है कि वो लोगों को नमाज़ के लिए बुलाने का ज़रिया है. जहाँ तक हिस्सेदारी की बात है तो दारूउल ऊलूम देवबंद ने बहुत क़ुर्बानिया दी हैं, उनके लोगों को सरेआम फाँसियाँ दी गईं. जैसे एक जाति को आरक्षण दिया गया है अगर इसी तरह मुसलमानों को भी मौक़ा दे दिया जाए तो उनके दिल से कुछ हद तक एक जो असुरक्षा का भाव है वो समाप्त हो जाएगा.

  • 53. 05:09 IST, 25 अप्रैल 2009 Ashiq Husain:

    आप कभी इराक़, ईरान या यमन जाकर देखिए. मैं अभी वहाँ से आया हूँ. वहाँ हमें भारतीय होने से कितनी इज़्ज़त मिलती है. और रही बात भारत के मुसलमानों की तो विदेश में वही मुसलमान सारी आधुनिकता के साथ रह रहे हैं. फिर भारत के लिए ऐसी तस्वीर क्यों पेश की जाती है. शायद विदेशों में मुसलमानों को बरगलाने वाले कोई नेता नहीं हैं. इसलिए वहाँ सब तरक्की कर रहे हैं. और भारत में नेता उन्हें तरक्की नहीं करने देते. मैं विगत 18 वर्षों से यूएई में बस चुका हूँ. यहाँ कभी ऐसा नहीं लगा कि हम लोग पिछड़े हुए हैं.

  • 54. 05:17 IST, 25 अप्रैल 2009 Pankaj Saxena:

    ज़रूरत इस बात की है कि हम सभी धर्म, वर्ग, जाति और पुरुष महिलाओं को बढ़िया सिखा दें और आगे बढ़ने का बराबर मौक़ा दें.

  • 55. 05:26 IST, 25 अप्रैल 2009 yogita:

    ये बात बिलकुल सही है कि मुसलमान अतीत के झरोखे से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं. इसके लिए उनके अंदर बैठी असुरक्षा की भावना के साथ राजनेता भी ज़िम्मेदार हैं. वो मुसलमानों को सिर्फ एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं. अपने फ़ायदे के लिए वो मुसलमानों के विकास की जगह उनके दकियानूसी विचारों को तरजीह देते हैं. समाजवादी पार्टी का घोषणापत्र जिसमें अंग्रेजी की पढाई पर रोक लगाने की बात कही थी इसका उदाहरण है.

  • 56. 05:56 IST, 25 अप्रैल 2009 Mohd. Atique:

    सुहेल साहब, इस्लाम में सिर्फ़ दो चीज़ हैं. एक क़ुरान और दूसरी हदीस. मैं समझता हूँ कि आपको इन दोनों चीज़ों को ध्यान से पढ़ना चाहिए फिर अपनी बात रखनी चाहिए. मैं मानता हूँ कि हिंदुस्तान का मुसलमान शिक्षा को नहीं अपना रहा है और यही सब बातों की जड़ है.

  • 57. 06:03 IST, 25 अप्रैल 2009 Vinod Kumar Purohit:

    हां ये सच है कि मुसलमानों में शिक्षा का अभाव है लेकिन ये सब राजनीति के कारण है क्योंकि नेताओं ने कभी नहीं चाहा कि उनका वोटर शिक्षित होकर वोट करने जाए. अगर शिक्षा के प्रति नेता संवेदनशील होते तो आज़ादी के इतने सालों बाद भी भारत में शिक्षा का स्तर इतना गिरा नहीं होता.

  • 58. 06:26 IST, 25 अप्रैल 2009 jamshed alam:

    मैं एक छात्र हूँ पर मुझे मुसलमान होने के नाते जो मुसीबत उठानी पड़ती है हमसे पूछिए. मैं करोड़ों हिंदुओं से ज़्यादा हिंदुस्तान की इज़्ज़त करता हूँ. आज भी मुसलमान हिंदुस्तान के लिए मरने को तैयार हैं पर हम को शक की नज़र से देखा जाता है. क्यों? हमें रहने के लिए कमरे नहीं मिलते क्योंकि हम मुसलमान हैं. अरे हम तो आज भी इस्लाम मानने वाले प्यार और मोहब्बत के पुजारी हैं. लोगों को आपना नज़रिया बदलना चाहिए. ऐसा न हो कि हमारा दम घुटने लगे और हम दुनिया छोड़ने पर मजबूर हो जाएँ.

  • 59. 06:38 IST, 25 अप्रैल 2009 Praveen, 9873451118:

    अपने हालात के लिए मुसलमान क्यों चिल्लाते हैं. भारत में बहुत से अल्पसंख्यक धर्म हैं लेकिन उनका आर्थिक और सामाजिक स्थिति मुसलमानों ही नहीं बल्कि हिंदुओं से भी बहुत बेहतर है. अपने हालात के लिए मुसलमान ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. अगर सरकार उनको मदरसों में शिक्षा देने का प्रबंध करती है तो मुस्लिस संगठन इसका विरोध क्यों करते हैं. ग़रीबी, अशिक्षा और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ मुसलमान जेहाद क्यों नहीं करते.

  • 60. 06:49 IST, 25 अप्रैल 2009 javed:

    अब क्या रखा है इन बातों में. जूते ले लो हाथों में.. भ्रष्टाचार के कारण मुसलमान तो क्या हिंदू भी सफल नहीं हो सकते भारत में.

  • 61. 07:06 IST, 25 अप्रैल 2009 Life Gill:

    सभी मुसलमान जो भारत में रहते हैं, भारतीय हैं. वे भारत में रहने वाले हर व्यक्ति की तरह भारत का हिस्सा हैं. राजनीतिक दलों ने अपने स्वयं के लाभ के लिए उन्हें इस्तेमाल किया. मुसलमानों को अधिक शिक्षित किया जाना चाहिए और समझना चाहिए कि उन्हें विभाजित करने की कोशिश कि जा रही है. हम सभी पहले भारतवासी हैं. पहले हमें एकजुट होने की ज़रूरत है. हमें मिलकर एकजुट होना चाहिए और सभी दुश्मनों के खिलाफ़ मिलकर लड़ाई लड़नी चाहिए. ईमानदार और समझदार नेताओं को खोजने की जरूरत है. हम को भारत को मज़बूत और एकजुट बनाना चाहिए. अगर हम एक हैं तो चरमपंथी या तालेबानी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते.

  • 62. 07:13 IST, 25 अप्रैल 2009 sunil:

    ऐसे हज़ारों मुसलमान हैं जो शिक्षित होकर समाज की मुख्यधारा के साथ जुड़े हुए हैं. लेकिन उन्होंने अपना धर्म याद रखा हुआ है. दरअसल बदलते समय के साथ उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों में भी बदलाव लाया है. जबकि हमारे राजनेताओं को सिर्फ़ अपने वोट बैंक से ही मतलब है. ऐसे नेता कभी भी मुसलमानों के हितैषी नहीं हो सकते क्योंकि वे जानते हैं कि अगर मुसलमान जागरूक हो गए तो उनका वोट बैंक खुद ही सिकुड़ जाएगा.

  • 63. 07:17 IST, 25 अप्रैल 2009 kumar harsh:

    इन उलझनों का हल कुछ सवालों के जवाब में छिपा हुआ है. मुश्किल ये है की भारतीय मुसलमान इन सवालों से न जाने क्यों भागता रहता है. मुस्लिम समुदाय राजनितिक तौर पर कुछ कठिन स्थितियों या कहें रुढियों में फंसा दिया गया है. उसे भाजपा विरोध के लिए विवश कर दिया गया है. रामविलास पासवान राजग सरकार में चार साल तक मंत्री रहने के बाद बाहर आते हैं और मुसलमान जामा मस्जिद में उनका स्वागत करने लगता है. चन्द्र बाबु नायडू राजग के संयोजक रहते हैं पर राजग छोड़ते ही वे सेक्युलर मान लिए जाते हैं. ये एक ऐसी रूढी स्थिति है जिसमें मुसलमान हमेशा ठगा जाता है. वाम प्रचारकों और सेक्युलर कहे जाने वाले दलों के ज़रिए की जा रही इस ठगी के चलते आज ये स्थिति आ गई है कि आडवानी द्वारा जिन्नाह को सेक्युलर कहे जाने पर भी मुस्लिम समुदाय अपना संतोष ज़ाहिर करना छिपा ले है. तीस्ता सीतलवाड के एक के बाद एक झूठ उजागर होने पर भी उन पर भरोसा करता है. बगैर ये जाने की वे उस समुदाय के दर्द को अवार्ड्स की शक्ल में भुना रही हैं. ये मजबूरी ही उसे लालू,मुलायम,मायावती के भ्रष्टाचार की मुख़ालफत नहीं करने देती और मोदी के विकास कार्यों की तारीफ़ नहीं करने देती. मुसलमान इस देश के उतने ही महत्वपूर्ण नागरिक हैं जितने मोहन भगवत या आडवानी पर ये बात स्टीरियो टाईप राजनीतिक स्टैंड की वजह से उभरकर नहीं आ पाती. जब तक मुस्लिम समुदाय इस ठगी से बाहर नहीं आता देश का दुर्भाग्य दूर नहीं होगा.

  • 64. 07:21 IST, 25 अप्रैल 2009 noor alam:

    सुहेल साहब, आपकी बात सही है पर ये भी सच है कि मुसलमानों के साथ हर जगह भेदभाव कर के उनको समाज की मुख्य धारा से दूर रखने की साज़िश की जा रही है.

  • 65. 07:33 IST, 25 अप्रैल 2009 Hassan Akbar:

    अल्लाह क़ुरान में इरशाद फ़र्माते हैं, "तुम मेरी ज़मीन पर फ़साद मत फैलाओ" और जो लोग आतंकवाद फैला रहे हैं वो मुसलमान तो क्या इंसान भी नहीं हो सकते. और जहाँ तक इल्म का सवाल है तो इस्लाम में साफ़ कहा गया है कि अगर इल्म हासिल करने के लिए दूर तक जाना प़ड़े तो जाओ, और इस्लाम को अल्लाह और उसके रसूल (मोहम्मद साहब) से जोड़ कर देखा जाना चाहिए न कि मुसलमान से और इस्लाम शांति का धर्म है.

  • 66. 07:56 IST, 25 अप्रैल 2009 dastgeer alam:

    अपने देश में जबतक हर हिंदू मुसलमान को हिंदुस्तानी नहीं मान लेता और मुसलमान अपने को तैयार नहीं करता तबतक ये नेता ऐसे ही हर मुसलमान को धोखा देते रहेंगे और अपने मतलब के लिए पुलिस को हथियार बनाकर दो, चार मुसलमानों को आतंकवाद और संप्रदायिकता के नाम पर मारवाते रहेंगे. फिर क्या अपना देश ऐसा ही चलता रहेगा.

  • 67. 08:30 IST, 25 अप्रैल 2009 zaki:

    आज का लोकतंत्र सिर्फ गरीबों तक सीमित है, चाहे वह मुसलमान हो या किसी कोई संप्रदाय, धर्म या बिरादरी से हो. जहां तक इस तरह के चर्चे की प्रासंगिकता का प्रश्न है, आप किसी भी तरह से अपनी बात कह सकते हैं, जहाँ तक बीबीसी के समाचारों की विश्वसीयता का प्रश्न है अब वह बात नहीं रही, भारत में जो असल वोटर है उस तक सहायता नहीं पहुँचती, मैं उन्हीं से हूं, 20 साल पहले जितनी सुविधा पहले थी आज नहीं है, उसपर तो चर्चा होती नहीं है. और जहां तक मुसलमान का ताल्लुक है वह भारत में कभी भी अपनी बात मनवा नहीं सकता. लाउडस्पीकर पर मस्जिद से अज़ान देने की इजाज़त की बात है, कोर्ट तो तीन मिनट के लिए भी इजाज़त नहीं देती, दूसरी ओर अगर दूसरे संप्रदाय वाले दिन-दिन भर इसका इस्तेमाल करें तो उसकी खबर किसी को नहीं है. भारत एक सेक्यूलर राष्ट्र है, लेकिन किस हद तक, यह सबको पता है. जहां तक मुसलमानों का सवाल है बुरे नहीं हैं, वह इसी भारत के हैं और भारत के किसी भी कार्य में बढ़ चढ़ कर भाग लेते हैं. मुसलमानों के साथ भेदभाव खुलेआम होता है, अगर यहीं होता रहा तो खुदा ही इन्साफ करेगा.

  • 68. 08:34 IST, 25 अप्रैल 2009 mukesh:

    मुसलमानों को समझना चाहिए कि अजान या लाउडस्पीकर की बात तब की है जब कि संचार माध्यमों का संकट था. बहुत से मुसलमान काम करते थे और काम करते वक्त घड़ी नहीं पहनते थे. आज वक्त बदल गया है और मुसलमान शिक्षित हो रहे हैं अब वे समय की अहमियत समझ सकते हैं. इसलिए अब लाउडस्पीकर की माँग तो वैसे ही बेकार हो जाती है वह भी सुबह सुबह जब लोग सो रहे होते हैं. अब मुसलमानों को अपनी सीमित सोच से बाहर आना चाहिए ताकि वे दूसरे धर्म के लोगों के साथ सौहार्द्र के साथ जी सकें.

  • 69. 08:37 IST, 25 अप्रैल 2009 surendra sharma:

    पाकिस्तान मुसलमानों ने नहीं माँगा था. पाकिस्तान तो सियासतदानों ने माँगा था. अगर मुसलमानों ने माँगा होता तो सारे मुसलमान हिंदुस्तान से चले गए होते. उस वक्त भी जो पाकिस्तान गए उनसे ज़्यादा मुसलमान हिंदुस्तान में रह गए अपना वतन समझकर. जब कोई चला जाता है तब उस के ना होने से जो कमी महसूस होती है वो जब सारे मुसलमान पाकिस्तान चले जाएंगे तब महसूस होगी बंटवारे के बाद. अलबत्ता मैं उस वक्त नहीं था फिर भी लगता है कि हमारा कोई उधर है जो हम देख नहीं सकते, मिल नहीं सकते. जो खालीपन आजाएगा उसे भरना मुश्किल होगा. दरअसल मुसलमानों ने अपने वतन पर भरोसा किया लेकिन सियासतदानों ने उसे राजनीति बना दिया.

  • 70. 08:46 IST, 25 अप्रैल 2009 Gaurav Rattan:

    मुझे लगता है कि ऐसे सवालों को उठाना ही बेमानी है. आज आप पूछ रहे हैं कि मुसलमान क्या चाहता है. कल दूसरे लोग पूछेंगे कि हिंदू क्या चाहते हैं या सिख क्या चाहते हैं. अगर हमने ऐसे सवाल पूछने शुरू कर दिए तो हम साथ नहीं जी सकेंगे. आज हमें यह पूछने की ज़रूरत है कि हम अपने 40 फ़ीसदी अनपढ़ भाइयों-बहनों को कैसे शिक्षित करें. और हम गरीबी रेखा में जी रहे लोगों का स्तर कैसे उठाएँ. या हम अपने लोगों के स्वास्थ्य के स्तर को कैसे सुधारें और देश से भ्रष्टाचार कैसे मिटाएँ. ऐसे अनेक सवाल हैं जो सभी धर्मों पर एक जैसा प्रभाव डालते हैं. अगर हम ऐसे सवालों को सुलझा सके तो इस जैसा कोई सवाल बाकी नहीं रहेगा. मैं नहीं समझता कि हमारे मुस्लिम भाई और कुछ विशेष चाहते हैं जो कोई हिंदू या सिख नहीं चाहता हो. लोगों को यह कहना अब बंद कर देना चाहिए कि मुसलमान इस देश को छोड़ दें. अगर किसी के परिवार में कोई बीमार हो या किसी दूसरी समस्या से त्रस्त हो तो हमें उसकी मदद करनी चाहिए. उसे घर से बाहर निकाल देना तो कोई सही उपाय नहीं है.

  • 71. 09:00 IST, 25 अप्रैल 2009 Aminur Rashid:

    मुसलमानों को क्या चाहिए? दो वक़्त की रोटी, सौहार्द्रपूर्ण जीवन और धार्मिक आज़ादी. खैर, आपने सवाल उठाया है तो बता दूँ कि मुसलमानों ने यूनिवर्सिटी, स्कूल या कॉलेज की भी मांग की है. चुनावों में शायद ना की हो, किन्तु आपने शायद उन मांगों की न्यूज़ नहीं पढी जिसमें अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के विस्तार की मांग की गई थी, उसे आईआईटी बनाने की मांग की गयी थी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की तर्ज़ पर और यूनिवर्सिटी बनाने की मांग की गयी थी. जब मुसलमानों ने अलग इंजीनियरिंग कालेज मांगा तो उन्हें सांप्रदायिक बता दिया गया. कहा गया कि अपने संप्रदाय के बारे में ही ये कौम सोचती है, और देश के बारे में नहीं और फिर कहा जाता है कि वो मांग नहीं करते. मांगे तो कई हैं सरकार, लेकिन कोई सुनने वाला तो हो. वैसे ये बतायें कि क्या इस देश के यूनिवर्सिटी, स्कूल या कॉलेजों पर मुसलमानों का कोई हक नहीं जो उन्हें अलग से मांग करने की ज़रुरत पड़े.

  • 72. 10:08 IST, 25 अप्रैल 2009 mohammad yasin:

    मैं लेखक की बातों से पूरी तरह से सहमत हूँ जैसा कि उन्होंने लाउडस्पीकर के बारे में लिखा है. वैसे मुस्लिम समुदाय अंधेरे में जीवन व्यतीत कर रहा है. उसने अपने आपको देश की मुख्य धारा से अलग रखा है और सभी मुख्य पार्टियाँ मुसलमानों के पिछड़ेपन से वाकिफ़ हैं. लेकिन कोई मुसलमानों को ऊपर नहीं ले जाना चाहती. वजह शायद सभी जानते हों. मैं तो मुस्लिम समुदाय से अपील करूँगा कि वो अपने आप में सीमित करके न रहें.और देश की मुख्य धारा से जुड़ें और अपनी शिक्षा के स्तर को बढ़ाएँ. जो कि निहायत ही ज़रूरी है. और अपने संकीर्ण विचारों को बदलें. देश के हित में अपना हित समझें. हमें रोटी, कपड़ा, मकान जो कि हर इंसान की बुनियादी ज़रूरत हैं, के साथ साथ देश को चलाने की ज़िम्मेदारी भी सौंपी जानी चाहिए. तब कहीं भारतीय मुसलमान अपने आपको गौरवांवित महसूस करेंगे. और रही मुद्दे की बात तो मुस्लिम समुदाय को शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास और मानवाधिकारों को ही अपना मुद्दा बनाना चाहिए.

  • 73. 11:36 IST, 25 अप्रैल 2009 rahat:

    दरअसल मुसलमान को आज यह नहीं मालूम कि उनकी भारत और इस पूरे क्षेत्र में क्या भूमिका रही है. इसका कोई मतलब नहीं कि मुसलमान क्या चाहता है. दरअसल भारतीय मुसलमान क्या चाहता है, यह जानना ज़रूरी है. भारत के मुसलमान ने जब धर्म बदला था तब सभी जानते हैं कि क्यों हुआ था. सिर्फ इज़्ज़त और दौलत के लिए. उसके पास न कभी वैश्विक सोच थी और न कभी होगी और न है. रही बात शिक्षा की तो सड़क, बिजली, पानी और दीगर सुविधाएँ शायद योग्यता या धर्म की मोहताज नहीं होती. अगर यह मुस्लिम कालोनी में नहीं हैं तो यह सिर्फ़ यह दिखाना है कि अब तुम हम में से नहीं हो. भले ही तुम यहीं के खून हो. तुम सिर्फ़ अब अधर्मी हो तो तुम को जीना नहीं चाहिए. या वापस हिंदू हो जाना चाहिए.तभी तुम्हें सारी मूल सुविधाएं मिल सकेंगी. मुसलमान भी अब भटक गए हैं. उनको मुसलमान बनने के बाद से हमेशा डर लगा रहता है कि उनका अब कुछ भला नहीं होगा. वो भी इस्लाम में इज़्ज़त नहीं महसूस करते. और कहीं जाना भी नहीं चाहते. वे सिर्फ़ एक भुलावे में हैं और आज भी नहीं जानते कि उनको क्या चाहिए.

  • 74. 11:45 IST, 25 अप्रैल 2009 Makiuddin Ahmed:

    मैं कुमार हर्ष की बातों से सौ प्रतिशत सहमत हूँ. उन्होंने गागर में सागर वाली कहावत में पूरी प्रतिक्रिया या पूरा सच कहा है. मुसलमान सिर्फ़ राजनीतिक पार्टियों और कट्टरपंथी मुल्लाओं के हाथ की कठपुतलियाँ बन कर रह गया है. तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों में भी जो बड़े मुस्लिम नेता हुए हैं या अभी भी हैं उन्होंने मुसलमानों के लिए क्या किया सिवाय हिंदू और मुसलमानों के बीच नफ़रत फैलाने के. एक ही मुसलमान को देश और धर्म को साथ साथ लेकर चलते हुए अपना रहनुमा खुद बनना होगा. मैं एक भारतीय मुसलमान हूँ जो 25 वर्षों से देश से बाहर रह रहा हूँ और मुझे इस पर गर्व है कि वहाँ का कानून और वहाँ का प्रशासन मुझे पड़ोसी देश के मुसलमानों के मुक़ाबले ज़्यादा अच्छी नज़र से देखता और इज़्ज़त करता है.

  • 75. 12:06 IST, 25 अप्रैल 2009 Abdullah:

    मुसलमानों को समझने से पहले निस्वार्थ भाव से इस्लाम को समझ लें तब मुसलमानों या इस्लाम पर टिप्पणी करें. आज का मुसलमान इस्लाम धर्म को पूर्णतया मानता है या बस नाम का अहमद मोहम्मद है. इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म है.

  • 76. 13:20 IST, 25 अप्रैल 2009 pawan:

    मुसलमान ख़ुद समस्या की जड़ हैं.

  • 77. 14:16 IST, 25 अप्रैल 2009 नदीम अख्तर:

    सुहैल साहब, आपकी बातें कुछ लोगों को खुश कर सकती हैं, कुछ बड़े सवाल खड़े कर सकती हैं लेकिन यह उसी तरह है, जैसा कि किसी गिलास को आधे भरे देखना और आधा खाली देखना। मुसलमान अगर लाउडस्पीकर से अजान देने के लिए अड़ते हैं, तो इसमें क्या बुराई है. क्या वे चौक-चौराहों पर कब्जा करके मस्जिद बनाने की ज़िद करते हैं, नहीं करते. आपको एक बात की जानकारी तो होगी ही कि एक धर्म विशेष का धर्मस्थल कब्ज़े की ज़मीन पर धड़ल्ले से बना लिया जाता है. यहां तक की थानों में, जहां हर किस्म के अपराधियों को रखा जाता है, जहां हर किस्म के पुलिसकर्मियों की पोस्टिंग होती है. आपको ये नहीं लगता कि उस धर्म के लोगों को भी एक साज़िश के तहत धर्मांधता में ढकेलने की कोशिश हो रही है. दरअसल, देश के हुक्मरान यह चाहते ही नहीं कि एक डिसाइडिंग फ़ैक्टर वाला वोटबैंक धर्म से अलग हटकर कुछ सोचे भी. अगर वह सोचने लगेगा, तो वह अपने लिए अच्छा बुरा भी सोच लेगा. यही वजह है कि आज हर दल ने अपने वोट-बैंक को पहचान लिया है, पहले यह काम कांग्रेस करती थी, अब दायरा बढ़ चुका है. सभी दल एक ही काम में जुटे हैं. ऐसे समय में ज़रूरत है लोगों को खुद जागने की. शिक्षा वास्तव में बहुत ज़रूरी है, वर्ना लोग यूं ही रह जायेंगे घिघियाते हुए नेताओं के आगे.

  • 78. 14:57 IST, 25 अप्रैल 2009 LALIT:

    मुसलमान भाइयों, आपको शिक्षा की ज़रूरत है और वो नेता कभी देंगे नहीं क्योंकि फिर आप इनको समझ जाएंगे. इसलिए यही कहूँगा कि - आप दीपो भव.

  • 79. 15:43 IST, 25 अप्रैल 2009 Yusuf Faize:

    मुसलमानों के कुछ चाहने ना चाहने का सवाल ही नहीं है. उन्हें भारत में चुनाव के वक्त सिर्फ़ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया जाता है. इस बात को शायद सिर्फ़ कुछ गिने चुने मुसलमान जानते हैं. क्योंकि इस क़ौम की आदत है एक ही क़तार में चलना. आज दुनिया तरक्की के उस मक़ाम पर पहुँच चुकी है मगर मुसलमान सिर्फ़ हर समाज से अपने को अलग ही करता आया है. और क्यों न हो क्योंकि ज्ञान के अभाव में नेता और सियासी लोगों के झ़ूठे वादों से ही वो बेहद खुश है. इन्हें जो चाहिए वो मिले या न मिले मगर वादा करने पर बहुत संतुष्ट है. आज सिर्फ़ हिंदुस्तान और पाकिस्तान के ही मुसलमान पिछड़े हुए हैं, बाकी मध्यपूर्व, यूरोप, अमरीका, इत्यादि हर जगह मुसलमान ने एक जायज़ मक़ाम हासिल किया है.

  • 80. 16:01 IST, 25 अप्रैल 2009 Hacker india:

    मेरा मानना है कि मुसलमान यह नहीं जानते कि उन्हें क्या चाहिए. वे अपनी ज़िंदगी को धार्मिक कामों में ही गुज़ार देते हैं. वे पढ़ाई और शोध के अलावा अपने लाइफ़स्टाइल में भी पैसा नहीं खर्च करते. वे बहुत पुरातनपंथी है और अपनी पूरी ज़िंदगी धार्मिक कामों में ही लगा देते हैं. मेरा सुझाव उनसे है कि खुद को विकसित करें और हिंदुओं पर आरोप लगाने के बजाय मेहनत करें. नहीं तो रेस में पिछड़ जाएंगे. यह समय आगे आकर कड़े निर्णय लेने का है जिससे आपकी ज़िंदगी बदल जाएगी. कड़ी मेहनत ही एकमात्र रास्ता है.

  • 81. 22:43 IST, 25 अप्रैल 2009 maqbool Ahmad Journalist:

    मुसलमानों के लिए कोई भी सरकार आए या उनका हमदर्द बनकर कोई नेता. सबको पता है कि भारत में ज़्यादातर मुसलमान जाहिल हैं. उनका फ़ायदा इनको जहालत के दायरे के अंदर रखकर ही है. अग़र मुसलमानों में जागरूकता आ जाती है तो फिर हमारे मुल्क की सियासत ही बदल जाएगी. पर कोई भी नेता ऐसा होने नहीं देगा. मुसलमानों से जहालत दूर करना बहुत जरूरी है. उनको अच्छी तालीम अच्छे स्कूल अच्छे कॉलेज और ऊपर उठाने के लिए क़दम उठाने की सख़्त ज़रूरत है.

  • 82. 06:07 IST, 26 अप्रैल 2009 Imran Sherghati:

    मेरा मानना है कि मुसलमान यह नहीं जानते कि उन्हें क्या चाहिए

  • 83. 07:20 IST, 26 अप्रैल 2009 YOGITA:

    ये बात बिलकुल सही है कि मुसलमान अतीत के झरोखों से बाहर आने के लिए तैयार नहीं है। ज्यादातर मुसलमान अल्पसंख्यक होने की असुरक्षा की भावना के चलते भी ऐसा करते हैं। इसके अलावा हमारे राजनीतिक दल भी उनकी इन्हीं मानसिकता को भुनाकर अपना वोटबैंक बढ़ाते हैं। विकास की बात कोई नहीं करता है।

  • 84. 07:35 IST, 26 अप्रैल 2009 sanjay kumar:

    बिल्कुल सही बात कही है. मुसलमान आज भी कट्टरपंथी ताक़तों के पीछे ही चलने का प्रयास करता है.

  • 85. 15:05 IST, 26 अप्रैल 2009 naveen:

    मुसलमानों को संविधान से सब मिला है. लेकिन आज भी वे समान हक़ की माँग करते हैं......उन्हें चाहिए केवल और केवल प्यार मोहब्बत....जो उन्हें दिया भी जाता रहा है.... कुछ लोग.,........कुछ लोग उन्हें ज़्यादा अधिकार का लालच देकर फुसला रहे हैं....इन मासूमों का इस्तेमाल कर रहे हैं. ये और कोई नहीं खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले वाम दल राजद, सपा, एनसीपी जैसे दल हैं.......इस लिए मैं अपने मुस्लिम भाईयों से अपील करूँगा कि कांग्रेस या बीजेपी को ही वोट दें, क्योंकि आज कोई भी दल 14 करोड़ लोगों को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता.

  • 86. 09:26 IST, 27 अप्रैल 2009 TAHIR KHAN:

    सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा. हम बुलबुले है इसकी ये गुलसिता हमारा, हमारा. ग़ुर्बत मे हो अगर हम रहता है दिल वतन में. समझो वही हमें भी दिल है जहाँ हमारा, हमारा.
    परबत वो सब से ऊंचा हमसाय आसमाँ का, वो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारा, हमारा. गोदी मे खेलती है इसकी हजारों नदियाँ, गुलशन है जिनके दम से रश्क-ए-जना हमारा, हमारा. ए अब रौद गंगा वो दिन है याद तुझको, उतर तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा, हमारा. मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दवी हैं हम वतन है हिन्दोस्तान हमारा, हमारा. यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिल गये जहाँ से. अब तक मगर है बाक़ी नामो-निशान हमारा, हमारा. कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमाँ हमारा, हमारा. इक़्बाल कोई मेहरम अपना नहीं जहाँ में, मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहा हमारा.

  • 87. 09:11 IST, 28 अप्रैल 2009 Asif Ashraf:

    असल मुद्दा शिक्षा या तरक्की नहीं है बल्कि आज़ादी का है. आज क्या मुसलमानों को आज़ादी मिली है. क्या वजह है इसकी.

  • 88. 16:25 IST, 28 अप्रैल 2009 Abad Ahmad SAUDI ARAB:

    मुसलमान ख़ुद को भूल गया है कि वो क्या है.

  • 89. 06:13 IST, 29 अप्रैल 2009 bom shankar:

    हिंदू धर्म इस्लाम से ठीक उल्टा है, सिवाय इसके की दोनों धर्म शांति का पाठ पढ़ाते हैं. इस कारण हिंदू और मुसलमान कभी एक नहीं हो सकते हैं.

  • 90. 08:26 IST, 29 अप्रैल 2009 Prashant :

    आसिफ़ भाई कैसी आज़ादी चाहते हैं आप जरा खुल कर बताएँ.

  • 91. 17:28 IST, 30 अप्रैल 2009 maher:

    आह, लालुवा ओ मुलायमा सारे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. मैं मुसलमानों से आपील करूँगा कि इनको तो पहले समझो बाद में कुछ करो. ये लोग बस वोट बैंक चाहते हैं.

  • 92. 02:33 IST, 18 मई 2010 bashir ahemad, GUJRAT(INDIA):

    मेरे सारे भाइयों की बात बिलकुल सही है. मैं दसवीं में पढ़ाई करने वाला छात्र हूँ. मुझे और मेरे साथ पढ़ने वाले मेरे सारे जिगरी दोस्त हिन्दू मुस्लिम सब जानते हैं कि भारत में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, बम धमाके, महंगाई इन सब की जड़ राजनीति ही है. पर हम सब ये सिर्फ सोचते हैं कि हम इसमें क्या कर सकते हैं और यही हमारी सबकी सबसे बड़ी भूल है. राजनीति में भ्रष्टाचार फैलाने वाला भी सिर्फ कोई एक ही है. तो हम भी एक है तो हम क्यों नहीं कुछ कर सकते. हम चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं. पर अफ़सोस कि हम चाहते ही नहीं बस बोल कर रह जाते हैं. चाहे तो इन बातों का अंत एक छात्र भी ला सकता है. और एक कम्प्यूटर पर बैठने वाला भी कर सकता है. तो भाई हो बोलकर भूला मत दो मिलकर मुकाबला करो. बुरी राजनीति के सामने तो नतीजा तुम्हारे सामने होगा. ये कभी मत भूलो कि 1947 से पहले इन सबके सामने लड़ने वाले भी अकेले कोई एक ही इंसान (गांधीजी) थे.
    GUJRAT(INDIA)

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