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अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बनते-बिगड़ते संबंध | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का बहुत क़रीबी नाता है. भारत सरकार ने जैसे ही क्रिकेट टीम के पाकिस्तान दौरे को लाल झंडी दिखाई, इस फ़ैसले का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ की गतिविधियों पर असर साफ़-साफ़ दिखने लगा. भारतीय क्रिकेट टीम के पाकिस्तान न जाने से पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (पीसीबी) को भारी आर्थिक नुक़सान तो होगा ही साथ ही 2009 में होने वाली चैंपियंस ट्राफ़ी पर भी सवालिया निशान लग गया है. वर्ष 2008 की चैंपियंस ट्राफ़ी को एक साल पाकिस्तान में ही आयोजित करवाने के लिए आईसीसी पर भारत ही दबाव डाल रहा था, भले ही इससे श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड नाराज़ हो गया. लेकिन अब सारे समीकरण बदल चुके हैं. श्रीलंका पहले ही चैंपियंस ट्राफ़ी नकारे जाने और इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के कारण उसके इंग्लैंड दौरा रद्द होने से नाख़ुश था. इसके बदले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की पेशकश को नज़रअंदाज़ करते हुए श्रीलंका के अधिकारियों ने 'विद्रोही' इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) के खिलाड़ियों पर घरेलू मैचों में हिस्सा लेने पर लगा प्रतिबंध हटा लिया. अब पीसीबी भी जल्द ही ऐसा करने वाला है. इंग्लैंड में तो यह पाबंदी कभी थी ही नहीं. अब बीसीसीआई पर आईसीएल के आयोजकों से समझौता करने का दबाव बढ़ने लगा है. यही कारण है कि इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) को ख़ुश करने के लिए भारत आईपीएल के कुछ मैचों को वहाँ भी कराने की पेशकश कर रहा है. ज़ाहिर है, बात आमदनी की है और ईसीबी को वैसे भी एलेन स्टेनफ़ोर्ड के कारण भारी नुक़सान होने का ख़तरा पैदा हो गया है. पर सबसे रोचक बात यह होगी कि अगर पाकिस्तान अपनी राष्ट्रीय टीम में आईसीएल के खिलाड़ियों को शामिल करता है और श्रीलंका इसपर कोई आपत्ति नहीं करता है तो इससे बीसीसीआई की साख पर ज़बरदस्त धब्बा लगेगा. आख़िर पाकिस्तान और श्रीलंका चाहते भी तो यही हैं.
भारत का जबाव भी बड़ा सीधा सा है. आईसीसी पर चुपके से दबाव बनाया जा रहा है कि एलीट पैनेल का कोई भी अंपायर पाकिस्तान-श्रीलंका के बीच होने वाली श्रृंखला के लिए न भेजा जाए. आईसीसी ने कह भी दिया है कि इस श्रृंखला के लिए अंपायरों के नाम तय करने से पहले वह पाकिस्तान के सुरक्षा हालात की जांच करना चाहता है. मतलब साफ़ है कि आईसीसी के अंपायर पाकिस्तान नहीं जाएँगे तो श्रृंखला के टेस्ट मैचों को अधिकारिक मान्यता ही नहीं मिलेगी. चाल बड़ी गहरी है क्योंकि अगर मैच ग़ैर अधिकारिक घोषित हो गए तो उनमें कौन खेलता है, इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है. इसके साथ ही इससे टेलीविज़न से पीसीबी को होने वाली कमाई पर भी गहरा असर पड़ेगा. टेन स्पोर्ट्स ने साफ़ तौर पर कह दिया है कि भारत-पाकिस्तान श्रृंखला नहीं होने के कारण वह पीसीबी के साथ हुए 12 करोड़ डालर के अनुबंध पर पुनर्विचार करने पर मजबूर है. एक बात तो तय है कि दक्षिण एशिया के चार देशों का जो गुट था वह अब टूट चुका है. भारत का आर्थिक दबदबा तो बरकरार है पर अपनी बात मनवाने की उसे अब भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है. बीसीसीआई के अधिकारियों पर दबाव है कि वे विद्रोही आईसीएल से समझौता कर लें. पर शायद यह 2009 के आईपीएल से पहले नहीं हो पाएगा क्योंकि नई टीमों के आने से मैचों के कार्यक्रम में भारी फेरबदल की ज़रूरत पड़ेगी. पर कुछ महीने पहले जो बात असंभव दिख रही थी अब उसके पूरे होने के आसार नज़र आ रहे हैं. आखिर आईसीएल के आयोजक भी सिर्फ़ मूँछ की लड़ाई में पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं. अगर सुलह हो गई तो उन्हें भी भारी फ़ायदा होगा.
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों का असर आईपीएल पर भी सीधे-सीधे पड़ सकता है. आईसीसी को किए गए वादे के मुताबिक अपने बोर्ड की अनुमति के बिना बीसीसीआई किसी खिलाड़ी को आईपीएल में खेलने की इजाज़त नहीं देगा. इसी बात का फ़ायदा उठाते हुए पीसीबी अपने खिलाड़ियों को इजाज़त देने में देर कर रहा है. दौरा रद्द किए जाने के तुरंत बाद बीसीसीआई के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए पीसीबी ने आईसीसी का दरवाज़ा भी खटखटाया था.पर राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की अपनी नीति की दुहाई देते हुए आईसीसी ने कोई क़दम उठाने से साफ़ इनकार कर दिया. आख़िर भारत के ख़िलाफ़ कुछ भी होता तो इंग्लैंड का ज़िम्बाब्वे दौरा रद्द किए जाने का फ़ैसला तुरंत ही उठने लगता. पर पाकिस्तान इतनी आसानी से हार नहीं मानेगा और न ही भारत उसे बहुत अधिक छूट देने के लिए राज़ी दिख रहा है. हैरानी की बात नहीं है कि भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में आई खटास का असर अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट पर साफ़ दिखाई ही नहीं पड़ रहा है बल्कि आईसीसी के बाकी सदस्य अपना उल्लू भी सीधा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. आख़िर भारत पर धौंस जमाने का मौक़ा बार-बार नहीं मिलता है. |
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