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दुश्मनी फिर कभी निकालिएगा

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वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|रविवार, 19 अप्रैल 2009, 13:37 IST

पिछले एक हफ़्ते से भारत में हूँ और शाम को कामकाज से फ़ारिग़ होने के बाद सिर्फ़ स्थानीय टेलीविज़न न्यूज़ चैनल देखता हूँ. मुंबई हमलों के पाँच महीने गुज़र जाने के बाद भी शायद ही कोई ऐसा चैनल हो जिस पर कम से कम दो घंटे पाकिस्तान का ज़िक्र नहीं होता हो.

मगर ये ज़िक्र तालेबान और दहशतगर्दी से शुरू होता है और उसी पर ख़त्म हो जाता है और ख़ुलासा ये होता है कि तालेबान, पाकिस्तान और दहशतगर्दी दरअसल एक ही सिक्के के तीन रुख़ हैं.

बहुत ही कम लोग ये स्वीकार करने को तैयार हैं कि आज का पाकिस्तान दहशतगर्दी के ख़ंजर से उस बुरी तरह निढाल है कि उसका राष्ट्रीय ढ़ांचा तेज़ी से ख़ून बहने के सबब ख़तरनाक रफ़्तार से (ग़शी) बेहोशी की हालत में जा रहा है. भारतीय मीडिया और उसके हवाले से ज़्यादातर स्थानीय लोगों का यही रवैया है कि पाकिस्तान की ही लगाई हुई आग है. ---अब वो भुगते--- हमें क्या----.

ये बिल्कुल वही ज़हनी रवैया है जिसका पाकिस्तान अस्सी और नब्बे के दशक में शिकार हुआ था. --- .यानी ये अफ़ग़ानिस्तान की आग है.--- हमें क्या.--- मुजाहिदीन जानें, रूसी जाने या ख़ुदा जाने.--- हमें तो अफ़ग़ानिस्तान ने हमेशा दुश्मनी का ही तोहफ़ा दिया है--- अब भुगते----

ये कश्मीर की आग है--- भारत जाने --- कश्मीरी जानें--- वहां घुसने और लड़ने वाले जानें.. हमें क्या--- वैसे भी साठ बरस में भारत ने हमें क्या दिया है सिवाए नुक़सान और दुश्मनी के--- अब भुगते कश्मीर को----

उस ज़माने में बहुत ही कम पाकिस्तानियों को एहसास था कि " यह तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है." इसलिए हम सब ने अपनी ज़िदगियों में ही देख लिया कि अफ़ग़ान मुजाहिदीन कैसे अफ़ग़ान तालेबान बने और फिर कैसे पाकिस्तानी तालेबान में तबदील हो गए. और कश्मीर में लड़कर लौटने वाले कैसे हाथों से निकल गए.

अब हालत यह है कि दो तिहाई पाकिस्तान किसी न किसी क़िस्म के फ़िरक़वाराना, क़ौम परस्ताना या मज़हबी शिद्दत पसंदाना ख़तरे में मुबतला है. और पहली बार कई सरों वाला ये ख़तरा किसी पाकिस्तानी हुकूमत को नहीं बल्कि राष्ट्र के वजूद और संप्रभुता को है.

ये बात अगर दिल्ली में किसी से की जाए तो आमतौर पर जवाब मिलता है कि हमें पाकिस्तान के हालात पर चिंता है और हमदर्दी है मगर मुंबई--- मगर कश्मीर--- कोई ये समझने को तैयार नहीं है कि इस वक़्त पाकिस्तानी राष्ट्र को जो ख़तरा है उसने मुल्क को ऐटमी धातु से बने हुए एक ऐसे जार में बदल दिया है कि अगर ये जार टूटा तो तेज़ाब दूर-दूर तक फैलेगा.

बहुत कम लोग ये समझ पा रहे हैं कि अफ़गा़निस्तान से लगने वाला जो वायरस इस वक़्त पाकिस्तान को बेदम कर रहा है वो एक छूत वाला वायरस है जिसके आगे सरहदें बेमानी हैं. मुँह पर हिफ़ाज़ती नक़ाब डालने, ख़ुद को अपने-अपने फ़ायदे के क्वारंटीन में बंद करने या मरीज़ को उसके हाल पर छोड़ने भागने से वायरस पीछा नहीं छोड़ेगा. इसलिए पाकिस्तानी राष्ट्र के वजूद को अब पाकिस्तान से ज़्यादा आलमी बिरादरी की ज़रूरत है.

ये वक़्त मरीज़ को उसकी संगीन ग़लतियाँ याद दिलाने या धमकियों और डांटडपट का नहीं है बल्कि मदद की ठंढ़ी पट्टियां रखने और अपने पर यक़ीन बहाल करने वाले ताक़तवर कैपसूल खिलाने का वक़्त है----

इस छूत के मर्ज़ से निपटना किसी एक के बस की बात नहीं. या तो अपना पड़ोसी बदल लें अगर नहीं तो फिर बचपना छोड़िए और बड़े हो जाइए. पुराने बदले चुकाने के लिए ज़िंदगी पड़ी है मियाँ-----

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 14:24 IST, 19 अप्रैल 2009 Abhay:

    बिलकुल सही कहा अपने...लेकिन एक बात पाकिस्तान की सरकार को क्यूँ समझ में नहीं आती..अपना घर बचाने की हैसियत पे शक है...लेकिन दूसरों का घर तोडेंगे ज़रुर....काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती ..लेकिन हमने चढाई..पर कब तक और कितनी बार...

  • 2. 14:35 IST, 19 अप्रैल 2009 vivek kumar pandey:

    ख़ान साहब पाकिस्तान के हालात से एक आम भारतीय भी दुखी है. पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है और हम अपना पड़ोसी नहीं बदल सकते. निश्चित रुप से पाकिस्तान को अभी सभी के सहयोग की ज़रुरत है. लेकिन भारत उस साधू की तरह नहीं है जो बिच्छू को पानी से बाहर निकाल रहा हो और वो लगातार डंक मारता रहे. पाकिस्तान अगर भारत के दुश्मनों के साथ ईमानदारी से निपटे तो भारत भी अपने भाई को दुखी कैसे देख सकता है.

  • 3. 14:55 IST, 19 अप्रैल 2009 Naresh Sati Montreal:

    वुसतुल्लाह ख़ान यह सुनकर अच्छा लगा कि आप भारत के दौरे पर हैं. लेकिन पुरानी कहावत है, 'जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे' बात सही है कि पाकिस्तान तालेबान चरमपंथियों के शिकंजे में है. पर पाकिस्तान की सरकार इस समस्या का हल जानती है. अपनी समस्याओं के प्रति हमें ईमानदार होना ज़रुरी है और बाहर से कोई मदद के लिए नहीं आ रहा है, शुरुआत ख़ुद करनी होगी.

  • 4. 14:56 IST, 19 अप्रैल 2009 Jayvind Singh:

    हम दोनों देश कुछ समय पहले तक एक ही थे इसका अर्थ हुआ कि अब भी भाई-भाई हैं. अच्छा यही है कि कठिन समस्याओं में साथ नहीं दे सकते तो कम से कम अनगर्ल आरोप-प्रत्यारोप से बचें.

  • 5. 16:36 IST, 19 अप्रैल 2009 Archana Bharti:

    ये बात सही है कि इस समय पाकिस्तान तालेबानी चरमपंथियों से परेशान है, पाकिस्तान सरकार को चाहिए की जल्द से जल्द इस कठिन समस्या का हल निकाले साथ ही पूरे राष्ट्र के सहयोग की ज़रूरत है क्योंकि चरमपंथी समस्या किसी एक राष्ट्र की समस्या नहीं है.

  • 6. 16:41 IST, 19 अप्रैल 2009 arvind:

    महाशय जी!
    पाकिस्तान ने हमेशा ही अफ़ग़नी, पाकिस्तानी और कश्मीरी लोगों को चरमपंथी बनाने और बनन में मदद की है, कभी ज़मीन दिया, हथियार दिए और ट्रेनिंग दी. उन्हें शायद पता होगा कि शौलों सो खेलना कितना ख़तरनाक होता है. वो भी ऐसे समय में जब ये उनके दामन में भी आग लगा दे. पाकिस्तानियों में शायद नरक करने की आदत बन गई है, हम बीमार हैं विदेशी हमारी मदद के लिए आओ. ये तरीक़ा पाकिस्तान को कभी लील लेगा.

  • 7. 16:44 IST, 19 अप्रैल 2009 Arvind Yadav, Spain:

    ख़ान साहब आपके विचार बिल्कुल सही हैं. पर काश ये बात सरकार को समझ में आती. मुंबई हमले होना साफ़ संकेत है कि भारत को पाकिस्तान से ख़तरा है. आपकी सरकार के पास बहुत सुनहरा अवसर था कि वो मुंबई हमलों पर उचित क़दम उठाए और अपने पडो़सी का विश्वास जीते. तब न आपकी सरकार ने ऐसा किया और जनता नाराज़ हो गई. ऐसी स्थिति में कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि पड़ोसी आपकी मदद करेगा.

  • 8. 16:44 IST, 19 अप्रैल 2009 satish Raut:

    सर! बहुत अच्छा लेख है. लेकिन क्या आईएसआई भारत के अच्छे इरादों को समझ सकता है. अगर हाँ तो फिर क्यों भारत के अफ़ग़निस्तान के रिबिल्डिंग की प्रक्रिया में रोड़े डालता है. क्या आप सचमुच समझते हैं कि मुंबई हमले में पाकिस्तान सरकार का हाथ नहीं था? क्यों पाकिस्तान उन घोषित अंतरराष्ट्रीय चरमपंथियों को भारत के हवाले नहीं कर रहा है?

  • 9. 18:08 IST, 19 अप्रैल 2009 Arvind Khare:

    आपने बहुत ही समझदारी की बात कही है. ऐसा ही लिखते रहें. आज नहीं तो कल लोगों की सोच और समझ बदलेगी. दोनों देश में ऐसे बहतु से लोग हैं जो मोमबत्ती के फ़्लेम की तरह हैं जो जलकर रौशनी कर रहे हैं.

  • 10. 18:19 IST, 19 अप्रैल 2009 Abhay R. Singh:

    ख़ान साहब ग़ुस्ताख़ी माफ़ हो तो एक बात पूरी ईमानदारी से बताएं. क्या सचमुच पाकिस्तान को और बाहरी मदद की ज़रूरत है जबकि अमरीका ने अपने हाथे खुले कर दिए हैं. एक बात और जो कुछ भी स्वात में हो रहा है क्या उसमें वहाँ के अवाम, पाकिस्तान सरकार, फ़ौज, आईएसआई की रज़ामंदी नहीं हैं. बात बस इतनी है कि आपका घर है तो ईमानदारी से पहले झाड़ू आप लोगों को उठानी पड़ेगी और मेरा ख़्याल से पाकिस्तान को बचाने के लिए उठाना है काफ़ी नहीं होगा, बल्कि बहुत कुछ करना होगा.

  • 11. 18:33 IST, 19 अप्रैल 2009 maneesh kumar sinha:

    ख़ान साहब बात बिल्कुल सही है कि आपकी सरकार और समाज ने तालेबान को पैदा किया और बढ़ावा दिया. मेहरबनी करके हमें अपनी परमाणु शक्ति और डरपोक तालेबान से नहीं डराएं. किसी भी देश की फ़ौज यहां तक आपकी सेना इन लातेबान को भगाने में कामयाब हो सकता है. यदि सच में आप भारत से मदद चाहते हैं तो पहले पाकिस्तान को दाउद जैसे लोगों को सज़ा देने की आवश्यकता है. यदि आपकी फ़ौज तालेबान से लड़ने में सक्ष्म नहीं है तो भारत की फ़ौज लातेबान को देख लेगी. हमलगों ने साठ साल में अनुभवों से यही सिखा है कि हम शांतिपूर्वक एक साथ नहीं रह सकते, यदि आप गंभीरतापूर्वक हमलोगों को ग़लत साबित करना चाहते हैं तो सबसे पहले चरमपंथियों के कैंप को तोड़ा जाए.

  • 12. 18:38 IST, 19 अप्रैल 2009 maneesh kumar sinha:

    मियां किसने पाकिस्तान को आग से खेलने के लिए कहा? शायद वो अमरीका था, अब वे आप लोगों को दवा दे रहे हैं. मेहरबानी करके उनका साथ दें और इंतज़ार करें.

  • 13. 19:07 IST, 19 अप्रैल 2009 muzzammil hayat:

    मैं मानता हूँ कि पाकिस्तान आतंकवाद से जूझ रहा है, लेकिन पाकिस्तान के 90 प्रतिशत अवाम की हमदर्दी अभी भी तालेबान के साथ है. आजतक किसी पाकिस्तानी नेता या व्यक्ति ने सरकार की तरफ़ से की जाने वाली लाल मस्जिद ऑपरेशन को सही नहीं ठहाराया और उसमें मरने वालों को आतकंवादी के बजाए शहीद कहते हैं. सच ये है कि इस्लामी नुक़्ते नज़र से भी देखें तो वो लोग शहीद नहीं बल्कि हराम मौत मरे थे. क्योंकि वो लोग सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश और बग़ावत के ज़ुमरे में आते थे और इन लोगों को वहाँ से निकलने के लिए काफ़ी वक़्त दिया गया था. इस्लाम में जान बचाना फ़र्ज़ है. चाहे झूठ ही क्यों नहीं बोलना पड़े. अगर यही मानसिकता पाकिस्तानी अवाम की बनी रही तो मौजूदा सरकार की कोई भी कोशिश दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ करगर साबित नहीं होगी और दुनिया यहीं समझेगी कि पाकिस्तान सरकार दिखावा कर रही है. ज़रुरत है कि पाकिस्तान अवाम को अपनी तालेबानी मानकिसता बदलने की ज़रूरत है. बात निकल कर वहीं आएगी कि जुकाम है और दवा भी कर रहे हैं लेकिन ठंडी चीज़ों से परहेज़ भी नहीं करते.

  • 14. 19:33 IST, 19 अप्रैल 2009 UMESH YADAVA:

    वुसतुल्लाह ख़ान साहब सलाम!
    आप का ब्लॉग पढ़ा, बहुत अच्छा लगा. हर हिदुस्तानी और पाकिस्तानी आम नागरिक मेरे ख्याल से यही सोचता है कि अब बहुत हो गया, अब अमन चाहिए. अब दोनों चाहते हैं, ईद पर कोई लाहौर में जाए और दोस्त से मिल के आए, और लाहौर का दोस्त दीपावली पे अपने दोस्त से दिल्ली आके के मिल पाए. पर आप के पिछले ब्लग में पढ़ा था "हिंदुस्तान और पाकिस्तान के मीडिया" की अंधी राष्ट्रभक्ति. मैं मानता हूँ नेता और मीडिया जो दोनों देशो के सन्दर्भ में नकारात्मक प्रचार और सोच को बढ़ावा देते हैं अब उनको अपना रवैया बदल कर सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना चाहिए.

  • 15. 20:21 IST, 19 अप्रैल 2009 ravi sinha:

    पाकिस्तान का जन्म ही भारत और अवाम से नफ़रत की बुनियाद पर हुआ था, प्यार से जन्मी चीज़ बेहतर हो सकती है लेकिन जन्म की वजह ही नफ़रत हो वो देश क्या आपस में भी भाई बन कर रहेगा.
    सच यही है कि मिलजुलकर रहने की बात ख़्वाब है. काश ये सच होता. पाकिस्तान सिर्फ़ भारत को परेशान देखने के लिए चीन के आगे घुटने टेकता है, फिर मुसिबतों के समय क्यों चीन से मदद नहीं मांगता. चीन को पता है कि पाकिस्तान एक नफ़रत से उपजा देश है इसलिए उसका फ़ायदा ले रहा है. पाकिस्तान की मदद आस्तीन में साँप पालने जैसा होगा. जो मदद के बाद भी भारत को अपने ज़हर का सौगात देते रहेगा.

  • 16. 20:46 IST, 19 अप्रैल 2009 Kapil Batra:

    आपकी खरी-खरी बातें अच्छी तो लगती हैं, साहब. पर एक बार पाकिस्तानी सरकार से भी यह कह दिया करें कि दाउद इब्राहीम को भारत के हवाले कर दो मियाँ. दुश्मनी निकालने के लिए ज़िंदगी पड़ी है तब आपकी हिम्मत की भी दाद दे दूँ मियाँ.

  • 17. 20:53 IST, 19 अप्रैल 2009 Sanjay Shah:

    ख़ान साहब आपको नहीं लगता कि आप कुछ ज़्यादा ही सच बोल रहे हैं. जबतक भारत में हैं तबतक तो सच बोल लीजिए क्योंकि इस मुल्क में विचार अभिव्यक्ती की स्वातंत्रा है. जनाब आप अपने मुल्क में सच नहीं बोलिएगा वरना सब आप पर ही टूट पड़ेंगे.

  • 18. 22:24 IST, 19 अप्रैल 2009 Ashok Kumar:

    खान साहब, आप सही कहते है कि ये छूत का रोग है. लेकिन पाकिस्तान तो आज तक भी ये नहीं मानता कि उसे ये छूत का रोग लगा है, पाकिस्तानी सरकार तो सबसे यही कह रही है कि उनके यहाँ कही भी तालेबान का क़ब्ज़ा नहीं है. जब तक पाकिस्तानी सरकार खुद उन दहशतगर्दों से लड़ने कि नही सोचेगी तो कौन उन्हें सहयोग देगा. पाकिस्तान सरकार तो उनसे लड़ने कि बजाए उनसे संधि कर रही है. जब खुद ही उन्हें अपने सिर पर बिठाना है तो कोई क्या कर सकता है और पाकिस्तान कि इन्ही हरकतों कि वजह से एक दिन भारत को भी तालेबान का मुहँ देखना पड़ेगा.

  • 19. 23:26 IST, 19 अप्रैल 2009 Rajiv Bishnoi:

    आपकी बात तो सही है किंतु ये भी तो सच है कि एक आम भारतीय अगर इस बात से खुश नहीं तो कम से कम दुखी तो नहीं है कि पाकिस्तान को इसके किए की सज़ा मिल रही है. लेकिन इसका ख़ामियाजा आम इंसानों को भुगतना पड: रहा है, उसका कहीं न कहीं दुख भी है. मगर भारत कैसे पाकिस्तान की मदद कर सकता है, और वैसे भी मुझे लगता है कि किसी भी तरह की भारतीय मदद को शक से ही देखा जाएगा. ज़रूरत शायद पाकिस्तान की आम जनता को जागरूक करने की है कि वो अपने हुक्मरानों पर दवाब डाले कि जिहादीयों की सब वित्तीय सहायता ना सिर्फ बंद करें बल्कि आम जनता को भी बताएं कि उनका दान कोई जन्नत पाने का तरीका नहीं वरन कहीं न कहीं इंसानी लहू बहाने में इस्तेमाल होगा.

  • 20. 03:39 IST, 20 अप्रैल 2009 Sharad:

    ख़ान साहब के लिखे ब्लॉग को पढ़कर अच्छा लगा, ख़ान साहब ने पाकिस्तान को एक ‘मासूम’ देश के तौर पर पेश करने की कोशिश की है, क्या मज़ाक़ है. पत्रकार महोदय शायद भूल गए है कि वो पाकिस्तान ही है जिसने कश्मीर में आग लगाई. अब वो कह रहे हैं कि तकलीफ़ हो रही है. इस समस्या का हल पाकिस्तान में हैं और पाकिस्तान सरकार को इस सिलसिले में कड़े क़दम उठाने की ज़रूरत है. मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि ये जनाब भारत से कहना क्या चाह रहे हैं. क्या ये चाहते हैं कि भारत पाकिस्तान में जाकर तालेबान से लड़े. ये कैसे मुमकिन है.

  • 21. 03:55 IST, 20 अप्रैल 2009 AJ:

    ख़ान साहब आपने जो कहा है, सही है. आपका देश ख़ुद की लगाई हुई आग में झुलस रहा है लेकिन फिर भी भारत को नुक़सान पहुचाँने की नीति से बाज़ नहीं आ रहा है. हमलोग सही मायने में पाकिस्तान की स्थिति से चिंतित हैं, लेकिन आप लोगों ने हालात ऐसे बनाए हैं कि मदद मुमकिन नहीं. आपका देश इस कहावत पर खड़ा उतर रहा है, ‘रस्सी जल गई, पर बाल नहीं गए’. अगर पाकिस्तान सही मायने में गंभीर है तो कई देश आपकी मदद करेंगे. हमलोग निश्चत रुप से पड़ोस में विफल पाकिस्तान नहीं चाहते. जैसाकि पाकिस्तानी के हुकमरानों की नीतियाँ हैं.

  • 22. 04:54 IST, 20 अप्रैल 2009 s l chowdhary:

    भाई बात तो आपकी ठीक है, पर--- ये 'पर' बहुत लंबा है. हम सभीको मिलकर सोचना और करना होगा.

  • 23. 05:05 IST, 20 अप्रैल 2009 NARENDRA SHARMA:

    विश्व के बहुत बड़े नेता (जिसे मुशर्रफ़ भी मान-सम्मान देते हैं) अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हम अपना इतिहास और भूगोल नहीं बदल सकते हैं, इसलिए आओ मिलकर साथ चलें. वे लाहौर बस लेकर भी गए थे. दोनों मुल्क कितना ख़ुश हुआ था तब.मेरे भाई पुराने बैर भूलकर नया दौर पैदा करें. मोहब्बत करें, विकास करें, सियासत न करें. हिंदी पाकिस्तानी भाई-भाई. रास्ते निकलेंगे. शुक्रिया.

  • 24. 05:43 IST, 20 अप्रैल 2009 n.s.bisht:

    मिस्टर खान, मैं आपकी बात से सहमत हूं लेकिन आखिरी पंक्ति को छोड़कर. आप शुरुआत करते हैं एक स्टैंड लेकरर लेकिन आखिरी में आप अपने को एक्सपोज़ कर देते हैं यह कहकर की ' दुश्मनी फिर कभी '. इसका यह मतलब हुआ कि सामान्य स्थिति में पाकिस्तान फिर वही सबकुछ करेगा जो पहले करता रहा है. आप अपना स्टैंड साफ करें कि आप क्या चाहते हैं शांति या दुश्मनी. वैसे भारत आने के लिए शुक्रिया.

  • 25. 05:50 IST, 20 अप्रैल 2009 shan:

    आपने भारतीय मीडिया की बात तो की, मगर आप पाकिस्तान के मीडिया पर भारत के विरुद्ध फैलाने जाने वाले कार्यक्रमों पर, ख़ास करके कश्मीर के मुद्दे पर, खामोश हैं ?

  • 26. 07:03 IST, 20 अप्रैल 2009 raushan:

    पाकिस्तान या तो अमरीका हो जाए या फिर भूटान. अगले 10 साल में भूटान हो जाने की उम्मीद ज़्यादा है. शायद इस समय पाकिस्तान में जारी जंग सिर्फ़ अपने अधिकारों को पश्चिमी शिक्षित वडेरों और जागिरदारों से वापस लेने की कोशिश है. वैसे हम भारतीयों के लिए फ़्रंटियर के पठान पुराने दोस्त रहे हैं.

  • 27. 07:38 IST, 20 अप्रैल 2009 Deepak Tiwari:

    हम लोग पाकिस्तान पर भरोसा नहीं कर सकते. पाकिस्तान की प्रतिबद्धता और काम में बहुत अधिक फ़र्क़ है. हमलोग पिछले साठ साल से देख रहे हैं.

  • 28. 07:52 IST, 20 अप्रैल 2009 shabbir:

    ख़ान साहब सबसे पहले तो शुक्रीया भारत में आने का और रहने का. हम यहां अमरीका में पिछले हफ्तें पाकिस्तान पर एक प्रोगाम देख रहे थें जिसमें पाकिस्तान की एक महीला पत्रकार ने अमरीका की पब्लिक टेलिविज़न के लिए प्रोगाम बनाया गया था जिसमें दिखाया जा रहा था कि किस तरह से कराची मे रहने वाले बेसहारा बच्चों के दिलों में (मस्जिदो में)मुजाहिदीन बनने की चाह पैदा की जाती है और किस तरह से स्वात में सामान्य लोगों के खिलाफ़ वदसलुकी (मुजाहीदीन से मोहब्बत करने वालों लोगों द्वारा) को सरकार नजर अंदाज करती हें. पाकिस्तान के अच्छे लोग जब तक भारत और विश्व के खिलाफ़ अपनें बच्चों मे ज़हर भरने वाले (गैरमुस्लिम कों काफिर कहनें और समझनेंवालें) मुल्लां, अब्बु और अम्मींओं का विरोध नहीं करगें तब तक वहां के लोगों में भारत और विश्व कें प्रति ज़हर रहेंगा और यह दहशतगर्दी बनी रहेंगी अब आप बताईए इसमें भारत क्या कर सकता है.

  • 29. 08:32 IST, 20 अप्रैल 2009 SHANKAR PRASAD YADAV:

    ख़ान साहब ने आपने जो भी बात लिखा है लाख टके की है. लेकिन ये बातें पाकिस्तान सरकार को क्यों समझ में नहीं आती. जबकि पाकिस्तान धीरे-धीरे गर्त में जा रहा है. इसलिए पाकिस्तान सरकार को चाहिए कि बढ़ रहे आतंकवाद को ख़त्म करने की कोशिश करे.

  • 30. 09:00 IST, 20 अप्रैल 2009 Pranes Bhargava:

    पाकिस्तानियों की सबसे बड़ी ग़लत बात यह है कि उनको दूसरों के गिरेबान का छेद दिख जाता है पर अपने फटे हुए गिरेबान को बिलकुल नहीं देखते. वुसत जी आप स्वयं भी उसी मानसिकता से ग्रस्त हैं. आप कहते हैं कि पाकिस्तानियों ने कहा कि "अफगानी जानें, रूसी जानें, खुदा जानें", इस से बड़ी ग़लत बात मैंने आज तक नहीं पढ़ी. और उसके बाद आप यहाँ तक कहते हैं कि पाकिस्तानियों ने कहा कि "ये कश्मीर की आग है--- भारत जाने --- कश्मीरी जानें--- वहां घुसने और लड़ने वाले जानें.. हमें क्या". वुसत जी इन नेक ख्यालों के साथ आप हिन्दुस्तान की आवाम को खुला चिट्ठा लिख रहे हैं? हिन्दुस्तानी कौम के मुंह पर थूक रहे हैं आप यह कह के कि पाकिस्तान ने कश्मीर से हाथ झाड़ लिए. आपको या तो पत्रकारिता की समझ नहीं, या इतिहास की समझ नहीं, या हिन्दुस्तानियों की समझ नहीं. मुझे लगता है की आपको किसी की भी समझ नहीं.

  • 31. 09:33 IST, 20 अप्रैल 2009 Karan:

    एक बहुत पुरानी कहावत है, सोते हुए को आदमी जगा भी दे, पर जागते हुए आदमी को कैसे जगाए’ मुझे आज भी याद है कि 1997 में एक अख़बर का संपादकीय पढ़ा था जिसमें कई मिसालों के ज़रिए समझाया गया था कि पाकिस्तान आज जिस आतंकवाद को श्री गणेश दे रहा है एक दिन वो उसपर ही उलटा पड़गा. उस समय वो पूरी तहरीर बकवास लगी थी लेकिन आज उस संपादक को सलाम करता हुँ जिसने भविष्यवाणी अपने आंखों से देखा है. कल तक पाकिस्तान जिन चरमपंथियों को पालते थे आज वही हीरो बन गए हैं. क्या यह बात सही में समझ में नहीं आई मियाँ.

  • 32. 10:36 IST, 20 अप्रैल 2009 arvind:

    ख़ान साहब! आप के कथन से लगता है कि आप दुश्मनी को हमेशा जारी रखना चाहते हैं. फिलहाल हमें बचा लो अपने ही पतलून से. आपके इस विचार से हंसी आती है और दया भी. पर जब आपके ज़हन में दुश्मनी जारी रखने की बात है तो ऐसा आग्रह कोई भी भारतीय स्वीकार नहीं कर सकता.

  • 33. 11:14 IST, 20 अप्रैल 2009 Ajay Pal Singh:

    ख़ान साहब! मैं समझता हूँ कि आपका देश को मदद की ज़रुरत है. लेकिन जबतक पातकिस्तान की जनता अपनी सोच और रवैया नहीं बदलता भारत से मदद की उम्मीद नहीं की जा सकती है. आप जाने है कि भारत आतकंवादियों से लड़ने की ताक़त रखता है. सिर्फ़ रिश्तों में विश्वास की आवश्यकता है.

  • 34. 11:35 IST, 20 अप्रैल 2009 Devender Kumar:

    ख़ान साहब! आप तालेबान से लड़ने के लिए भारत की मदद चाहते हैं. आपको याद करना चाहिए कि आपका संबंध एक ऐसे देश से है जो हमेशा भारत को धोखा देता रहा है. कश्मीर, संसद पर हमला, मुंबई हमला. हमारी सेना अपने दुश्मनों से लड़ने की हिम्मत रखती है. और एक बात स्पष्ट है कि पाकिस्तान एक दिन अपन पाप में झुलसकर बर्बाद हो जाएगा. इसलिए इंतज़ार करें और किसी मदद की उम्मीद नहीं करें. हम भारतीय( हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई) तालेबान से लड़ने के लिए तैयार है.

  • 35. 13:16 IST, 20 अप्रैल 2009 wamiq khan:

    ख़ान साहब सलाम. आपकी बेबाक रिपोर्टिंग अपने बचपन से सुनता आ रहा हूँ. लेकिन आज राय भी दे रहा हूँ. आज पाकिस्तान का जो हाल है उसके बारे में जहाँ तक समझता हूँ ये आज की ग़लती नहीं है. भारत पाकिस्तान का बंटवारा ही शरिया क़ानून और इस्लामी क़ानून के आधार पर हुआ था. पर वहां की सरकार ने अवाम को धोखा दिया. जो 60 साल बीत जाने के बाद भी क़ानून नहीं बन सका. तो अगर वहां के अवाम की मर्ज़ी ही शरिया क़ानून है तो इसमें सराकरी को परेशानी क्या है.

  • 36. 22:07 IST, 20 अप्रैल 2009 Jatin Mehta:

    खान साहब, मुझे लगता है कि आपने जो लेख लिखा है, वह बहुत प्रभावशाली और आदर्शवादी है. मैं आपके दृष्टिकोण से इत्तेफ़ाक रखता हूँ. वैसे मैं यह नहीं समझ सका हूँ कि आजकल आपके देश को मिल रही चुनौतियों के मद्देनज़र भारत और पाकिस्तान का मुक़ाबला आप कैसे कर सकते हैं. आपने लिखा है कि 90 के दशक में जो पाकिस्तान मानता था, ठीक वही आज भारत कर रहा है. आप यह बताया भूल गए कि पाकिस्तान वह देश है जिसने अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर में चरमपंथियों को पनाह दी है. यही वजह है कि सभी कहते हैं कि अपने बोए बीज के वृक्ष को काटना ही पड़ेगा. भारत ऐसा देश है जिसने कभी भी दुनिया के किसी भी हिस्से में चरमपंथ को समर्थन नहीं दिया. और न ही भविष्य में कभी करेगा. जहाँ तक तालिबान का सवाल है, हमारी सेना उनको भारत में घुसने से रोकने के लिए काफ़ी समर्थ है.

  • 37. 12:18 IST, 21 अप्रैल 2009 iqbal aftab:

    वसुतुल्लाह ख़ान आपने जो कहा सच कहा, हम लोगों को मिलकर इसका उपाय ढूँढ़ना चाहिए. यह भी सच पाकिस्तान ने जो वाइरस पैदा किया वह उसे ही बीमार कर कर दिया है.

  • 38. 12:45 IST, 26 अप्रैल 2009 Pranesh Bhargava:

    पाकिस्तानियों की सबसे बड़ी ग़लत बात यह है कि उनको दूसरों के गिरेबान का छेद दिख जाता है पर अपने फटे हुए गिरेबान को बिलकुल नहीं देखते. वुसत जी आप स्वयं भी उसी मानसिकता से ग्रस्त हैं. आप कहते हैं कि पाकिस्तानियों ने कहा कि "अफ़ग़ानी जानें, रूसी जानें, ख़ुदा जाने", इससे बड़ी ग़लत बात मैंने आज तक नहीं पढ़ी. और उसके बाद आप यहाँ तक कहते हैं कि पाकिस्तानियों ने कहा कि "ये कश्मीर की आग है--- भारत जाने --- कश्मीरी जानें--- वहां घुसने और लड़ने वाले जानें.. हमें क्या". वुसत जी इन नेक खयालों के साथ आप हिन्दुस्तान की आवाम को खुला चिट्ठा लिख रहे हैं? हिन्दुस्तानी कौम के मुंह पर थूक रहे हैं आप यह कह कर कि पाकिस्तान ने कश्मीर से हाथ झाड़ लिए. आपको या तो पत्रकारिता की समझ नहीं, या इतिहास की समझ नहीं, या हिन्दुस्तानियों की समझ नहीं. मुझे लगता है कि आपको किसी की भी समझ नहीं.

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