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शुक्रवार, 17 अक्तूबर, 2008 को 13:26 GMT तक के समाचार
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सपने को सच्चाई में बदलने वाला शख़्स

सचिन तेंदुलकर

हिमाचल प्रदेश के उना शहर की वो एक कड़कड़ाती सर्दी वाली शाम थी. इस सर्द मौसम के बीच मैं सड़क के किनारे एक दूकान पर चाय की चुस्की ले रहा था.

हमसे कुछ ही दूरी पर दो किशोर भी चाय का आनंद ले रहे थे. मुझसे इन लड़कों में से एक को ध्यान से देखने को कहा गया. उस समय वो लड़का 15 वर्ष से भी कम उम्र का था और इस शहर में एक ज़ोनल वनडे मैच खेलने आया था.

लेकिन उसके स्पेशल होने का ये कारण नहीं था. उस उम्र में उसकी अदभुत बल्लेबाज़ी शैली के कारण क्रिकेट विशेषज्ञों ने यह भविष्यवाणी की थी लड़का आगे चलकर कारनामा करेगा.

उस समय मुझे सलाह दी गई- आप जाकर उस किशोर से हाथ तो मिला लो. वर्षों बाद भी आप इस क्षण को याद करोगे और दुनिया को ये बताओगे कि आप इस किशोर को उस समय से जानते हो जब वो कुछ भी नहीं था.

आज सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट क्रिकेट में एक और ऊँचाई हासिल की तो सहसा मेरी आँखों के सामने वो दृश्य घूम गए.

उस दिन को दो दशक से ज़्यादा समय बीत चुके हैं लेकिन उनके मनमोहक चेहरे, शरारती आँखों और शांत आचरण ने जो छाप दिल पर छोड़ी थी, वो उस समय और जीवंत हो उठती हैं जब-जब तेंदुलकर किसी विश्व रिकॉर्ड को पार करते हैं.

दबाव

जब भी आप उन्हें देखते हैं, आप एक सम्मान वाले अंदाज़ में आश्चर्यचकित होते हैं कि कैसे ये खिलाड़ी मीडिया की समीक्षा के बीच सिर उठाकर खड़ा होता है, कैसे अपनी ख़ुद की उम्मीदों और क्रिकेट प्रशंसकों की ओर से कभी न ख़त्म होने वाले दबाव को झेलता है.

सचिन के नाम कई रिकॉर्ड हैं

यह और भी प्रशंसनीय है कि कैसे सचिन अपनी जड़ से जुड़े रहे और चमक-दमक के जाल में भी नहीं फँसे. उनसे कम उपलब्धि वाले कई लोगों को मान-सम्मान भी मिला और पैसे भी लेकिन उन्होंने अपनी छवि गँवा दी.

कौन सी चीज़ है जो सचिन को सचिन बनाती है? रिजर्व रहना उन्हें समझदार बनाती है. हालाँकि कई बार लोग उन्हें इस कारण घमंडी कहते हैं. लेकिन बल्लेबाज़ी को लेकर उनका जोश, अपनी कला को लेकर उनका धुन उन्हें उस बाहरी दुनिया से अलग करता है, जो सचिन से हमेशा उम्मीद करता है कि वे शतक ही बनाएँ.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में आठ साल बिताने के बाद सचिन ने अपने ऊपर दबाव की बात की थी और ये भी बताया था कि कैसे यह दबाव उनके मस्तिष्क और शरीर पर असर करता है.

ज़िम्मेदारी

वर्ष 1997 में सचिन वेस्टइंडीज़ में भारतीय टीम का नेतृत्व कर रहे थे. वो सिरीज़ न तो टीम के लिए और न ही उनके लिए अच्छी रही.

 अगर वे टीम के कप्तान बने रहते तो हो सकता है कि टीम का नेतृत्व करने के दबाव में उनका करियर समय से पहले ही ख़त्म हो जाता. एक बार उन्होंने स्वीकार किया था कि टीम की कप्तानी का दबाव उन पर इतना ज़्यादा है कि वे शायद अपनी बल्लेबाज़ी पर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे हैं जैसा उन्हें देना चाहिए

उस समय सचिन ने कहा था- मैं अभी भी रात पर नहीं सो पाता ख़ासकर उस रात जब दूसरे दिन मुझे बल्लेबाज़ी करनी होती है. सचिन जानते थे कि वे अपने ऊपर ख़ुद ही कितना दबाव बना लेते हैं और ये आगे चलकर उनके लिए अच्छा नहीं है.

लेकिन सचिन ने कहा था- मैं जानता हूँ कि यह मेरे लिए अच्छा नहीं है. लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकता. क्योंकि मैं ऐसा ही हूँ.

एक बार जब सचिन से ये पूछा गया कि क्या ऐसा भी समय आ सकता है जब आप क्रिकेट से ऊब जाएँ, सचिन का जबाव था- हाँ, मैं जानता हूँ. ऐसा हो सकता है. दरअसल अभी भी ऐसा समय आता है जब मैं बल्लेबाज़ी के दौरान एकाग्रचित नहीं रह पाता, लेकिन ऐसे क्षण कभी-कभी ही आते हैं.

अगर वे टीम के कप्तान बने रहते तो हो सकता है कि टीम का नेतृत्व करने के दबाव में उनका करियर समय से पहले ही ख़त्म हो जाता. एक बार उन्होंने स्वीकार किया था कि टीम की कप्तानी का दबाव उन पर इतना ज़्यादा है कि वे शायद अपनी बल्लेबाज़ी पर उतना ध्यान नहीं दे पा रहे हैं जैसा उन्हें देना चाहिए.

सच्चाई

लेकिन 10 साल पहले जिस एकाग्रता की कमी की बात उन्होंने की थी, वो कप्तानी की ज़िम्मेदारी के कारण था न कि क्रिकेट या बल्लेबाज़ी से ऊब जाने के कारण.

हाल के वर्षों में सचिन की आलोचना तेज़ हुई है

कुछ वर्षों से सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट प्रशंसकों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. कई बार चोट और फिर बढ़ती उम्र के कारण उनकी धार में भी कमी आई है.

सचिन तेंदुलकर भले ही पुराने सचिन जैसी बल्लेबाज़ी न कर पा रहे हो लेकिन 20 साल तक क्रिकेट खेलना और हर प्रतिष्ठित रिकॉर्ड को अपने नाम करना ऐसी उपलब्धि है जिसकी हर व्यक्ति कल्पना ही कर सकता है.

और सिर्फ़ तेंदुलकर जैसी प्रतिभा ही मैदान पर आकर सपने को सच्चाई में बदल सकती है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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