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चौथी पारी में बड़े स्कोर का आकर्षण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्बादी और विनाश की कुछ घटनाओं के बीच साल 2008 भले ही कुछ निराशाजनक रहा हो, लेकिन भारत में खेलों के लिहाज़ से ये साल अच्छा रहा और ख़ासकर क्रिकेट के दीवानों के लिए तो शानदार रहा. बीजिंग ओलंपिक में सोने पर निशाना साधने के बाद अभिनव बिंद्रा की प्रतिक्रिया की याद के अलावा पूरे साल क्रिकेट का सुरूर हावी रहा है पूरे साल जब-तब क्रिकेटर जश्न मनाते रहे. ये सही है कि ऑस्ट्रेलिया का सिंहासन हासिल करने की होड़ में भले ही दक्षिण अफ्रीका भारत से आगे हो गया हो, लेकिन अगर आप भारतीय हैं और टेलीविज़न देखने के आदी हैं तो आपकी नज़र में भारत पहले ही दुनिया की नंबर एक टीम बन चुकी है. बेशक मौजूदा टीम की ताक़त को देखते हुए भारतीय टीम नंबर वन होने का माद्दा रखती है, लेकिन इसके लिए अभी काफ़ी कुछ करना होगा. दावेदार ऐसा नहीं कि महज एक घरेलू सिरीज़ में जीत के बाद भारत को विश्व चैंपियन घोषित कर दिया जाए. नंबर वन की इस दौड़ में भारतीय टीम उस वक़्त गौरवान्वित हुई जब इंग्लैंड के ख़िलाफ़ चेन्नई टेस्ट में उसने 387 रन के लक्ष्य का सफलतापूर्वक पीछा किया. टेस्ट क्रिकेट का इतिहास बताता है कि चौथी पारी में 250 रन से अधिक का लक्ष्य कतई आसान नहीं होता. उस पर 350 से अधिक रन का लक्ष्य पाना भारतीय टीम की योग्यता और मानसिक मज़बूती बताने के लिए काफ़ी है.
लेकिन दक्षिण अफ़्रीका इस मामले में भी एक क़दम आगे निकल गया और उसने विदेशी ज़मीन पर चौथी पारी में 400 से अधिक रनों का लक्ष्य हासिल कर लिया और साबित किया कि चैंपियन का तमगा पहनने का क्यों वो सही हक़दार है. एक कमज़ोर टीम के जाँबाज प्रदर्शन की तरफ़ भी खेल प्रेमियों का ज़्यादा ध्यान नहीं गया. बांग्लादेश जैसी कमज़ोर मानी जाने वाली टीम ने चौथी पारी में 400 रन बनाए. बांग्लादेश भले ही वो टेस्ट हार गया, लेकिन उस टीम के ख़िलाफ़ इतने रन बनाना हर्गिज़ आसान नहीं था, जिसमें मुथैया मुरलीधरन जैसा विश्वस्तरीय स्पिनर हो. यहाँ तक कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम भी टेस्ट मैच के पाँचवें दिन मुरलीधरन का सामना करने से घबराती है. साज़िश तो क्या चौथी पारियों के ये स्कोर महज एक तुक्का है या फिर टीमें आखिर में बल्लेबाज़ी करने और बड़ा स्कोर बनाने के लिए मानसिक रूप से मज़बूत हो गई हैं. या फिर दुनिया भर में विकेट पहले के मुक़ाबले बल्लेबाज़ों के लिए धीमे और आसान हुए हैं और इन पर गेंदबाज़ों को जूझना पड़ता है. जो साज़िश या षडयंत्र जैसी बातों में यकीन रखते हैं उनके लिए ये मानना बिल्कुल आसान है कि क्रिकेट में पैसा झोंकने वाली टेलीविज़न कंपनियाँ और प्रायोजक कतई नहीं चाहते कि टेस्ट मैच पाँच दिन से पहले ख़त्म हो और वे ये भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि ऐसे विकेट न बनाए जाएँ जो गेंदबाज़ों के माफ़िक हों. वजह चाहे कुछ भी हो, इसमें कोई शक नहीं कि चौथी पारी में भारी भरकम बनने से टेस्ट क्रिकेट का आकर्षण बढ़ा है. ये टेस्ट क्रिकेट के लिए ऑक्सीजन कही जा सकती है. और अगर लंबे समय तक ऐसा ही चलता रहा तो कप्तानों को विपक्षी टीमों के लिए लक्ष्य तय करने में बहुत सावधानी बरतनी होगी. |
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