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शनिवार, 28 फ़रवरी, 2009 को 16:32 GMT तक के समाचार
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कितने अलग अलग हैं दोनों क्रिकेट

ये टेस्ट क्रिकेट में ट्वेन्टी-20 की अदा है?
सप्ताह गुज़र गया और छोड़ गया है दिमाग़ में कुछ तस्वीरें. पहली तस्वीर है ट्वेन्टी-20 क्रिकेट की ज़बर्दस्त आपाधापी की.

हज़ारों मील दूर क्राइस्टचर्च और ऑकलैंड में गेंद पर पड़ने वाली बल्ले की चोट, गिल्लियाँ को उड़ाती गेंद की आवाज़ कान के पर्दे को कंपाती है.

स्टेडियम में उत्साह से भरे हज़ारों लोग अपनी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए कोरस में आवाज़ लगाते हैं, मानवीय ऊर्जा का भीषण विस्फोट.

दिमाग़ में एक दूसरी तस्वीर घूमती है, सफ़ेद कपड़ों में खड़ा बल्लेबाज़ तेज़ी से अंदर आती लाल गेंद को कलाई का इस्तेमाल करते हुए एक तरफ़ मोड़ देता है, उसे कोई हड़बड़ी नहीं है.

जो लोग ताक़त के ऊपर कौशल को तरज़ीह देते हैं उन्हें दूसरी तस्वीर ज्यादा सुहानी लगेगी. चंद सौ लोग शांति से बैठकर ध्यान के साथ मैच देखते हैं, ऐसा लगता है जैसे किसी शोकसभा में बैठे हों.

ट्वेन्टी-20 में जब युवराज या मैकुलम जैसे बल्लेबाज़ गेंद को आसमान की सैर कराते हैं तो लगता है कि बल्लेबाज़ ही सब कुछ है, गेंदबाज़ पर तरस आता है. बल्लेबाज़ की ताक़त और गेंदबाज़ की कमज़ोरी का एक गहरा एहसास होता है.

ट्वेन्टी-20 क्रिकेट का स्टेडियम रोम के कॉलोसियम की याद दिलाता है, जहाँ लोगों को भूखे शेर के सामने फेंक दिया जाता था. ट्वेन्टी-20 में बल्लेबाज़ ही शेर होता है.

ये ज़माना ढेर सारे विकल्पों का है और रिमोट के बटन दबाने की देरी है, आपकी मर्ज़ी है कि आप स्टेडियम के हज़ारों लोगों के कोलाहल की आवाज़ और ऊँची कर लें या फिर अगर गेंदबाज़ की धुनाई आपको अमानवीय लग रही हो तो चैनल बदल लें.

टेस्ट मैच में रिकी पॉन्टिंग गेंदबाज़ की स्विंग करती हुई बॉल की लेंथ-लाइन को समझते हैं, अपना स्ट्रोक चुनते हैं, एनटिनी या स्टेन की तेज़ गेंद पर पलक झपकते ही सही निर्णय लेना कोई आसान काम नहीं है.

पॉन्टिंग जब कलात्मक संतुलन के साथ अपना पुल शॉट लगाते हैं या गेंद को स्ट्रेट ड्राइव करके सीमारेखा के पार पहुँचाते हैं तो दर्शकों की जैसी प्रतिक्रिया आती है उसका मुक़ाबला क्रिकेट के दूसरे संस्करण से नहीं किया जा सकता.

हर बार जब कैमरा टेस्ट मैच की खाली दर्शकदीर्घा दिखाता है तो अपने घर के आरामदेह कमरे में बैठे हम ये सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि दुनिया कितनी बदल चुकी है और हम उसमें कितने अकेले हैं.

ट्वेन्टी-20 और टेस्ट क्रिकेट के बीच का विरोधाभास इतना गहरा और वास्तविक है कि क्रिकेट को नियंत्रित करने के नाम पर ख़ज़ाने की चाभी अपने पास रखने वाले लोग इन दोनों के बीच कोई पुल नहीं बनाना चाहते.

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