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कौन सानिया मिर्ज़ा.... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
किसी भारतीय समर्थक के मुँह से अगर आप ये बात सुनें तो अजीब लगेगा ना. लेकिन ये है सौ फ़ीसदी सच. विंबलडन के शुरू के दो दिनों के दौरान मुझे ऐसे कई भारतीय समर्थक मिले. एक सज्जन को तो ये भी नहीं पता था कि कौन-कौन से भारतीय खिलाड़ी विंबलडन में खेल रहे हैं. जब मैंने उन्हें सानिया का नाम बताया तो कहने लगे- अच्छा आज मैच है तो देख लेंगे. फिर मुझसे कोर्ट नंबर और मैच का समय पूछने लगे. लेकिन हद को उस समय हो गई जब अमरीका से मैच देखने आईं और हिंदी बोलने वाली एक महिला ने मुझसे कहा- कौन सानिया. अब आप ही बताएँ विंबलडन परिसर में कोई भारतीय मुझसे ये पूछे तो मैं क्या जवाब दूँ. ***************************************************************** सेंटर कोर्ट की सानिया सानिया मिर्ज़ा के मैच में बड़ी संख्या में भारतीय प्रशंसक मौजूद थे. तालियों के बीच सानिया का शानदार खेल जारी था. लेकिन एक दर्शक की टिप्पणी ऐसी थी- जिससे पूरे दर्शक दीर्घा में तालियाँ बजने लगी.
तालियाँ सानिया के शॉट पर नहीं, बल्कि उन सज्जन की बोली पर बजीं. उन्होंने कहा- सानिया हम तुम्हें सेंटर कोर्ट पर देखना चाहते हैं. सभी ने तालियाँ पीट कर जैसे उनका समर्थन किया. वैसे तो सेंटर कोर्ट पर पहले दौर के भी मैच होते हैं लेकिन उनके कहने का मतलब था कि वे सानिया को फ़ाइनल में देखना चाहते हैं. और सानिया ने इस विंबलडन के सफ़र की शानदार शुरुआत की है. ग्रास कोर्ट पर उनका शानदार खेल आगे भी जारी रहता या नहीं- ये तो देखने वाली बात होगी और इसी पर निर्भर करेगा उनका 'सेंटर कोर्ट' पर खेलना. ***************************************************************** लीनिंग टॉवर ऑफ़ कार्लोविच
विंबलडन के दूसरे दिन कोर्ट नंबर पाँच पर फ़्रांस के फ़्रैबिस संतारो और क्रोएशिया के इवो कार्लोविच के बीच मैच चल रहा था. कार्लोविच काफ़ी लंबे हैं तो उनके मुक़ाबले संतारो की लंबाई काफ़ी कम. दर्शकों की टोका-टाकी के बीच कार्लोविच ने कई बार अपनी लंबाई का फ़ायदा उठाते हुए संतारो के समझदार शॉट को नाकाम कर रहे थे. तभी एक दर्शक से रहा नहीं गया. जब कार्लोविच ने एक ऊँचे शॉट को आसानी से खेल लिया तो उन्होंने टिप्पणी की- आपका नाम तो लीनिंग टॉवर ऑफ़ कार्लोविच होना चाहिए. ***************************************************************** पिकनिक स्पॉट विंबलडन का मज़ा लेने के लिए कोई किस हद तक जा सकता है, इसका अंदाज़ा आपको वहाँ जाकर मिलता है. कोई पाँच घंटे, तो कोई छह घंटे तो कोई सात घंटे लाइन में लगकर टिकट ले पाता है.
टिकट पाने के बाद जब वो अंदर आता है, तो उसे अंदाज़ा मिलता है कि उसने तो कई मैच गँवा दिए हैं. लेकिन वे इसकी कसर पूरी करते हैं ख़ूब मस्ती करके. सुबह-सुबह जब आप विंबलडन के बाहर पहुँचे तो कभी ना ख़त्म होने वाली लोगों की लंबी कतार आपकी बाँट जोहती नज़र आती है. लेकिन शाम होने के बाद विंबलडन के बाहर बाहर से आने वाले लोग अपनी कुटिया भी लगा लेते हैं. टेंट लग जाते हैं, खाना-पीना होने लगता है. सच पूछिए तो विंबलडन कई मायनों में पिकनिक स्पॉट भी है. |
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