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......बातें हैं बातों का क्या | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अपने को सदाचारी कहना एक ऐसा मुखौटा है जो पैसे और आराम के लालच में कभी भी तार-तार हो सकता है. बहुत पहले की बात नहीं है कि जब क्रिकेट खेलने वाले पश्चिमी देशों में भारत एक ऐसा देश था जहाँ नंगे साधू और जानवर सड़कों पर घूमते थे. भारत एक ऐसी जगह थी जहाँ क्रिकेट खेलना मजबूरी थी आवश्यक नहीं. कई बार तो दुनिया के शीर्ष खिलाड़ी इस 'असभ्य दुनिया' में खेलने आने से डरते थे क्योंकि उन्हें स्वास्थ्य पर ख़तरा मँडराता दिखता था. लेकिन अब यह धारणा इतनी बदल चुकी है कि वही पश्चिमी दुनिया की निगाह में भारत सबसे ज़्यादा फ़ायदे वाली जगह बन गया है. और तो और अब उसी दुनिया के खिलाड़ी वित्तीय फायदे के लिए थक कर चूर-चूर होने के लिए भी तैयार हैं. हम भारत के लोगों को अपने को छोटा समझने की आवश्यकता नहीं. हम दुनिया के सामने इस मामले पर रक्षात्मक बनने की भी ज़रूरत नहीं कि अब 'गोरे लोग' भी बम हमले के अभ्यस्त हो चुके हैं और ये बम हमले दुनिया में हर जगह हो रहे हैं. ऑस्ट्रेलियाई नैतिकता पर भाषण देने में कभी पीछे नहीं रहते और अपने क़दमों को सही ठहराने के लिए वे अपने को 'निष्पक्ष' भी कहते रहते हैं. दोहरे मापदंड लेकिन दिल्ली में हुए धमाकों के बावजूद भारत दौरे पर आने का फ़ैसला किया है. ये वही ऑस्ट्रेलियाई हैं जिन्होंने पिछले महीने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था.
मैं शिकायत नहीं कर रहा हूँ. हम ऐसा क्यों करे? लेकिन ये चीज़ें उस तर्क को और पुष्ट करती हैं कि अब 'सभ्य दुनिया' पैसे की उतनी ही फ़िक्र करती है जैसी 'असभ्य दुनिया'. और जब मैदान के बाहर की चमचमाती दुनिया आपकी सूची में जुड़ती है तो कौन इन सब चीज़ों से मुँह मोड़ने का पागलपन करेगा. भारत को ये समझने के लिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका दबदबा लगातार बढ़ रहा है, परणामु समझौते की ओर देखने की आवश्यकता नहीं. बिना समझाए-बुझाए ऑस्ट्रेलियाई टीम का भारत दौरे के लिए हामी भरना इसका मज़बूत संकेत है कि अब हम 'पहली दुनिया' का हिस्सा हैं. बेचारा पाकिस्तान! वो क्रिकेट की दुनिया को देता ही क्या है. न तो बड़े-बड़े प्रायोजक और न ही ललचाने वाला इंडियन प्रीमियर लीग. न ही वहाँ ऐसा सामाजिक जीवन है, जो युवाओं को आकर्षित करे. इस तरह के माहौल में आतंकवाद बड़ा ख़तरा बन जाता है और ईमानदारी का मुखौटा पहनना सहूलियत के हिसाब से सही भी हो जाता है. शायद मैंने किसी को ये भी कहते सुना है कि ऑस्ट्रेलिया वाले भारत दौरे की टीम में एंड्रयू साइमंड्स को चुनना ही नहीं चाहते थे और उन्होंने इसके लिए अनुशासनहीनता को सिर्फ़ एक बहाना बनाया. इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि ऑस्ट्रेलियाई भारत में एंड्रयू साइमंड्स को निशाना बनाए जाने को लेकर चिंतित थे. अगर खिलाड़ी ऐसा नहीं करते तो भारतीय दर्शक तो ज़रूर साइमंड्स को निशाना बनाते. और ये दबाव खिलाड़ियों और टीम के लिए बहुत ज़्यादा होता. इसलिए उन्होंने एक माहौल तैयार किया कि बांग्लादेश के ख़िलाफ़ सिरीज़ में ग़लतियों के लिए उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है. ख़ैर. हम इस बात से सहमत हैं कि इस साज़िश वाली बात को इतनी गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं. लेकिन जब हम मुखौटे वाली दुनिया में रहते हैं तो सच्चाई के भी कई चेहरे होते हैं. (लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं) |
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