विदेशी कार निर्माताओं ने चेन्नई का खानपान कैसे बदल दिया?

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- Author, सिमरित माल्ही
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
अमरीका के सुशी व्यंजनों से परिचित होने से एक दशक पहले ही दक्षिण भारत के तटीय शहर चेन्नई का एक रेस्तरां स्थानीय टूना मछली से साशिमी बनाता था.
अकासाका नाम का यह छोटा जापानी रेस्तरां चेन्नई के भीड़भाड़ भरे चौराहे के पास एक बिल्डिंग के पीछे बना था.
इसके निजी कमरे और घर में बनी बार्ली टी चेन्नई के अति-व्यस्त और शोरगुल से भरे रेस्त्रां से बिल्कुल अलग थे.
स्थानीय रेस्तरां सांभर-वडा परोसते थे, जिनको खाने वालों के पास इतना समय भी नहीं होता कि वे कुर्सी पर बैठकर आराम से खाना खा सकें.
साल 1996 में जब यहां जापानी रेस्तरां खुला तो ये तुरंत क़ामयाब हो गया. रान तकायामा अकासाका में काम कर चुके हैं.
रान तकायामा कहते हैं, "कई बार तो यहां लोगो की इतनी लंबी लाइन लगती थी कि बिल्डिंग गेट से लेकर मेन रोड तक लोगों को खड़े होना पड़ता था."

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एफ़डीआई ने बदली सूरत
रान तकायामा की राय में "ये रेस्तरां बहुत लोकप्रिय हुआ, क्योंकि यहां के प्रोडक्ट बहुत ही उम्दा थे." उससे पांच साल पहले (1991 में) भारत ने अपने बाज़ार को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोला था.
तब चेन्नई महानगर की जगह सिर्फ़ शहर जैसा था. जे जयललिता तमिलनाडु की नई-नई मुख्यमंत्री बनी थीं.
एफडीआई को मंजूरी मिलने के कुछ ही दिनों बाद वह सत्ता में आई थीं. उन्होंने कार बनाने वाली कंपनियों को चेन्नई लाने में सक्रियता दिखाई.
जयललिता की कोशिशें रंग लाईं. मित्सुबिशी, निसान, ह्युंदई और यामाहा ने चेन्नई के बाहर अपनी फैक्ट्रियां लगाईं.
ह्युंदई ने इस शहर पर ख़ास तौर पर असर छोड़ा, क्योंकि एक साथ 3,000 कोरियाई कर्मचारी इसकी फैक्ट्री में काम करने के लिए चेन्नई आए.

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ग्राहकों की कमी नहीं
आज इस शहर में करीब 10 हजार विदेशी काम करते हैं, जिनमें से ज़्यादातर एशियाई हैं.
कार बनाने वाली फैक्ट्रियां स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) में बनी हैं, जो शहर से ज़्यादा दूर नहीं हैं.
श्रीपेरूम्बदूर एसईज़ेड चेन्नई से 50 किलोमीटर दूर ऑटोमोटिव कॉरीडोर पर बना है. हाईवे पर आते ही कोरियाई भाषा के संकेत चिह्न मिलने लगते हैं.
वहां कोरियाई सुपरमार्केट हैं, जापानी होटल हैं और एक बड़ा बुक स्टोर भी है. दक्षिण भारत की भयंकर गर्मी के बीच ये सारी सुविधाएं पूरी तरह वातानुकूलित हैं.
यहीं 20 साल पहले खुला अरिरंग भी है जो शहर का पहला कोरियाई रेस्त्रां है. अरिरंग को 50 साल के कोरियाई जो सांगयुन चलाते हैं.
सांगयुन ने भारत आकर ही क़ामयाबी पाई है. 1990 के दशक में वह एक कोरियाई कंपनी में काम करने चेन्नई आए थे. भोजन के प्रति दीवानगी के कारण वह यहीं रह गए.
चेन्नई वालों की पसंद
अरिरंग के बाद उन्होंने दूसरे कई रेस्त्रां भी खोले. इनके साथ वह ह्युंदई की फैक्ट्री में कैंटीन भी चलाते हैं.
जो के कोरियाई व्यंजनों में पोर्क बॉसम (उबला हुआ सुअर का सुगंधित गोश्त) और डक बुलगोगी (भुना हुआ मसालेदार बत्तख) शामिल है.
ये आकर्षक दिखते हैं और जायके से भरपूर होते हैं. इन्हें देखकर रसम (टमाटर से बना सूप) और रेड फिश करी की याद आती है जिनको चेन्नई में बहुत पसंद किया जाता है.
जो के बनाए व्यंजनों को स्थानीय लोग भी चाव से खाते हैं. इस तरह वह यहां पाककला के अग्रदूत बन गए हैं.
जो कहते हैं, "इनसोल मेरे सबसे पुराने रेस्तरां में से एक था जिसने भारतीयों को कोरियाई व्यंजनों से परिचित कराया."
"वह शहर के बीच में था और हमेशा भरा रहता था. बहुत से भारतीय वहां आते थे."
प्लेट में कोरिया-जापान!
तमिलनाडु दुनिया के 10 सबसे प्रमुख ऑटोमोबाइल हब में से एक के रूप में विकसित हुआ है.
विकास के साथ उत्तर पूर्वी एशिया से यहां आने वाले विदेशियों का असर भी बढ़ा है.
कोरियाई शराब 'सोजू' यहां की सरकारी शराब दुकानों में मिलती है. युवाओं में के-पॉप (कोरियाई पॉप) की प्रतियोगिताएं लोकप्रिय हो रही हैं.
याकीटोरी (भुना हुआ चिकन) के लिए मशहूर जापानी रेस्तरां चेन कुराकू ने भी इस शहर में अपनी ब्रांच खोली है.
चेन्नई में जापानी और कोरियाई व्यंजन परोसने वाले करीब 50 रेस्तरां हैं, जिनमें कम से कम 1,000 स्थानीय लोग काम करते हैं.
जापानियों की दुकानें ज़्यादा बड़ी और महंगी हैं. कोरिया के कुछ लोग जापानी रेस्तरां भी चलाते हैं और कई जगहों पर दोनों तरह के व्यंजन मिलते हैं.
जापान और कोरिया
शहर के आसपास स्थानीय व्यंजन परोसने वाले हजारों रेस्तरां हैं.
चिकन 65 नाम से मशहूर एक डिश के कारण 2015 में नेशनल जियोग्राफिक ने चेन्नई को टॉप 10 फ़ूडी सिटी के रूप में चुना था.
इस डिश के लिए चिकन को मसाले में लपेटकर डीप फ्राई किया जाता है. भारत के प्रमुख अखबारों में लिखने वाली फ़ूड क्रिटिक अमीता अग्निहोत्री चेन्नई में ही रहती हैं.
उनको लगता है कि नये व्यंजनों ने यहां के खानपान पर स्थायी असर छोड़ा है.
"लोग यह जानकर हैरत में पड़ जाते हैं कि हम चेन्नई के लोग जापान और कोरिया के पारंपरिक व्यंजनों के बारे में कितना कुछ जानते हैं."
भविष्य फ़्यूजन का है!
चेन्नई में इडली, डोसा और चीला की फास्ट फ़ूड संस्कृति के सामने टिके रहना मैकडोनल्ड जैसे विदेशी चेन के लिए भी आसान नहीं है.
फिर भी कोरियाई और जापानी रेस्तरां देसी व्यंजनों वाले स्थानीय रेस्तराओं के साथ फल-फूल रहे हैं. रति शेट्टी चेन्नई में रहती हैं और खुद की फाइनेंस सर्विसेज़ कंपनी चलाती हैं.
रति शेट्टी का कहना है कि विदेश में रह चुके भारतीय और अनिवासी भारतीयों के आने से शहर में खाने-पीने का बाज़ार तेज़ी से बदल रहा है.
"अब आप अपने ऑफिस की डेस्क पर ही टेंपुरा या सुशी की डिलीवरी ले सकते हैं. चाय की ज़्यादातर दुकानों में बबल टी उपलब्ध हैं."
चेन्नई के ज़्यादातर लोगों के घरों में मिसो पेस्ट मिल जाते हैं. शहर के कई एशियाई सुपरमार्केट में अब यह आसानी से उपलब्ध है.
हाइब्रिड व्यंजन
रति कहती हैं, "यह खानपान के मामले में पहले से अधिक खुले समाज के निर्माण और बाज़ार की भूख बढ़ने का संकेत है."
दक्षिण भारतीय और पूर्वी एशियाई देशों के ज़ायके को मिलाकर नये व्यंजन भी बनाए जा रहे हैं. कई जापानी रेस्तरां, जिनको भारतीय चला रहे हैं, स्थानीय लोगों को लुभाने के लिए अपना ज़ायका बदल रहे हैं.
वे एक नये तरह का मसालेदार जापानी हाइब्रिड व्यंजन बना रहे हैं. कोरियाई व्यंजनों के साथ इस तरह के प्रयोग कम हुए हैं. जो कहते हैं कि श्रीपेरूम्बदूर में खाने-पीने की कम से कम 20 जगहें हैं जहां सिर्फ़ कोरियाई समुदाय के लोग जाते हैं.
वजह यह है कि एसईज़ेड खुल जाने के बाद शहर के बाहर बने अपार्टमेंट और सुपरमार्केट का फ़ायदा उठाने के लिए विदेशी लोग इनमें रहने चले आए.
बिजनेस के साथ पैसा
उनके कर्मचारी भारतीय ही हैं. मतलब यह कि पहले से ज़्यादा स्थानीय लोग कोरियाई व्यंजनों से अच्छी तरह वाकिफ हो गए हैं.
गिरीश और एल.टी. लेप्सा दोनों जो के अरिरंग रेस्तरां में मिले थे. वे वहीं काम करते थे. वर्षों तक इस बिजनेस में रहने के बाद दोनों दोस्तों ने अपना कोरियाई रेस्तरां खोला- न्यू सोल होटल्स.
ये चेन्नई का पहला कोरियाई रेस्तरां है जो पूरी तरह भारतीयों के हाथ में है. गिरीश ने अरिरंग में वेटर के रूप में शुरुआत की थी और लेप्सा वहां की किचेन में काम करते थे.
लेकिन अब उनके अपने रेस्त्रां में आने वाले व्यापारी एकदम अलग सामाजिक-आर्थिक हैसियत के होते हैं.
पिछले चार साल में कई कोरियाई इस रेस्त्रां के स्थायी ग्राहक बन चुके हैं और भारतीय ग्राहकों की संख्या भी बढ़ रही है.
कोरियाई लोगों के साथ
गिरीश कहते हैं, "वे हमारे कुल ग्राहकों के कम से कम 10 फीसदी के बराबर हैं. उनमें से कई बिजनेसमैन हैं."
"उनको कोरियाई व्यंजनों के बारे में बहुत कुछ पता है. ऐसा लगता है कि कोरियाई लोगों के साथ काम करते-करते उनको इन व्यंजनों का अनुभव मिला है."
जिस देश में भीषण आर्थिक असमानता हो, वहां अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों का कोरियाई स्वाद चखने के लिए आना विदेशी कार निर्माताओं के असर का अहम संकेत है.
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