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'क्रिकेट का अस्तित्व ख़तरे में....' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के लाहौर शहर में श्रीलंकाई क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों पर हुए हमले के बारे में जब सुबह पता चला तो विश्वास नहीं हुआ. लेकिन जब इसकी पुष्टि हुई तो जैसे वर्षों से एक भरोसा था जो टूट गया. राजनीति और आतंकवाद के बीच सरकारों की गर्मागर्मी के दौरान भी मन में ये विश्वास बैठा हुआ था कि खिलाड़ियों पर कभी हमला नहीं होगा. कई अन्य लोगों की तरह मेरा भी ये मानना था कि इस सब के बीच क्रिकेट या खेल जारी रखना चाहिए. चाहे आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में जो भी हो रहा हो उसमें खेल जगत को मोहरा नहीं बनने देना चाहिए. विश्वास टूट गया अब तक आतंकवादियों ने कभी भी क्रिकेट के खिलाड़ियों पर हमला नहीं किया था. ये तो हमें पता है कि क्रिकेटर ख़ासे लोकप्रिय हैं. इसीलिए मन में ये विश्वास था कि आतंकवादी या ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले ऐसा नहीं करना चाहेंगे क्योंकि उनके अपने समुदाय के लोग भी ऐसी हरकत पसंद नहीं करेंगे. लेकिन अब ये विश्वास टूट गया है. इसका सीधा मतलब ये है कि यदि कोई क्रिकेट टीम भारत (जहाँ हाल में हमले हुए हैं) या किसी अन्य देश में न आना चाहे तो कोई ये नहीं कह पाएगा कि यह ग़लत हो रहा है. असर पहले पाकिस्तान पर इसका पहला असर ये होगा कि शायद आने वाले कुछ वर्षों तक टीमें पाकिस्तान नहीं जाएँगी. जब मुंबई पर हमला हुआ था तब भी क्रिकेट जारी रहा था लेकिन अब शायद ऐसा न हो. इन परिस्थितियों में पाकिस्तान के अलग-थलग पड़ने की संभावना को नकारा जा ही नहीं सकता. दूसरा बड़ा असर वर्ष 2011 में क्रिकेट वर्ल्ड कप पर होगा. वर्ल्ड कप के स्थल, उसकी तैयारियाँ, पाकिस्तान का वेन्य के रूप में अस्वीकार्य होना उन पेचीदगियों का हिस्सा होंगे. नई जगह देखनी पड़ेगी, नए सिरे से तैयारियों को देखना पड़ेगा. एक समय था जब टीमें श्रीलंका जाना पसंद नहीं करती थीं. हाल में बंग्लादेश में भी सशस्त्र विद्रोह हुआ है. भारत में आतंकवादी हमले हो चुके हैं. विश्व में क्रिकेट खेलने वाले आठ प्रमुख देशों में से चार भारतीय उपमहाद्वीप में है जो इस खेल को जीवित रखे हुए हैं. बढ़ जाएँगी चुनौतियाँ इन चार देशों ने इस उपमहाद्वीप को क्रिकेट का हब या सेंटर बना दिया है. केवल पैसा ही नहीं, इस क्षेत्र में क्रिकेट की लोकप्रियता है, लाखों फ़ैनस हैं. लेकिन इसके बाद हो सकता है कि इन देशों में खेलने के लिए अन्य देशों के खिलाड़ी आने में हिचकिचाएँ या इनका आना कम हो जाए. यदि बहुत ही ध्यानपूर्वक क्रिकेट प्रबंधक और प्रशासक इन चुनौतियों का सामना नहीं करते तो क्रिकेट का असतित्व ख़तरे में पड़ सकता है. इसीलिए पाकिस्तान में क्रिकेट को ज़िंदा रखना बहुत ज़रूरी है. हो सकता है कि कुछ सालों के लिए मैच न्यूट्रल या निष्पक्ष मैदान पर हों और ऐसे कुछ देशों के नाम सुझाए भी जा रहे हैं. बात क्रिकेट खेलने वाले नौ देशों में से केवल एक में क्रिकेट पर मंडराते ख़तरे की नहीं है. भारत में भी ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं और हो सकता है कि पाकिस्तान के बाद ये खिलाड़ी भारत में आने के बारे में भी ऐसा ही सोचें. इससे पहले इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के दौरान जयपुर में जब धमाके हुए थे तो खिलाड़ियों ने बहादुरी से प्रतियोगिता में भाग लेना जारी रखा था. लेकिन अब जब ख़ुद खिलाड़ियों पर हमला होआ है तो इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है. खिलाड़ियों के बीच अचानक ख़तरे के आभास से जो डर पैदा हुआ होगा, उसका असर उनके खेल पर भी पड़ सकता है. इसका सामना बहुत ही समझदारी के साथ करने की ज़रूरत है. दशकों पहले म्यूनिक ओलंपिक के दौरान खिलाड़ियों पर ऐसा हमला हुआ था लेकिन खेल रुका नहीं. यदि क्रिकेट खेलने वाले देशों में से चार देशों में खिलाड़ी आने से हिचकिचाने लगे तो निश्चित ही क्रिकेट अंतिम सांसे लेने लगेगा.....इस बारे में सबकों सतर्क रहना होगा. (बीबीसी संवाददाता अतुल संगर के साथ प्रदीप मैगज़ीन की बातचीत पर आधारित) |
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