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लाहौर हमले के साइड इफ़ेक्ट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और टेलीविज़न देखने के शौकीन वहाँ का मध्य वर्ग ग़ुस्से में है. चिंता ये थी कि क्या आईपीएल को इस कारण रद्द कर देना चाहिए कि मैच और मतदान एक समय हो रहे हैं और क्या आईपीएल को टालने से दुनियाभर में ये संदेश नहीं जाएगा कि हमने आतंकवाद के आगे हथियार डाल दिए हैं? तर्क ये है कि भारत पाकिस्तान की तरह नहीं है और अगर हमने आईपीएल रद्द किया तो हमें एक कमज़ोर देश के रूप में देखा जाएगा. अजीब बात ये है कि देश की अस्मिता का सवाल एक ऐसी प्रतियोगिता से जोड़ा जा रहा है, जहाँ खिलाड़ियों को ज़रूरत से ज़्यादा पैसे दिए जा रहे हैं. उद्योग जगत तो अपना ब्रांड बेचता है, बोर्ड जम कर पैसा बनाता है और पूरा भारत इसे टीवी पर देखता है. ऐसा लगता है कि किसी को इसकी फ़िक्र नहीं कि क्या खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षाकर्मी उपलब्ध हैं या नहीं. या फिर देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की आवश्यकता है. उपलब्धि यह उस उद्योग जगत की बड़ी जीत है, तो यह जनमत तैयार करने में सफल हो गया है कि आईपीएल का मतलब भारत और राष्ट्रीय अस्मिता है.
और तो और लाहौर की घटना के बाद भी उनकी सोच नहीं बदली कि कम से कम वे इस पर विचार तो करें कि हो सकता है कि देश के पास चुनाव कराने और उसी समय होने वाले आईपीएल के लिए पर्याप्त सुरक्षाकर्मी न हों. मुंबई की घटना के बाद भी उन्हें अपनी पुलिस और अर्ध सैनिक बलों पर पूरा भरोसा था. कितनी मर्मस्पर्शी बात है. लेकिन गंभीर बात ये है कि लाहौर में जो कुछ भी हुआ, वो बहुत भयंकर था. इस घटना के बाद क्रिकेट पहले जैसा नहीं रह पाएगा. ख़ास भारतीय उप महाद्वीप में. श्रीलंका के खिलाड़ियों पर हुआ हमला क्रिकेट के दिल पर हमला है, ये क्रिकेट की अर्थव्यवस्था पर हमला है. और इसका केंद्र है भारत. दुष्परिणाम भारत की वित्तीय राजधानी में हमला करके आतंकवादी जो हासिल करना चाहते थे, वो लाहौर की घटना के बाद पूरी हो गई है.
हमारे जैसे लोग ये पैरवी करते थे कि खेल और राजनीति को नहीं मिलाना चाहिए और ये कहते थे कि खेलों को लोगों के बीच संबंधों को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए. हम ख़ुशी-ख़ुशी अपने को निर्दयी भी कहलाने को राज़ी थे. ये भरोसा कि आतंकवादी कभी भी किसी क्रिकेटर को नुक़सान नहीं पहुँचाएँगे, ग़लत साबित हुआ. और तो और क्रिकेटर भी ऐसा ही सोचते थे. लेकिन ऐसा हुआ और अब दुनिया का एक और अशुभ आयाम सामने आ गया है. इसका दुष्परिणाम भारतीय क्रिकेट पर भी पड़ेगा. हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि पूरे उप महाद्वीप में क्रिकेट का क्या भविष्य होगा. हम भारत के लोग शायद अब भी ये समझ नहीं पाए हैं कि पश्चिमी देशों की नज़र में भारत भी अतिसंवेदनशील देश है, जहाँ आतंकवादी हमले हो सकते है और वो भी विदेशी लोगों पर. मुंबई हमलों के बाद भारत के बारे में ये सोच अब सच्चाई बन गई है. हम सब ने उन इंग्लिश क्रिकेटरों की सराहना की, जो वनडे सिरीज़ रद्द करने के बाद टेस्ट मैच खेलने भारत आए. इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया की टीमों का अतीत देखकर कई लोगों को यही लगा कि अगर आईपीएल ना होता, तो मुंबई हमलों के बाद इंग्लैंड की टीम वापस नहीं आती. इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन ने इंग्लैंड के खिलाड़ियों के भारत लौटने के फ़ैसले का स्वागत किया था. लेकिन अब वे कह रहे हैं- एशियाई देशों में 2011 के विश्व कप का आयोजन जोखिम में है. मुंबई के बाद मैंने इसकी पैरवी की थी कि इंग्लैंड को भारत जाना चाहिए. लेकिन शायद मैं ग़लत था. बदल गई है सोच ये सिर्फ़ नासिर हुसैन की बात नहीं है. कई अन्य क्रिकेटर अब ये सोच रहे हैं कि क्या उन्हें आईपीएल में खेलने का रिस्क लेना चाहिए या नहीं.
न्यूज़ीलैंड के क्रिकेटर जैकब ओरम का बयान सभी क्रिकेटरों की भावना लगती है. उन्होंने कहा- आईपीएल के कारण ऐसा वित्तीय दरवाज़ा खुला है, जो मैंने सोचा नहीं था. लेकिन जो हो रहा है उससे नज़र चुरा लेना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. मैं क्रिकेट को इतना प्यार नहीं करता कि मैं किसी देश में जाकर अपनी जान जोखिम में डाल दूँ. संक्षेप में कहूँ, तो फ़ैसला लेने में जोखिम की बात प्रमुख हो गई है. लाहौर की घटना के बाद क्या कोई ये कह सकता है कि 'उनका' रुख़ 'हमारे' ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह से पनपा है? भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट ख़तरे में है- ऐसा कहना भी बहुत हल्का बयान है. क्रिकेट प्रबंधन को एक कुशल व्यक्ति की आवश्यकता है, जो उसे इस रसातल से निकाले. हालाँकि आख़िरी नेतृत्व तो राजनेताओं को ही देना होगा. क्रिकेट का भविष्य इस उपमहाद्वीप की राजनीति से गहरे से जुड़ा हुआ है. अगर शांति नहीं होगी, तो क्रिकेट भी बहुत कम होगा. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं) |
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