सुरमा लगाके...
हर सुबह मैं ताज़ा भारतीय अख़बारात में यहां के चुनावी उम्मीदवारों की बेचारगी की दास्ताने पढ़ता हूँ और शुक्र अदा करता हूँ कि मैं इस मुल्क में नहीं रहता.
जैसे इसी ख़बर को लीजिए कि प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट से मनमोहन सिंह की तस्वीर हटा दी गई है, क्योंकि चुनाव आयोग के ख़्याल में अब जब के चुनाव हो रहे हैं, मनमोहन सिंह का वेबसाइट पर टिके रहना ठीक नहीं है.
पाकिस्तान में चाहे फ़ौजी राष्ट्रपति हो या ग़ैर फ़ौजी, प्रधानमंत्री कितना ही कमज़ोर क्यों न हो, वो भारत के प्रधानमंत्री की तरह बेचारा नहीं होता. वहां तो चुनाव के बहुत दिन बाद तक आधिकारिक वेबसाइट पर पुरानी तस्वीरें लगी रहती हैं.
लालू प्रसाद यादव के कान चुनाव आयोग ने सिर्फ़ इतनी सी बात पर खींच लिए कि उनका हेलीकॉप्टर किसी स्कूल के मैदान में बग़ैर इजाज़त कैसे उतरा और मध्य प्रदेश में कांग्रेसी उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया से चुनाव आयोग यह पूछ रहा है कि उनका हेलीकॉप्टर जब एक खेत में उतरा तो क्या खेत के मालिक से इजाज़त ली थी?
पाकिस्तान में अगर चुनाव के दौरान नवाज़ शरीफ़ या आसिफ़ अली ज़रदारी का हेलीकॉप्टर किसी के सर पर भी उतर जाए तो वो ख़ुशी से दीवाना हो जाता है. चुनाव आयोग अपने काम से काम रखता है और यह मामला मतदाता और राजनेताओं पर छोड़ देता है.
भारतीय प्रेस वरुण गांधी के हाथ काट देने और लालू के रोड रोलर के नीचे दे देने के बयान को इतना उछाल रहा है जैसे कोई क़यामत आ गई हो. इससे अच्छा तो पाकिस्तान है जहां हर राजनेता दूसरे को जब चाहे काफ़िर, ग़ैर मुल्की और सिक्यूरिटी रिस्क कह सकता है. जलसे-जुलूस में खुलेआम एक-दूसरे का मुँह तोड़ने और फाँसी चढ़ाने की बातें होती हैं, लेकिन चुनाव आयोग को अच्छी तरह पता है कि राजनेताओं की इस तरह की बातों का कोई मतलब नहीं होता, यह सब सामान्य सियासी कलचर का हिस्सा है इसीलिए चुनाव आयोग ऐसी बातों का नोटिस लेकर अपना और क़ौम का वक़्त बर्बाद नहीं करता.
देखिए जम्हूरियत का मतलब है आज़ादी, मगर यह बात आपकी समझ में क्यों आएगी, इसलिए कि आप चुनाव आयोग से डरते हैं. अगर चुनाव आयोग का सब्र और राजनेताओं की आज़ादी देखना चाहते हैं तो मेरी जान कभी आओं ना पाकिस्तान सुरमा लगाके.

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आपने ऐसी नस पकड़ी है जिसे ज़्यादातर लोग नहीं पकड़ पाते. मैं मानता हूँ कि भारत का चुनाव आयोग कभी कभी कुछ ज़्यादा ही तेज़ हो जाता है जिसकी ज़रूरत नहीं होती. लेकिन यह एक श्रेष्ठ और स्वतंत्र संस्था है.
माफ़ कीजिए, मुझे लगता है लेखक खामखाँ में एक बहस को जनम दे रहे हैं. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के चुनाव आयोग के बारे में जबकि पाकिस्तान नेता भारत के चुनाव आयोग की तारीफ़ कर चुके हैं. हैरानी होती है कि उनको सिर्फ़ चुनाव आयोग का यही एक पहलू नज़र आया. यह बात दुख पहुँचाने वाली लगी कि आप भारतीय प्रधानमंत्री को पाकिस्तान के मुक़ाबले बेचारा समझते हैं. वैसे मुझे नहीं लगता कि चुनाव आयोग का सब्र और राजनेता की आज़ादी देखने कोई पाकिस्तान जाना चाहेगा. फ़िलहाल तो लेखक हिंदुस्तान आये हैं यहाँ का चुनाव देखने....सुरमा लगाके
खान साहब, शुक्रिया..... आपको आपका पाकिस्तान बहुत बहुत मुबारक हो... और अल्लाह का शुक्र है कि आप जैसे लोग भारत में नहीं हो सकते हैं....पाकिस्तान में ही होंगे..... जिस तरह गोल्ड को तपाया जाता है और निखार लाने को, उसी तरह भारत में चुनाव आयोग बहुत कड़ा है. प्रजातंत्र में निखार लाने को.......आमीन.
मुझे नहीं पता कि आप किस तरह की आज़ादी की बात कर रहे हैं. पर आपका ये कहना कि अच्छा है कि मैं इस मुल्क़ में नहीं रहता, मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगा. आपको पाकिस्तान में लागू होने वाला शरिया कानून मुबारक़ हो. पर कृपा कर किसी भी दूसरे मुल्क़ की आज़ादी को लेकर नुक्ताचीनी करना अच्छा नहीं है. खासकर कि जब आप पत्रकार हैं तो आपकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. मैं मानता हूँ कि आप के ये खुद के विचार हैं, पर तब भी उन्हें ऐसे व्यक्त करने का कोई मतलब नहीं है अगर वो किसी समुदाय या देश को चुभते हों.
वुसत साहब, हमें वाक़ई शुक्र अदा करना चाहिए कि हम जिस देश में रहते हैं वहाँ सेना कभी भी, किसी भी समय चुनी हुई सरकार को गिरा सकती है और राजनेता चुनाव आयोग को घास ही नहीं डालते. पाकिस्तान में अगर चुनाव आयोग स्वतंत्र होता तो वह भी इतनी सी बातों पर नेताओं के कान खींचता. मेरे विचार से भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने में भारतीय चुनाव आयोग की अहम भूमिका है और जिस की वजह से भारत में संस्थाएँ दिनबदिन मज़बूत हो रही हैं. इस का पूरा श्रेय अगर कोई देना चाहे तो, भारत के चुनाव आयोग को जाता है. अगर क़ानून की नफ़र्मानी देखनी हो तो ज़रूर सुरमा लगाके पाकिस्तान आओ.
तभी तो पाकिस्तान का यह हाल है आज, आप ये ख़बर छाप कर पाकिस्तान को क्या साबित करना चाहते हैं? तो चले जाओ ना पाकिस्तान, किसने कहा यहाँ आओ, और हाँ, हमें मत सिखाओ कि पाकिस्तान में क्या होता है और क्या नहीं, हमें अच्छी तरह से पता है.
यहाँ पर भी जनता पार्टी के समय एस शकधर और बाद में टीएन शेषन ने ही चुनाव आयोग को ऊँचा दर्जा दिया. हाँ कभी ज़्यादा हो जाता है पर थोड़ा समझाने के लिए दंड दिखाना ज़रूरी भी है. आपने बुलाया है तो आने की कोशिश करेंगे सुरमा तो वहाँ भी होगा ही.
मुझे लगता है कि चुनाव आयोग के काम की तारीफ़ की जानी चाहिए. हमें यह याद रखना चाहिए कि चुनाव के वक्त जो भी चुनाव आयोग कर रहा है, वह उसकी ड्यूटी है लेकिन होना यह चाहिए कि चुनाव के बाद चुनी गई सरकार को ऐसे हर व्यक्ति के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना चाहिए जो हमारे राष्ट्र के बहुधर्मी, बहु सांस्कृतिक और बहुभाषी चरित्र को नष्ट करने की कोशिश करे. हमारे राष्ट्र की यही विशेषताएं हैं जिनके लिए दुनिया के दूसरे देशों में उसकी पहचान है. हम धर्म के नाम पर बाँटो और राज करो वाली नीति का असर देख ही चुके हैं. ऐसे में हमें पड़ोसी देशों में क्या हो रहा है, इससे कोई मुकाबला नहीं करना चाहिए. किसी की भी अच्छाई को लिया जा सकता है लेकिन खराब बातों का अनुसरण नहीं किया जाना चाहिए चाहे वह अपने घर की ही बात क्यों न हो. चुनाव आयोग अपनी ड्यूटी कर रहा है जो तारीफ़ के काबिल है. यही वजह है कि हमारे दो पूर्व चुनाव आयुक्तों को मैगसेसे पुरस्कार मिल चुका है.
सारे पाठकों की प्रतिक्रिया जल्दबाज़ी में दी गई प्रतिक्रिया है. वुसतुल्लाह खान साहब के इस पोस्ट का मतलब ठीक से समझा नहीं गया. मैं सभी पाठकों से कहना चाहूँगा कि वे कृपया इस पोस्ट को दोबारा पढ़ें और फिर इस पर प्रतिक्रिया दें.
मेरे ख़याल से वुसत खान पाकिस्तान पर व्यंग्य कर रहे हैं. और भारत की तारीफ़ कर रहे हैं पर पाठक इसे अलग ही नज़रिए से देख रहे हैं.
क्या साहब, आज़ादी का मतलब ज़िम्मेदारी भी होती है. और यही हमारा चुनाव आयोग भी समझता है. इसी कारण हमारे यहाँ लोकतंत्र की मज़बूती ज़्यादा है. इस बात को कोई भी पाकिस्तानी कभी समझ ही नहीं सकता है सुरमा लगाकर.......
मुझे लगता है कि लेखक भारत के चुनाव आयोग की भूमिका की तारीफ अपने अंदाज़ में करना चाहते हैं. लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोगों ने उनकी बात को नहीं समझा और उनके व्यंग्य पर काफ़ी कटु टिप्पणियाँ कर दी हैं. प्रिय खान साहब, आप अपनी बात में बिलकुल सही और निष्पक्ष हैं. आप जैसे लोग ही इस दुनिया को बेहतर बनाते हैं. काश आप हिंदुस्तानी होते लेकिन एक पाकिस्तानी होने पर भी हमारे लिए यह कम गर्व की बात नहीं है. धन्यवाद!
मेरे हिंदुस्तानी दोस्तो, ज़रा आराम से, यह वुसतुल्ला साहब का व्यंग्यात्मक अंदाज़ है. यह सब कहकर वे पाकिस्तान की प्रजातांत्रिक व्यवस्था की टांग खिंचाई कर रहे हैं.
दरअसल ख़ान साहब ने भारत के चुनाव आयोग को अपनी तरफ़ करने के लिए पाकिस्तान चुनाव आयोग पर जूता मारा है. साथ ही पाकिस्तान की राजनीति पर भी कड़ा प्रहार किया है.
ख़ान साहब ने जो लिखा है बहुत अच्छा लिखा है, अमज़द ख़ान की टिप्पणी से सहमत हूँ. अमित साहब ने भी सही लिखा है.
दोस्तों ये पाकिस्तान के हालात पर व्यंग्य है. ..... बहुत ही अच्छी शैली में लिखा गया लेख है...... भारतीय चुनाव आयोग नोटिस लेने में तेज़ है लेकिन कार्रवाई करने के मामले में बहुत कम है. हमें दुआ करनी चाहिए कि तेज़ी से फ़ैसले देने वाली अदालत और चुस्त दुरूस्त पुलिस व्यवस्था चाहिए.
जनाब, पाकिस्तान के अवाम को भी एक बेहतर चुनाव आयोग बनाने की ज़रुरत है.
मेरे पाठकों को टिप्पणी करने के पहले ख़ान साहब के भावनाओं को ठीक से समझ लेते तो अच्छा ख़ान साहब की भाषा व्यंग्यात्मक और विचार में गहराई है.
जब पाकिस्तान के सियासतदान जनता के सामने दुश्मनों को फांसी देने की बात करते हैं तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है.
धन्यवाद! आपने कितनी ख़ूबसूरती के साथ भारतीय चुनाव आयोग की प्रशंसा की है.
कुछ ही लोग हैं जो आप के इस व्यंग्य को समझ पाए हैं, जो आप ने पाकिस्तान के बारे में लिखा है वो कमियाँ कुछ हद तक भारत में भी है.
वुसतुल्ला साहब, आपकी इस व्यंग्यात्मक अदा के हम कायल हैं. पर आपकी बातों का हमारे देश वासियों ने बहुत ही नकारात्मक अंदाज़ में लिया उसके लिए हमें अफ़सोस है. भारत में आपका स्वागत है.
बात दरअसल ऐसा है कि पाँच साल तक नेता नौकरशाह पर हुक्म बजाते हैं लेकिन चुनाव के दौरान नौकरशाहओं को नेतोओ पर हुक्म चालने का मौक़ा मिलता है, ऐसी में नेताओं पर फ़ालतू का भी इल्ज़ाम लगाया जाता है.
जी हाँ, वरुण के बायन को भारतीय राजनेताओं के ज़रिए इस्तेमाल किया जा रहा है. चलिए मेरे भाई कोई तो ऐसा है जो इन सवालों पर लिख रहा है. जो समझता है कि यह सब सत्ता पाने का खेल है.
हाहा. मज़ा आ गया. जिस लहजे में आपने पाकिस्तान के नवजात ज़म्हूरियत की खिंचाई की है. काश कि उनको भी ये समझ में आए जिनके लिए ये मायने रखता है.
यह पाकिसतान के सिलसिले में अच्छी टिप्पणी है.
इस ब्लॉग को पढ़ने के बाद मैं अपनी हँसी को नहीं रोक सका. आपने व्यंग्य व्यंग्य में सभी कुछ कह दिया. अच्छा काम है जारी रखें.
खान भाई, जय श्री राम, मुझे यह तो नहीं पता कि आपका उद्देश्य भारत पर व्यगय करना था कि पाकिस्तान पर लेकिन आप का तरीका ग़लत है क्योंकि इसे भारत का हर एक नगरिक देख सकता है| अगर आप यह व्यंगय भारत के चुनाव आयोग के दायरे में कर रहे होते तो आप भी चुनाव आयोग के इन मसलों को समझ जाते ओर तरीफ़ कर रहे होते और इस तरह व्यगय नहीं करते| यह पाबन्दी ज़रुरी है नहीं तो हम भी लाल मस्जिद की तरह हो जाते | मुझे यह लगता है की आप यह लिखने के समय किसी राजनैता के घर तो नहं थे | हर हर महादेव.
अगर लेखक का ये लेख व्यंग्य है तो मैं कहूँगा कि वो इसमें सफल नहीं हो सके हैं. बेहतर होगा कि लेखक अपने अगले लेख में इस बारे में कुछ खुलकर लिखें. वैसे पाठकों की प्रतिक्रिया कम दिलचस्प नहीं हैं.
ख़ान साहब! धन्यवाद भारतीय चुनाव आयोग की सकारात्मक टिप्पणी के लिए. मैं क्षमा मांगता हूँ कि कुछ पाठकों ने आपके लेख का सही से नहीं समझा. दरअसल आप का लेख पाकिस्तानी जनता को यह बताना था कि भारत का चुनाव आयोग कैसे काम करता है. जिसे पाठक समझ नहीं सके.
ख़ान साहब! आपके अंदाज़ को सलाम. सलाम आपने चुनाव आयोग को भी जो कुछ पलों के लिए ही सही, अपने अपको राजा समझने वाले नेताओं को ज़मीनी हक़ीकत बताते हैं. बस यही दुआ करता हूँ कि हमारे पड़ोसी की भी राजनीतिक व्यवस्था दुरूस्त हो जाए. आमीन
वुसत का लेख अप्रत्यक्ष रुप से भारतीय लोकतंत्र की तारीफ़ करता है. हर कोई जानता है, "सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा". इसलिए वुसत साहब भारत में हर प्रकार से आज़ादी महसूस कर रहे हैं.
अरे भाई ये व्यंगात्मक लेख है. ज़रा ढंग से पढ़ने के बाद टिप्पणी कीजिए.
खान साहब ने अच्छा लिखा है, इंशाल्लाह आपके पाकिस्तान में भी जम्हूरियत आएगी.
इस लेख को पढ़ने के बाद मुझे बहुत बुरा लगा. आज यही कारण है कि पाकिस्तान इस स्थिति में है. यह आप की तरह के एक अच्छे पत्रकार से अप्रत्याशित है.
ख़ान साहब आपने अपने देश के चुनाव आयोग पर अच्छा व्यंग्य किया है. धन्यवाद
शायद यह पाकिस्तान की लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक बनाने का एक तरीका था. लेकिन श्री खान बहुत अपने संदेश में स्पष्ट होना चाहिए.
हद हो गई. इतने बड़े पत्रकार के व्यंग्य को इस वेबसाइट के पढ़ने वालों में समझ बिल्कुल नहीं है. ज़रा ग़ौर से पढ़ो वुसत साहब को. ख़ान साहब आपके लिखने का अंदाज़ निराला है. आपने पाकिस्तानी जम्हूरियत की बड़ी संजीदगी से मज़ाक़ उड़ाया है. भारत के लोकतंत्र की तारीफ़ करने के लिए शुक्रिया.
भारतीय चुनाव आयोग की तारीफ़ करने का यह सबसे अच्छा तरीक़ा है साथ ही पाकिस्तान चुनाव आयोग को क़रीब से समझने का भी. बहुत-बहुत धन्यवाद वुसतुल्लाह ख़ान साहब.
हैरत है कि पत्रकार अपने देश की कमज़ोर लोकतांत्रिक व्यवस्था का मज़ाक उड़ा रहा है और हमारे चुनाव आयोग की जी जान से तारीफ़ कर रहा है. मेरा निवेदन है कि पाठक पहले श्रीलाल और सुख लाल शंकर प्रसाद को पढ़ कर व्यंग्य को समझें.
ख़ान साहब की छींटाकशी सही है या नहीं ये तो नैतिकता के स्तर पर तोली जानी चाहिए पर उनकी ये सूचना बढ़िया लगी. मुझे लगता है कि इस मामले में भारत एक ज़िम्मेदार भूमिका अदा कर रहा है और यह अन्य पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका के लिए प्रेरणादायक हो सकते हैं. वैसे आपने मज़ाक में ही कहा वुसत भाई कि कभी आपके मुल्क आएँ पर बात अच्छा लगी. गर कभी वीज़ा पा सकने की स्थिति में होते तो उत्तरी चित्राल और स्वात की खूबसूरत वादियों में सैर की तमन्ना थी, उम्मीद है कि हालात बेहतर होंगे और एक दिन.
एक उम्दा और ईमानदार अभिव्यक्ति को भी जो लोग नहीं सराह सके हैं उनकी नज़्र मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शे'र करना चाहता हूं:
या रब ना वो समझे हैं ना वो समझेंगे मेरी बात
दे उनको दिल और या दे मुझे ज़ुबां और.
बेहतरीन व्यंग्य ! बधाई वुसतुल्लाह साहब.
दोस्तों! वुसत साहब बहुत अच्छे पत्रकार हैं उनकी बातें ज़रा ध्यान से पढ़ें.
वुसत साहब आप पाठक वर्ग के लिए नए हैं इसलिए कुछ आलोचना भी हो रही है, लिखते रहें जल्द ही आपके ब्लॉग के लोग दीवाने हो जाएंगे. शुरू-शुरू में ऐसा होता है.. सुरमा लगाके.
वुसतुल्लाह साबह ने पाकिस्तान चुनाव आयोग की खिंचाई की है, शायद उसको बहुत सारे लोग समझ ही नहीं पा रहे है कि किस दबे अंदाज़ में उन्होंने भारत के चुनाव आयोग और पाकिस्तान के चुनाव आयोग की लाचारी का ज़िक्र किया है.
जनाब वुतसुल्लाह ख़ान साहब आपकी व्यंगात्मक टिप्पणी बहुत अच्छी हैं. क्या ख़ूबसूरती के साथ भारत-पाकिस्तान की तुलना की है, जवाब नहीं. भारतीय चुनाव आयोग के इमानदार रवैय को माना और हक़ीकत को बयान किया. ऐसे में भारत के निष्पक्ष चुनाव के तरीक़े पर हमें भारतीय होने पर गर्व है.
इस ब्लाग पर की गई कुछ टिप्प्णियां पढ़ कर महसूस होता है कि कई लोग सचमुच अक़्ल के पीछे लट्ठ लेकर दौड़ते हैं. भाइयो ठंड रखो, और इस लेख को फ़िर से पढ़ो, लेकिन इस बार सुरमा लगा के.
ख़ान साहब आपकी व्यंगात्मक टिप्पणी बहुत अच्छी हैं.
ख़ान साहब ने जो भी लिखा है बहुत अच्छा लिखा है. मगर उनके नज़रिए को कुछ लोग समझ नहीं पा रहे हैं.
भारतीय चुनाव आयोग एक महान संगठन है. चुनावों के लेकर आयोग के फ़ैसले यक़ीनन आम लोगों के हित में है. चुनाव प्रचार में लाउडस्पीकर नहीं है. कोई नेता अपने चुनावी फ़ायदे के लिए आपको परेशान नहीं कर सकता. सबसे अच्छी बात है कि चुनावों में सुरक्षा का इंतेज़ाम है. बिहार और झारखंड में ज़रूर कुछ अप्रिय घटनाएँ हुई हैं फिर भी पहले की अपेक्षा ज़्यादा बेहतर ढंग से चुनाव कराए जा रहे हैं. आयोग के काम में जुड़े सभी लोग देश को अपनी सच्ची सेवाएँ दे रहे हैं.
पाकिस्तान में जमहूरियत जैसी कोई चीज़ नहीं है.
वाह, क्या लिखा है सुरमा लगा के...
ख़ान साहब आपने जो भी लिखा है, बहुत ही अच्छा है, और ये कुट सत्य भी है. ख़ान साहब तो ये बात कर रहे हैं कि पाकिस्तान में किस हद तक स्थितियाँ ख़राब हुई हैं. वहां की सरकार आंखों में सुरमा लगाती है लेकिन उसे दिखाई कुछ नहीं देता. ख़ान साहब ने वहाँ के हालात पर बड़े अच्छे ढंग से व्यंग किया है. इस लेख को अच्छी तरह से पढ़ने की ज़रूरत है. मैं टिप्पणियां भेजने वालों से अनुरोध करूँगा कि इस लेख की गरिमा को समझने के लिए इसे दोबारा ज़रूर पढ़ें.
शुरू की कुछ प्रतिक्रियाएं पढ़कर लगा कि- अरे क्या मैने कोई और लेख पढ़ा और प्रतिक्रियाएं किसी और लेख की देख रहा हूँ! बाद की प्रतिक्रियाएं पढ़कर राहत मिली कि बीबीसी के अधिकाँश पाठक वुसतुल्लाह साहब को समझ पाए.हालाँकि हिन्दुस्तान की जम्हूरियत में अभी काफी सुधार कि गुंजाइश है, लेकिन फिलहाल खान साहब की इस तारीफ का शुक्रिया. इंशा अल्लाह पाकिस्तान में भी जम्हूरियत का परचम बुलंद हो.
खान साहब आप ने बिल्कुल ठीक लिखा है. कुछ पाठक आप को समझ नही सके और कटु टिप्पडी कर दी उन सभी की ओर से हम दिल से माफी मागते हैं *जयहिँद*
खान साहेब का व्यंग्य पढ़के मज़ा आ गया! आपने दो पड़ोसी मुल्क़ों की व्यवस्था पर बहुत ही बेहतरीन टिपण्णी की है! मुझे इस बात का दुःख है कि कुछ पाठको ने बहुत ही तीखी टिप्पणी की और ये बस उनकी अपरिपक्वता को दर्शाता है! मै तो बस यही कहना चाहूँगा कि मित्रों पहले तुम सुरमा लगा के इस लेख को एक बार फिर से पढो और अगर खान साहेब के लेख से तुम्हारा अंधा राष्ट्र प्रेम आहत होता है तो बेशक एक बार पाकिस्तान जाओ और वहाँ का सुरमा लगा के देखो वो तुम्हे अपने देश से ज़्यादा अलग नहीं दिखेगा. आम लोगों की हालत एक सी है , उधर माओवादी की जगह तालिबान दिखेगा और सोनिया जी की जगह ज़रदारी साहेब !!!
खान साहब आप ठीक ही लिख रहे हैं. जहां के आप हैं अगर वहीं लोकतंत्र को समझा गया होता तो न ज़रदारी के हेलिकाप्टर के सर पर उतरने के बाद लोग दीवाने होते न हीं तालिबान आपके घर में घुसता. जनाब यहां लोकत्रंत्र यहीं नियम सर्वोपरि होते हैं. वैसे अच्छा ही हुआ कि आप जैसे लोग यहां नहीं रहते...