शेयर बाज़ार में किस महीने में करें निवेश कि ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा हो?

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    • Author, मिरियम क्विक और ब्रायन लुफ़किन
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

"मई में बेचो और दूर हट जाओ"- शेयर बाज़ार में निवेश को लेकर यह पुरानी कहावत है.

परंपरागत रूप से माना जाता है कि गर्मी के महीनों में मई से लेकर अक्तूबर तक शेयर बाज़ार मंदा रहता है और सर्दियों में नवंबर से लेकर अप्रैल तक बाज़ार में तेज़ी रहती है.

कहावत के मुताबिक बसंत में गर्मी शुरू होने से ठीक पहले शेयर बेच देने चाहिए और पतझड़ में, शेयरों की कीमत बढ़ने से पहले उनको फिर से ख़रीद लेना चाहिए.

इसे "हैलोवीन संकेतक" भी कहते हैं. इस कहावत के पीछे बहुत हद तक सच्चाई भी है.

2002 के एक रिसर्च पेपर का निष्कर्ष था कि दुनिया भर के 37 में से 36 विकसित और उभरते हुए बाज़ारों में यह पैटर्न सही पाया गया.

यूरोप में यह पैटर्न विशेष तौर पर मज़बूत था. रिसर्च पेपर में बताया गया कि ब्रिटेन में यह पैटर्न 1694 से ही जारी है.

शेयर बाज़ार पर यह असर निवेशकों के बीच आशावाद के मौसमी उतार-चढ़ाव के कारण हो सकता है.

किसी खास महीने में निवेश की सलाह देने वाली कुछ और कहावतें भी हैं. मिसाल के लिए, "जनवरी इफेक्ट" के मुताबिक साल के पहले महीने में शेयरों की कीमतें बढ़ती हैं.

"सैंटा क्लॉज़ रैली" के मुताबिक क्रिसमस की छुट्टियों के सीज़न में भी निवेशक आशावादी हो जाते हैं और शेयर बाज़ार चढ़ जाता है.

तो क्या शेयर ख़रीदने के लिए साल का कोई एक महीना दूसरे सभी महीनों से बेहतर है?

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मूड बदलने का चक्र

असल में लोग मई में शेयर नहीं बेचते. अमरीका और कनाडा के शोधकर्ताओं ने पाया कि बसंत में निवेशक तेजड़िए बन जाते हैं और पतझड़ में वे एहतियात बरतने लगते हैं.

इस अध्ययन में म्युचुअल फ़ंड की अलग-अलग कैटेगरी में पैसे के प्रवाह को देखा गया. पता चला कि गर्मी के महीनों में लोग जोखिम वाले शेयर भी ख़रीद लेते हैं, लेकिन साल के आखिरी महीनों में वे ज़्यादा जोखिम उठाने को तैयार नहीं होते.

सर्दियों में जोखिम वाले स्टॉक को बेचकर सुरक्षित स्टॉक ख़रीदने की संभावना ज़्यादा रहती है.

बसंत के मौसम में तेज़ी का यह माहौल फाइनेंशियल मीडिया में भी दिखता है.

2014 में छपे एक पेपर में जापान के दो शोधकर्ताओं ने 1986 से 2010 के बीच छपे अख़बारों के लेखों के मूड का विश्लेषण करने के लिए टेक्स्ट माइनिंग तकनीक का इस्तेमाल किया.

उन्होंने पाया कि साल के पहले छह महीने में अख़बार ज़्यादा आशावादी रहते हैं, जबकि आखिरी छह महीनों में वे निराशावादी हो जाते हैं.

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मौसम के अनुसार मूड बदलने के इस चक्र की उत्पत्ति खुद मौसम में हो सकती है.

कुछ अर्थशास्त्रियों के मुताबिक तापमान बढ़ने-घटने, दिन की लंबाई और रोशनी के स्तर से निवेशकों का व्यवहार बदलता है और उसी के मुताबिक बाज़ार भी बदलता है.

लिजा क्रेमर टोरंटो यूनिवर्सिटी में फाइनेंस की प्रोफेसर हैं. उन्होंने मानवीय व्यवहार और निवेश का अध्ययन किया है.

क्रेमर ने पाया कि लोगों के निवेश की आदतों पर मौसम का प्रभाव पड़ता है. वह सीज़नल अफेक्टिव डिस-ऑर्डर (SAD) की तरफ इशारा करती हैं कि कैसे सर्दियों के लंबे, ठंडे और अंधेरे दिन लोगों को निवेश के प्रति निराशावादी बनाते हैं.

"लोगों को यह हमेशा पता नहीं होता कि निवेश पर उनके मूड का भी असर होता है, लेकिन इसके सबूत मिल रहे हैं."

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मौसमी निवेश

2003 में अमरीका और कनाडा के इन्हीं लेखकों ने पता लगाया था कि मौसमी निवेश व्यवहार अलग-अलग तरह के निवेश को वरीयता देने से भी जुड़ा है.

विभिन्न अक्षांश पर बसे देशों और वहां मौसम के अनुरूप सूरज की रोशनी में होने वाले बदलावों को स्टॉक मार्केट इंडेक्स से तुलना करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि शेयरों से होने वाली कमाई के मौसमी चक्र में "SAD इफेक्ट" महत्वपूर्ण भी है और पर्याप्त भी.

सितंबर में सबसे कम मुनाफ़ा हुआ था. फिर वह धीरे-धीरे बढ़ा और दिसंबर के अंत में सबसे ऊपर पहुंच गया. उसके बाद उसमें फिर गिरावट आने लगी और बसंत और गर्मियों में वह पूरी तरह गायब हो गया.

दक्षिणी गोलार्ध के देशों (ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका) में शेयर बाज़ार से होने वाली कमाई का पैटर्न उत्तरी गोलार्ध से छह महीने के अंतर पर देखा गया, जो वहां के मौसम को प्रतिबिंबित करता है.

सबसे महत्वपूर्ण यह कि जो देश ध्रुवों के ज़्यादा निकट थे और जहां सर्दियों के दिन छोटे थे, वहां "विंटर SAD इफेक्ट" ज़्यादा स्पष्ट था.

क्रेमर कहती हैं, "इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि बाज़ार में इतना उतार-चढ़ाव क्यों आता है. यह हमें भावनाओं पर आधारित फ़ैसले लेने से एक कदम पीछे करता है."

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फिर भी, निवेश को लेकर ज़्यादा एहतियात बरतना हमेशा अच्छी बात नहीं होती.

सरकारी बॉन्ड जैसे स्थायी निवेश लंबे समय में जोखिम वाले शेयरों से बहुत कम फ़ायदा देते हैं. जहां जोखिम होता है, वहां कमाई की संभावना ज़्यादा रहती है.

ज़्यादा सतर्कता असल में लोगों को छोटे नुकसान टालने के लिए बड़े जोखिम उठाने की ओर धकेल देती है.

यदि (सर्दियों में) निवेशक ज़्यादा सतर्क हो जाते हैं और सतर्क निवेशकों के लिए मुनाफ़ा सामान्य तौर पर कम होता है तो सर्दियों में बाज़ार बढ़ता क्यों है?

लेखकों के मुताबिक ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सतर्क निवेशक पतझड़ के मौसम में जब जोखिम वाले शेयरों को बेच देते हैं तो उनकी कीमतें घट जाती हैं.

जोखिम उठाने के लिए तैयार लोग उस समय निचले स्तर पर ख़रीदारी करते हैं. चूंकि ये निवेश कम कीमत पर होते हैं, इसलिए सर्दियों के बाद जब बाज़ार चढ़ता है तो इन पर ज़्यादा मुनाफ़ा होता है. लेकिन ध्यान रखें कि यहां कई दूसरी शर्तें भी हैं.

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लकीर के फकीर मत बनिए

मुनाफ़े पर मौसम का असर पड़ता है, लेकिन यह निवेश की पहेली का एक टुकड़ा भर है.

पहली बात, "मई में बेचो" इफेक्ट शेयर की कीमतों को प्रभावित करने वाले कई मौसमी चक्रों में से सिर्फ़ एक चक्र है.

जनवरी इफेक्ट, होलीडे इफेक्ट और टर्न-ऑफ़-द-मंथ इफेक्ट जैसे कई अन्य इफेक्ट भी हैं. ये सब स्मॉल-कैप शेयरों (उन कंपनियों के शेयर जिनकी बाज़ार पूंजी 2 अरब डॉलर से कम हो) को ज़्यादा प्रभावित करते हैं.

दूसरी और महत्वपूर्ण बात, बाज़ार को प्रभावित करने वाले बहुत से कारकों में से मौसम सिर्फ़ एक कारण है.

किसी साल शेयर बाज़ार से होने वाली कमाई मौसमी पैटर्न के उलट भी हो सकती है. बाज़ार में पैसा लगाने के इच्छुक लोगों को थर्मामीटर की तरफ देखने की जगह किसी योग्य वित्तीय सलाहकार की मदद लेनी चाहिए.

वाशिंगटन डीसी की अमरीकन यूनिवर्सिटी में एकाउंटिंग के प्रोफ़ेसर मार्क मा कहते हैं, "स्टॉक मार्केट में मौसम का असर रहता है, लेकिन ऐसा क्यों होता है, इसके मिश्रित कारण या सबूत हैं."

मार्क मा SAD इफेक्ट को मानते हैं, लेकिन यह भी बताते हैं कि सिंगापुर जैसी जगहों पर जहां साल भर तापमान एक जैसा (32 डिग्री के करीब) रहता है वहां भी यह इफेक्ट देखा गया है.

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उतार-चढ़ाव के अन्य कारक

वह जनवरी इफेक्ट की ओर भी इशारा करते हैं कि जनवरी में शेयर बाज़ार से होने वाली कमाई इसलिए ज़्यादा होती है क्योंकि दिसंबर में टैक्स ईयर ख़त्म होता है.

यदि लोगों की कमाई ज़्यादा है तो उन्हें ज़्यादा टैक्स चुकाना पड़ेगा. लेकिन यदि वे पहले ही शेयर बेच दें तो उनकी कर-योग्य कुल आय घट जाती है और वे टैक्स से बच जाते हैं.

मा को लगता है कि निवेश और मुनाफ़े का कोई तय रास्ता नहीं है और लोगों को मौसमी पैटर्न पर भरोसा नहीं करना चाहिए.

आखिरकार यहां एक साथ कई कारक होते हैं, खासकर शेयर बाज़ार जैसी जगह पर, जिसके बारे में कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता.

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विशेषज्ञों की राय

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में फाइनेंस के असिस्टेंड प्रोफ़ेसर हरन सेग्राम कहते हैं, मौसम पर ध्यान रखना अच्छा है, लेकिन आपको दूसरे सबूतों की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए, जैसे किसी कंपनी में विकास की संभावना या पिछले कुछ वर्षों के प्रदर्शन.

"मैं किसी खास महीने में निवेश करने की जगह स्टॉक के फंडामेंटल्स पर यकीन रखने वाला हूं, जैसे- नकदी का प्रवाह, जोखिम और विकास की संभावना."

इस लेख के लिए जिन विशेषज्ञों से बात की गई, सबने यही कहा कि मौसम पर ध्यान रखिए, लेकिन सबसे ज़रूरी यह है कि कम जोखिम लीजिए.

हो सकता है कि छोटे दौर में आपको कम मुनाफ़ा हो, लेकिन यह सोच लंबे दौर में बहुत काम आएगी. धीरे-धीरे पैसे लगाइए और साल दर साल इसे बढ़ने दीजिए.

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धीरज का खेल

सेग्राम इससे सहमति जताते हैं. निराशा से भरी सर्दियों के महीने में भी अपने निवेश फ़ैसले इस आधार पर न लें कि आपको कैसा लग रहा है.

क्रेमर कहती हैं, "पैसे से लोगों का भावनात्मक रिश्ता होता है. वे इसे भविष्य में सुख के साधन के रूप में देखते हैं. लेकिन लोग पैसे के बारे में सोच-समझकर फ़ैसले नहीं लेते. मैं अपने छात्रों से कहती हूं कि यह धीरज रखने का खेल है."

वह कहती हैं, "रिटायरमेंट बचत के लिए नियमित निवेश कीजिए. सफलता का यही सबसे सही रास्ता है. जब हम बाज़ार से ज़्यादा चतुराई दिखाते हैं तो अक्सर खुद का नुकसान करते हैं."

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