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शनिवार, 13 दिसंबर, 2008 को 11:40 GMT तक के समाचार
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टेस्ट क्रिकेट का तमाशा

चेन्नई

क्या हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो वो कहती है जिसका अर्थ कुछ और होता है या उसका अर्थ वो होता है जो वो कहना नहीं चाहती.

भारत इस समय ग़ुस्से में है, जहाँ सत्ताधारी अभिजात्य वर्ग ख़ून का प्यासा है और देश के दुश्मनों से ख़ूनी प्रतिशोध के लिए गुर्रा रहा है.

इसे खलनायक की तलाश है और वह चाहता है कि पत्थर मार-मार कर उसकी जान ले ली जाए. लेकिन ये तलाश शायद ही हमें अपने अंदर देखने, अपना आकलन करने या फिर ख़ुद को आईना दिखाने की ओर ले जाती है.

कहा जाता है कि आईना कभी झूठ नहीं बोलता लेकिन यहाँ भी यह वही प्रतिबिंबित करता है, जो हम देखना चाहते हैं. ख़ूबसूरत और बदसूरत चीज़े साथ-साथ ही चलती है..क्या वाक़ई ऐसा होता है?

आप ये पूछ सकते हैं कि जो कॉलम खेल पर केंद्रित है, वहाँ ऐसी दार्शनिक बातें क्यों हो रही हैं.

लेकिन पिछले कुछ दिनों के दौरान टेस्ट क्रिकेट देखने और फिर उसके बारे में पढ़कर मैं ऐसे विचलित हुआ, जैसे मुझे खेलों की निरर्थकता का सार पता चल गया हो और जो क्षणिक रोमांच इससे मिलता था, उसका अब कोई मतलब नहीं रह गया हो.

सच से सामना

या ये भी हो सकता है कि मुझे इस सच्चाई का पता थोड़ी देर से चला हो. ये हमेशा से ही ऐसा था. उसी समय से जब दो देशों के बीच कोई खेल खेला गया था.

 चेन्नई भारत के सबसे प्रिय टेस्ट क्रिकेट केंद्रों में से एक है. और अगर ऐसा लग रहा है कि यहाँ के लोगों ने भी टेस्ट क्रिकेट से मुँह मोड़ लिया है, तो अब समय आ गया है कि जब कम से कम भारत में टेस्ट क्रिकेट के भविष्य पर गंभीरता से विचार हो

ऐसा तर्क दिया जा रहा है कि इंग्लैंड के खिलाड़ियों ने भारत आने का इसलिए फ़ैसला किया क्योंकि उन्हें भविष्य में इंडियन प्रीमियर लीग से मिलने वाले आकर्षक अनुबंध के जाने का डर था.

ऐसा सोचने वाले बहुत ज़्यादा हैं. लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने इंग्लैंड की इस पहल का स्वागत किया है. ऐसी पहल जिससे बताने की कोशिश गई है कि आतंकवादियों के इरादे सफल नहीं होंगे.

बदले में भारत ने न सिर्फ़ इंग्लैंड को तहे दिल से शुक्रिया कहा है बल्कि उसका कर्ज़दार भी हो गया है. लेकिन दूसरी ओर पाकिस्तान को टेस्ट खेलने वाले देशों की ओर से ऐसी प्रतिक्रिया क्यों नहीं मिल रही.

पाकिस्तान को अलग-थलग क्यों समझा जा रहा है, इसका भी सार्थक जवाब तलाश करने की कोशिश करनी चाहिए.

चेन्नई के मैदान पर काफ़ी कम दर्शक आए

लोगों ने यह भी सोचा होगा कि भारत पर इंग्लैंड के इस अहसान की बदौलत चेन्नई में भारी भीड़ जुटेगी और ये भीड़ इंग्लैंड के खिलाड़ियों का खड़े होकर स्वागत करेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, मैदान पर बहुत कम लोग नज़र आए.

चेन्नई भारत के सबसे प्रिय टेस्ट क्रिकेट केंद्रों में से एक है. और अगर ऐसा लग रहा है कि यहाँ के लोगों ने भी टेस्ट क्रिकेट से मुँह मोड़ लिया है, तो अब समय आ गया है कि जब कम से कम भारत में टेस्ट क्रिकेट के भविष्य पर गंभीरता से विचार हो.

हममें से कई लोग ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मैच में दर्शकों की कमी का कारण जानने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन चेन्नई जैसे केंद्र पर टेस्ट क्रिकेट से बोरियत दिखने लगे, तो ये बोरियत महामारी है.

अगर यह सच्चाई है, तो क्या इंग्लैंड को वापस आकर भारत में खेलने की ज़रूरत थी? या ये भी हो सकता है कि जब हम असामान्य समय में जी रहे हों तो सांकेतिक चीज़ें घटनाओं से ज़्यादा वास्तविक हो जाती हैं.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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