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कौन सच्चा कौन झूठा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय क्रिकेट के लिए वह दिन किसी अन्य दिन की तरह ही था. लेकिन उस दिन मीडिया ने सबसे पहले ख़बर देने की होड़ में हमेशा की तरह अति की. टेलीविज़न चैनल चीख रहे थे, चिल्ला रहे थे. क्योंकि इस दिन ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पहले दो टेस्ट मैच के लिए भारतीय टीम की घोषणा होनी थी. सूत्रों का हवाला देकर ये बताया जा रहा था कि सौरभ गांगुली को क्यों टीम में जगह मिलेगी. क़रीब-क़रीब हर टीवी चैनल के रिपोर्टर इस अंदाज़ से बात कर रहे थे जैसे वे सब कुछ जानते हैं और बोर्ड और गांगुली के बीच तथाकथित समझौते के गवाह हैं. कुछ बेहतर पत्रकारों ने तो अपने आप को ऐसे पेश किया जैसे उन्होंने यह समझौता करवाने में अहम भूमिका निभाई. हमें यह बताया गया कि सिर्फ़ गांगुली ही नहीं सभी वरिष्ठ खिलाड़ियों का सम्मानपूर्ण 'अंत' होगा और इन खिलाड़ियों को समय और स्थान का चुनाव करना होगा. अगर ये समझौते वाली कहानी पर भरोसा किया जाए, तो कई लोगों के लिए यह समझौता वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए बेइज़्ज़ती की बात थी, हालाँकि क़रीब क़रीब सभी इस बात पर सहमत हैं कि धीरे-धीरे इन खिलाड़ियों को टीम से हटना भी चाहिए. हो सकता है कि ये सिरीज़ इस योजना को लागू करने का सही समय न हो लेकिन इतना तो तय है कि देर-सबेर ये तो होना ही है. लेकिन स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) की राह पर चलना सही रास्ता नहीं क्योंकि इससे ऐसा लगता है जैसे खिलाड़ियों पर अहसान किया जा रहा है. और इसी कारण हममें से ज़्यादातर लोगों ने इस पर रोषपूर्ण प्रतिक्रिया दी. सौरभ गांगुली अपने को ज़्यादा असंतुष्ट पा रहे होंगे और ये भी सोच रहे होंगे कि उन्हें की हमेशा पहले क्यों निशाना बनाया जाता है. सूत्रों की कहानी अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत से ही गांगुली सुर्ख़ियों में रहे हैं, जिन्हें आप ज़्यादा समय तक बर्दाश्त भी नहीं करते और न ही उनके बिना रह सकते हैं.
उस दिन शाम तक इस तथाकथित समझौते के बारे में बोलने वाले लोगों की आवाज़ दबने लगी थी. दूसरी ओर गांगुली ने कैमरे के सामने इस समझौते को न सिर्फ़ ख़ारिज किया बल्कि अपनी नाराज़गी भी दिखाई. आख़िर में सामने आए टेस्ट टीम के कप्तान अनिल कुंबले. उन्होंने बताया कि उन लोगों ने इस समझौते के बारे में सुना तक नहीं. उन्होंने पूरे दम और इज़्ज़त के साथ अपनी बात रखी- आप हमारी समीक्षा कीजिए लेकिन सम्मानपूर्वक. पारदर्शिता न दिखाने के लिए मशहूर भारतीय बोर्ड ने उस कथित स्रोत और उनकी बातों को बड़ा बनने दिया. लेकिन दूसरे दिन यही बोर्ड इस कहानी का खंडन करने के लिए आगे आ गया. लेकिन सच क्या है. इसके लिए आपको इंदरजीत सिंह बिंद्रा को पढ़ना पड़ेगा. उन्होंने उन क्रिकेट प्रशासकों के बारे में प्रशंसा के लिए जैसे एक पूरी किताब लिख दी. हमें बताया गया कि शरद पवार से लेकर ललित मोदी तक कितने महान लोग हैं. हो सकता है वे महान हो भी, लेकिन जब तक हमें कोई सूत्र ऐसा नहीं बताते, ये सच नहीं हो सकता. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं) |
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