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शनिवार, 08 नवंबर, 2008 को 12:07 GMT तक के समाचार
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तूफ़ान के पहले का 'ख़ालीपन'

अनिल कुंबले

एक ऐसे स्टेडियम में टेस्ट मैच देखना काफ़ी चिंतित कर सकता है, जो ख़ाली होने के कारण और विशाल दिखता है.

आपको ऐसा अहसास होता है मानों आप किसी ऐसे व्यक्ति के अंतिम संस्कार में हिस्सा ले रहे हैं जिसे दुनिया ने अकेला छोड़ दिया है.

भारत में शायद ही कोई ऐसा स्टेडियम हो जिसमें क़रीब-क़रीब कोई कमी नहीं. इस स्टेडियम में विश्व स्तर की हर सुविधाएँ हैं.

नागपुर के इस बेहतरीन स्टेडियम को राज्य क्रिकेट एसोसिएशन ने बनवाया है. जिसके अध्यक्ष शशांक मनोहर इस समय भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के भी प्रमुख हैं.

लेकिन दुख की बात ये है कि ये बेहतरीन स्टेडियम टेस्ट क्रिकेट की याद में एक मज़ार बन सकता है. दर्शक टेस्ट क्रिकेट की दुनिया की दो शीर्ष टीमों के बीच प्रतियोगिता की अनदेखी क्यों कर रहे हैं?

क्या ज़्यादा क्रिकेट के कारण दर्शक थक गए हैं और उन पर इसका असर पड़ रहा है या फिर उन्हें अब सिर्फ़ फटाफट क्रिकेट ही रोमांचित करता है?

सूझ-बूझ की कमी

दरअसल टेस्ट क्रिकेट की जटिलता को समझने के लिए संयम और सूझ-बूझ की आवश्यता है लेकिन जिन्हें फटाफट क्रिकेट के नाम पर 'जंक फूड' परोसा जा रहा है, उनमें इसकी कमी है.

 अगर टेस्ट क्रिकेट को बचाना है तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड को गंभीर कोशिश करनी होगी. कोशिश दर्शकों को आकर्षित करने की और ऐसी स्थिति न बनाने की, जिसमें क्रिकेट का उत्साही वर्ग भी टेस्ट क्रिकेट के भाड़ में जाने की बात कहने लगे

अब उन्हें संतुष्ट होने के लिए 'मेन कोर्स' भोजन की आवश्यकता नहीं. अगर ये सब सच भी तो इससे यह व्याख्या नहीं हो पाती कि एकाएक दर्शकों की संख्या में इतनी गिरावट क्यों हुई.

नागपुर के पुराने स्टेडियम में भारतीय टीम को अभ्यास करते देखने आने वालों की संख्या उन लोगों से ज़्यादा है जो नए स्टेडियम में मैच देखने जा रहे हैं. ऐसा क्यों?

नागपुर का नया स्टेडियम मुख्य शहर से एक घंटे की ड्राइव पर है. लेकिन सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की कमी के कारण इसे लाभ नहीं हो रहा.

और तो और टिकट पूरे पाँच दिनों के लिए बिक रहे हैं न कि प्रतिदिन के हिसाब से. हालाँकि टिकटों की क़ीमत 750 से 1000 रुपए तक ही है.

लेकिन मुझे नहीं पता कि इस कारण बोर्ड अधिकारियों की नींद उड़ी है या नहीं, क्योंकि उनका ख़ज़ाना तो पहले से ही भरा हुआ है. उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि टेस्ट क्रिकेट देखने दर्शक नहीं आ रहे क्योंकि उन्होंने पहले से ही लाभ कमा लिया है.

उन्होंने ख़ूब पैसा लगाकर इतने बड़े स्टेडियम बना लिए हैं और वे जानते हैं कि असली मनोरंजन को ट्वेन्टी-20 मैच ही देते हैं. इन मैचों के दौरान इतनी भीड़ होती है कि बड़ा से बड़ा स्टेडियम भी छोटा दिखने लगता है.

इन मैचों के लिए टीवी दर्शक भी ख़ूब होते हैं जहाँ से बोर्ड को ख़ूब पैसे मिलते हैं. जब भारतीय बोर्ड अपनी कमाई में से राज्य क्रिकेट एसोसिएशनों को हर साल 25 से 30 करोड़ रुपए दे रहा हो, तो उन्हें इस बात की चिंता कहाँ कि दर्शक मैच देखने आते हैं या नहीं.

कोशिश

क़रीब एक दशक पहले जब पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन ने मोहाली में एक शानदार स्टेडियम बनाया तो दुनियाभर ने इसकी सराहना की. भारत में मोहाली से पहले ऐसा स्टेडियम नहीं था, जहाँ इतनी सुविधाएँ हो.

क्या बीसीसीआई की नींद टूटेगी?

अधिकारियों को इससे कोई मतलब नहीं था कि यह स्टेडियम ऐसी जगह बन रहा है जहाँ क्रिकेट की कोई परंपरा नहीं रही है. क्रिकेट मैचों में दर्शकों की कम रुचि का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि आईपीएल मैचों के दौरान भी मोहाली का स्टेडियम भर नहीं पाता था.

अगर क्रिकेट एसोसिएशन पटियाला, अमृतसर या जालंधर में एक स्टेडियम बनवाते तो उन्हें ऐसी शर्मनाक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता और स्टेडियम को भरा-पूरा दिखाने के लिए स्कूली बच्चों को मुफ़्त की सैर न करानी पड़ती.

नागपुर में हमें बताया गया कि कुछ वर्षों के बाद शहर का और विस्तार होगा और स्टेडियम के आसपास की जगह भरी-पूरी होगी. तो उज्ज्वल भविष्य के लिए यह बर्दाश्त किया जा रहा है.

संभव है ये सच हो. लेकिन एक चीज़ धीरे-धीरे स्पष्ट हो रही है. अगर टेस्ट क्रिकेट को बचाना है तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड को गंभीर कोशिश करनी होगी.

कोशिश दर्शकों को आकर्षित करने की और ऐसी स्थिति न बनाने की, जिसमें क्रिकेट का उत्साही वर्ग भी टेस्ट क्रिकेट के भाड़ में जाने की बात कहने लगे.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के स्पोर्ट्स सलाहकार हैं)

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