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टेनिस जगत में रूस के बढ़ते कदम | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय टेनिस जगत पर अगर नज़र डालें तो रूस इनदिनों टेनिस के नए पावरहाउस के रूप में उभर कर सामने आ रहा है. महिला टेनिस में तो रूसी बालाओं का दबदबा है ही, अब दबे पांव से ही सही लेकिन पुरुष वर्ग में भी रूसी खिलाड़ी दस्तक देने लगे हैं. यूएस ओपन में दो रूसी पुरुष खिलाड़ी सेमीफ़ाइनल तक पहुँचने में कामयाब रहे.
वहीं महिला वर्गा में रूस के दबदबे की ताज़ा मिसाल है यूएस ओपन में रूस की 19 वर्षीय मारिया शरापोवा की जीत. डब्लूटीए रैंकिग पर एक नज़र दौड़ाएँ तो स्पष्ट हो जाता है कि रूस ने महिला टेनिस जगत में किस तेज़ी से क़दम बढ़ाएँ हैं. पहली वरियता भले ही फ्रांस की ऐमिली मॉरेज़मो के नाम हो लेकिन दुनिया की दस चोटी की खिलाड़ियों में चार केवल रूस की हैं. केवल रूस ही ऐसा देश है जिसके 4 खिलाड़ी टॉप 10 में हैं जबकि टॉप-20 में रूस की 6 खिलाड़ी हैं और टॉप-100 में 17. आलम ये है कि कई दिग्गज टेनिस खिलाड़ी देने वाले अमरीका की एक भी खिलाड़ी टॉप-10 में नहीं है-केवल लिंडसे डेवनपोर्ट 12वें नंबर पर है. सामाजिक-आर्थिक बदलाव अब से 10-15 बरस पहले की स्थिति पर नज़र डालें तो महिला टेनिस में रूस की ख़ास मौजूदगी नहीं थी. स्टेफ़ी ग्राफ़,मोनिका सेलेस, मार्टिना हिंगिस,विलियम्स बहनें,लिंडसे डेवनपोर्ट, किम क्लाइस्टर्स- विभिन्न देशों की टॉप खिलाड़ी लेकिन रूस से कोई नहीं. तो आख़िर स्थिति बदलनी कब और कैसे शुरू हुई? वरिष्ठ टेनिस पत्रकार एसके कन्नन कहते हैं कि पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद जब नया रूस बना तो वहीं से हालात बदलने शुरू हो गए. वे कहते हैं, "रूस बनने के बाद चीज़े खुलने लगीं. खिलाड़ियों को ये प्रोत्साहन मिलने लगा कि आप प्रोफ़ेशनल बनें और फिर जो भी आप कमाएँगे वो कमाई आपकी होगी. किसी तरह की रोक-टोक नहीं रही. खिलाड़ियों को काफ़ी आर्थिक आज़ादी मिली." वहीं भारतीय डेविस कप टीम के कप्तान रहे चुके नरेश कुमार का कहना है हैं, "पूर्व सोवियत संघ के विघटन के बाद नया रूस सामने आया. पहले वहाँ का माहौल काफ़ी घुटन वाला था. वहाँ के हालात ऐसे थे कि किसी भी अच्छे से रहना मुमकिन ही नहीं था." सफलता का आगाज़ कुर्निकोवा से..
90 के दशक में रूस ने महिला टेनिस में सफलता का पहला स्वाद चखा अन्ना कुर्निकोवा के रूप में. 1998 तक आते-आते वो डब्लूटीओ की टॉप-20 तक जा पहुँची और 2000 में वो आठवें पायदान तक पहुँच गई. डबल्स में तो उन्होंने कई ग्रैंड स्लैम जीतकर पहले पायदान पर जगह बनाई. लेकिन टेनिस से ज़्यादा वे बतौर 'ग्लैमर गर्ल' मशहूर हुईं और जिस तेज़ी से वो टेनिस के परिदृश्य पर आईं थी उतनी ही तेज़ी से ग़ायब भी हो गईं. लेकिन कुर्निकोवा के जाने के बाद जैसे रूसी महिला खिलाड़िओं का सैलाब सा आ गया. 2004 में रूस की एनेस्तेसिया मिस्कीना ने फ़्रैंच ओपन जीता और ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने वाली पहली रूसी महिला बनीं. उसके बाद शरापोवा ने 2004 में विंबलडन पर क़ब्ज़ा किया और फिर इसी वर्ष स्वेतलाना कुज़्नेत्सोवा ने यूएस ओपन अपने नाम किया. 'जीतने की भूख'
नरेश कुमार का कहना है कि रूस में बदले माहौल ने परिस्थितियों को अनुकूल बनाया लेकिन रुसी महिलाओं की सफलता का असली राज़ है उनमें जीतने की भूख. उनके कहना है, "सबसे बड़ी बात है कि रूसी खिलाडि़यों में जीतने की ज़बरदस्त भूख है, भूख इतनी कि मैच को अंत तक छोड़ती नहीं है, बहुत ही टफ़ होती हैं. " वहीं वरिष्ठ पत्रकार एसके कन्नन का कहना है कि रूस में केवल चार-पाँच वर्ष की उम्र में कड़ा प्रशिक्षण शुरू हो जाता है और ज़्यातातर खिलाड़ी अमरीका में जाकर प्रशिक्षण लेते हैं. वे मारिया शरापोवा की मिसाल देते हुए कहते हैं, "वे जब चार-साढ़े चार साल की रही होंगी जब उनके पिता शरापोवा को लेकर अमरीका चले गए थे.आप सोचिए चार साल की बच्ची अपना घर छोड़ कर जा रही है ताकि करियर बन सके. " महिला वर्ग में सफलता के बाद अब पुरुष वर्ग में भी रूसी खिलाड़ी क़दम आगे बढ़ा रहे हैं. एटीपी रैंकिंग में रूस के निकोलाई डेवीडिएंको चौथी पायदान तक पहुँच चुके हैं. जबकि यूएस ओपन के सेमीफ़ाइनल में पहुँचे रूस के मिखाइल यूज़नी 25 अंकों का छलांग लगाकर 21वें नंबर पर हैं. हालांकि वर्ष 2004 में बेहतरीन शुरुआत के बाद 2005 में ग्रैंड स्लैम प्रतियोगिताओं पर रूसी महिलाओं का क़ब्ज़ा नहीं हो सका था. और विशषेलकों का कहना है कि यही रूसी खिलाड़ियों के लिए बड़ी चुनौती रहेगी- सफलता का स्वाद चखने के बाद सफलता के क्रम को लंबे समय तक बरकरार रख पाना. |
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